कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६९४ ) बघेलवंशवर्णन ।
स. द्वैभगिनी मम व्याहन योग्य जहां तिनव्याहन योग्यउचारी॥
होय विवाह तहां तिनको ध्रुव जानत आप सबै बड़वारी ॥
राना स्वरूप सराहि कह्यो सुनिहैं हमहूंको खँभार या भारी ॥
सो सम्बंध कियो हम ठीक हियो मँह जयपुर नाह विचारी ॥१॥
घनाक्षरी ।
नाम जाहि रामसिंह रूप अभिराम जाकोतिलक चढ़ायो जोधपुर नाह सुता व्याह ॥
पठवैवकील हमौ ढील नहीं हैहै काज आपहूको रीवां जात जयपुर पैरगो राह ॥
महाराज विश्वनाथसिंहको कुमार रघुराज सिंह बोल्यो सुनि भलो या कियो सलाह ॥
सहित उछाह कृपा करिकै अथाह अब दीजै सीख काह यहीहै उमाह मनमाह ॥१॥
दोहा-सुनि राना सुख पायकै, सुंदर दिवस शोधाय ॥
सीख दियो रघुराज को, दै बहु धन समुदाय ॥१५०॥
भूप स्वरूप अनूप सुनि, निज भगिनी हर्षाय ॥
विदा कियो धन अमित दै, शिबिका रुचिर चढ़ाय ५१॥
संग रहे सरदार जे, औ जे बंधु अपार ॥
यथा उचित सब फौजको, कीन्ह्यो अति सत्कार ॥ ५२ ॥
महाराज विश्वनाथ किशोरा । अति मसन्न युत चमू अथोरा ॥
विजय मुहूरतमैं सुख छाई । हरि गुरु गणपति पद शिरनाई ॥
सैन्य सहित द्रुत कियो पयाना । बाजे बहु गहगहे निसाना ॥
चलत चलत जैपुर नियरान्यो । महाराज जयपुरको जान्यो ॥
कोश भरेते लै अगुवाई । डेरा दिय देवाय पुर लाई ॥
सैन्य समेत शिबिर पुनि आये । रामसिंह भूपति सुख छाये ॥
श्रीरघुराज उदार अपारा । विविध भांति कीन्ह्यो सत्कारा ॥
सो लहि जयपुरको नरनाहा । लह्यो ससैन्य मरम उद्साहा ॥
दोहा--फौज साजि पुनि मौज भरि, युत समाज रघुराज ॥
जयपुरके महाराजपै, गमन्यो प्रभा दराज ॥ ५३ ॥