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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

( ६८० ) बघेलवंशवर्णन ।
छेंके रह्यो वर्ष सो बारा । खायो बोयो आम अपारा ॥
दुर्ग अटूट मानि सो हारा । लै सब सैना सपदि सिधारा ॥
वीरभानु वरवीर नरेशा । छीनिलियो दल लै निज देशा ॥
लै विलायती दल निज संगा । चलो हुमायूं सहित उमंगा ॥
इत अकबर यक दिवश उचारा । सुनिये बांधवनाह उदारा ॥
भई रामसिंह सँग माहीं । बैठतहौ नित भोजन काहीं ॥
हमको क्यों बैठावत नाहीं । नृप कहै आप खामिदै आहीं ॥
पूँछिलेहु मातासों जाई । पूंछयो सो सब दियो बताई ॥
दोहा-खङ्गचर्म लै हाथमें, सुनि अकबर सो हाल ॥
चल्यो कियो तिन संगमें, वीरभानु निज बाल६८॥
अकबरसों तहँ राम कह, कोस कोस करि वास ॥
चलिये दिल्लीनगरको, जुरै फौज अनयास ॥ ६९ ॥
जुरी चमू चतुरंग संग, अमित तुरंग मतंग ॥
रँगो रामसिंह जंगके, रंग अभंग उमंग ॥ ७० ॥
नातनको लिखवायो पानी । चारों नृप आये मुदमानी ॥
तिन सँग रामसिंह यशवाला । जातभयो भो जंग विशाला ॥
हन्योशेरको तहाँ हुमाऊ । दिल्ली तख्त बैठ युत चाऊ ॥
ईतै सुलेमैं राम सँहारी । दिल्लीको द्रुत गयो सिधारी ॥
ताकन तनय हेतु सुखधारी । चढ्यो हुमायूं ऊंची अटारी ॥
मोद मगनसों गिरिगो नीचै । होत भयो तुरंत वश मीचै ॥
तनय हुमायूं अकबर काहीं । बैठायो तब तख्तहिं माहीं ॥
वीरभानु जब तज्यो शरीरा । रामसिंह नृप भो मतिधीरा ॥
दोहा-दिल्लीको पुनि राम नृप, गये अकब्बर शाह ॥
कीन्ह्यो अति सन्मानसो, अकस मानि नरनाह॥७१॥
औचक मारनको गये, ते नृप रामहिं काहँ ॥
फिरे मानि विस्मय सबै, निरखि चारु चौबाहँ॥७२॥

नापितसेन स्वरूप धरि, हरि जिनके तनु माहिं ॥
तेल लगायो राम सो, कहियेकेहिं नृप काहिं ॥७३॥
वीरभद्र तेहि सुत भयो, वीरभद्र कर संत ॥
आगे वर्णौं औरहू, भये जे नृप मतिमंत ॥ ७४ ॥
वीरभद्र सुतविक्रमा-दित्य भयो अबदात ॥
नामहिंके अनुगुण भयो, जेहिं गुण जग विख्यात ॥७५॥
लीन्ह्यो जायरिझाय जो, निज करतूतिहि माहिं ॥
ब्रह्मके मारे मरिलह्यो, सोन देव पुर काहिं ॥ ७६ ॥
अमरसिंह ताको सुवन, सरिस अमरपति भोज ॥
रीवां रजधानी करी, सींवा यश अरु वोज ॥ ७७ ॥
दिल्लीको गमनत भयो, चुक्यौ खर्च मग माहिं ॥
लूटि दौलताबादको, गयो शाह ढिग पाहिं ॥ ७८ ॥
उमरावन चुगुली करी, शाह निकट द्रुत जाय ॥
बादशाह मान्यो नहीं, नृप पै खुशी बनाय ॥ ७९ ॥
अमरसिंह भूपालके, भो अनूपसिंह भूप ॥
भूपर जासु प्रताप यश, छायो परमअनूप ॥ ८० ॥
भावसिंह ताको तनय, भयो भानु सम भास ॥
दाता ज्ञाता वीरवर, ज्ञाता बुद्धि विलास ॥ ८१ ॥
जगन्नाथजी जायकै, मूर्त्ति लाय जगनाथ ॥
थापिव्यासके ग्रंथको, संच्यो भरि सुख गाथ ॥८२॥
राना घरमें व्याहभो, तहँते मूरति दोय ॥
लाये सरस्वति गरुड़की, थापित किय मुदमोय ॥८३॥
विप्रन दान महानदै, कीन्हे बहु सन्मान ॥
तिनके भे अनिरुद्ध सिंह, भूपति परम सुजान ॥ ८४ ॥
ताके भो अवधूतसिंह, जाहिर दान जहान ॥
ताके सुवन अजीतसिंह, दुवन अजीत महान ॥ ८५॥

( ६८२ ) बघेलवंशवर्णन ।
जाके गौहरशाह बसि, जायो अकबर शाह ॥
सैन्य साजि जेहिं तखतमें,बैठावत नरनाह ॥८६॥
जाजमऊलों जायकै, दिल्ली दियो पठाय ॥
अँगरेजहुँ अठवर्नको, दीन्ह्यो जंगभगाय ॥८७॥
तासु तनय जयसिंहभो, जयमें सिंह समान ॥
जाहिर दान कृपानमें, भक्तिवान भगवान ॥८८॥
दशहजार असवार लै, पूनाको हारोल ॥
आवतभो यशवंत तेहिं, हत्यो प्रताप अतोल ॥८९॥
गहरवार करि गर्व बहु, लीन्हे देश दबाय ॥
तिनको मारि भगाय दिय, बचे ते गिरिन लुकाय९०
देश आपने अमल करि, दै विप्रन बहु दान ॥
अंत समय तनु प्राग तजि,हरिपुर कियो पयान॥९१॥
विश्वनाथ नरनाथभो, तासु तनय यशगाथ ॥
रति अनन्य सियनाथपै, भई जासु महिमाथ ॥९२॥
सरि सर घर घर पुर पथन, छयो राम गुणगाथ ॥
कितो परीक्षित कै कियो, कलि कृतयुग विश्वनाथ९३
तासुतनय रघुराज भो, महाराज शिरताज ॥
राजत राज समाजमधि,जाको सुयश दराज ॥९४॥
श्रीकबीरजी कथित यह, है विचित्र नृप वंश ॥
नहिं असत्य मानै कोऊ, जानि संत अवतंश ॥९५॥
सतयुगमें सत नाम रह, अरु मुनींद्र त्रेताहिं ॥
करुणामय द्वापर रह्यो, अब कबीर कलि माहिं ॥९६॥
कबित्त ।
नृपति उदार केते भये अनुसार मति तिनके अपार गुण यश कियो गानहै ॥
जनम करम भूप रघुराजको अनूप धरमको जूप दिव्य जाहिर जहानहै ॥
देख्यो निज नैन ताते भरो अति चैन उर करतहौं निज वैन सबिधि बखानहै ॥
कहै युगलेश अहै झूठको नलेश कहूं मानि है विशेष सांच सोई बड़ो जान है ॥१॥

छंद्-कह्यो कबीर भविष्य राम नृप सुनि सुखराशी ॥
हंसिनि सुवचन कुँवरि रानि तू हंस प्रकाशी ॥
वीरभद्र तुव सुतहु हंस: नित हरि ढिग वासी ॥
गुणगंभीर अति वीर धीर यश सुयश विलासी ॥
जब दशै वंश अवतंस नृप, प्रगट होयहै तू अवशि ॥
तब सति परिहरि नरेशकुल, जनमीयह तुबतियहुलसि १
दोहा-तासों तेरो होयगो, सुखप्रद प्रथम विवाह ॥
वीरभद्र यह तेहि उदर, वंश इग्यरहे माह ॥९७॥
जनमि देयगो तुमहि अति, परमप्रमोद विख्यात ॥
तेजवंत क्षिति छाय है यश अनंत अवदात ॥९८॥
समय विजय करसिंहतो, भो जयसिंह भुआल ॥
गंग लियो अगवान जेहि, तनु त्यागनके काल ॥९९॥
प्रगट भयो ताके तनय, हंस जो कह्यो कबीर ॥
विश्वनाथ तेहि नामभो, परमयशी रणधीर ॥१००॥
रघुपति भक्त अनन्य अति, अरु ब्रह्मण्य शरण्य ॥
अग्रगण्य क्षिति नृपनमें, तेग त्याग जेहिं धन्य ॥ १ ॥
तेहि आदिक गुण तेज यश, औरहु अमित चरित्र ॥
मैं विचित्र वर्णन कियो, ग्रंथ सोपरमपवित्र ॥ २ ॥
देखहिं श्रद्धावान जे, होवैं मनुज सुजान ॥
औरहु करहुँ बखान कछु, निजमतिके अनुमान ॥ ३ ॥
रानी सुवचन कुँवरिभै, पुरी उचहरा माहिं ॥
सुता भई शिवराज नृप, व्याहिगई तेहि काहिं ॥ ४ ॥
पठ्यो भागवत ताहिमें, दृढ़भो तेहिं विश्वास ॥
गुण यश अनुपम तासुभे, किय जो कबीर प्रकाश ॥ ५ ॥
विश्वनाथ नरनाथकी, तिय सों अति अभिराम ॥
कुँवरि सुभद्रा नाम जेहिं, सरिस सुभद्रा आम ॥ ६ ॥

( ६८४ ) बघेलवंशवर्णन ।
छप्पय-वीरभद्र सुत रामभूपको हंस सुहायो ॥
श्रीकबीर आगम निदेश निजग्रन्थहिं गायो ॥
विश्वनाथ तेहिं तीय गर्भ जबते सो आयो ॥
तबते बाँधवदेश धर्म परमानँद छायो ॥
कहुँ रह्यो न अधरम लेश क्षिति बिन कलेश पुर जन भयों
कलि वेश छयो कृतयुतधरम सतयुगलेशसो कहि दयों १
दोहा-रींवा घर घर सब प्रजा, सुखभरि करत उच्चार ॥
विश्वनाथके होय सुत, तौ धनि जन्म हमार ॥ ७ ॥
परमहंस जो ऋषभदेवसम । चतुरदास जेहि नाम शमन भ्रम ॥
फिरतरहे रींवापुरमाहीं । रामभजनमें मग्न सदाहीं ॥
डोलत मग औरही मुखबोलैं । निज हियकोअंतर नहिंखोलैं ॥
वर्षाऋतु धारैं शिरवर्षा । जाड़े जलमें बसैं सहर्षा ॥
ग्रीषम तपत उपलमें सोवैं । प्रेमेते हँसैं कहूं क्षण रोवैं ॥
नृप रघुराज सुतासु चरित्रा । भक्तमालमें रच्यो पवित्रा ॥
परमहंस सो सहज सुभाये । सुविश्वनाथ जन्मदिन आये ॥
लगे बजावन मुदित नगारा । कहि मुख हंस लेतु अवतारां ॥
दोहा-यह हवाल जयासह नृप,मनि सुनि त्यों पितु मात ॥
क्षण क्षण अति हरषातभे, हियमें सो न समात ॥८॥
अष्टादशसै असीको, साल सुकातिक मास ॥
कृष्णपक्ष तिथि चौथ शुभ,वासरदानि हुलास॥ ९ ॥
वीरभद्र नृप हंसस्वरूपा । भयो भूप रघुराज अनूपा ॥
कृष्णचंद्रको प्रिय अधिकारी । शर्मद धरा धर्म धुरधारी ॥
नाम भागवतदास दुलारा । करहिं मातु पितु सदा उचारा ॥
बालहिते भो ज्ञाननिधाना । भक्तिवानं पूजक भगवाना ॥
कछुदिनमें जननी मतिवारी । तनु तजि पुरवैकुंठ सिधारी ॥
पिता पितामह निकट सकारे । लैनित जाहिं खेलावन वारे ॥
तिनसों कहि कहि सुंदर वानी । कथै ज्ञान मानहु बड़ ज्ञानी ॥

बघेलवंशवर्णन । ( ६८५ )
जगत शरीर अनित्यहि जानो । मरत सो जीव नित्य ध्रुव मानो ॥
अजर अमर तेहि गावत वेदा । वृथा करत तेहि हित नरखेदा ॥
दोहा-सुनि सुनि कहे प्रसन्न मन, ते अति हिय हर्षात ॥
हैं ये पुरुष पुरानकोउ, पाल रूप दर्शात ॥ ११० ॥
कछु दिनमें पुनि जाय प्रयागा । नृप जयसिंह तुरत तनु त्यागा ॥
श्रीविश्वनाथ राज पद पायो । रघुराजहु युवराज कहायो ॥
रहे उर्मिलादास सुसंता । भक्त अनन्द उर्मिलाकंता ॥
चलि चलि तिनके आश्रम माहीं । दर्शन तिनको करै सदाहीं ॥
मंत्र लेनको बड़े उमाहा । विनय कियो तिनसों सउछाहा ॥
प्रभु मोहिं मंत्र कृपाकरिं दीजै । मेरो जन्म सफल जगकीजै ॥
नाथ कह्यो तबअति हर्षाई । मेरे रूप संत यक आई ॥
देहैं तोहिं मंत्र सहुलासा । ह्वैहै सिगरे जगत् प्रकासा ॥
दोहा-तोहिं देनको मंत्र मोहिं, है नहिं लखन नियोग ॥
मेटिहैं तुव भव सोग सोई, ध्रुवलखिहैं सब लोग १॥
छंद-स्वामि मुकुंदाचार्य्य शिष्य यक संत रह्यो अभिरामा॥
नाम जासु लक्ष्मी प्रपन्न ढिग विश्वनाथ निष्कामा ॥
मंत्र लेनकी इच्छा गुणि मन श्रीरघुराजहि केरो ॥
भाषि गयो भूपतिसों निज गुरु भक्ति प्रभाव घनेरो १॥
आश्रम परम मनोहर तिनको ब्रह्मशिला तट गंगा ॥
प्रियादास जे गुरू आपके तिनको रह सतसंगा ॥
भक्ति ग्रंथ पठे तिनके बहु वाल्मीकि रामायन ॥
श्रीभागवत भागवत पूरे पढ़त निरंतर चायन ॥ २ ॥
लायक गुरू विशेष होनेते नरनायक सुत केरे ॥
आयसु होय बोलिलै आऊं ऐहैं विनती मेरे ॥
विश्वनाथ कह आप सरिस शिष जिनके जगत सोहाहीं
जो कहिसकै महामहिमा तिन कौंहै अस महि माहीं॥
श्रीराना जवानसिंह जासों लियो मंत्र उपदेशू ॥

( ६८६ ) बघेलवंशवर्णन ।
ऐसे शिष्य आप जिनकेहैं तेतो संत विशेशू ॥
जौलौं स्वामिहिं इतै न लावो तालौं मम सुतकाहीं।
भक्तिभेद तुम्हहीं दरशावो करी सुकृपा डरमाहीं ॥४॥
पुनि सुत श्रीरघुराज नामको एक बाग लगवायेो ॥
लक्ष्मण बाग सुनाम तासुको युत अनुराग धरायो ॥
अति उतंग आयत विचित्र हरि मंदिर यक अभिरामा॥
निरखत प्रद मुद दाम जननको बनवायेो तेहिं ठामा५॥
श्रीरघुराज सुदिवस माँहँ पुनि उर उछाह अति धारी॥
थापित किय सिय राम लषणकी मूरति तहँ मनहारी॥
औरहु अमित देवको प्रमुदित सादर तहँ बैठायो ॥
दान महान द्विजन दै संतन करि सत्कार सोहायो ६॥
विश्वनाथ पितु पद शिरधरि पुनि विनयकियोकर जोरी
पूरणभो प्रसाद यह तिहरे अब यह इच्छा मोरी ॥
पठइय प्रभु लक्ष्मी प्रपन्नको ब्रह्मशिलामें जाई ॥ ७ ॥
बोलिलै आवैं सपदि स्वामिको लेहुं मंत्र हरषाई ॥
बैन सुनत सुतकेँ सचैन है विश्वनाथ नरनाथा ॥
कह लक्ष्मी प्रपन्नसों, सादर जोरे दोऊ हाथा ॥
ब्रह्मशिला सुरसरि समीप जहँ स्वामि मुकुंदाचारी ॥
वास करत तुम जाय आशु तहँ लावहु तिन्हें सुखारी ८॥
दोहा-महाराज विश्वनाथके, सुनत वचन सुख पाय ॥
द्रुत लक्ष्मीपरपन्न तब, ब्रह्मशिलागो धाय ॥ १२ ॥
प्रभु ढिग चलि करि दंड प्रणामा । कुशल पूँछि पायो सुखधामा ॥
विनय कियो पुनि दोउ कर जोरी । पुरवहु नाथ कामना मोरी ॥
बांधवेश विश्वनाथ नरेशा । रीवाँ रजधानी जेहिं वेशा ॥
राम अनन्य भक्त जगबीनो । राम परत्व ग्रंथ बहु कीनों ॥
मियादास भे संत महाना । तासु शिष्य सो विदित जहाना ॥

बघेलवंशवर्णन । ( ६८७ )
भांक ग्रंथ ते बहुत बनाये । ते सब आप वदन निज गाये ॥
सो विशुनाथ तनय मतिवाना । है रघुराजसिंह जग जाना ॥
आप सों मंत्र लेनके हेतू । कीन्हे प्रण मन कृपानिकेतू ॥
दोहा-ताहि समाश्रय कीजिये, चलि रीवामें नाथ ॥
प्रभु कह मैं नहिं जाहुँ कहुँ, तजि तट सुरसरि पाथ॥१३॥
यह थलु जो विहाय उत जैहौं । तौ अब परममोद नहिं पैहौं ॥
किय पुनि विनय सेव बहु ठानी । नाथ कह्यो पुनि सोई वानी ॥
सुनि लक्ष्मीप्रसन्न पुनि बोल्यो । निज अंतरको अंतर खोल्यो ॥
जो प्रभु रींवानगर न जै हैं। तौ सति मोहिं जिवत नहिं पै हैं ॥
सुनिहँसिकै कह दीनदयाला । जो अस तेरो अहै हवाला ॥
तौ अब आसु सुदिवंस विचारी । तहां जानकी करैं तयारी ॥
सुनि लक्ष्मी प्रपन्न हरषाई । गणक बोलि द्रुत सुदिन शोधाई ॥
[L14

( ६८८ ) बघेलवंशवर्णन ।
तीरथ चित्रकूट जे नाना । तहां पठै करि द्रव्य महाना ॥
सविधि कियो साधुन सत्कारा । ते सब जय जय किये अपारा ॥
लियो मन्त्र जबते युत प्रीती । तबते चलन लग्यो यह रीती ॥
दोहा-पाठ गजेंद्रहि मोक्ष अरु, मूल रमायण ख्यात ॥
करि नारायण कवचको, पाठ उठैं परभात ॥ १६ ॥
पण्डित जे नव कृष्ण निबेरे । बसनहार कलकत्ता केरे ॥
तिनहिं लाटसों कहि बोलवायो । विश्वनाथ नरनाथ सोहायो ॥
सौंपिदियो निज सुत रघुराजै । विद्या सुखद पढ़ावन काजै ॥
तिनसों श्रीरघुराज सुजाना । अङ्गरेजी पढ़ि बहु सुख माना ॥
मुग्धबोध व्याकरण विशाला । पुनि पढ़ि लियो थोरही काला ॥
फेरि अयोध्यावासि महन्ता । जग जाहिर रामानुज सन्ता ॥
सौंप्यो तिन्हें पढ़ावन हेतू । नृप विश्वनाथ धर्मको सेतू ॥
तिनसों वाल्मीकि रामायन । श्रीरघुराज पढ़यो अति चायन ॥
दोहा-सवालाख श्लोक जेहिं, महाभारत विख्यात ॥
विन श्रम ताको पढ़िलियो, कहि सबसों हरषात ॥१७॥
करि मज्जन विधियुत श्रीकन्ता । पूजन ठानि रोज सुखवन्ता ॥
वाल्मीकि रामायण सादर । श्रीभागवत सुनावत सुखकर ॥
वाल्मीकि भागवत विशोका । प्रति अध्याय जिते श्लोका ॥
जेहिं आगे श्लोक जो होई । पूंछे बुधहि बतावत सोई ॥
महाभारतमें जे इतिहासा । ते पुस्तक बिन करत प्रकासा ॥
अस सब भांति अलौकिक करणी । श्रीरघुराज केरि कवि वरणी ॥
गति जो कविता रचन नवीनी । बालहिंते विरंचि तेहिं दीनी ॥
संस्कृत और भाषहू केरी । कविता बहु विधि रची घनेरी ॥
दोहा-विनयमालको प्रथम रचि, रुक्मिणि परिणय फेरि ॥
पितुहिं सुनायो ते भये, अति प्रसन्न मुख टेरि ॥ १८ ॥
चित्रकूट गमनत भये, एक समय रघुराज ॥
रच्यो तहां सुंदर शतक, हनुमतचरित दराज ॥ १९ ॥

बघेलवंशवर्णन । ( ६८९ )
जो कोउ वांचत पत्रिका, देखि पिठौता तासु ॥
वांचिआशु सबसों कहत, सुनि सब लहत हुलासु १२०
लिखन शक्ति लखिनाथकी, विदित लिखारी जोउ ॥
दीखन नृप अस चखन कहि, सिखन चहतहै सोउ २१॥
कहूं चढ़ैती तुरंगकी, दरशावत सबकाहिं ॥
कहूं मतंग सवारहै, सुरपति सरिस सोहाहिं ॥ २२ ॥
कहूं दुनाली धनुष लै, गोली तीर चलाय ॥
हनै निसाना रोपिकै, तुरतहि देहिं गिराय ॥ २३ ॥
कहूं तेगको घालिकै, करहिं टूक चौरंग ॥
सुनि लखि पितु विशुनाथ नृप, होत मनहिं मन दंग २४॥
कहुँ वन जाय अहेरको, मारिशेर वनजीव ॥
देखरावाहिं निज तातको, होहिं ते खुशी अतीव ॥२५॥
बहु वनराजनको हन्यो, वनहिं सिंह रघुराज ॥
ते दराज विस्तर भयहि, वर्ण्यो नहीं समाज ॥२६॥
कवित्त ।
एक समय राना श्रीजमानसिंह हिंद भान गया करिवेको कीन्ह्यो देश या पयानहै ॥
जाय विश्वनाथ चित्रकूट मुलाकात करि रींवहि लेवायलाये करि सन्मानहै ॥
भाई लछिमनसिंह कन्या तिन्हें व्याहि दीन्ह्यो चीन्ह्यो विश्वनाथै भलोभक्तभगवानहै
तासु सुत रघुराज तिलक चढ़ायआसु जातभे हुलास भरि उदैपुर थानहै ॥ १ ॥
दोहा-कछु दिन माहि जमानसिंह, गे वैकुंठ सिधारि ॥
रानाभो सरदारसिंह, तैउगे स्वर्ग पधारि ॥२७॥
भूपति भयो स्वरूपसिंह, तेग त्याग समरथ्य ॥
राज काजमें निपुण अति, चल्यो सुनीति सुपथ्य ॥२८॥
निज भगिनिनिके व्याह हित, करि संदेह मनमाह ॥
श्रीरघुराज सलाह करि, चलि ढिग पितु नरनाह ॥२९॥
महापात्र अजवेशको, खतलिखाय यहि भांति ॥
पठयो वेगि उदयपुरै, नृप सुत अति मुदमाति १३०॥
४४

(६९०) बघेलवंशवर्णन ।
आपसयान सुजान सुठि, को करिसकै बखान ॥
जहँकीजै अनुमान तहँ, हमहिं प्रमाण न आन ॥३१॥
विश्वनाथ नरनाथ अरु, युवराजहु रघुराज ॥
बरनिदेशअजबेश लहि, सुकविनको शिरताज ॥३२॥
स०-चैन भरो चल्यो ऐनते बेगि गयो अजबेश उदैपुरमाहीं॥
राना स्वरूप अनूप जो भूप सुन्यो श्रुति आयो इते तेहिं काहीं॥
सादर बोलि सुप्रेमते क्षेमको पूँछि कह्यो ढिग बैठो इहांहीं ॥
बैठि स्वनाथको पत्रसो हाथ दियो लिय माथते धारि तहांहीं
दोहा-श्रीस्वरूप राना सुघर, सुनि हवाल खत केर ॥
कह्यो सुकवि अजबेश सों, लहि प्रमोद उर ढेर ॥३३॥
लिख्यो जो सुता व्याहके हेतू । सो हम अवशि बांधि हैं नेतू ॥
पै राना जवानसिंह रूरे । गया करनगे जब सुख पूरे ॥
तब रींवा गवने सउछाहा । तिनको तहां होत भो व्याहा ॥
राजकुवँर रघुराज सुहायो । ताको तहँ ते तिलक चढ़ायो ॥
बीतिगये बहु दिवस सुजाना । इतको ते नहिं कियो पयाना ॥
सो अब ऐसी करहु उपाई । जाते इहौ वहौ सधिजाई ॥
महापात्र आपहु लिखि पाती । पठवहु द्रुत आवहिं जेहिं भाती ॥
हमहु लिखावतहैं खत आसू । आवहिं राजकुँवर सहलासू ॥
दोहा-काज होय रघुराज इत, हमरहु कारज होय ॥
जहँ को संमत देहिंगे, तहँको करबै सोय ॥३४॥
महापात्र सुनि भल कहि दीन्ह्यो । नाथ विचार भलो यह कीन्ह्यों ॥
अस कहि बेगि सुकवि अजवेशा । पत्र लिखतभो इतको वेशा ॥
रानहु इतको खत लिखवायो । बोलि पठायो सो इत आयो ॥
खत सुनि विश्वनाथ नरनाथा । सुतसों कह्यो मानि सुख गाथा ॥
रानाको यह खत सुनिलेहू । लियो सो करहु बेगि युत नेहू ॥
तब रघुराजहु खत सुनि सोई । कहत भयो पितुसों मुद मोई ॥
यह हवाल मैं सब सुनि लीन्ह्यो । मोहिं बोलावनको लिखि दीन्ह्योः ॥
सो जस प्रभु मोहिं देहिं रजाई । सोइ करों सोइ नीक जनाई ॥

बघेलवंशवर्णन । ( ६९१ )
दोहा-विश्वनाथ नरनाथ तब, कह्यो भरे उत्साह ॥
जाहु उदयपुर ब्याह हित, मेरो इहै सलाह ॥ ३५ ॥
बोलि ज्योतिषिन तुरत पुनि, गमनन सुदिन बनाय ॥
कह्यो सुवनसों यह भली, साइत दियो बताय ॥ ३६ ॥
सुनि रघुराज कह्यो हर्षाई । दीजै सब तदबीर कराई ॥
कौन देवान जान सँग योगू । ताकहँ दीजै नाथ नियोगू ॥
कौन कौन सरदार सुजाना । मेरे सँगमें करहिं पयाना ॥
नाथ कृपा करि सादर सोई । देहिंबताय सिद्धि सब होई ॥
भाष्यो महाराज सुख पाई । सभा सदनको सपदि सुनाई ॥
बीर धीर अरु होय उदारा । राज काजमें चतुर अपारा ॥
धर्मवान पूजक भगवाना । द्विज साधुनमें प्रीति महाना ॥
स्वामिहि मानै प्राण समाना । ये लक्षणहैं विदित देवाना ॥
दोहा-ते लक्षणयुत सांच अब, दीनबंधु तुव पास ॥
लेहुसाथ तिनको अवशि, तिनते सकल सुपास ॥ ३७ ॥
हैं सरदार सुजान सब, सावधान तुव सेव ॥
तिनको सबको लेहु सँग, जे जानत रणभेव ॥ ३८ ॥
सुनि रघुराज जनकके बैना । दीनबंधु कहँ बोलि सचैना ॥
पुनि सरदारन निकट बोलाई । चतुरंगिणी चमू सजवाई ॥
सैनप दीनबंधुको करिकै । व्याह पोशाक किये सुखभारिकै ॥
बाजिरहे चहुँ ओर नगारा । बंदीजन वर विरद उचारा ॥
लहि रघुराज प्रमोद अपारा । भयो उतंग मतंग सवारा ॥
औरहु सखा वृद्ध सरदारा । चढ़ि चढ़ि हय गय रथनमँझारा ॥
हरि गुरु गणपति हनुमतकाहीं । सुमिरि सुमिरि सब निज मनमाहीं ॥
गहि गहि अस्त्र शस्त्र निजहाथा । गमनत भये सबै यक साथा ॥
दोहा-जे मगमें भूपति परे, तिनसों लहि सत्कार ॥
निकट उदयपुर जब गये, राना सुन्यो उदार ॥ ३९ ॥

( ६९२ ) बघेलावंशवर्णन ।
कवित्त ।
करिकै पेसवाई महाराना श्री स्वरूपसिंह उदैपुर आनि मुदै उरकै दराजको ॥
सकल सुपास जहां दीन्ह्यो जनवास तहां कीन्ह्यो सन्मान दे हुलास त्यों समाजको ॥
लखि लखि नारी नयन नृपति किशोर सारी मैन वस भई छोडी ऐन काज लाजको ॥
कहैं ठाम ठाम कैधौं काम सुखधामधाम काम त्यागि जो हैं जन ग्राम रघुराजको १ ॥
लगन विचारि कह्यो जादिन गणक गण तादिन पधारयो रघुराज द्वारमाह है ॥
देखिकै वरात शोभा पुरजनवातलोभा रांनहुको भा अथाह भारी उतसाह है ॥
व्याह भयो छोनीमें उछाह छायो महा तहाँ याचक उमाह भरो यांचिभो अचाहहै ॥
राह राह कहत न ऐसो नर नाह कहूं सुन्यो सांच शाहनको करन पनाहहै ॥
दोहा-रहस वहस युत होत भो, पुनि उदार जेवनार ॥
सरदारन युत फेरि भो, दरबारहुँ दरबार ॥ १४० ॥
कवित्त ।
जेते ऐंडदार राजा राजत पछाह माँह शाहन सों अकस जे कीन्हीहै बनायकै ॥
कलम बिनाही लिखें हिम्मति न रही काहू महाराना सुता जो विवाहै सुखछायकै॥
महाराज विश्वनाथ सुत रघुराज सिंह अचरज कीनी करतूति तेज छायकै ॥
सुनिं सुनि ते वैन नरराय पछितायमहा हाथ मींजिरहे शरमाय शीशनाइकै ॥
दोहा-शिव यकलिंग प्रसिद्ध तहँ, तिनके दर्शन हेत ॥
जातभयो रघुराज पुनि, मंत्री सैन्य समेत ॥ ४१ ॥
हय गय अरु मुद्रा सहस, सादर तिनहिं चढ़ाय ॥
दर्शन लीन्ह्यो सरस उर, सरस हरस सरसाय ॥ ४२ ॥
महाराज विश्वनाथ सुत, श्रीरघुराज उदार ॥
फेरि नाथजी दरशहित, गये साथ सरदार ॥ ४३ ॥
साजि वाजि गज वसन वर, मोहर शत सुख साथ ॥
माथनाय अर्पण कियो, पद पाथज श्रीनाथ ॥ ४४ ॥

बघेलवंशवर्णन । ( ६९३ )
घनाक्षरी ।
सन्मुख बैठि छवि निरखन लागे चख अंग अंग केरी उर हरष बढ़ायकै ॥
ताही समै नाथजीको हाथ लै पुजारी ऐना लग्यो दरशावै मोद गाथ हिये पाइकै ॥
ग्रीवानाय हरि तब बदन लखन लागे लखि रघुराजसिंह अचरज छायकै ॥
रण दवनसिंह सों कह्यो या तू देखि कला भाष्यो तिन होहूं लख्यो नैन टक लायकै १॥
दोहा-कृपानाथजी आपके, ऊपर करी महान ॥
सुनत पुजारीहूं कह्यो, यहां प्रगट भगवान ॥ ४५ ॥
राम सागराह्निक अहै, विश्वनाथ कृत जौन ॥
बखतावर गायक लगे, गावन तिन ढिग तौन ॥ ४६ ॥
गावत सन्मुख निरखिकै, तहां पुजारी कोय ॥
आयकह्यो अस बैठिवो, रानहुको नहिं होय ॥ ४७ ॥
कवित्त ।
दीन्ह्यो सो उठाय बखताबर विचारि यह हरिसर्वत्रअहै और ठौर जांयकै ॥
प्रेम पूर पागे लागे गाबै राग सागरको प्रभु को रिझाय लियो सुरनको छायकै ॥
उघरे कपाट सबै आपही सो ताही समै टेरिकै पुजारी कह्यो बाहेरहि आयकै ॥
नाथको निदेश अहै लेहू वह गायकको इतही बोलाय बैठि गावै हरषाइकै ॥
दोहा-कह पुजारि तुम्हरे ऊपर, रीझेहैं ब्रजराज ॥
सुनि बखतार कह्यो सति, यह प्रभाव रघुराज ॥ ४८ ॥
सहितचमू चतुरंगिनि भाई । पुनि रघुराज शिविर निजआई ॥
कछु वासर किय सुख युत वासा । राना मान्यो परम हुलासा ॥
सीखदेन अवसर जब आयो । तब राना निज निकट बोलायो ॥
श्रीरघुराज समाज समेतू । गमनत भयो तहां मति सेतू ॥
लै आगू राना चलि धामै । बैठायो गद्दी अभिरामै ॥
कीन्ह्यो सकल भांति सत्कारा । दीन्ह्यो हय गय वसन अपारा ॥
भूषण बहु पुनि दिये अमोले । ज्योतिमान मणि मोतिन तोले ॥
विश्वनाथ नरनाथ कुमारा । राना सो पुनि वचन उचारा ॥
दोहा-आप सुजान सयान हैं, मेरे पिता समान ॥
दीजै संमत तासु प्रभु, जो मैं करौं बखान ॥ ४९ ॥

( ६९४ ) बघेलवंशवर्णन ।
स. द्वैभगिनी मम व्याहन योग्य जहां तिनव्याहन योग्यउचारी॥
होय विवाह तहां तिनको ध्रुव जानत आप सबै बड़वारी ॥
राना स्वरूप सराहि कह्यो सुनिहैं हमहूंको खँभार या भारी ॥
सो सम्बंध कियो हम ठीक हियो मँह जयपुर नाह विचारी ॥१॥
घनाक्षरी ।
नाम जाहि रामसिंह रूप अभिराम जाकोतिलक चढ़ायो जोधपुर नाह सुता व्याह ॥
पठवैवकील हमौ ढील नहीं हैहै काज आपहूको रीवां जात जयपुर पैरगो राह ॥
महाराज विश्वनाथसिंहको कुमार रघुराज सिंह बोल्यो सुनि भलो या कियो सलाह ॥
सहित उछाह कृपा करिकै अथाह अब दीजै सीख काह यहीहै उमाह मनमाह ॥१॥
दोहा-सुनि राना सुख पायकै, सुंदर दिवस शोधाय ॥
सीख दियो रघुराज को, दै बहु धन समुदाय ॥१५०॥
भूप स्वरूप अनूप सुनि, निज भगिनी हर्षाय ॥
विदा कियो धन अमित दै, शिबिका रुचिर चढ़ाय ५१॥
संग रहे सरदार जे, औ जे बंधु अपार ॥
यथा उचित सब फौजको, कीन्ह्यो अति सत्कार ॥ ५२ ॥
महाराज विश्वनाथ किशोरा । अति मसन्न युत चमू अथोरा ॥
विजय मुहूरतमैं सुख छाई । हरि गुरु गणपति पद शिरनाई ॥
सैन्य सहित द्रुत कियो पयाना । बाजे बहु गहगहे निसाना ॥
चलत चलत जैपुर नियरान्यो । महाराज जयपुरको जान्यो ॥
कोश भरेते लै अगुवाई । डेरा दिय देवाय पुर लाई ॥
सैन्य समेत शिबिर पुनि आये । रामसिंह भूपति सुख छाये ॥
श्रीरघुराज उदार अपारा । विविध भांति कीन्ह्यो सत्कारा ॥
सो लहि जयपुरको नरनाहा । लह्यो ससैन्य मरम उद्साहा ॥
दोहा--फौज साजि पुनि मौज भरि, युत समाज रघुराज ॥
जयपुरके महाराजपै, गमन्यो प्रभा दराज ॥ ५३ ॥

बघेलवंशवर्णन । ( ६९५ )

निरखि निरखि जयपुर नर नारी । पावतभे उर आनंद भारी ॥
कछु दूरीते जयपुर राजा । आगू लै आवत रघुराजा ॥
महल जाय गद्दी बैठायो । आपहुँ बैठि परमसुख पायो ॥
विविध भाँति सत्कारहि कीन्ह्यो । पाय सो येऊ अति सुख भीन्यो ॥
सैन्य सहित पुनि शिबिर सिधाई । बात होन संबंध चलाई ॥
ठहरिगयो सो बिनहिं प्रयासा । गुन्यो कृपा यह रमा निवासा ॥
रसम व्याह पूरब जो होई । सो दै करि सादर मुदमोई ॥
वृन्दावन तीरथ करिवेको । बढ़ी लालसा वसु दीवेको ॥
दोहा-सादर सब सरदारसों, अरु देवानहु पाहिँ ॥
कहहिं सफल होतो जनम, लखि वृंदावन काहिँ ॥ ५४ ॥
सुदिन शोधाय ज्योतिषिन तेरे । श्रीरघुराज मोद लहि ढेरे ॥
श्रीहरि गुरु पदपंकज सौंरी । सैन्य सहित वृन्दावन ओरी ॥
कीन्ह्यो होत प्रभात पयाना । बजे फौजमें अमित निसाना ॥
बीच बीच वीथिन करि वासा । पहुँचत भये जबै ब्रज पासा ॥
सादर करिकै दंड प्रणामा । जातभये तुलसीवन ठामा ॥
वृन्दावन मधुपुर दर्शना । नंदगाँव जो विदित जहाना ॥
मुख्य चारि तीरथ ये करिकै । दर्शन करि साधुन मुद भरिकै ॥
पुनि चौरासी कोशहु केरी । किय प्रदक्षिणा लहि मुद ढेरी ॥
दोहा-हरिमंदिर जेते रहे, दर्शन किय पद जाय ॥
हय गय वसन अमोल अरु, मोहर अमित चढ़ाय ५५
राधा राधारमणकी, मूरति पुनि पधराय ॥
रागभोग हित गाँव यक, दीन्ह्यो तहां चढ़ाय ॥ ५६ ॥
पुनि विश्रांतघाटमें जाई । सुवरण तुला चढ्यो सुख छाई ॥
सो सुवरण ब्रजमंडल वासी । जेते रहे विप्र सुखरासी ॥
तिनको दै कीन्ह्यो अति तोषू । ते माने सब भांति सँतोषू ॥
तिमि याचक जे रहे घनेरे । तिन्हें हेम बहु दिये निवेरे ॥
नारी रोंकि रोंकि मंगमाहीं । कहि कहि लला लेहिं गहि बाहीं ॥
तिनको मनवांछित धन दीन्हे । शीशनाय बहु मानहि कीन्हे ॥

( ६९६ ) बघेलवंशवर्णन ।
देश देशके याचक आये । भये प्रसन्न हेम बहु पाये ॥
ब्रजमंडलमें नर औ नारी । सब थल ऐसो परचो निहारी ॥
दोहा–लहि लहि अमित हिरण्यको, भाषहिं ते काहि धन्य ॥
यह नवीन परजन्य नृप, वरस्यो ब्रजहिं हिरन्य ॥५७॥
कवित्त ।
दीन्हे हैं द्विजान पंडितन हेम महादान रघुराजसिंह वृन्दा कानन मँझारी है ।
सुयश महान शीत भानुसों प्रकांशमान सुकवि मध्यानमें वखान जासु भारी है ।
मानिन अमानद अमानिनको मानदान ज्ञानिन प्रदान ज्ञान दीन त्राणकारी है ।
दान सनमानमें जहानमें न आन ऐसो भानुवंशमें निशान ज्ञान ध्यान धारी है ॥१॥
दोहा–“सुदिवश ब्रजते कूच करि, चलि मगमें दरकूच ॥
रीवांगर पहूंचिगो, संयुत सैन्य समूच” ॥
सोरठा–उधद्धि बंध यक चित्र, जामें यही चरित्र सब ॥
सो रचिचात विचित्र, लिखे देत चरचैं सुकवि ॥ १ ॥


[बायाँ स्तम्भ]
पारसीके बैतका अर्थ–तन्-
सरा कहे तन उसके तईं पैरहन जो
कपड़ा सो भी उरियां कहे नंगा नहीं
देखताहै तोते जो कपेरै उसके अंग-
को नहीं देखताहै तो और कोई
उसके अंगको नहीं देखताहै यह
कहा कहिबेको यह काव्यार्थापत्ति
अलंकार व्यंजित भयों कपरौ उसके
अंगको कैसे नहीं देखताहै बुजां दर-
तन् कहे जैसे जान जो है जीव सो
बीच नके है व तन दरकहे तनके
बीच रहिहू कै जान जो है जीव सो
नहीं देखाता है यह उपमालंकारतें
स्वकीया नायिका व्यंजित भई ॥

[दायाँ स्तम्भ]
अंगरेज़ीके दोहाका अर्थ–दी
कहे प्रसिद्ध अमनि प्रीजंट कहे सर्व-
व्यापी जो है गाड कहे ईश्वर ताकी
अन कहे पृथ्वी अर्थ कहे ताके ऊपर
आई कहे हम प्रे कहे प्रार्थना करै हैं
न्यारो कहे सूक्ष्म माई कहे हमार
है हरट कहे चित्त ताके अन कहे
ऊपर डीवाइन कहे दिव्य मर्थ कहें
आनंद वृं कहे ल्यावने को अर्थात्
जामें दिव्य आनंद जो है ब्रह्मानंद
सो मेरे चित्तमें होय याके लिये मैं
प्रार्थना करौहौं इहां सर्वव्यापी ईश्व-
रकों कह्यो ताते मैं ईश्वरहीके भरोसे
सर्वदा रहौंहौं यह मेरे मनकी जान-
तई होयँगे यह व्यंजित कियों ॥

बघेलवंशवर्णन । ( ६९७ )
दोहा-कछु दिनमें आवत भयो, जयपुरको नरनाह ॥
शाहन करन पनाहभे, भूपति जेहिं कुलमाह ॥ ५८ ॥
भगिनि उभय रह जानकी, कृष्ण कुवँरि जिन नाम ॥
व्याहि विदा कीन्ह्यो तिन्हैं, दै बहु धन अभिराम ॥५९॥
पुनि बीते कछु काल श्री, विश्वनाथ नरपाल ॥
है वश काल निवास किय, पास अवधपति लाल ॥६०॥
श्रीरघुराज तनय तेहि केरो । हरिइच्छा गुणि बिन अवसेरो ॥
मानि राज्य सब यदुपति केरी । कामदार सों कह्यो निवेरी ॥
राजाराम राज्यके एकू । तिनकी कृपा न भय मोहिं नेकू ॥
स्वामि धर्मरत जन हितकारी । करिहैं कबहुँ न काम बिगारी ॥
सुदिन अबै न राज अभिषेकु । कह्यो ज्योतिषी सहित विवेकू ॥
ताते मो मन भावत येहू । करो यज्ञ संमत करिदेहू ॥
सुनि दिवान कह बहुत सराही । प्रभु भल कह्यो ऐसहीं चाही ॥
तब रघुराज परम सुख पाई । आशु बनारस मनुज पठाई ।
दोहा--विप्र वेद वित छिम्र बहु, रीवां नगर बोलाय ॥
सुदिन शोधाय सचाय गो, लछिमनबाग सिधाय ६१॥
तहँ किय कठिन कायको नेमा । पगो परम यदुपति पद प्रेमा ॥
मज्जन करि गायत्री जापा । प्रथम करै नितहरै जो पापा ॥
पुनि षोडश प्रकार भरि चायन । पूजन करै रमा नारायन ॥
पुनि नारायण अष्टाक्षर मनु । बीसहज़ार जपैं निश्चल मनु ॥
यही भांति विप्रनहुँ जपावै । रहै यकांत अनत नहिं जावै ॥
पुरश्चरण सौ दिन करि यहि विधि । कृष्ण कृपा पात्रता लही सिधि ॥
कह्यो स्वप्नमें आय मुरारी । राज्य करै है मम अधिकारी ॥
लहत मनहिं मन परमहुलासा । कोहुसों कबहुँ न कियो प्रकाशा ॥
दोहा--जप अष्टाक्षर मंत्रको, बीस हजाराहिं केर ॥
जौलौं रहै शरीर जग, किय संकल्प करेर ॥ ६२ ॥

( ६९८ ) बघेलवंशवर्णन ।
रमा द्वारकाधीशकी, त्यों बलकी करि सूर्त्ति ॥
हेम रजत रचवायकै, परम मनोहर मूर्ति ॥ ६३ ॥
वेद् विहित करवायकै, आसु प्रतिष्ठा वेश ॥
बांधवेश विश्वनाथ सुत, पूजन करत हमेश ॥ ६४ ॥
करन लगै जप जेहिंसमय,तब भरि मोद अनंत ॥
भजन सुनैं भजनीनसौं, निर्मित निज बहु संत ॥ ६५ ॥
सुदिन राज्य अभिषेक को, आयो जब मुदवान ॥
सब तद्वीर महान भै, वेद् विधान प्रमान ॥ ६६ ॥
श्रीरघुराज जाय मखशाला । वसु मंत्रिनते सहित उताला ॥
रघुपति यदुपति मूरति काहीं । थिति कै हेमसिंहासन माहीं ॥
महाराज अभिषेक कराई । अभिषेकित भो आपु सोहाई ॥
श्रीकृष्णहिके कृपापात्र कर । अधिकारी भो विदित अवनिपर ॥
कर परताप छयो परतापा । सज्जन सुखप्रद सुयश अमापा ॥
पितु सम पालत प्रजन सप्रीती । नीति रीति करि. मेटि अनीती ॥
सुनि सुनि शाहहु जाहि सराह्यो । आय अजंट लाट भल चाह्यो ॥
राज्य करत बीत्यो कछु काला । दर्शन हित जगदीश कृपाला ॥
दोहा-करि लालसा विशाल लै, संग चमू चतुरंग ॥
रानिन युत जगपति पुरी, गमन्यो सहित उमंग ॥ ६७ ॥
बीच बीच वीथिन करि वासा । श्रीरघुराज राज सहुलासा ॥
शतक संस्कृत यक जगदीशा । विरच्यो मैं निज आँखिन दीसा ॥
भाषा शतक कवितमें दूजो । विरचन लग्यो सो उमग पूजो ॥
पर्यो अमर कंटक मग माहीं । गमनत भयो नाथ तहँकाहीं ॥
मेकल गिरिते कढ़ि तहँ प्रगटी । शिव प्रिय रेवा सरि अघ निघटी ॥
तहँ मज्जन करि दै बहु दाना । रेवा अष्टक रच्यो सुजाना ॥
शिवअष्टक पुनि रच्यो तहांहीं । सिंहवलोकन छंदहिं माहीं ॥
रहें जे संत विप्र तहँ वासी । तिनको देत भयो धन राशी ॥

बघेलवंशावर्णन । ( ६९९ )
दोहा-सहित सैन्य चतुरंगिणी, तहँते करि सु पयान ॥
सेवरी नारायण निकट, जातभयो मतिमान ॥ ६८ ॥
सेवरीनारायण करि दर्शन । किय सहस्र मुद्रा कहँ अर्पन ॥
तहँते प्रभु पयान करि आसू । पहुँच्‍यो साक्षिगोपालहि पासू ॥
मुद्रा सहस गयंद सुहायो । दर्शन लैकै तिन्हें चढ़ायो ॥
दै सबको तिमि द्रव्य महाना । सादर चढ़वायो भगवाना ॥
पंडा गाड़िन लादि प्रसादा । लाय दिये लै युत अहलादा ॥
महाराज सबको विरताई । खायो स्वाद अपूर्व सुनाई ॥
श्रीरघुराज परमसुख भीनो । तहँते पुनि पयान द्रुत कीनो ॥
जगन्नाथ मंदिरके ऊपर । नीलचक्रपरश्यो जब अघहर ॥
सोरठा-करि दंडवत प्रमाण, कीन्ह्यो पुरी प्रवेश प्रभु ॥
डेरा किय गुरुधाम, रानिन सहित हुलास भरि ॥
दोहा-तहँते गमनतभो तुरत, दर्शन हित जगदीश ॥
अरुण खम्भ ढिग द्वारमें, जात भयो अवनीश ॥ ६९ ॥
रकबा चार्यो दिशि बन्यो,मंदिर मध्य उतंग ॥
लसत दुर्ग सो उदधि तट, तकत करत अघ भंग ॥ १७० ॥
प्रथम अकेले आपहीं, युत भाइन सरदार ॥
सादर भीतर द्वारके, जाय नरेश उदार ॥ ७१ ॥
घनाक्षरी ।
जगपति मंदिरके चारों ओर देवनके मंदिर सुखद तिन दरशकै सुखकारि ॥
सहित समाज प्रदक्षिणकै चारि फेरि मंदिर सिधारि शिरनाय खम्भ पन्नगारि॥
जाय कछु निकट सुभद्रा बलभद्र युत सछवि मुरारि वार वार नैन सों निहारि॥
वारि मन प्रथम सँभारि तनु सुंधि फेरि पलक नेवारि हेरि रहे धन वारि वारि ॥
स० आजुभयो सफलो मम जन्म गुन्यो यह जन्ममें पुण्य बढ़ायों
जानि लियो कियो पूरव जन्महुँ पुण्य महान विशोषि सुहायो ॥