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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

( ३४२ ) बीजक कबीरदास ।
जीवको ब्याही माया जो होइहै सो मनते होइहै सो मन ससुर भयो अरु
शुद्धते अशुद्धभयो सो अशुद्ध जीवको बाप शुद्ध जीव ठहरयो सोई समधी
ठहरयो तौने जीवके घरमें लमधी जो है मन को भाईचित्त सो आयो नाना
स्मरण देवायो तबहूं जो माया है ताको भाई काल आयो । चूल्हा जो है तामें
दुइँ पल्ला होइहैं सो पुण्य पाप जेहैं ते दूनों पल्लाहैं तौने चूल्हामें गोड़ दैकै
चरखा जो शरीर है तिनको डड़ाइदीन्ह्यो कहे लाइदियो काहूको पुण्य करायकै
काहू को पाप करायकै शरीर खाइलीन्ह्यो ॥ ४ ॥
देवलोक मरि जाहिंगे एक न मरै बढ़ाय ।
यह मन रंजन कारने चरखा दियो बढ़ाय ॥ ५ ॥
कह कबीर संतौ सुनौ चरखा लखै न कोइ ।
जाको चरखा लखि परो आवा गवन न होइ ॥ ६ ॥
देवलोक को नरलोक को सबको काल खाइलेइहै यह बढ़ैया जो मनहै
सोनहीं मारो मरै है औ जब वह चरखा टूटैहै तब बढ़ही बनाइ देइहै ऐसें
वह बढ़ई जो मन सो कालके रंजन करिवे को शरीर रूपी चरखा कों दृढ़
करत जाइहै नाना शरीर कालको खवावत जाय है ॥ ५ ॥ श्रीकबीरजी
कहैं हैं कि, चरखा जे चारो शरीरहैं तिनको कोई नहीं लखै है जाको चारों
शरीर लखिपरे अरु पांचौशरीर कैवल्य में प्राप्त भयो कहे केवल चितमात्र
रहिगयो तब वह चरखाको गढ़ैया जो मनहै तेहिते जीव भिन्न ह्वैगयो तब
छठवाँ अंश स्वरूप साहब देइहै तामें स्थित हैकै साहबके लोकको जाइहैं
आवा गवन नहीं होई है ॥ ६ ॥
इति अरसठवां शब्द समाप्त ।
अथ उनहत्तरवां शब्द ॥ ६९ ॥
यंत्री यंत्र अनूपम बाजै । वाके अष्ट गगन मुख गाजै ॥१॥
तूही माजै तूही बाजै तुही लिये कर डोलै ।

शब्द । ( ३४३ )
एक शब्द में राग छत्तिसौ अनहद वाणी बोलै ॥ २ ॥
मुखको नाल श्रवणके तुम्बा सतगुरु साज बनाया ।
जिह्वा तार नासिका चरही माया मोम लगाया ॥ ३ ॥
गगन मँडल मा भा उजियारा उलटा फेर लगाया ।
कह कबीर जन भये विवेकी जिन यंत्री मन लाया ॥ ४ ॥
यंत्री यंत्र अनूपम वाजै । वाके अष्ट गगन मुख गाजै ॥१॥
यंत्री जो है जीव ताको यंत्र जो शरीर है सो अनूपम बीन बाजै है बीनमें
सात स्वर बाजैहैं अरु आठवों जीवके तारमें टीपको स्वर बाजै है औ इहां
यह शरीरमें सात चक्रहैं सहस्तारलों तिनके बीच बीचको जो है आकाश ये सात
गगन भये अरु आठवों सहस्तार के ऊपर को जो आकाश तामें सुरपति कम-
लमें बैठो जो गुरुनाम बतावै है सो वह आठवां गगनमें जाइकै गाज्यो कहैं
रामनाम सुनिकै लेन लग्यो सो इहां सुषुम्णा जो नाड़ी सोई तार है मूलाधार
चक्रसुरति कमल येई तुम्बा हैं ॥ १ ॥
तूही गाजै तूही वाजै तुही लिये करडोलै ।
एक शब्द में राग छत्तिसौ अनहद वाणी बोलै॥२॥
सो या बीणाको तुही गाजै कहै सुरति कमलमें तुही नाम लेइ है औ तुहीं
बाजै कहै तुही सुरति बोले है औ तुही सुरतिको लैके डोलै है कहै तुहीं
सुषम्णा ह्वै चढ़िआइहै अर्थात् शरीरको मालिक तुही है औ बीणामें छत्तिस राग
बोलैहै। औ इहां एक शब्द जो है राम नाम तामें चौंतिस बर्ण औ पैंतीसौंनाद औ
छत्तिसौंबिंदु ई सब हैं बिंदुते आकारादिक स्वर आइगये वही अनहद है कहै वही-
को हद नहीं है तौने रामनाम रूपी बाणी सुरति कमलमें गुरु बोलै है सो तहीं
जपैहै या अंतर बीणा बतायो सो जानु अब बाहर को बीणा बतावै हैं ॥ २ ॥

( ६४४ ) बीजक कबीरदास ।
मुखको नाल श्रवणके तुम्बा सतगुरु साज बनाया ।
जिह्वा तार नासिका चरही माया मोम लगाया ॥ ३ ॥
बीणाके बीचमें डांड़ीहै यहां मुखै नाल डांडी है वीणामें दुइतुम्बा लगैहैं यहां
दूनों जे श्रवणहैं तेई तुम्बाहैं बीणाको स्वर मिलावै हैं औ यहां सतगुरु जेहैं ते साज
बनाइ जीवनको उपदेश करै हैं औ वहा बीणामें तार लागै है अरु यहां जीभ जो
है सोई तार है औ बीणामें चरही कहै सार लाँगैहै औ यहां नासिका चरही कहे
सारहै सारमें मोम जमाया जाइ है यहां माया जो है गुरुकी कृपा माया "दम्भे
कृपायां च॥" सोई मोम जमायो जैसे बीणा में जौन स्वर बजावै तौन बाजै है
तैसे सुरति कमलते गुरु जो राम नामको उपदेश कियो सोई जीभते जपै है ॥३॥
गगन मँडल मा भा उजियारा उलटा फेर लगाया ।
कह कबीर जन भये विवेकी जिन यंत्री मन लाया ॥४॥
बीणा जब सुरते बाजै है तब सब रागनको उजियारा ह्वै जाइहै औ आछो
लगैहै सबराग जानि जाइहैं और दूसरे पक्षमें जीवको उलटो ज्ञान जगत्मुख
ह्वैगयो तैं ब्रह्ममुख ह्वैगयो तैं औ आत्मामुख ह्वैगयो तैं कि महीं ब्रह्महौं ताकों
नाना शब्दमें समुझाइकै अठयें गगनमें जीवको साहब मुख करतभये तब जीव-
को ज्ञान ह्वैगयो सब धोखा छोड़िकै साहब में लग्यो जगत्मुख रह्यो सो
उलटा रह्यो ताको सीधेमें गुरुवालोग फेरि लैआये औ लगायो । पाठ होइतो
साहबमें लगावत भये श्रीकबीरजी कहैहैं कि, यंत्री जो हैं बीणाकार उस्ताद
तौनेते जो बीन बजावै मन लगाय सीखैहै तौ वाको सुरनको रागनको वे ब्यौरा
आइ जाइहैं ऐसे सुरति कमलमें बैठे जे हैं परमगुरु जे राम नामको उपदेश
करै हैं तिनसोंजो कोई यंत्री जीवात्मा मन लगावै है सो बिबेकी होइहै कहे
जगत् को असांच जानिकै सांच साहब में लगि जाइहै ॥ ४ ॥
इति उनहत्तरवां शब्द समाप्त ।

शब्द । ( ३४५ )
अथ सत्तरवां शब्द ॥ ७० ॥
जसमास नरकी तसमास पशुकी रुधिररुधिर यकसाराजी ।
पशुकी मास भखै सबकोई नरहि न भखै सियाराजी ॥ १ ॥
ब्रह्मकुलाल मेदिनी भरिया उपजि विनशि कित गइयाजी ।
मास मछरिया जोपै खैया जो खेतनि में बोइयाजी ॥ २ ॥
माटीको करि देई देवा जीव काटि काटि देइयाजी ।
जो तेरा है सांचा देवा खेत चरत किन लेइयाजी ॥ ३ ॥
कहै कबीर सुनोहो संतो रामनाम नित लैयाजी ।
जो कछुकियो जिह्वाके स्वारथ बदल परारा दैयाजी ॥४॥
जसमासनरकी तसमासपशुकी रुधिररुधिरयकसाराजी ।
पशुको मास भखै सबकोई नरहि न भखै सियाराजी ॥१॥
जस नरकी मास होइ है तस पशुकी मास होइ है अरु रुधिर भी एक
तरह होइ है परंतु पशुके मासको जे भक्षण करै हैं ते सियारई हैं सो
वे मनुष्यते औ सियारते यतनै भेद है कि, सियार मनुष्यको मांस खाइ है अरु
नरपशु की मांस खाइ है मनुष्यको मांस पशु नहीं खाइ है सो कहै हैं कि,
रुधिर मांस तो सब एकई तरह है नर की मांस काहे नहीं खाय हैं ॥ १ ॥
ब्रह्म कुलाल मेदिनी भरिया उपजि विनशि कित गइयाजी ।
मास मछरिया जोपै खैया जो खेतनि में बोइयाजी ॥ २ ॥
जौनेते सब पृथ्वी जगत् भयो है ऐसो जो है ब्रह्मा कुलाल जो कुम्हार औ
सर्वत्र जगत में भरै रहा अर्थात् सब वस्तु ब्रह्मई रह्यो तौ यह सब पृथ्वी
उपजी औ बिनशिकै कहां गई सो एक ब्रह्मही सर्व मानिकै जो मास मछली
खाउ कि सब तो एकई है जो मन चलैगो सो करेंगे नरक स्वर्ग कर्म सब

( ३४६ ) बीजक कबीरदास ।
मिथ्या हैं ऐसो जो मानौगे तौ जो खेतमें बोवनको होइ हैं, सो तुम मुर्दे पशु
की मासकी मास खाउ हौ अरु वे तुम्हारे जीतही यमपुरमें मांस खाइँगे जो
कहौं हम देवताको बलि चढ़ाइकै खाइ हैं तौनेपर कहै हैं ॥ २ ॥
माटीको करि देई देवा जीव काटि काटि देइयाजी ।
जो तेराहै सांचा देवा खेत चरत किन लेइयाजी ॥ ३ ॥
माटीको तौ देवता बनाओहौ उसके आगे जीव काटि काटि के राखौहौ
यह कैसी गाफिली तुमको घेरी है जो माटीको देवता सांच है तो जब बोकरी
खेतमें चरती है तब तुम्हारा देवता काहे नहीं खाता क्या देवताको किसीका
डर है भाव यह है कि, तुम काहेको हत्यारी लेतेहो अंगुरियादेउ जो सांचा
होयगो तौ खाइगो तेहिते तुम्हारी देवता मिथ्या है खेतमें चरत बोकरीको न
खाइ सकैगो ॥ ३ ॥
कहै कबीर सुनोहो संतो रामनाम नित लैयाजी ।
जो कछु कियो जिह्वाके स्वारथ बदल परारा दैयाजी ४॥
सो कबीरजी कहै हैं कि, जिनके जिनके गलाको तुम काटतेहौ ते सब
तुम्हारो नरकमें गला काटेंगे तेहिते रामनामको नितलेउ भाव यह है जब नामा-
पराध छोड़ि रामनाम लेउगे और फिरि पातक न करौगे तबहीं तुम्हारे पातक
जावेंगे तामें प्रमाण ॥ "हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तैरपि स्मृतः । यदृच्छयापि
संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः ॥ रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्। नरो न
लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विंदति " ॥ दशनामापराधमें प्रमाण ॥ "संतां निंदा
नाम्नः परममपराधं वितनुते यतः ख्यातिं जातं कथमयह सहेद्धेलनमदः । शिवस्य
श्रीविष्णोर्य इह गुणनामादिसकलं धिया भिन्नं पश्येत्स खलु हरिनामा हितकरः॥
गुरोरवज्ञा श्रुतिशास्त्रनिंदनं तथार्थवादो हरिनाम कल्पनं । नाम्नो बलाद्यस्य
हि पापबुद्धिर्न विद्यते तस्य यमैर्हि विच्युतिः ॥ श्रुत्वापि नाममाहात्म्यं यः
प्रीतिरहितोधमः । अहं ममादिपरमो नाम्नि सोप्यपराधकृत् ॥ ४ ॥
इति सत्तरवां शब्द समाप्त ।

शब्द । ( ३४७ )
अथ इकहत्तरवां शब्द ॥ ७१ ॥
गुरुमुख ।
चातक कहा पुकारै दूरी । सो जल जगत रहा भरपूरी ॥१॥
जेहि जल नाद विन्दु का भेदा। षटकर्मसहितउपान्यौवेदा २
जेहि जलजीव सीव का वासा। सो जल धरणि अमर परकासा ३
जेहि जलउपजेसकलशरीरा। सो जल भेद न जान कबीरा॥४॥
चातृक कहा पुकारै दूरी। सो जल जगत रहा भरपूरी ॥ १ ॥
जेहि जल नादविन्दु का भेदा। षटकर्मसहित उपान्यौवेदा २॥
सबते गुरु परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्र कहैहैं कि, हे चातक दूरि दूरि तैं कहा
पुकारै है कि पियासोहौं पियासोहौं जैन स्वातीको जल तैं चाहैहै जाते पियास
बंद है जाइहैं सो राम नाम रूपी जल स्वातीको मुख्य मुक्तिको साधन जगत्में
पूरि रह्यो है तैं कहां और और मुक्तिको साधनको खोजत फिरैहै ॥ १ ॥ औ
जौने रामनामरूपी जलमें नादबिंदु को भेद है अपने षट मात्रनते वेदको उपान्यौ
कहै उत्पत्ति कियो है ॥ २ ॥
जेहिजलजीवसीवकावासा। सो जल धरणिअमरपरकासा ३॥
जेहिजलउपजेसकलशरीरा। सो जलभेदनजानकबीरा ॥४॥
जौने रामनामरूपी जलमें जीव जेहैं सीव जे नानाईश्वर तिनको बासैहै औ
सोई रामनामरूपी जब धरणि में जो कोई जैपै ताको अमर करै है या प्रकाश
कहै जाहिरहै अथवा वा अवनीमें नाशमान नहीं होयहै या जाहिरहै
तैं पियासो काहे मरै है ॥ ३ ॥ जेहि राम नामरूपी जलते सकल शरीर उप-
जै है अर्थात् संसारमुख अर्थते अनन्त ब्रह्मा उपजै हैं रामनामरूपी जलको भेद
कबीरा कहै कायाके बीर जे जीव हैं ते नहीं जानै हैं अर्थात् जो रामनाम
मोको बतावै है सो जो विचार करै तौ चिद्विग्रह करिकै सर्वत्र महीं देखों
परौं तौ मेरी भक्ति जलपान करिकै मुक्ति है जाइ है । औ संसारताप बुताइ
जाइ है ॥ ४ ॥
इति इकहत्तरवां शब्द समाप्त ।

( ३४८ ) बीजक कबीरदास ।
अथ बहत्तरवां शब्द ॥ ७२ ॥
चलहु का टेढ़ो टेढ़ो टेढ़ो ।
दशौ द्वार नरकै में बूड़े तू गंधीको बेढो ॥ १ ॥
फूटे नैन हृदय नहिं सूझै मति एकौ नहिं जानी ।
काम क्रोध तृष्णाके मारे बूड़ि मुये बिन पानी ॥ २ ॥
जारे देह भसम हैजाई गाड़े माटी खाई ।
शूकर श्वान कागके भोजन तनकी यहै बड़ाई॥३॥
चेति न देखु मुगुध नर वौरे तूते काल न दूरी ।
कोटिन यतन करै बहु तेरे तनकी अवस्था धूरी॥४॥
वालूके घरवामें बैठे चेतत नाहिं अयाना ।
कह कबीर यक राम भजे बिन बूड़े बहुत सयाना ॥ ५ ॥
चलहुका टेढ़ोटेढ़ोटेढ़ो।दशौ द्वार नरकैमें बूड़ैतू गंधीकोबेढ़ो
तीन बार टेढ़ो टेढ़ो टेढ़ो जो कह्यो सो ज्ञानकांड कर्मकांड उपासना कांड
ये तीनों मार्ग अथवा सतोगुणी रजोगुणी तमोगुणी ये तीनों कर्मते टेढ़े हैं सो
ये मार्ग में कहा चलोहौ दशौ द्वार जे दशौ इन्द्री हैं ते नरकही में लगी हैं
कहे बिषयन ही में लगी हैं सो तेरे बिषयकी गन्धि लगी है ताते तैं गन्धी है
सो तोहीं ऐसे गन्धी को माया बेढ़िलियो कहे तेरो ज्ञान छोड़ाइ लियो । अरु
जो बेड़ो पाठ होइ तौ यह अर्थहै कि तोहीं ऐसे गंधीको जाके दशौद्वार नरक
हीमें बूड़ेहैं ताको बेड़ो नहीं है जाते संसार सागर उतरि जाइ अथवा गन्ध
जगत जो है गन्धी शरीर ताको तैं बेड़ो कहे आधार कहा ह्वैरहैहै टेढ़ो टेढ़ो
चाल चलिकै यहां कहां तेरो पारकियो होइगो संसार सागरते न होइगो
बूड़िही जाइगो ॥ १ ॥
फूटे नैन हृदय नहिं सूझै मति एकौ नहिं जानी ।
काम क्रोध तृष्णाके मारे बूड़ि मुये बिन पानी ॥ २ ॥

  • ा + न.
    "कागके": क + ा + ग + क + े.
    "भोजन": भ + ो + ज + न.
    "तनकी": त + न + क + ी.
    "यहै": य + ह + ै.
    "बड़ाई": ब + ड़ + ा + ई.
    "॥ ३ ॥"

Line 4:
चेति न देखु मुगुध नर बौरे तूते काल न दूरी ।
"चेति": च + े + त + ि.
"न": न.
"देखु": द + े + ख + ु.
"मुगुध": म + ु + ग + ु + ध.
"नर": न + र.
"बौरे": ब + ौ + र + े.
"तूते": त + ू + त + े.
"काल": क + ा + ल.
"न": न.
"दूरी": द + ू + र + ी.
"।"

Line 5:
कोटिन यतन करै बहुतैरे तनकी अवस्था धूरी ॥ ४ ॥
"कोटिन": क + ो + ट + ि + न.
"यतन": य + त + न.
"करै": क + र + ै.
"बहुतैरे": ब + ह + ु + त + ै + र + े.
"तनकी": त + न + क + ी.

( ३५० ) बीजक कबीरदास ।
देहरीलौं वरनारि संगहै आगे संग सहेला ।
मृतकथान सँगदियो खटोला फिरि पुनि हंस अकेला॥३॥
जारे देह भसम हैजाई गाड़े माटी खाई ।
काचे कुंभ उदक जो भरिया तन कै इहै बड़ाई ॥ ४ ॥
राम न रमसि मोहमें माते पर्यो कालवश कूवा ।
कह कबीर नर आपु बँधायो ज्यों नलिनीभ्रम सूव ॥ ५ ॥
फिरहु का फूले फूले फूले ।
जो दश मास अधो मुख झूले सोदिन काहेक भूले ॥१॥
औरे औरे मतनमें लगिकै कहा फूले फूले फिरौहौ कि हमहीं मालिक हैं
हमहीं मुक्तहैं दश महीना अधोमुख गर्भ में झूलतरह तहां कह्यो किं हे
साहब ! मैं तिहारो भजन करौंगो मोको छोड़ावो । सो दिन कांहेको भूलिगयें
अब काहे भजन नहीं करौहौ निकसतही कहां कहां करनलग्यो । जो कहो
जब हम गर्भमें रहे तब हमको साहबै दयालुता करिकै सुरति लगायों अब काहे
दयालुता करिकै सुरति नहीं लगावै हैं सो हम कहाकरैं, हमको साहबई भुलाइ
दियो । अरे मूढ़ साहबतो गोहरावत जाइहै सब शास्त्र वेदके तात्पर्य करिकै बीज-
कमें कि जो मोको जानि भजनकरु तो मैं तेरो उद्धार करौंगो सो गर्भबासमें जो
तैं भजन करिबेको कौल कियो सो भजन न कियो भुलायदियो तामें प्रमाण
कबीरजीके मुक्तिलीला ग्रन्थ को ॥ “ गर्भबासमें रह्यो मैं भजिहौं तोहीं । निशि-
दिन सुमिरौं नाम कष्टसे काढौ मोहीं ॥ यतना कियो करार काढ़ि गुरु बाहर
कीना । भूलिगयो निज नाम भयो माया आधीना ” ॥ सो साहबको कौन दोष-
है तुहीं कौलते चूकि गयो साहबको भजन न कियो ॥ १ ॥
ज्यों माखी स्वादै लहि विहरै शोचि शोचि धनकीन्हा ।
त्योंहीं पीछे लेहु लेहुकर भूत रहनि कछु दीन्हा ॥ २ ॥

शब्द। ( ३५१ )
जैसे माखी फूलनके रसके स्वादको पाइकै बिहार करै है औ ताहीके
सहतको धन जोरि जोरिकै धरै है तैसे तुमहूं विषय भोग करिकै धन जोरि
जोरि धरौहौ सो जैसे कोऊ आइकै मछेहनको लाइकै सहतको लैजाइकै आपसमें
बांटे लेइहै तैसे तोहीं पीछे कहे जब तुम न रहिजाउगे तब तिहारे धनको स्त्री
पुत्रादिक लेहु लेहु करिकै बांटि लेइँगे अरु तुमको भूत की रहनि कहे दशदिन
भूत कहेंगे मरवटामें बैठायेंगे ॥ २
देहरीलौ वरनारि संगहै आगे संग सहेला ।
मृतुकथान सँग दियो खटोला फिरि पुनि हंस अकेला ३
जारे देह भसम हैजाई गाड़े माटी खाई ।
काचे कुंभ उदक जो भरिया तनकै इहै बड़ाई ॥ ४ ॥
ये चारो तुकनको अर्थ स्पष्टहै ॥ ४ ॥
राम न रमसि मोहमें माते पर्यो काल वश कूवा ।
कह कबीर नर आपु बँधायो ज्यों नलिनी भ्रम सूवा ॥५॥
श्री कबीरजी कहै हैं कि हेजीव! मोहमें माते राममें नहीं रमै है कालके वश
ह्वैकै संसार कूपमें पर्यो है वाते बारबार तेरो जन्म मरण होइहै सो तौ अप-
नेही भ्रमते नानादुःख सहै है जैसे नलिनी को सुवा अपनेही चंगुलते धरि लियो
छोड़ै नहीं है मारो जाइहै तैसे तैंहूं नाना मतनमें लगिकै अरु विषयनमें लगिकै
आपहीते यह संसारमें परिकै बँधिगयो संसारको धरैहै भाव यहहै संसार
तोको बांधे नहीं है तें छोड़ि काहे नहीं देइहै अरु जेहि साहबको तैं है जहां
एकउ दुःख नहीं हैं तिनमें काहे नहीं लगे है ॥ ५ ॥
इति तिहत्तरवां शब्द समाप्त ।
अथ चौहत्तरवां शब्द ॥ ७४ ॥
योगिया ऐसोहै बड़ करणी । जाके गगन अकाश न धरणी १
हाथ न वाके पाउँ न वाके रूपनवाके रेखा ।
बिना हाट हटवाई लावै करै ब्याई लेखा ॥ २ ॥

( ३५२ ) बीजक कबीरदास ।
कर्म न वाके धर्म न वाके योग न वाके युगुती ।
सींगी पत्र कछुव नहिं वाके काहेक मांगै भुगुती ॥ ३ ॥
तैं मोहिं जाना मैं तोहिं जाना मैं तोहिं माँह समाना ।
उतपतिप्रलय एक नहिं होती तब कहु कौनको ध्याना ॥४॥
योगिया एक आनि किय ठाढो राम रहा भरिपूरी ।
औषधि मूल कछुव नहिं वाके राम सजीविनि मूरी ॥ ५ ॥
नटवत बाजी पेखनी पेखै बाजीगरकी बाजी ।
कहै कबीर सुनौहो सन्तों भई सो राज विराजी ॥ ६ ॥
योगिया ऐसो है बद करणी। जाके गगन अकाश न धरणी १
हाथ न वाके पाउँ न वाके रूप न वाके रेखा ।
विना हाट हटवाई लावै करै बयाई लेखा ॥ २ ॥
योगिया कहे संयोगी याको ब्रह्मसंयोग करिकै जगत् करैहै याते योगिया
माया सबलित ब्रह्महै सो वह योगिया की बद करणी है कहे निषिद्ध करणी है
जौने चैतन्याकाशमें अहं ब्रह्मास्मि बुद्धि करै है तौन चैतन्याकाश मेरे लोकको
प्रकाशहै तहां आकाश धरणी एकौ नहीं हैं ॥१॥ वह चैतन्याकाशको जो मानि
लियो है कि सो महीं है ऐसा जो समष्टि जीव चैतन्य ब्रह्मरूप सो वाके न हाथ
है न पाउँ हैं न वाके रूप रेखा है जहां जीव नानाकर्म करै है जंगत् अरु बही
जगत् कर्मनको फल पावैहै जहां यही लेनदेन ह्वै रह्यो है सो जो है हाट वाकें
नहीं हैं कहे देश काल वस्तु परिच्छेदतें शून्यहै औ हटवाई लगौतै है माया
कहे सबलित ह्वैकै जगत् करतै है अरु बया और को अनाज और और को नापि
देइहै अरु ब्रह्म जो है बया सो माया सबलित ह्वैकै ईश्वर रूपते जीवनके कियें
जे कर्मके फलहैं ते जीवन को देइहै ॥ २ ॥
कर्म न वाके धर्म न वाके योग न वाके युगुती ।
सींगीपत्र कछुव नहिं वाके काहेको मांगै भुगुती ॥३॥

शब्द। (३५३)
अरु वह ब्रह्मको न कर्म है न धर्म है और न वाके योग युगुती है औ सींगी जो
योगी लोग बजावैहैं सो वाके नहीं है औ योगी तुम्बा लिये रहैहैं अरु वाकें
पात्र नहीं है। सो कबीरजी कहै हैं कि, वह ब्रह्म तौ न योग करै न वेष बनावै
सिद्धांत में तो कछू हई नहीं है सो हे योगिउ ज्ञानिउ वेष बनाईकै जो कहौहौ
कि हमहीं ब्रह्महैं तौ मुक्ति कहे ऐश्वर्य काहे मांगौ हौ कि हमहीं जगत् के
मालिक औ ब्रह्म हैनाईं; हे गुरु ! हमको यह युगुति बताइ देउ औ जो मुक्ति पाठ
होइ तौ तुम पहिलेही ते मुक्त बनेरहे गुरुवा लोगनते काहे मुक्ति मांगौहौ कि
जामें हम मुक्त है जाइँ सो युगुति बताइ देउ। जो कहो हम आपने भ्रम निवृत्ति
करिबे को मुक्ति को ज्ञान मांगै हैं तौ अरे मूढौ वह ब्रह्मके तो कुछ हई नहीं है वह
निर्लेपहै वह ब्रह्म जो तुम होते तो अज्ञानई तुम्हारे कैसे होतो ॥ ३ ॥
तैं मोहिं जाना मै तोहिं जाना मैं तोहिं माहँ समाना ।
उतपति प्रलय एक नहिं होती तब कहु कौनको ध्याना ४
श्री कबीरजी कहैहैं कि, हे जीव ! ज्ञानजो तैं मानि लियो है अर्थात्
ते उपासना करै हैं कि मैं ईश्वरहौं ईश्वर में समानहौं ईश्वर मोहीं में समानहै।
तौ उत्पत्ति प्रलय जब कुछ नहीं है तबतो बताउ कौनको ध्यानहै अर्थात् काहूको
ध्यान नहीं करत रह्यो भाव यह है कि तब जो ब्रह्महोते तौ संसारी काहे होते ॥ ४ ॥
योगिया एक आनि किय ठाढ़ो राम रहो भरिपूरी ।
औषधि मूल कछुव नहिं वाके राम सजीवनि मूरी ॥५॥
सो तैंही योगिया मायाशवलित ब्रह्मको अनुभव करिकै धोखा ब्रह्महीकौ
साहब मानि ठाढ़कै लीन्हो है। फिरि कैसो है ना कुछ औषधिहै ना वाके मूलहै
ताको मानै है परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्रहैं सजीवनि मूरि सर्वत्र पूर्ण द्वै रहे हैं
ताको नहीं जानैहैं सजीवनि मूरि याते कह्यो औ नाना ईश्वर जीवत्व मिटाय देन-
वारे हैं औ साहब जीवनको जियाय देनवारे हैं अर्थात् रूप देनवारे हैं ॥ ५ ॥
नटवत बाजी पेखनी पैखै बाजीगर की बाजी ।
कहै कबीर सुनोहो संतो भई सो राजविराजी॥ ६ ॥
२३

( ३५४ ) बीजक कबीरदास ।
जौन तू धोखाब्रह्म सर्वत्र पूर्ण मानै है सो तेरी यह पेखनी नटवत बाजी
पेखनी है अर्थात् झूठहै बाजीगरकी बानी है अर्थात् सांच असांच देखावै असांच
सांच देखावैहै सो कबीरजी कहै हैं कि हे संतो ! सुनो उनको राजाविराजी ह्वै
गई कहै सर्वत्र पूर्ण सत्य जे साहबहैं ते उनको नहीं जानिपरैहैं वही धोखाब्रह्म
में लगे हैं असत्यही सर्वत्र देखे हैं मनमाया को राज हैरहो है साहबको राज्य
नहीं है ॥ ६ ॥
इति चौहत्तरवां शब्द समाप्त ।
अथ पचहत्तरवां शब्द ॥ ७५ ॥
ऐसो भर्म विगुरचिन भारी ।
वेद किताव दीन औ दोजख को पुरुषाको नारी ॥ १ ॥
माटीको घट साज बनाया नादे बिंदु समाना ।
घट बिनशे क्या नाम धरहुगे अहमक खोज भुलाना॥२॥
एकै हाड़ त्वचा मल मुत्रा रुधिर गूद यक मुद्रा ।
एक बिंदुते सृष्टि रच्योहै को ब्राह्मणको शुद्रा ॥ ३ ॥
रजगुण ब्रह्म तमोगुण शंकर सतोगुणी हरि सोई ।
कहै कबीर राम रमि रहिया हिन्दू तुरुक न कोई ॥ ४ ॥
ऐसो भर्म विगुरचिन भारी ।
वेद किताव दीन औ दोजख को पुरुषा को नारी ॥ १ ॥
ऐसो कहै यहितरहते जैसो आगे कहै हैं तैसो चिन्मात्र जीव को बिगारिबों
भर्मते बहुत भारी है काहेते कि भर्म ते दुबिधा कहिकै वह सार पदार्थ को
न जान्यो हिन्दू मुसल्मान दोऊ बिगरिगये हिन्दू वेद की राहते नाना मत
बनाय लेतभये औ मुसल्मान किताबनकी शरा लैके नाना मत दूसरो दीनकों
खड़ा करत भये हिन्दू नरक स्वर्ग मुसल्मान बिहिश्त दोज़ख़ कहतभये जों

शब्द । ( ३५५ )
वेद किताबकें तात्पर्यते देखौ तौ न कोई पुरुष जानिपरै न नारी जानिपरै सों
जब पुरुषही नारीको भेद नहीं है तौ हिन्दू मुसल्मान कैसे भेद भयो ॥ १ ॥
माटी को घट साज बनाया नादे विंदु समाना ।
घट विनशे क्या नाम धरहुगे अहमक खोज भुलाना २
एकै हाड़ त्वचा मल मुत्रा रुधिर गूद् यक मुद्रा ।
एक विंदुते सृष्टि रच्यो है को ब्राह्मण को शूद्रा ॥ ३ ॥
नाभीके तरे जो दश आंगुरकी ज्योतिहै औ तौनेमें जब प्राण बायुको
संयोग होइहै तब नाद उठै है तामें बिंदु समाइगयो तब माटीको घट यह
पिंडभयो ताहीको नाम धरावैहै जब याको घट बिनशिगयो कहे शरीर छूटि-
गयो तब याको क्या नाम धरोगे अर्थात् नामरूप याके सब मिथ्या हैं अहमक
जो है जीव सो नाम रूपके खोजनमें भुलाइ गयो ये सब जीवात्मा के नाम रूप
नहीं हैं ॥ २ ॥ सो एकै हाड़ादिकनते औ एकै बिंदुते कहे वीर्य ते सकल
सृष्टि भई है काको हिन्दू कहैं काको मुसल्मानकहैं काको ब्राह्मण कहैं काकों
शूद्रकहैं शरीरमें यही साज सबकैं हैं अरु वेदमैं कर्म किताब में शरायंही तें
नानाभेद लगे हैं जो विचारिकै देखो तौ नाम रूपहीको भेद लगि रह्यो है
आत्मा तो सबको चितही है औ मांस चाम सबके पांचभौतिकही हैं अब जे
गुणाभिमानी हैं तिनको कहैं हैं ॥ ३ ॥
रजगुण ब्रह्म तमोगुण शंकर सतोगुणी हरि सोई ।
कहैं कबीर राम रमि रहिया हिंदू तुरुक न कोई ॥४॥
वही नाम रूप के भेदते ब्रह्मा रजोगुणी शंकर तमो गुणी विष्णु सतोगुणी
भये औ वही नामके भेदते मुसल्मानमें इनहीं को अजाजील मैकाइल इजराईल
कबीरजी कहै हैं कि येतो सबनाम रूपके भेदहैं इनको सबको आत्मा एकई है
तिनमें अंतर्यामी रूपते मनवचनके परे परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्रई रमि रहे
हैं । जो कहो राम नामौ तौ नाममें आवै है तौ रामको नाम मन वचनमें
नहीं आवै है आपही स्फुरित होइहै तेहिते नामत्व नहीं है अरु श्रीरामचन्द्र

( ३५६ ) बीजक कबीरदास ।
निर्गुण सगुणके परे हैं तिनको जानै औ जो आत्मा नाम रूपते भिन्नहै न हिन्दू है
न तुरुक है तामें येई राम रमि रहे हैं या हेतुते सबको आत्मा इन्हींको दासहै
तेहिते इन्हींको जो जाने सोई मुक होइहै परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्र निर्गुण
सगुणके परे हैं तिनहींको राम नाम जाने मुक्ति होइ है तामें प्रमाण ॥
“रामके नामते पिंड ब्रह्मांड सब रामका नाम सुनि भर्म मानी । निर्गुण निरा-
कार के पार परब्रह्महै तासुका नाम रंकार जानी । विष्णु पूजाकरैं ध्यान शंकर
धरैं भनैं सुबिरंचि बहु बिबिध बानी । कहै कबीर कोइ पार पावै नहीं रामका
नाम अकह कहानी” ॥ ४ ॥
इति पचहत्तरवां शब्द समाप्त ।
अथ छिहत्तरवां शब्द ॥ ७६ ॥
अपन पौ आपुही बिसरो ।
जैसे शोनहा कांच माँदिरमें भर्मत भूँकि मरो ॥ १ ॥
ज्यों केहरि वपु निरखि कूप जल प्रतिमा देखिपरो ।
ऐसेहि मद गज फटिकशिलापर दशननि अनिअरो॥२॥
मर्कट मुठी स्वाद ना बिहुरै घर घर नटत फिरो ॥
कह कबीर ललनीके सुवना तोहिं कवने पकरो ॥ ३ ॥
अपन पौ आपुही बिसरो ।
जैसे शोनहा कांच माँदिरमें भर्मत भूँकिं मरो ॥ १ ॥
ज्यों केहरि वपु निरखि कूप जल प्रतिमा देखिपरो
ऐसेहि मद गज फटिक शिलापर दशननि आनि अरोर
अपनपौ कहे आपने जे परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्र हैं तिनको आपही तें
यह जीव बिसरि गयो जैसे कूकुर कांचके मंदिरमें आपनो रूप देखि देखि
भर्मते भूँकि भूँकि मरैहै ॥ १ ॥ अरु जैसे केहरि कूपके जलमें अपनी प्रतिमा

शब्द । ( ३५७ )
देखिकै कूदि परैहै अरु ऐसेही प्रतिबिंब देखि स्फटिक शिलामें हाथी दांत
टोरि डारैहै ॥ २ ॥
मर्कट मुठी स्वाद न विहुरै घर घर नटत फिरो
कह कबीर ललनीके सुवना तोहिं कवने पकरो ॥ ३ ॥
अरु जैसे मर्कट मूठीमें जेहि दाना ताके स्वादके लिये फँसि गये बाजी-
गरके साथ नाचत वाँगैहै सो कबीरजी कहैं हैं कि जैसे इनके सबके भ्रम
होइहै तैसे हे जीव तैंही सब कल्पना करिलियो है अपनी कल्पनाने तोहींको
भ्रम होइहै नाना उपासना नाना ठाकुर खोजत फिरैहैं। विचारिकै देख तौ जब
तेरे कल्पना नहीरही तबते शुद्ध रहैहै जैसे सुवा ललनीको पकरि लेइहै तैसे
तैंही ये सब कल्पना करिकै कल्पनामें बँधोहै जैसे सुवा ललनी को जो छेड़ि-
देइ तौ वृक्षमें पहुंचै जाइ तैसे तैंहूं जो कल्पनाको छोड़िदेइ तौ तोको कौन
पकरयोहै।परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्र के पास पहुंचै जाइ जब सब कल्पना छोड़ि
शुद्ध है जाइ है तब साहब अपनो विग्रह देइहै तामें स्थितहै साहबके लोकको
जाइहै तामें प्रमाण॥ "आदत्ते हरिहस्तेन हरिपादेन गच्छति" इतिस्मृतिः॥ अरु
श्रीकबीरऊ जी को मंगल प्रमाण ॥ " चलो सखी बैकुण्ठ बिष्णु माया
जहां चारिउ मुक्ति निदान परम पद लेतहां ॥ आगे शून्य स्वरूप अलख नहिं
लाखि परै । तत्त्व निरंजन जान भरम जनि जनि चितधरै ॥ आगे है भगवंत
तो अक्षर नाउँहै । तौन मिटावै कोटि बनावै ठाउँहै ॥ आगे सिंधु बलंद
महा गहिरो जहां । कोनैया लैजाय उतौरै को तहां ॥ कर अजपाकी नाव तो
सुरति उतारैहै । लेइहौं अज्जरनाउँ तो हंस उबारिहै ॥ पार उतर पुरुषोत्तम
पैरख्यो जानहै । तहँवां धाम अखंड तो पद निर्वान है ॥ तहँ नहिं चाहत
मुक्ति तो पद डारे फिरै । सुरत सनेही हंस निरंतर उचरै ॥ बारह मास
बसंत अमर लीला जहां । कहैं कबीर बिचारि अटल है रहुतहां " ॥ ३ ॥
इति छिहत्तरवां शब्द समाप्त ।

( ३५८ ) बीजक कबीरदास ।
अथ सतहत्तरवां शब्द ॥ ७७ ॥
आपन आश किये बहु तेरा। काहु न मर्म पाव हरि केरा ॥१॥
इन्द्री कहां करै विश्राम । सो कहँ गये जो कहते राम ॥२॥
सो कहँ गये होत अज्ञान।होय मृतक वहि पदहि समान॥३॥
रामानंद् राम रस छाके।कह कबीर हम कहि कहिथाके॥४॥
आपन आश किये बहुतेरा । काहु न मर्म पाव हरि केरा ॥१॥
आपने स्वरूपके चीन्हिबे की बहुतेरा कहे बहुत आशकिये कि हमारों
आत्मै सबको मालिकह यहीके जानेते हम मुक्त ह्वै जाइँगे परन्तु मुक्त न भये
अरु हरि जे परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्र सबकें कलेश हरनवारे हैं तिनकों
मर्म न पायो अर्थात् उनको कोई न चीन्ह्यो ॥ १ ॥
इंद्री कहांकरै विश्राम । सो कहँगये जो कहते राम॥२॥
अरु यह कोई नहीं विचार करै है कि इन्द्री कहा बिश्राम करै है काहेतें
कि इन्द्रीके जे देवता हैं तिनते समेत इन्द्रीतो मनते चैतन्य हैं औ मन जीवात्मा
ते चैतन्यहै औ जीवात्मा परमपुरुषपर श्रीरामचंद्र के प्रकाशते चैतन्य है सो
जे आपने स्वरूपको बिचार करै हैं कि महीं रामहौं ते वे रामभर कहांगये अर्थात्
नहीं गये ब्रह्ममें समान रहे अरु एक एकते चैतन्यहै तामें श्रीगोसाई तुलसीदास
को प्रमाण ॥ ‘‘ बिषय करन सुर जीव समेता । सकल एकते एक सचेता ॥
सबकर परम प्रकाशक जोई । राम अनादि अवधपति सोई ॥ जगत प्रकाश
प्रकाशक रामू । मायाधीश ज्ञान गुणधामू ’’ ॥ २ ॥
सो कहँगये होत अज्ञान । होय मृतक यहि पदहि समान॥३॥
रामानंद राम रसछाके। कह कबीर हम कहि कहि थाके॥४॥
जीव ब्रह्ममें समान रह्यो शुद्ध रह्यो जब मनकी उत्पत्ति भई अज्ञान भयो सों
कहांगयो अर्थात् तब मृतक ह्वैकै आपने स्वरूपको भुलायकै यहि पदहि कहे यहि
संसारमें समान॥ ३॥ श्रीकबीरजी कहैहैं कि हम चारों युगमें कहि कहि थकिगये

शब्द । ( ३५९ )
कि रामानंद जेहैं तेई राम कें रसमें छके हैं अरु तेई परमपुरुषपर श्रीरामचंद्रके
धामको गये हैं और कोई नहीं परम मुक्ति पाई है तुमहूं रामानंद होतजाउ
अर्थात् तुमहूं रामहींते आनंद मानतजाउ यह हम चारोंयुग में सबको समझा-
यो परंतु कोई हमारो कह्यो न मान्यो राममें आनंद कोई न मान्यो सब वही
माया ब्रह्ममें लगिकै संसारी होतभयो ॥ ४ ॥
इति सतहत्तरवां शब्द समाप्त ।
अथ अठहत्तरवां शब्द ॥ ७८ ॥
अब हम जाना हो हरि बाजीको खेल ।
डंक बजाय देखाय तमाशा बहुरि सो लेत सकेल ॥ १ ॥
हरि बाजी सुर नर मुनि जहँडे माया चेटक लाया ।
घरमें डारि सबन भरमाया हृदया ज्ञान न आया ॥ २ ॥
बाजी झूठ बाजीगर सांचा साधुनकी मति ऐसी ।
कह कबीर जिन जैसी समुझी ताकी गति भइ तैसी ॥ ३ ॥
अब हम जाना हो हरि बाजी को खेल ।
डंक बजाय देखाय तमाशा बहुरि सो लेत सकेल ॥ १ ॥
हेहरि ! हे साहब ! संसाररूप बाजीके खेलको हेतु अब हम जान्यो । अब जो
कह्यो तामें धुनि यहहैं कि, तब यह विचारत रहे कि साहब तो दयालुहै शुद्धजी-
वको संसार रचि अशुद्ध काहे करिदिये यह शंका रही सो अब जब छूटी तब
साहबको हेतु जान्यो साहब जो सुरति दियो सो अपनेपास लिवाय सुखलिये
डङ्क बजाय कहे रामनाम शब्द सुनायकै तमाशा देखाय कहे जगत् मुख अर्थ
द्वार संसार तमाशा देखायकै बहुरि सो लेत सकेल कहे जो कोई जीव साहब
के सम्मुख भयो ताको साहब मुख अर्थ बताइकै चित अचितरूप विग्रह जगत्
खायकै संसार सकेलि लेय है अर्थात् संसार देखि नहीं परै ॥ १ ॥

( ३६० ) बीजक कबीरदास ।
हरिवाजी सुर नर मुनि जहँडे माया चेटक लाया ।
घरमें डारि सबन भरमाया हृदया ज्ञान न आया ॥ २ ॥
वाजी झूठ वाजीगर साँचा साधुनकी मति ऐसी
कह कबीर जिन जैसी समुझी ताकी गति भइ तैसी॥३॥
हरि जे साहब तिनकी बाजी जोसंसार तामें साहबको हेतु न जानिकै सुर-
नर मुनि जे हैं ते रामनामको संसार मुख अर्थ करिकै मायाके चेटकमें जहँडि-
गये अर्थात् भूलिगये सो माया इनको घर जो संसार तामें डारिकै भरमायदियो
हृदयमें ज्ञान न होतभयो तौन हम जान्यो साहब सुरतिदियो तैं अपने पास बोला-
वैको सो या जीव आपहीते संसार बाजीरचि भूलिगयो॥२॥ बाजी जो संसार सो झूठ
बाजीगर जो जीव सो सांचहै सो साधुनकी मति तो ऐसी है और जे सबहैं बद्धजीव
ते जैसे समुझिनि है ताकी तैसी ही गति भई है सो गतिहू सब अनित्य है ॥३॥
इति अठहत्तरवां शब्द समाप्त ।
अथ उन्नासीवां शब्द ॥ ७९ ॥
कहो हो अम्बर कासों लागा । चेतनहारे चेतु सुभागा ॥ १ ॥
अम्बर मध्ये दीसै तारा । यक चेतै दुजे चेतवनहारा ॥ २ ॥
जेहि खोजै सो उहवां नाहीं।सोतो आहि अमर पद माहीं ३॥
कह कबीर पद बूझै सोई । मुख हृदया जाके यक होई ४॥
कहो हो अम्बर कासों लागा। चेतन हारे चेतुं सुभागा॥ १॥
अम्बर मध्ये दीसै तारा । यक चेतै दुजे चेतवनहारा॥२॥
तैंतों सुभागाहै साहब कोहै तैं काहे मन माया ब्रह्ममें लगिकै अभागा ह्वैरहैहै
चेत करनवारे तैं चेत तोकरु अंबर जो है लोक प्रकाश रूप ब्रह्म सो कहां
लागाहै अर्थात् वह काको प्रकाशहै वह साहब साहबके लोकको प्रकाशहै चेततों
करु ॥ १ ॥ वह अम्बर जोहै लोक प्रकाश ब्रह्म तामें तारा देखाइहै कहैं

शब्द । ( ३६१ )
जबतें उहां अहं ब्रह्म बुद्धि करै है, तबहीं जगवरूप तारा उत्पत्ति होइहै तौनेही
जगत्में एक गुरु होइहै सो चेतावैहै अरु एक शिष्य होइहै सो चेतकरैहै ॥२॥
जेहि खोजै सो उहवां नाहीं। सोतो आहि अमर पद माहीं ४
कह कबीर पद बूझै सोई । मुख हृदया जाके यक होई ४
सो ज्यहि आपने स्वरूपको तें खोजै है कि मैं आपने स्वरूपको जानिकै मुक्त
हैजाउँ सो उहां वागुरुवनको ज्ञानमें नहीं है औ न वह लोक प्रकाशमें है काहेते
कि जे जे देवनमें वे लगावैंहैं तेई अमर नहीं हैं तौ तोको कहां मुक्ति करेंगे
अरु महा प्रलयमें जब लोक प्रकाशमें लीन होइहै तब उहौंते उत्पत्ति होइहै
तेहिते उहाँ गये अमर नहीं होइहैं तेहिते यह आयो कि तैंतो अमर नहीं होइहै
तेहिते यह आयो कि तैंतो अमर पदमें है साहबको अंशहै साहबको जानिले तौ
अमर हैजाइ ॥ ३ ॥ श्रीकबीरजी कहैहैं कि यह अमरपद आपनो स्वरूप कोई
बिरला बूझैहै कौन जाके सम अधिक नहींहै ऐसो जो है एक रामनाम सो जाके
मुखहृदय में होइहै सोई बूझैहै ॥ ४ ॥
इति उन्नासीवां शब्द समाप्त ।
अथ अस्सीवां शब्द ॥ ८० ॥
बन्दे करि ले आप निबेरा ।
आपु जियत लखु आप ठवर करु मुये कहां घर तेरा ॥ १ ॥
यहि अवसर नहिं चेतौ प्राणी अन्त कोई नहिं तेरा ।
कहै कबीर सुनो हो संतो कठिन काल को घेरा ॥ २ ॥
बन्दे करि ले आप निवेरा ।
आपु जियत लखु आप ठवर करु मुये कहां घर तेरा ॥ १ ॥
यहि अवसर नहिं चेतौ प्राणी अंत कोई नहिं तेरा ।
कहै कबीर सुनो हो संतौ कठिन काल को घेरा ॥ २ ॥