कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द। (३५३)
अरु वह ब्रह्मको न कर्म है न धर्म है और न वाके योग युगुती है औ सींगी जो
योगी लोग बजावैहैं सो वाके नहीं है औ योगी तुम्बा लिये रहैहैं अरु वाकें
पात्र नहीं है। सो कबीरजी कहै हैं कि, वह ब्रह्म तौ न योग करै न वेष बनावै
सिद्धांत में तो कछू हई नहीं है सो हे योगिउ ज्ञानिउ वेष बनाईकै जो कहौहौ
कि हमहीं ब्रह्महैं तौ मुक्ति कहे ऐश्वर्य काहे मांगौ हौ कि हमहीं जगत् के
मालिक औ ब्रह्म हैनाईं; हे गुरु ! हमको यह युगुति बताइ देउ औ जो मुक्ति पाठ
होइ तौ तुम पहिलेही ते मुक्त बनेरहे गुरुवा लोगनते काहे मुक्ति मांगौहौ कि
जामें हम मुक्त है जाइँ सो युगुति बताइ देउ। जो कहो हम आपने भ्रम निवृत्ति
करिबे को मुक्ति को ज्ञान मांगै हैं तौ अरे मूढौ वह ब्रह्मके तो कुछ हई नहीं है वह
निर्लेपहै वह ब्रह्म जो तुम होते तो अज्ञानई तुम्हारे कैसे होतो ॥ ३ ॥
तैं मोहिं जाना मै तोहिं जाना मैं तोहिं माहँ समाना ।
उतपति प्रलय एक नहिं होती तब कहु कौनको ध्याना ४
श्री कबीरजी कहैहैं कि, हे जीव ! ज्ञानजो तैं मानि लियो है अर्थात्
ते उपासना करै हैं कि मैं ईश्वरहौं ईश्वर में समानहौं ईश्वर मोहीं में समानहै।
तौ उत्पत्ति प्रलय जब कुछ नहीं है तबतो बताउ कौनको ध्यानहै अर्थात् काहूको
ध्यान नहीं करत रह्यो भाव यह है कि तब जो ब्रह्महोते तौ संसारी काहे होते ॥ ४ ॥
योगिया एक आनि किय ठाढ़ो राम रहो भरिपूरी ।
औषधि मूल कछुव नहिं वाके राम सजीवनि मूरी ॥५॥
सो तैंही योगिया मायाशवलित ब्रह्मको अनुभव करिकै धोखा ब्रह्महीकौ
साहब मानि ठाढ़कै लीन्हो है। फिरि कैसो है ना कुछ औषधिहै ना वाके मूलहै
ताको मानै है परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्रहैं सजीवनि मूरि सर्वत्र पूर्ण द्वै रहे हैं
ताको नहीं जानैहैं सजीवनि मूरि याते कह्यो औ नाना ईश्वर जीवत्व मिटाय देन-
वारे हैं औ साहब जीवनको जियाय देनवारे हैं अर्थात् रूप देनवारे हैं ॥ ५ ॥
नटवत बाजी पेखनी पैखै बाजीगर की बाजी ।
कहै कबीर सुनोहो संतो भई सो राजविराजी॥ ६ ॥
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