कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
८८ कथासरित्सागर
८८ कथासरित्सागर
अयञ्च वर्धितोऽन्यासां सिंहीनां पयसा मया।
अद्य चाहं विमुक्तोऽस्मि शापाद् बाणाहतस्त्वया ॥१०२॥
तद् गृहाण महासत्त्व मया दत्तममुं सुतम्।
अयं ह्यर्थं समादिष्टस्तैरेव मुनिभि पुरा ॥१०३॥
इत्युक्त्वान्तर्हिते तस्मिन्सातनामनि गुह्यके।
स राजा तं समादाय बालं प्रत्याययौ गृहम् ॥१०४॥
सातेन यस्मादूढोऽभूत्तस्मात् सातवाहनम्।
नाम्ना चकार कालेन राज्ये चैनं न्यवेशयत् ॥१०५॥
ततस्तस्मिन्नातदण्ड्ये दीपकणौ क्षितीश्वरे।
संवृत्त सार्वभौमोऽसौ भूपति सातवाहन ॥१०६॥
एवमुक्त्वा कथां मह्यं काणभूत्यनुयोगतः।
गुणाढ्य प्रकृतं धीमाननुस्मृत्याब्रवीत्पुनः ॥१०७॥
सत कदाचिदभ्यागाद् वसन्तसमयोत्सवः।
दर्पीकृत तमुद्यानं स राजा सातवाहनः ॥१०८॥
विहरन् सुचिरं तत्र महेन्द्र इव नन्दने।
वापीजलेऽवतीर्णोऽभूत्क्रीडितुं कामिनीसखः ॥१०९॥
असिञ्चत्तत्र दयिताः सहेलं करवारिभिः।
असिञ्चत स ताभिश्च वशाभिरिव वारणः ॥११०॥
मुक्तधौताञ्जनाताम्रनेत्रजङ्गर्जलाप्लुतैः ।
अङ्गैः सक्ताम्बरव्यक्तविभागैश्च तमाङ्गनाः ॥१११॥
विद्रुतपत्रतिलकाः स चक्र वनमध्यगाः।
च्युताभरणपुष्पास्ताः मत्ता वायुरिव प्रियाः ॥११२॥
अथैका तस्य महिषी राज्ञः स्तनभराल्लसा।
शिरीषसुकुमाराङ्गी क्रीडन्ती क्लममभ्यगात् ॥११३॥
सा जलैरभिषिञ्चन्तं राजानमसहा सती।
अब्रवीन्मोदकैर्देव परिताडय मामिति ॥११४॥
तच्छ्रुत्वा मोदकान् राजा द्रुतमानाययद् बहून्।
ततो विहस्य सा राज्ञी पुनरेवमभाषत ॥११५॥
राजन्नवसरः कोऽत्र मोदकानां जलान्तरे।
उदकैः सिञ्च मा त्वं मामित्युक्तं हि मया तव ॥११६॥
इसलिए तुम इस महाबलवान् बालक को लो। यह बात पहले के ही शाप देनेवाले
मुनिजी ने कही थी" ॥१ २-१ ३॥
ऐसा कहकर उस सात नामक यक्ष के अन्तर्धान हो जाने पर वह राजा उस बालक को
लेकर लौट आया ॥१ ४॥
सात नामक यक्ष ने उसे उठा रखा था। अतः उस बालक का नाम सातवाहन रखा
और समय आने पर उसे राज्य-सिंहासन पर बैठा दिया ॥१ ५॥
कुछ समय के बाद राजा दीपकणि के वन में चले जाने पर वह सातवाहन राजा सार्वभौम
बन गया ॥१ ६॥
इस प्रकार कथा कहकर गालभूति के अनुरोध से बुद्धिमान् गुणाढ्य ने प्रसन्न सा पुनः
स्मरण करके कहा ॥१ ७॥
कुछ समय के अनन्तर, वसन्तोत्सव के समय राजा सातवाहन उस देवी के बनाये
हुए उद्यान में गया ॥१ ८॥
नन्दन-वन में महेन्द्र के समान बहुत काल तक उस उद्यान में अपनी रानियों के साथ
विहार करता हुआ राजा सातवाहन बावली के जल में रानियों के साथ जलक्रीड़ा के लिए
उतरा ॥१ ९॥
जल में वह रानियों को हाथ से फेंके हुए छींटों से सींचने लगा और रानियाँ भी उसे इस
प्रकार सींचने लगीं जैसे हथिनियाँ हाथी को सींचती हैं ॥११ ॥
काजल के घुल जाने पर लाल नेत्रों से और पानी से वस्त्रों के अंगों में चिपक
जाने के कारण स्पष्ट दीखते हुए शरीर-भिन्न अवयवों से वे राजा का मन-हरण करने
लगीं ॥१११॥
वायु के समान राजा ने उन प्रियतमाओं को वन में लताओं के समान कर
दिया। वन में वायु, लताओं के पत्र-रूपी तिलक को हटा देता है और पुष्यरूपी आभरणों
से रहित कर देता है। उसी प्रकार राजा ने रानियों के पत्रावली-रूपी तिलक को पानी
के छींटों की बौछार से धो डाला और पुष्पों के समान शोभित उनके आभरणों को उतरवा
डाला ॥११२॥
जलक्रीड़ा करते-करते उस राजा की शिरीष पुष्प के समान एक सुकुमार रानी स्तन-भार
से क्लान्त होकर खेलती-खेलती थक गयी ॥११३॥
वह रानी पानी के छींटों की बौछार करती हुई राजा से बोली— 'स्वामिन् ! मुझे पानी से
मत मारो।' (मोदकैं — मा—मत उदकै —पानी से) ॥११५॥
यह सुनकर राजा ने जल्द ही बहुत-से लड्डू मँगवाये। तब रानी ने हँसकर फिर कहा—
राजन्, पानी के अन्दर लड्डुओं की कौन तुक है? मैंने तो तुमसे कहा कि जल से मुझे मत
सींचो ॥११६॥