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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

मूल रमैनी प्रारम्भ ।
( अक्षर खण्डकी रमैनी )
प्रथमशब्दहैशून्याकार ॥ परा^१अव्यक्त सोकह्रै बिचार॥अंतः
करणउदयजबहोय ॥ पश्यंति^२अर्धमात्रासोय ॥ स्वर^३सोकंठ
मँध्यमा^४जान ॥ चौंतिस^५अक्षरमुखस्थान ॥ अनवनिबानि^६तेहि-
केमांहि ॥ विनजानेनरभटका^७खांहि ॥ बानी अक्षर स्वर संमु-
दाय ॥ अर्ध^८पश्यंतिजातनशाय ॥ शून्याकारसोप्रथमारहै ॥
अक्षरब्रह्मसनातनकह्रै ॥ निर्वृति^९ ॥ प्रवृति^१०हैशब्दाकार ॥ प्रण-
व^११जानेइहेबिवार ॥ साक्षी ॥ अँकुलाहट^१२केशब्दजो, भई
चारसोभेष ॥ बहुबानीबहुरूपकै पृथकपृथकसबदेश ॥ १ ॥
रमैनी॥अनवनिबानीचारप्रकार ॥ १ काल २ संधि ३ झांई ४
औ सार॥ हेतुशब्दबूझियेजोय ॥ जानिय येंथारथ^१३ द्वारा^१५सोय॥
भ्रमिक^१४झांईसंधिकऔकाल ॥ सारशब्दकाटेभ्रमजाल ॥ द्वारों
चारअर्थपरमान ॥ पद^१६ारथ व्यंग^१७ाथपहिचान भौार्थ^१८ १९
ध्वन्यार्थचार ॥ द्वाराशब्दकोइलखेविचार ॥ पैरा^२० पराइति
मुखसोजान ॥ मोरे सोरहकला निदान ॥ साक्षी ॥ विन-
जानेसोरहकला, शब्दीशब्द कौआयै^२१ ॥ शब्द सुधारप-
१ इसका स्थान नाभी ॥ २ इसका स्थान हृदय ॥ ३ सोलह स्वर अ
आ इत्यादि ॥ ४ इसका स्थान कंठ ॥ ५ व्यंजन ॥ ६ नाना प्रकारकी ॥
७ इकट्ठा ॥ ८ पश्यंति होय फिर परा अवस्था को प्राप्त होता है ॥ ९ लय॥
१० उत्पत्ति ॥ ११ ओंकार ॥ १२ उबिआहट ॥ १३ सच्चा ॥ १४
भरमाने ॥ १५ मार्ग, रस्ता ॥ १६ पद, अर्थ, शब्दका जो अर्थ, शब्दार्थ॥
१७ व्यंग, अर्थ, व्यंग भाव से जो कहा जावे ॥ १८ मतलब आशय
वाला जो अर्थ १९ ध्वनिमात्र ॥ २० परा और अपरा दो विद्या कोई शब्द
परा विद्या को वर्णन करता है कोई अपरा को ॥ २१ भटकता है ॥

( ३६ ) रमैनी ।
हिचानियै, कौनकहावौआय ॥२॥ रमैनी ॥ अक्षरवेदपुराणब
खान ॥ धरमकरमतीरथअनुमान ॥ अक्षरपूजासेवाजाप॥और
महातमजेतेथाप॥यहीकहावतअक्षरकाल॥जाएगडीउरह्योके
भालै ॥ ओंहं सोहं आतमराम ॥ मायामंत्रादिकसब काम ॥
येसबअक्षर संधि कहै ॥ जेहिमानिनिशिवासर जिव रहै ॥ नि-
रगुणअलखअकहनिर्वाण ॥ मनबुधि इन्द्रिय जायनजान ॥
विधिनिषेधजहं ब्वैैंनितादोय ॥ कहैंकबीरपदझांईसोय ॥
साक्षी ॥ प्रथमेझांई झांकते, पैठासंधिककाल ॥ पुनिझांईकी
झांईरही, गुरुबिन सकेकोढाल ॥ ३ ॥ रमैनी ॥ प्रथमही
संभैवशब्द अमान ॥ शब्द्दीशब्दकियोअनुमान ॥ मानमहा
तममानभुलान ॥ मानत मानत बावनठान ॥ फेरा फिरतभ-
यो भ्रमजाल ॥ देहादिकजगभयें विशाल ॥ देहभईतेदेहिक-
होय ॥ जगतभईतेकती कोय ॥ कती कौंरणकर्महिलाग ॥
घरघर लोगकियो अनुराग ॥ २७छौ दरशनवर्णश्रमचार ॥ २९नौ
छौ भए पाखंडबेकार ॥ कोई ३१त्यागी ३२अनुरागी कोय ॥ विधि-
निषेधमाबधियादोय ॥ कल्पेउग्रंथपुराणअनेक ॥ भरभिरहें
सबबिनाबिवेक ॥ साक्षी ॥ भरभिरहासब शब्दमें, सबदी-
शब्दनजान ॥ गुरुकृपानिजपरखैबल, परखोधोखाज्ञान ॥ ४ ॥
२२ तीर ॥ २३ जगत को निषेधकर और ब्रह्मका प्रतिपादन करना यह
है स्त्री जिसका ॥ २४ होताभया ॥ २५ शब्दका मालिक शब्द कहने वाला ॥
२६ हेतु॥२७ १योगी२ जंगम३ सेवड़ा ४ सन्यासी५दर्भेश ६ छठांकहिये ब्राह्म
ण छ घर छ है भेश ॥ २८ ब्राह्मण १ क्षत्री २ वैश्य ३ शूद्र ४ वर्ण और
ब्रह्मचर्य्य १ गृहस्थ २ बाणप्रस्थ ३ सन्यास ४ आश्रम ॥ २९-३०=
छ्यानवेपाखण्ड ३१ विरक्त ॥ ३२ गृहस्थ ॥

रमैनी ॥ धोखाप्रथमपरखियेभाई ॥ नामजातिकुलकर्मबड़ाई
क्षिति<sup>३३</sup>जल पावक<sup>३४</sup> मरुत<sup>३५</sup>अकाश ॥ तामहपंच<sup>३६</sup> विषयपरकाश॥
तत्व पांचमेंश्वासासार ॥ प्राणअपानसमान उदान<sup>३७</sup> ॥ और-
व्यानबावनसंचार ॥ निजनिज थल<sup>३८</sup>निज कारजकार ॥ इंग-
ला पिंगलाऔ सुखमनी ॥ इकइस सहस्र छौसत सोगनी ॥
निगम<sup>३९</sup> अंगम<sup>४०</sup> सो सदा बतावै ॥ श्वासासारसरोदा गावै ॥
साक्षी ॥ धोखा <sup>४१</sup>अँधेरी पायकै, याविधिभयाशरीर ॥
कल्पेउकारताएक पुनि, बढ़ीकर्मकी <sup>४२</sup>पीर ॥ ५ ॥ रमैनी ॥
योग्य जप तपध्यानअलेख ॥ तीरथ फिरतधरेबहुभेख ॥
योगी जंगमसिद्धउदास ॥ घरको त्यागि फिरेबनबास ॥ <sup>४३</sup>कैन्द
<sup>४४</sup>मूल <sup>४५</sup>फल करतअहार ॥ कोइकोइ जटाधरे शिरभार ॥ मन-
मलीन मुखलायेधूर ॥ आगे पीछेअग्रिऔ <sup>४६</sup>सूर ॥ नग्रहोयनर
<sup>४७</sup>खोरि नफिरे ॥ पीतरपाथरमेंशिरधरे ॥ साक्षी ॥ कालशब्द-
केसोरते, <sup>४८</sup>होरपरीसंसार ॥ देखा देखीभागिया, कोईनकरे
विचार ॥ ६ ॥ रमैनी ॥ जब <sup>४९</sup>पुँनिआयलखी यह <sup>५०</sup>बाँनि ॥
तबपुनिचित्तमाकियो अनुमनि ॥ महीं ब्रह्म कर्त्ताजगकेर ॥
॥ ३४ अग्नि ३३ पृथ्वी ३५ वायु ॥ ३६ शब्द आकाश का विषय स्पर्श
वायुका ॥ रूप अग्नि का रसजलका गंध पृथ्वीका ३७ उदान ॥ ३८ स्थान॥
३९ शास्त्र ॥ ४० वेद ॥ ४१ अविद्या अज्ञानता ॥ ४२ दुख ॥ ४३ जो
पृथ्वी के नीचे होता है जैसे आलू शकरकंद केसउर फर इत्यादि ॥ ४४ जो
मूल से होता है अर्थात् काठ फोड कर जो निकलता है जैसे कट हल; गूलर
ईत्यादि ॥ ४५ जो फूल से पैदा है जैसे आंब ( केरी ) अमरूद(जामफळ)
इत्यादि ॥ ४६ सूर्य्य ॥ ४७ बेशर्म ॥ ४८ शोर हल्ला ॥ ४९ फिर ॥
शब्द ॥ ५० ॥

- the letter has a loop/tail:परखेउ धोखा-! Yes, it's definitely परखेउ. Wait, let's look at परखेउ: प र ख े उ. Yes, उ`.
भेवनिज, गुरुकी दयाउवार ॥८॥ रमैनी ॥ पहिले एकशब्द-
समुदाय ॥ बावनरूपधरेछितराय ॥ इच्छा नारिधरेतेहिभेश॥
तातेब्रह्मा विष्णुमहेश ॥ चारिउ उरपुरबावनजागे ॥ पंच अठ-
रह कंठहिलागे ॥ तालू पंचशुन्यसोआय ॥ दसरसनाके पूत-
कहाय॥पांचअधर अधरहीमारहै॥शुन्नेकंठसमोधेवहै॥ ओठकें-
ठेलेप्रगटे ठौर ॥ बोलनलागे औरकेऔर ॥ साक्षी ॥ एक-
शब्द समुदायजो, जामेचार प्रकार ॥ कालशब्द सें-
५१ पांचतत्व ॥ देखो रमैनी ३ । १० इत्यादि ॥ ५३ कहां ॥ ५४ भेद ॥
५५ शोक दुख, ॥ ५६ कहने में जो नहीं आवे ॥ ५७ कला अंश रहित ॥
५८ इच्छा रहित ५९ बाद

६ ॥ ७२ बाणी ॥` (wait, ६९६)

Line 26:
७३ फंस गया ॥ ७४ कठिन ॥ ७५ शब्द ॥ ७६ पांचतत्व ७७ कीचड़

Line 27:
पंक, कांदो ॥ ७८ निराकार ॥

  1. Final Polish:
    Line prefixes: , , ... ``.
    Check image top to bottom:
    रमैनी । ( ३९ )
    घिशब्द, झांईऔपुनि सार ॥ ९ ॥ रमैनी ॥ पांचैं ^६३ तीनि ^६४
    ^६५ नौ ^६६ छौ ^६७ औचार ॥ और ^६८ अठारह करेपुकार ॥ कर्मधर्मतीरथ-
    ...
    Everything matches line-by-line precisely.रमैनी । ( ३९ )
    घिशब्द, झांईऔपुनि सार ॥ ९ ॥ रमैनी ॥ पांचैं ^६३ तीनि ^६४
    ^६५ नौ ^६६ छौ ^६७ औचार ॥ और ^६८ अठारह करेपुकार ॥ कर्मधर्मतीरथ-
    केभाव ॥ ईसवकालशब्दकेदाव ॥ सोहंआत्माब्रह्मलखाव ॥
    [L

( ४० ) रमैनी ।
भरमबढ़ीशिरकेशबढावै ॥ तकेगगन कोइ बांह उठावै ॥ दैता
री करनाशाग है ॥ भरमिकगुरू बतावै लहै ॥ भरम बढ़ी अरु
घूमन लागे ॥ बिनु गुरु पारख कहु को जागे ॥ साक्षी ॥
कहैं कबीर पुकारके, गहहुशरणतजिमान ॥ परखावे गुरभर-
मको, बानि खानिसहिदान ॥ ११ ॥ रमैनी भरमजीव परमा
तममाया॥भरमदेहऔ भरम र्निकाया ॥ अनहदनाद औ ज्यो
ति प्रकास ॥ आदिअन्तलौभरमहि भास ॥ इत उत करे भरम
निर्रमान ॥भरम मान औभरमअमान॥कोहं जगतकहांसे भया॥
ईसबभरम अतीनिरमया ॥ प्रंलय चारि भ्रमपुण्य औ पाप ॥
मन्त्रजापपूजाभ्रमथाप ॥ साक्षी ॥ बाट बाट सब भर्म है,
माया रचीबनाय ॥ भेद बिना भरमें सकल,गुरु बिन कहांल-
खाय ॥ १२ ( बापपूत दोउ भरमहै, मायारची बनाय ॥ भेद
बिनाभरमे सकल, गुरु बिनकहाँलखाय ) ॥ साक्षी ॥
बापपूत दोऊ भरम, औधकोश नवपांच ॥ बिन गुरु भरम
नछूटे, कैसे आवैसांच ॥ १३॥ रमैनी ॥ कैलमा बाँग निर्माज
गुजारे॥भरमभई अल्लाहपुकारै ॥ अजबभरम एकभईतमासा॥
लाँ मुकाम बेचूँननिबासा ॥ वेनैमूनवहसब केपारा॥ आँखि-
रताको करे दिर्दारा ॥ रगड़ैनाक मँसजिदअचेत ॥ निंदे बुँत
७९ स्थित ॥ ८० नित्य प्रलय १ नैमित्तिक प्रलय २ महाप्रलय ३ आत्यं
तिक प्रलय ४ ॥ ८१ अधामात्रौ ॥ मुसलमानो का गुरु मन्त्र ला एला इलि-
ल्लाह मुहम्मदुर्रसू लिल्लाह ॥ ८३ अजान जो निमाज पढ़ने के थोड़ीही पहले
निमाज के समय सूचन करने को कलमा श० पुकारते हैं ॥ ८४ जो खुदा
के प्रार्थना पांच समय दिन और रात्री पढ़ते हैं पश्चिम मुह होंकर ॥ ८५
स्थान रहित ॥ ८६ निराकार ॥ ८७ अद्वितीय ॥ ८८ क्यामतके दिन,सृष्टि
के अंत में जब खुदा सबका न्याय करेगा ॥ ८९ दर्शन ॥ ९० मुसलमानों
के नेमाज पढ़ने की जगह ॥ ९१प्रतिमापूजक ॥

रमैनी । ( ४१ )
परसततोहिहेत ॥ बौवन तीसंबरन निरमान ॥ हिन्दू तुरुक
दाऊभरमान ॥ साक्षी ॥ भरमिरहेसब भरममहं, हिंदू-
तुरुकबखांन ॥ कहहिंकबीरपुकारिकै, बितुगुरूकोपहिचान
॥ १४ ॥ रमैनी ॥ भरमत भरमतसबै भरमाने ॥ रामसनेही
बिरलेजाने ॥ तिरदेवा सबखोजतहारे ॥ सुरनरमुनिनहिपा-
वतपारे ॥ थकितभयातबकहावेअन्ता ॥ विरहैंनिनारिरही
बितु कैन्ता ॥ कोटिनतरक करें मनमाहीं ॥ दिलकी दुबिधा
कतहूँनजाही ॥ कोई नख शिखजटा बढ़ावै ॥ अरमिभरमि-
सबजहँतहँधावैं ॥ बाटनसूझै भईअँधेरी ॥ होयरहीबानी कीं
चेरी ॥ नाना पन्थ बरनिनहिंजाई ॥ ( जातिकर्म गुन नाम
बड़ाई ) जाति वरणकुलनामवड़ाई ॥ रैन दिवसवे ठाँठेरहहीं
वृक्ष पहारकाहेंनहितरहीं ॥ साक्षी ॥ खेसमनचीन्हे बावरी,
परपूरुषलौलीन ॥ कहंहिकबीर पुकारके परीनबानीचीन
॥ १५ ॥ रमैनी ॥ कैनरसकी मतवालीनारि ॥ कुँटनीसेखो-
जे लैंगवारि ॥ कुटनीआंखिन कौंजरदियऊ । लागिवैंतावन
ऊपरपीयऊ ॥ काजरलेकेहूवैगईअंधी ॥ समुझनपरीबाँतेंकी
१०४ संधी ॥ बाजेकुटनीमोरे १०५ मँटकी ॥ ई सब छिनरोतामहँअ-
टकी ॥ विरहिनिहोय के देहसुखावै ॥ कोई शिरमह केशब-
ढ़ावै ॥ मानि मानि सब कीन्ह सिंगारा ॥ बिनपियपरसैंस-
बैंअंगारा ॥ साक्षी ॥ अटकीनारिछिनारि सब, हर-
दम कुटनीद्वार ॥ खसम न चीन्हेबावरी, घरघरफिरतखु-
९२ संस्कृत वर्णमाला के ५२ अक्षर ॥ ९३ मुसलमानीवर्णमाला के
३० अक्षर ॥ ९४ मुसलमान ॥ ९५ वियोगिन ॥ ९६ पिया मालिक ॥
९७ खड़े ॥ ९८ मालिक ॥ ९९ बाणी ॥ १०० गुरुआ लोग ॥
१०१ आशना, जार ॥ १०२ झूठा उपदेश ॥ १०३ उपदेश करने
लगी ॥ १०४ मिलावट ॥ १०५ इशारा ॥

( ४२ ) रमैनी ।

वार ॥ १६ ॥ रमैनी ॥ नवदरवाजाभरमविलास ॥ भरमहि-
वावनबहेवतास ॥ ^१०६कैंनउजबावनभूतसमान ॥ कहं लगिगनों
सो प्रथमउडान ॥ माया ब्रह्मजीवअनुमान ॥ मानतही मालि-
क बौरान ॥ अकबकभूतवके परचंड ॥ व्यापि रहा सकलों
ब्रह्मांड ॥ ई भर्म भूत की अकथकहानी ॥ ^१०७गोत्योजीवजहांन-
हिंपानी ॥ तनकतनकपरदौरे बौरा ॥ जहांजायेतहंपावेन-
ठौरा ॥ साक्षी ॥ योगी रोगीभक्तबाबरा, ज्ञानीफिरे
^१०८निखटू ॥ संसारीको ^१०९चैन नहींहै, ज्योंसरांयकाटटू ॥ १७
रमैनी ॥ इतैंउंतदौरैसबसंसार ॥ छुटेनभरमकिआउपचार ॥
जरैजीवकोबहुरिजरावै ॥ काटे ऊपर लोनलगावै ॥ योगी
ऐसी हालबनाई ॥ ^१११उलटी वत्ती नाक चलाई ॥ कोइविभूति-
मृगछालाडारे ॥ अगमपन्थकी राहनिहारे ॥ काहूको जलमां-
झसुतावे ॥ कहंरतहीं सबरैनगंवावै ॥ भगती नारी कीन
श्रृंगार ॥ बिन प्रिया परचै सबै अंगार ॥ एकगर्भ ज्ञानअनु-
मान ॥ नारि पुरुषकाभेदनजान ॥ संसारीकहूंकलनाहिंपावे
॥ ^११२कहरतजगमेंजीवगंवावे ॥ चारिदिशामें मंत्रीझांरे ॥
लियेपलीतामुलनाहारे ॥ जरैनभूतबड़ो वरि^११४खारा ॥ काजी
पण्डित [पचिपचि] पढ़िपढ़ि हारा ॥ इन दोनोंपरएकै भूत ॥
झारेंगे क्यामाकी चूत ॥ साक्षी ॥ भूत नउतरे भूतसों, सन्तों
करोविचार ॥ कहैंकबीरपुकारिके, बिनुगुरु नहिंनिस्तार ॥
साक्षी॥परमप्रकाश ^११५भाँसजो, होत ^११६प्रौढाविशेष॥ तद् प्रकाश

१०६ अक्षर १०७ डुबाया ॥ १०८ उदास ॥ १०९ सुख ॥ ११० यहां
बवां ॥ १११ नेती धोती बाहर कराता है ॥११२ हाय २ करतें २ ॥
११३ पंडित लोग ॥ ११४ मजबूत बलीबलवान ॥ ११५ अध्यास
॥ ११६ दृढ़ ॥

संभव भई, महाकाश सो शेष २१ ॥ साक्षी ॥ झांईंसंभवबुद्धि
ले, करीकल्पना अनेक ॥ सोपरकाशक जानिये, ईश्वरसाक्षी
एक ॥ साक्षी ॥ बिषमभईंशंकल्प जब, तदाकारसोरूप ॥ महा
अंधेरीकालसो, परेअविद्या कूप ॥ साक्षी ॥ महातत्व
त्रीगुणपांच तत्व, सैमष्टि ११७ व्यैष्टि ११३ परमान ॥ दोय प्रकार होयप्र-
गटे, ११९खंड १२०अखंडसोजान ॥ २२ ॥ रमैनी ॥ सदा अस्ति १२१भा
से निजभास ॥ सोईकहियेपरम प्रकाश ॥ परमप्रकाशले झां-
ईं होय ॥ महदअकाश होयबरते सोय॥बरतेवर्त मानपरचंड॥
१२२भासक तुरियातीतअखंड ॥ कालसंधिहोये उश्वास ॥ आगे
पीछे अनवनि भास ॥ विविधि भावना कल्पित रूप ॥ परका-
शी सोसाक्षि अनूप ॥ शून्य अज्ञान सुषुप्तिहोय ॥ अकुलाहट
ते नादै सोय ॥ (शून्य ज्ञान सुषुप्ती होय ॥ अकुलाहटसे नादी
सोय ) ॥ नादवेद अकर्षण जान ॥ तेजनीर प्रगटे तेहिआन ॥
पानी पवन गांठि परिजाय ॥ देही देह धरे जग आय ॥ सो
कौआर शब्द परचंड ॥ बहुव्यवहार खण्डब्रह्माण्ड ॥ साक्षी ॥
जतन भये निज अर्थ को, जेहि छूटे दुख भूरि १२३॥ धूर परी
जब आंखमें, सूझे किमि निजसूर ॥ २३ ॥ रमैनी ॥ पांजी
परख जबै फरिआवै ॥ तुरतहि सबै विकार नशावै ॥ शब्द
सुधारिके रहे अकरम ॥ स्वाती भक्ति के खोटे भरम ॥ काल
जाल जो लखि नहिं आवै ॥ तौलौ निजपद नहीं पावै ॥
झांई संधि काल पहिचान ॥ शार शब्द बिनु गुरु नहिं-
जान ॥ परखे रूप अवस्था जाए ॥ आन विचार न ताहि
समाए॥ १२४झांईं संधि शब्दले परखे जोय॥संशय वाकेरहै न कोय॥
११७ समूह जैसे बन ॥ ११३ एक जैसे एक वृक्ष ॥ ११९ अंस
॥ १२० पूर्ण ॥ १२१ सत्य ॥ १२२ अध्यास का कराने वाला ॥
१२३ ढेर्र समूह ॥ १२४ वेदांत ॥

साक्षी ॥ धन्य धन्य तरण तरण, जिन परखा संसार ॥
बंदी छोरकबीरसों, परगटगुरू विचार ॥ २४ ॥ रमैनी ॥
शब्द संधि ले ज्ञानी मूढ ॥ देह करमजगत आरूढ़ ॥ नौंइंसं-^१२५
धिलै सपना होय ॥ झांईं शून्य सुषोपति सोय ॥ ज्ञान प्रका-
शक साक्षी संधि ॥ तुरियातीत अभास अबंधि ॥ झांईं ले
बरते वर्तमान ॥ सो जो तहां परे पहिचान ॥ काल अस्थिति
के भासनशाए ॥ परख प्रकाश लक्ष बिलगाए ॥ बिलगेलक्ष
अपन ^१२६पौ जान ॥ आपु अपन पौ भेद न आन ॥ साक्षी
॥ आप अपन पौ भेद बिनु, उलटिपलटि अरझाय ॥ गुरु बि-
न मिटे न दुगदुगी, अनबनीयतभनशाय ॥ २५ ॥ रमैनी ॥
निज प्रकाश झांई जो जान ॥ महा संधि माकाश बखान ॥
सो ईं^१२७पांजी ल बुद्धि विशेष॥प्रकाशक तुरियातीत अरुशेष॥
विविध भावना बुधि अं^१२८नुरूप ॥ विद्यामाया सोई स्वरूप ॥
सो संकल्प

रमैनी । ( ४५ )
पहिरें चीर॥युग युग नाचे दास १३५कबीर ॥ २१ ॥ रमैनी ॥भासे
जीवरूप सो एक ॥ तेही भास के रूप अनेक ॥ कोई १३६मैंगन
रूप लौलीन ॥ कोई १३७अँरूप ईश्वर मन दीन ॥ कोई कहै कर्म-
१३८रूप है सोय ॥ शब्द १३९निरूपेन करे पुनि कोय ॥ १४०संशय रूप
कोई भगवान ॥ कर्त्ता न्यारा १४१कोई अनुमान ॥ कोई कहै
१४२ईश्वरै ज्योतिहिं जान ॥ आतम को कोई १४३स्वतः बखान ॥
कोई कहै सब १४४पुनि सबते न्यारा ॥ आपै राम विश्व विस्ता-
रा ॥ शब्द १४५भौंव कोई अनुमान ॥ अद्वै रूप १४६भई पहिचान ॥
१४७डेंगडुग रही को बोलै बात ॥ बोलतही सब तत्व नशात ॥
बोल १४८अंबोल लखे पुनि कोय ॥ भास जीव नहिं परखै सोय
॥ साक्षी ॥ निज अँध्यास झांई अहै, सोसंधिक औभास ॥
प्रथम अनुहारी कल्पना, सदा करे परकास ॥ २६ ॥ रमैनी॥
लख चौराशी योनि जेते ॥ देही बुद्धि जानिये तेते ॥ जहं
जेहि भास सोई सोइ रूप ॥ निश्चै किया परा भवकूपं ॥ नाना
भांति विषय रस लीन ॥ अरुझि २ जिव मिथ्या दीन ॥
१५०दाँवा १५१विषयै जरै सब लोय ॥ बांचा चहै गहै पुनि सोय ॥दृढ़
विश्वास १५२भरोसा राम ॥ कबहूं तो वे आवैं काम ॥ १५३विषयै
विकार मांझ संग्राम ॥ राम खटोला किया अराम ॥ घायल
बिना तीर तरवार ॥ सोइ १५४अभरैंण जेहि रीझे भरतार ॥
१३५ भक्त लोग ॥ १३६ सगुण उपासक ॥ १३७ निर्गुण उपासक ॥
१३८ पूर्व मीमांसक ॥ १३९व्याकरणी ॥ १४० वैशेषिक ॥ ( काल वादी )
१४१ तर्क वादी नैयाइक ॥ १४२ योगी ( पातांजल ) १४३ सांख्यक ॥
१४४ वेदांती ॥ १४५ बोलता ॥ १४६अद्भुत रूप ॥ १४७ शंका ॥
१४८ विज्ञानी ॥ १४९ कल्पना ॥ १५० उसके बुद्धि का जो विषय ॥
१५१ अग्नि ॥ १५२ आशा ॥ १५३॥ क्षोभ, ऐब ॥ १५४ गहना ॥

( ४६ ) रमैनी ।
कामिनी पहिर पिया सों राँ१५५ची ॥ कहैं १५६कबीर भव बूड़त
बांची ॥ २३ ॥ रमैनी ॥ भव बूड़त बेड़ौ१५७ भगवान ॥ चढ़े
धाये लागी लौ ज्ञान ॥ थाह न पावे कहे अथाह ॥
डोलत करत तराहि तराह ॥ सूझ परे नहिं वार न पार ॥
कहै अपार रहे मैंझधार ॥ मांझधारमें किया विवेक॥कहां के
दूजा कहांके एक ॥ बेरा आपु आपु अवधार ॥ आपै उतरन
चाहेपार ॥ बिन जाने जाने है और॥आपै राम रमैसब ठौर॥
बार पार ना जाने जोर ॥ कहै कबीर पार है ठौर ॥ २४ ॥
रमैनी ॥ अक्षर खानी अक्षर वानी ॥अक्षर ते अक्षरउतपानी
अक्षर करता आदि प्रकास ॥ ताते अक्षर जगत विलास ॥
अक्षर ब्रह्मा विष्णु महेश ॥ अक्षर रज सत तम उपदेश ॥
छिति जलपावक मरुत अकाशा॥ये सब अक्षर मो परकाशा ॥
दश औतार सो अक्षर माया ॥ अक्षरनिर्गुणब्रह्मानिकाया ॥
अक्षर काल संधि अरु झांई ॥ अक्षर १५९दहिने अक्षर १६०बाँई ॥
अक्षर आगे करे पुकार ॥ अँटके नर नहिं उतरे पार ॥
गुरुकृपा निजैं१६१ उदैयविचार१६२ ॥ जानिपरी तब गुरुमत-
सार ॥ साक्षी ॥ जहां ओसको लेश नही, बूडे सकल
जहांन ॥ गुरु कृपानिज परखबल, तब ताको पहि-
चान ॥ २७ ॥ रमैनी ॥ अक्षर काया अक्षर माया ॥ अक्षर
सतगुरु भेद बताया ॥ अक्षर यन्त्र मन्त्र अरु पूजा ॥ अक्षर
ध्यान धरावत दूजा ॥ अक्षर पढि २ जगत भुलान ॥ अक्षर
बिनु नहिं पावै ज्ञान ॥ बिन अक्षर नहिं पावे गैती१६३ ॥ अक्षर
१५५ लगी ॥ १५६ गुरू ॥ १५७ नाव किश्ती ॥ १५८ बीच
धारमें ॥ १५९ दक्षिण पंथ ॥ १६० वाममार्ग ॥ १६१ अपना ॥ १६२ प्रकाश ॥
१६३ मुक्ति ॥

रमैनी । ( ४७ )

बिन नहिं पावै १६४रंती ॥ अक्षर भए अनेक उपाय ॥ अक्षर
सुनि २ शून्य समाय ॥ अक्षर से भव आवै जाय ॥ अक्षर
काल सबनको खाय ॥ अक्षर सबका भाषे लेखा ॥ अक्षर
उत्पति प्रलय विशेखा ॥ अक्षरकी पावै सहिं१६५दानी ॥ कहैं क-
बीर तब उतरे प्रानी ॥ साक्षी ॥ परखावे गुरुकृपा
करि, अक्षर की सहिदानि ॥ निज बल उदथ विचारते,
तब होवे भ्रम हानि ॥ २८ ॥ रमैनी ॥ बावन के बहु बने
तरंग ॥ ताते भासत नाना रंग ॥ उपजे औ पालै अनुसरै ॥
बावन अक्षर आखिर करै ॥ राम कृष्ण दोउ लहर अपार ॥
जेहिपद गहि नर उतरै पार ॥ महादेव लोमश नहिं बांचे ॥
अक्षर त्रास सबै मुनि नाचे ॥ ब्रह्मा विष्णु नाचै
अधिकाई ॥ जाको धर्म जगत सब गाई ॥ नाँचै गण गंधर्व
मुनि देवा ॥ नाचै सनकादिक बहु भेवा ॥ अक्षर १६६त्रास सबन
को होई ॥ साधक सिद्ध बचे नहिं कोई ॥ अक्षर त्रास लखे
नहिं कोई ॥ आदि भूल बंधे सब लोई ॥ अक्षर सागर अक्षर
नाव ॥ करणधार अक्षर समुदाय ॥ अक्षर सबका भेद
बखान ॥ बिन अक्षर नहिं अक्षर जान ॥ अक्षर आसते फंदा
परे॥ अक्षर लखे ते फंदा टरे॥ गुरु शिष अक्षर लखलखावे ॥
चौराशी फंदा मुक्तावै ॥ बिनु गुरु अक्षर कौन छोडावे ॥
अक्षर जाल ते कौन बचावै ॥ संचितँ १६७ क्रिया उदय जब होय ॥
मानुष जन्म पावै तब सोय ॥ गुरुपारख बल उदय विचार ॥
परख लेहु जगत गुरुमुख सार ॥ अस्ति हंसप्रकाश अपार॥


१६४ प्रवृत्ति ॥ १६५ चिह्न, पारख, पहिचान, ॥ १६६ भय ॥
१६७ जन्मांतरोंमें संचित किया हुआ कर्म ॥

( ४८ ) रमैनी ।
गुरुमुख सुख निज अति दातार २७ ॥ साक्षी ॥ अक्षर है
तिहु भर्मका, बिनु अक्षर नहिं जान॥ गुरु कृपानिज बुद्धिबल,
तब होवे पहिचान २९ ॥ साक्षी ॥ १६८जँहवां से सब प्रगटे, सो
हम समझत नाहि ॥ यह अज्ञान है मानुषा, सो गुरु ब्रह्म
कहि ताहि ॥ ३० ॥ साक्षी ॥ ब्रह्म विचारे ब्रह्मको, पारख
गुरु १६९प्रसाद ॥ १७०रहित रहे पद परखिके, जिव से होय
१७१अंवाद ॥ ३१ ॥ मूल रमैनी सम्पूर्णा ॥ कठिन शब्द जेते रहे,
टिप्पणी करि बनाय ॥ बाकी अब कछु होय जो दीजो संत
जनाय ॥ १ ॥ गुरुथल १७२हौता जानिये, १७३शिवहर जन्म स्थान॥
युगलानन्द मम नाम है, जानो संत सुजान ॥ २ ॥
१६८ जहांसे ॥ १६९ दया, कृपा ॥ १७० अलग ॥ १७१ वाद
रहित ॥ . १७२ जिला सारन डा० घ० कुवाहकोटकें इलाकेमें और
हथुआसें पांच कोस उत्तर पर है ॥ १७४ बिहार प्रान्तके मुजफ्फरपुर जिलेमें
राजस्थान हैं ।
इति श्रीमूलरमैनी प्रसिद्ध अक्षरखण्डकी रमैनी स्वामी युगलानन्द कबीरपंथी
भारतपथिकद्वारा संशोधिता समाप्ता ।
पुस्तक मिलनेका ठिकाणा—
खेमराज श्रीकृष्णदास,
“ श्रीवेंकटेश्वर ” ( स्टीम् ) यन्त्रालय-बम्बई.

सत्यनाम
बीजक कबीरदास ।
अथ आदिमंगल ।
दोहा—प्रथमै समरथ आप रहे, दूजा रहा न कोइ ॥
दूजा केहि बिधि उपजा, पूछत हौं गुरु सोइ ॥ १ ॥
तवसतगुरु मुखबोलिया, सुकृतसुनोसुजान ॥
आदि अन्त की पारचै, तोसों कहौं बखान ॥ २ ॥
प्रथमसुरति समरथ कियो, घटमें सहजउचार ॥
ताते जामन दीनिया , सात करी विस्तार ॥ ३ ॥
दूजे घट इच्छा भई, चितमनसातो कीन्ह ॥
सातरूप निरमाइया, अविगत काहु न चीन्ह ॥ ४ ॥
तवसमरथ के श्रवणते, मूलसुरति भै सार ॥
शब्द कला तातेभई, पाँच ब्रह्म अनुहार ॥ ५ ॥
पाँचौ पाँचै अंड धरि, एक एकमा कीन्ह ॥
दुइ इच्छा तहँ गुप्तहैं, सो सुकृत चितचीन्ह ॥ ६ ॥

(२) बीजक कबीरदास ।
योगमया यकु कारणे, ऊजे अक्षर कीन्ह ॥
याअविगतिसमरथकरी, ताहिगुतकरिदीन्ह ॥ ७ ॥
श्वासा सोहं ऊपजे, कीन अमी बंधान ॥
आठ अंश निरमाइया, चीन्हौ संत सुजान ॥ ८ ॥
तेज अंड आंचित्त्यका, दीन्हो सकल पसार ॥
अंड शिखा पर बैठिकै, अधर दीप निरधार ॥ ९ ॥
ते अचिन्त के प्रेमते, उपजे अक्षर सार ॥
चारि अंश निरमाइया, चारि वेद विस्तार ॥ १० ॥
तब अक्षरका दीनिया, नींद मोह अलसान ॥
वेसमरथअविगतिकरी, मर्मकोइनहिंजान ॥ ११ ॥
जब अक्षरके नींदगै, देवी सुरति निरबान ॥
श्यामवरण यकअंड है, सो जलमें उतरान ॥ १२ ॥
अक्षर घटमें ऊपजे, व्याकुल संशय शूल ॥
किन अंडा निरमाइया, कहा अंडका मूल ॥ १३ ॥
तेहि अंडके मुखपर, लगी शब्दकी छाप ॥
अक्षर दृष्टिसे फूटिया, दशद्वारे कढ़ि वाप ॥ १४ ॥
तेहिते ज्योति निरञ्जनौ, प्रकटे रूप निधान ॥
काल अपरवल बीरभा, तीनिलोक परधान ॥ १५ ॥
ताते तीनों देव भे, ब्रह्मा विष्णु महेश ॥
चारिखानितिनसिरजिया, मायाके उपदेश ॥ १६ ॥
चारि वेद षट शास्त्रऊ, औ दशअष्ट पुरान ॥
आशादै जग बाँधिया, तीनों लोक भुलान ॥ १७ ॥

आदिमंगल। ( ३ )
लख चौरासी धारमा, तहाँ जीवदिय बास ॥
चौदह यम रखवारिया, चारिवेद विश्वास ॥१८॥
आपु आपु सुख सबरमै, एक अंडके माहिं ॥
उत्पतिपरलयदुःखसुख, फिरिआवहिंफिरिजाहिं १९
तेहि पाछे हम आइया, सत्य शब्दके हेत ॥
आदि अन्तकी उतपती, सो तुमसों कहिदेत ॥२०॥
सात सुरति सवमूलहै, प्रलयहु इन्हीं माहिं ॥
इन्हीं मासे ऊपजे, इन्हीं माँह समाहिं ॥२१॥
सोई ख्याल समरथकर, रहे सो अच्छप छपाइ॥
सोई संधिलै आइया, सोवत जगहिं जगाइ॥२२॥
सात सुरतिके बाहिरे, सोरह संखके पार ॥
तहँ समरथको बैठका, हंसन केर अधार ॥२३॥
घर घर हम सबसों कही, शब्द न सुनैं हमार ॥
ते भवसागर डूबहीं, लख चौरासी धार ॥२४॥
मंगल उत्पत्ति आदिका, सुनियो संत सुजान ॥
कह कबीर गुरु जाग्रत, समरथका फुरमान ॥२५॥
वस्तुनिर्देशात्मक मंगल ।
दोहा-प्रथमै समरथ आपरहे, दूजा रहा न कोय ॥
दूजा केहिविधि उपजा, पूंछतहौं गुरुसोय ॥१॥
कबीरजीकी वाणीके अर्थ करिवेकों मोमें सामर्थ्य नहींरही परंतु साहब यह
विचारिकै कि कबीरजीके बीजकको पाखण्ड अर्थलगाइकै जीवबिगरे जाँयहैं सो

साहब तो परमदयालु हैं उन कों करुणाभई तब कबीरजीको भेज्यो याकहि कै
कि आगे हम तुमको भेज्यो हतो सो तुम ग्रन्थबनाइकै बहुत जीवनको उप-
देशकरिकै उद्धार कियो सो अब तिहारे ग्रन्थको पाखंड अर्थकरिकै पाखंडी हैं
कै जीव बिगरे जायँ हैं औ बहुत बिगरिगये सो तुमनाइकै जौन अर्थ तुम बीज-
कमें राख्योहै सो अर्थ विश्वनाथ सों बनवावो जाते सो अर्थ समुझिकै जीव
हमारे पास आवैं सो कबीरजी आयकै मोसों कह्यो कि तुम बीजकको अर्थ
बनावो हम तुमको बतावेंगे सो उनके हुकुमते मैं बीजकको अर्थ बनाउं हौं
बतावने वाले श्रीकबीरहीजी हैं मोमें ताक़त नहीं है जो मैं बनायसकौं और ना-
भाजी भक्तमालमें लिख्योहै कि “कबीर कानि राखी नहीं बरणाश्रम षटदरशनी”
सो इहां कबीरजी को सिद्दात मत मैं कहौंगो औ सर्वसिद्धांतग्रंथ जो मैं बनायोहै
तामें सबको सिद्धांत यथार्थ राख्योहै सो यहां बीजकके तिलक में साहबको औ
कबीरजीको हुकुम यहीहै कि एक सिद्धांत रहै जो सबतेपरैहै और सिद्धांत सबखंडन
हैजायँ सो सबके सिद्धांतनको खण्डन करिकै एक सिद्दात मैं वर्णन करौंहौं सों
सुनिकै साहब के हुकुमी जानिकै साधुलोग पंडितलोग और और मत वाले जेहैं
ते मेरे ऊपर खफा न होयँ प्रसन्न रहैं ना समुझिपरै तौ प्रसन्नहोइकै गुरुसों पूँछि-
लेइँ अब अर्थ लिखैहैं ।
अर्थ-प्रथम समरथ जे श्रीरामचन्द्रहैं ते आपही हैं दूसरा कोई नहीं
रह्यो जो कहौ उनके लोक में तौ हंस हंसिनी सब वर्णन करैहैं उनके
पार्षद सबहैं ताको वर्णन निर्भय ज्ञानमें विस्तारते हैं सो इहां संक्षेप तें
सूचित किये देई हैं ॥ “सत्य पुरुष निर्भय निरबानां । निर्भय हंस तहँ
निर्भयज्ञाना ॥ ” इत्यादिक बहुत वर्णन निर्भयज्ञानमें कबीरजी कियोहै तुम
एकही कैसे कहौ है सो सत्यहै उहांके जीवसनातन पार्षद बने रहैहैं औ साहब
औ साहबको लोक सनातन बनो रहैहैं परंतु उहांके पार्षदजीव और उहांकी
सब बस्तु साहबहीके रूपहै औ सब चिन्मयहै सो वेद कहैहैं ॥ श्लोक॥ “सच्चि-
दानन्दो भगवान् सच्चिदानन्दात्मिकास्यव्यक्तिः॥”औ वह अयोध्या नगरी ब्रह्मके
परैहै ब्रह्म वाको प्रकाशहै औ रघुनाथजी के समीप के जे पार्षद हैं ते साहबकें
स्वरूपहैं तामें प्रमाण ॥ “ अयोध्यापरंब्रह्म सरयू सगुणःपुमान् ॥ तन्निवासी-
जगन्नाथः सत्यंसत्यंवदाम्यहम् ॥ १॥ अयोध्यानगरीनित्यासच्चिदानन्दरूपिणी ॥

आदिमंगल । ( ५ )
यदंशांशेनगोलोकः वैकुण्ठस्थःप्रतिष्ठितः ॥ २ ॥” इति वसिष्ठसंहितायाम् ॥
‘‘ देवानांपूरयोध्या तस्यांहिरण्मयः कोशः स्वर्गेलोकोज्योतिषावृतः ’’ इतिश्रुतेः॥
सो इहां कहैंहैं कि प्रथमतौ समर्थ साहब वह लोक में आपही आपहै दूजा कोई
नहीं रह्यो दूजा जो रह्यो सो तौ साहबके लोकको प्रकाश चैतन्याकाशमें रह्योहै
सो कबीरजीते धर्मदास कहे हैं कि हे गुरुजी मैं तुमसे पूछौंहौं कि साहबकें
लोकको प्रकाश चैतन्याकाशमें जो समष्टि जीव वह दूजारह्यो सो केहिविधितें
उपज्यो संसारी भयो काहेतें कि साहबतो दयालुहैं जीवों को संसारते छुड़ाइदे-
इहैं जीवोंको संसारी नहीं करिदेइहैं औ वह समष्टि जीवके तब मनादिक नहीं
रहे शुद्धरह्योहै उपजिबे की सामर्थ्य नहीं रहीहै औ साहब सामर्थ्य दैके जीवोंकों
संसारी करबही नकरेंगे सो दूसरा जो है समष्टिजीव सो उपजिकै व्यष्टिरूप
संसारी केहि बिधित भयो औ जीवके अपने ते उपजिबे की सामर्थ्य नहींरही
तामेंप्रमाण ॥ ‘‘ कर्तृत्वंकरणत्वंचसुभावश्चेतनाधृतिः ॥ तत्मसादादिमे

( ६ ) बीजक कबीरदास ।
प्रथम समर्थजे साहब श्रीरामचन्द्रहैं साकेत निवासी दयालु जिनके लोकके
प्रकाशमें समष्टिरूपते यह जीव है ते श्रीरामचन्द्र परमदयालु यह जीवको देखि-
कै कि कछू बस्तुकों याकों ज्ञान नहीं है जब यह जीवपर साहबकी दयाभई तब
सुरतिमात्र दैकै अपने जानिबेकों वाको समर्थ करतभये कि जब याकें सुरति-
हौयगी तब मोकोजानैगो मैं हंसस्वरूप दैकै अपनेलोक लैआउंगो । जहां मन-
मायां कालकीगतिनहींहै तहां सुखपावैगो अबैतो याको सुखको ज्ञानही नहीं है ।
यह करुणा करिकै वह समष्टिरूप जीवके घटमें सहजही सुरति को उच्चारकरत
भये कहे अंकुर करतभयें । सो साहबतो अपने जानिबेको सुरतिदियो कि मों-
कोजानै औ यह जीव वही सुरति कों पाइकै औ मनादिकन को कारण इनकें
रहंबई करै औ शुद्ध रहै दूधरहै जीव अपनी शुद्धता रूप दूधमें जगत्को कारण
बनोई रहै तामें वही सुरति को जामन दैदियो सो बिनशिगयो सो वह सुरति
पाइकै साहबकेपास तो न गयो जीव बिनशिकै इच्छादिक जे सात तिनको
बिस्तार करत भयो । औ यह चैतन्य जीवको सुरति दैकै साहब चैतन्य करैहै ।
साहब चैतन्यो को चैतन्यहै तामें प्रमाण श्लोक॥ “नित्योनित्यञ्चेतनश्चेतनानां।
द्रव्यंकर्मचकालश्चस्वभावोजीव एवच।यदनुग्रहतःसंतिनसंति यदुपेक्षया इति भाग-
वते॥”औ इच्छादिकन को कौन सात.बिस्तार करतभयो सो आगेकहैहैं ॥३॥
दोहा- दूजेघटइच्छाभई, चितमन सातौकीन्ह ॥
सातरूपनि रमाइया, अबिगतकाहुनचीन्ह ॥ ४ ॥
जब याकों साहब सुरति दीन तब जीवके जगत को कारणमें रामाज्ञान
बनोईरहै तेहिते सुरति साहबमें न लगायो जगत् मुख लगायो । जब सुरति
जगत् मुखलाग्यो तबप्रथम जगत्को कारण पुष्टभयो विनशिगयो तेहिते दूसर
इच्छा रूप अंकुरभयो तीसर चित्तभयो चौथमनभयो पांचौंबुद्धिभई छठौं अहंकार
भयो सातौं अहंब्रह्म कहेअनुभवते भयोजो ब्रह्म ताकोमान्यो कि मैंहींब्रह्महौं सों
शुद्धते अशुद्ध ह्वैकै सातबिस्तार करिकै समष्टिरूपजो जीव सो अहंब्रह्मास्मिमान्ये
तब याको अनुभव ब्रह्ममाया सबलित भयो, ताहीद्वारा जगत् उत्पन्न भयों,
ताहीद्वारा यहंजीवौ उत्पन्नभयो अर्थात् समष्टिरूप जीवको अनुमान जो ब्रह्म सों