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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

पंचम लम्बक ५१५

पंचम लम्बक ५१५
राजा ने पूर्वजन्म का स्मरण करनेवाली उस कन्या को अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ देखकर
और उसके मनानुकूल वर मिलने में कोई दूसरा उपाय न देखकर अपने देश में आये हुए यात्रियों
के लिए प्रतिदिन इसी प्रकार का डिंडोरा पीटने की आज्ञा दे दी ॥२३२॥
'जिस ब्राह्मण या क्षत्रिय युवक ने कनकपुरी देखी हो, वह बताये राजा उस युवराज-पद
के साथ अपनी कन्या देंगे'। इस प्रकार ललकारने से सभी जगह घोषणा होने लगी किन्तु कनकपुरी
देखा हुआ एक व्यक्ति भी नहीं मिल पाया ॥२३३॥
प्रथम तरङ्ग समाप्त।
द्वितीय तरंग
शक्तिदेव का कनकपुरी देखने के लिए जाना
इसी बीच चाही हुई राजकन्या द्वारा अपमानित अतएव दुःखित वह युवक ब्राह्मण शक्ति-
देव सोचने लगा ॥१॥
'कनकपुरी मैंने देखी है'—इस प्रकार झूठ बोलकर मैंने उस राजकन्या के बदले अत्यन्त
अपमान प्राप्त किया है ॥२॥
अत उस राजकन्या की प्राप्ति के लिए मुझे तबतक सारी पृथ्वी का चक्कर काटना पड़ेगा
जबतक मैं उस नगरी को न देख लूँ या प्राणों का त्याग न कर दूँ ॥३॥
उस नगरी को देखकर उसी शर्त पर मैं राजकन्या को न ब्याह लूं, तो मेरे इस जीवन से
ही क्या लाभ है ? ॥४॥
ऐसी प्रतिज्ञा करके वह उस वर्धमान नगर से दक्षिण दिशा का मार्ग पकड़कर चल
पड़ा ॥५॥
क्रमशः चलते हुए उस शक्तिदेव को मार्ग में विन्ध्य भाग का महान् और घोर वन-
प्रान्त मिला। वह ब्राह्मण-युवक अपनी लम्बी और दृढ़ इच्छा के समान उस महान् वनप्रान्त में
प्रविष्ट हुआ ॥६॥
वायु से हिलाये गये कोमल पल्लवों से वह वन अत्यन्त उष्ण सूर्य की किरणों से सन्तप्त
उसके शरीर पर मानों पंखा झल रहा था ॥७॥
सिंह आदि हिंस्र जन्तुओं से मारे जाते हुए मृग आदिकी करुण चीत्कारों के बहाने अनेका-
नैक चोर-डाकुओं के पराभव-दुःख के कारण मानो वह वन दिन-रात रोता रहता था ॥८॥

स्वच्छन्दोच्छलदुद्दाममहामरुमरीचिभिः ।
भिगीषन्त्यामिवात्यूष्मव्याप्येव तेजांसि भास्वतः ॥९॥
जलसङ्गतिहीनायामप्यहो सुरुभापवि ।
सततोल्लङ्घ्यमानायामपि दूरीभवद्भुवि ॥१०॥
दिवसैर्बूरमध्वानमतिक्रम्य ददर्श सः ।
एकान्ते शीतलस्वच्छसलिलं सुमहत्सरः ॥११॥
पुण्डरीकोत्थितच्छत्रं प्रोल्लसद्धंसचामरम् ।
कुर्वन्तमिव सर्वेषां सरसामधिराजताम् ॥१२॥
तस्मिन्स्नानादिकं कृत्वा च तत्पार्श्वे पुनरुत्तरे ।
अपश्यदाश्रमपदं सफलस्निग्धपादपम् ॥१३॥
तत्राश्वत्थतरोर्मूले निषण्णं तापसंवृतम् ।
स सूर्यतपसं नाम स्थविरं मुनिमक्षत ॥१४॥
स्ववयोऽब्दशतग्रन्थिसङ्ख्येवाक्षमालया ।
जराधवलकर्णाग्रसस्थियिया विराजितम् ॥१५॥
प्रणामपूर्वकं तं च मुनिमभ्याजगाम सः ।
तेनाप्यतिथिसत्कारैर्मुनिना सोऽभ्यनन्द्यत ॥१६॥
अपृच्छ्यत च तेनैव सविभज्य फलादिभिः ।
कुत प्राप्तोऽसि गन्तासि क्व च मद्गोच्यतामिति ॥१७॥
वर्धमानपुरात्तावद् भगवन्नहमागतः ।
गन्तुं प्रवृत्तः कनकपुरीमस्मि प्रतिज्ञया ॥१८॥
न जाने क्व भवेत्सा तु भगवान्वस्तु वेत्ति चेत् ।
इति तं शक्तिदेवोऽपि स प्राज्ञो मुनिमभ्यधात् ॥१९॥
वत्स ! वर्षशतान्यष्टौ ममाश्रमपदे त्विह ।
व्यतिक्रान्तानि न च सा श्रुतापि नगरी मया ॥२०॥
इति सेनापि मुनिना गदितः स विषादवान् ।
पुनरेवाब्रवीत्तर्हि मृतोऽस्मि क्षमो भ्रमन्विह ॥२१॥
ततः श्रमण शान्तार्थं स मुनिस्तमभाषत ।
यदि ते निष्प्रपस्तर्हि यदहं वच्मि तत्कुरु ॥२२॥
अस्ति काम्पिल्यविषयो योजनानां शतद्वितः ।
त्रिषु तत्रोत्तरास्यादौ गिरिरस्त्यपि मध्यमः ॥२३॥