कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६९६ ) बघेलवंशवर्णन ।
देश देशके याचक आये । भये प्रसन्न हेम बहु पाये ॥
ब्रजमंडलमें नर औ नारी । सब थल ऐसो परचो निहारी ॥
दोहा–लहि लहि अमित हिरण्यको, भाषहिं ते काहि धन्य ॥
यह नवीन परजन्य नृप, वरस्यो ब्रजहिं हिरन्य ॥५७॥
कवित्त ।
दीन्हे हैं द्विजान पंडितन हेम महादान रघुराजसिंह वृन्दा कानन मँझारी है ।
सुयश महान शीत भानुसों प्रकांशमान सुकवि मध्यानमें वखान जासु भारी है ।
मानिन अमानद अमानिनको मानदान ज्ञानिन प्रदान ज्ञान दीन त्राणकारी है ।
दान सनमानमें जहानमें न आन ऐसो भानुवंशमें निशान ज्ञान ध्यान धारी है ॥१॥
दोहा–“सुदिवश ब्रजते कूच करि, चलि मगमें दरकूच ॥
रीवांगर पहूंचिगो, संयुत सैन्य समूच” ॥
सोरठा–उधद्धि बंध यक चित्र, जामें यही चरित्र सब ॥
सो रचिचात विचित्र, लिखे देत चरचैं सुकवि ॥ १ ॥
[बायाँ स्तम्भ]
पारसीके बैतका अर्थ–तन्-
सरा कहे तन उसके तईं पैरहन जो
कपड़ा सो भी उरियां कहे नंगा नहीं
देखताहै तोते जो कपेरै उसके अंग-
को नहीं देखताहै तो और कोई
उसके अंगको नहीं देखताहै यह
कहा कहिबेको यह काव्यार्थापत्ति
अलंकार व्यंजित भयों कपरौ उसके
अंगको कैसे नहीं देखताहै बुजां दर-
तन् कहे जैसे जान जो है जीव सो
बीच नके है व तन दरकहे तनके
बीच रहिहू कै जान जो है जीव सो
नहीं देखाता है यह उपमालंकारतें
स्वकीया नायिका व्यंजित भई ॥
[दायाँ स्तम्भ]
अंगरेज़ीके दोहाका अर्थ–दी
कहे प्रसिद्ध अमनि प्रीजंट कहे सर्व-
व्यापी जो है गाड कहे ईश्वर ताकी
अन कहे पृथ्वी अर्थ कहे ताके ऊपर
आई कहे हम प्रे कहे प्रार्थना करै हैं
न्यारो कहे सूक्ष्म माई कहे हमार
है हरट कहे चित्त ताके अन कहे
ऊपर डीवाइन कहे दिव्य मर्थ कहें
आनंद वृं कहे ल्यावने को अर्थात्
जामें दिव्य आनंद जो है ब्रह्मानंद
सो मेरे चित्तमें होय याके लिये मैं
प्रार्थना करौहौं इहां सर्वव्यापी ईश्व-
रकों कह्यो ताते मैं ईश्वरहीके भरोसे
सर्वदा रहौंहौं यह मेरे मनकी जान-
तई होयँगे यह व्यंजित कियों ॥