क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३४ क्षेमकुतूहलम्
एकं शशाङ्कधवलं दधिशुक्लनीरं
संक्षिमसैन्धवयुतं सह शृङ्गवेरम्।
प्रभृष्टजीरसुरभीकृतमस्य योगा-
दुद्दीपितो भवति जाठरजातवेदाः॥१३॥
जठरजातवेदा दधि योग
शशांक धवल दधि शुक्ल नीर (चन्द्रमा सदृशा श्वेत दधि जलयुक्त), सैंधव-
आर्द्रक प्रभृष्ट जीरक (भुना जीरा) से सुगन्धित पानक के समान निर्माण (सेवनयोग्य)
करते हैं। इससे नष्टप्रायः पाचकाग्नि पुनः प्रदीप्त हो जाती है॥१३॥
शृतक्षीराच्च यज्जातं गुणवद्दधि तत्स्मृतम्।
वातपित्तहरं रुच्यं धात्वग्निबलवर्धनम्॥१४॥
शृतक्षीरज दधि
१. शृतक्षीर (दुग्ध को पूर्णतया पका कर) से बना दधि (दही) गुणवान् (गुणवद्दधि)
माना गया है।
२. इस कोटिका दधि इन गुणों से युक्त है—
१. वातहर २. पित्तशामक ३. रुच्य रोचक (रुचिजनन)
४. धातुवर्धक ५. अग्नि वर्धक ६. बल्य
अथ गव्यस्य गुणनिरूपणम्
गव्यं दध्युत्तमं बल्यं स्वाद पाके रुचिप्रदम्।
पवित्रं दीपनं हृद्यं पुष्टिकृद्दोषनाशनम्॥१५॥
गव्यदधि
गाय के दुग्ध से बना (जमाया) दधि उत्तम होता है (गव्यं दध्युत्तमं), जिसके गुण
जिसमे विविध गुण होते हैं—
१. बल्य २. स्वादु ३. मधुरपाकी
४. रुचिप्रद ५. पवित्र ६. दीपन
७. हृद्य ८. पुष्टिकृत ९. दोषनाश (त्रिदोषहर)
द्वादशोत्सवः २३५
अथ माहिषस्यगुणनिरूपणम्
माहिषं मधुरं पाके वृष्यं पित्तानिलापहम्।
बलमेदःकरं स्निग्धं सुशीतं कफकृद्दरम्॥१६॥
माहिष दधि
माहिष दधि (भैंस का दही) विविध गुण युक्त है—
१. मधुरपाक २. वृष्य ३. पित्तशामक
४. अनिलापह ५. बल्य ६. मेदाकर
७. स्निग्ध ८. सुशीत ९. कफकृत्
अथाजस्य गुणनिरूपणम्
दध्याजं कफपित्तघ्नं लघु वातक्षयापहम्।
दुर्नामश्वासकासेषु हितमग्नेश्च दीपनम्॥१७॥
अजाज दधि
अजा जन्य दुग्धोत्पादित दधि (बकरी के दूध का दही)— दध्याज इस तरह
गुणवान् होता है—
१. कफघ्न २. पित्तशामक ३. लघु
४. वातजरोग ५. क्षय ६. दुर्नाम (अर्श)
७. श्वासवृद्धि ८. कास ९. दीपन
अथ दघ्नः सामान्यसेवनविधिर्गुणाश्च
दधि नक्तं न सेवेत सेव्यं चैद्वै ससूपकम्।
सक्षौद्रं शर्करोन्मिश्रं सेवेतामलकैर्युतम्॥१८॥
शरद्सन्तयोर्वैद्यैर्निन्दितं प्रायशो दधि।
प्रावृट्शिशिरहेमन्ते संसेव्यं दधि पण्डितैः॥१९॥
दघ्न सामान्य गुण ऋत्वनुसार सेवन
दधि (दही) का समय (काल) के अनुसार (ऋतु आधारित) सेवन करने का
विधान प्रस्तुत किया गया है—
१. रात्रि को दही नहीं खाना चाहिए (दधि नक्तं स सेवेत्)।