सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 721, कुल 766 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 721

बघेलवंशवर्णन । ( ६९३ )
घनाक्षरी ।
सन्मुख बैठि छवि निरखन लागे चख अंग अंग केरी उर हरष बढ़ायकै ॥
ताही समै नाथजीको हाथ लै पुजारी ऐना लग्यो दरशावै मोद गाथ हिये पाइकै ॥
ग्रीवानाय हरि तब बदन लखन लागे लखि रघुराजसिंह अचरज छायकै ॥
रण दवनसिंह सों कह्यो या तू देखि कला भाष्यो तिन होहूं लख्यो नैन टक लायकै १॥
दोहा-कृपानाथजी आपके, ऊपर करी महान ॥
सुनत पुजारीहूं कह्यो, यहां प्रगट भगवान ॥ ४५ ॥
राम सागराह्निक अहै, विश्वनाथ कृत जौन ॥
बखतावर गायक लगे, गावन तिन ढिग तौन ॥ ४६ ॥
गावत सन्मुख निरखिकै, तहां पुजारी कोय ॥
आयकह्यो अस बैठिवो, रानहुको नहिं होय ॥ ४७ ॥
कवित्त ।
दीन्ह्यो सो उठाय बखताबर विचारि यह हरिसर्वत्रअहै और ठौर जांयकै ॥
प्रेम पूर पागे लागे गाबै राग सागरको प्रभु को रिझाय लियो सुरनको छायकै ॥
उघरे कपाट सबै आपही सो ताही समै टेरिकै पुजारी कह्यो बाहेरहि आयकै ॥
नाथको निदेश अहै लेहू वह गायकको इतही बोलाय बैठि गावै हरषाइकै ॥
दोहा-कह पुजारि तुम्हरे ऊपर, रीझेहैं ब्रजराज ॥
सुनि बखतार कह्यो सति, यह प्रभाव रघुराज ॥ ४८ ॥
सहितचमू चतुरंगिनि भाई । पुनि रघुराज शिविर निजआई ॥
कछु वासर किय सुख युत वासा । राना मान्यो परम हुलासा ॥
सीखदेन अवसर जब आयो । तब राना निज निकट बोलायो ॥
श्रीरघुराज समाज समेतू । गमनत भयो तहां मति सेतू ॥
लै आगू राना चलि धामै । बैठायो गद्दी अभिरामै ॥
कीन्ह्यो सकल भांति सत्कारा । दीन्ह्यो हय गय वसन अपारा ॥
भूषण बहु पुनि दिये अमोले । ज्योतिमान मणि मोतिन तोले ॥
विश्वनाथ नरनाथ कुमारा । राना सो पुनि वचन उचारा ॥
दोहा-आप सुजान सयान हैं, मेरे पिता समान ॥
दीजै संमत तासु प्रभु, जो मैं करौं बखान ॥ ४९ ॥