कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबघेलवंशवर्णन । ( ६९५ )
निरखि निरखि जयपुर नर नारी । पावतभे उर आनंद भारी ॥
कछु दूरीते जयपुर राजा । आगू लै आवत रघुराजा ॥
महल जाय गद्दी बैठायो । आपहुँ बैठि परमसुख पायो ॥
विविध भाँति सत्कारहि कीन्ह्यो । पाय सो येऊ अति सुख भीन्यो ॥
सैन्य सहित पुनि शिबिर सिधाई । बात होन संबंध चलाई ॥
ठहरिगयो सो बिनहिं प्रयासा । गुन्यो कृपा यह रमा निवासा ॥
रसम व्याह पूरब जो होई । सो दै करि सादर मुदमोई ॥
वृन्दावन तीरथ करिवेको । बढ़ी लालसा वसु दीवेको ॥
दोहा-सादर सब सरदारसों, अरु देवानहु पाहिँ ॥
कहहिं सफल होतो जनम, लखि वृंदावन काहिँ ॥ ५४ ॥
सुदिन शोधाय ज्योतिषिन तेरे । श्रीरघुराज मोद लहि ढेरे ॥
श्रीहरि गुरु पदपंकज सौंरी । सैन्य सहित वृन्दावन ओरी ॥
कीन्ह्यो होत प्रभात पयाना । बजे फौजमें अमित निसाना ॥
बीच बीच वीथिन करि वासा । पहुँचत भये जबै ब्रज पासा ॥
सादर करिकै दंड प्रणामा । जातभये तुलसीवन ठामा ॥
वृन्दावन मधुपुर दर्शना । नंदगाँव जो विदित जहाना ॥
मुख्य चारि तीरथ ये करिकै । दर्शन करि साधुन मुद भरिकै ॥
पुनि चौरासी कोशहु केरी । किय प्रदक्षिणा लहि मुद ढेरी ॥
दोहा-हरिमंदिर जेते रहे, दर्शन किय पद जाय ॥
हय गय वसन अमोल अरु, मोहर अमित चढ़ाय ५५
राधा राधारमणकी, मूरति पुनि पधराय ॥
रागभोग हित गाँव यक, दीन्ह्यो तहां चढ़ाय ॥ ५६ ॥
पुनि विश्रांतघाटमें जाई । सुवरण तुला चढ्यो सुख छाई ॥
सो सुवरण ब्रजमंडल वासी । जेते रहे विप्र सुखरासी ॥
तिनको दै कीन्ह्यो अति तोषू । ते माने सब भांति सँतोषू ॥
तिमि याचक जे रहे घनेरे । तिन्हें हेम बहु दिये निवेरे ॥
नारी रोंकि रोंकि मंगमाहीं । कहि कहि लला लेहिं गहि बाहीं ॥
तिनको मनवांछित धन दीन्हे । शीशनाय बहु मानहि कीन्हे ॥