कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी ॥ धोखाप्रथमपरखियेभाई ॥ नामजातिकुलकर्मबड़ाई
क्षिति<sup>३३</sup>जल पावक<sup>३४</sup> मरुत<sup>३५</sup>अकाश ॥ तामहपंच<sup>३६</sup> विषयपरकाश॥
तत्व पांचमेंश्वासासार ॥ प्राणअपानसमान उदान<sup>३७</sup> ॥ और-
व्यानबावनसंचार ॥ निजनिज थल<sup>३८</sup>निज कारजकार ॥ इंग-
ला पिंगलाऔ सुखमनी ॥ इकइस सहस्र छौसत सोगनी ॥
निगम<sup>३९</sup> अंगम<sup>४०</sup> सो सदा बतावै ॥ श्वासासारसरोदा गावै ॥
साक्षी ॥ धोखा <sup>४१</sup>अँधेरी पायकै, याविधिभयाशरीर ॥
कल्पेउकारताएक पुनि, बढ़ीकर्मकी <sup>४२</sup>पीर ॥ ५ ॥ रमैनी ॥
योग्य जप तपध्यानअलेख ॥ तीरथ फिरतधरेबहुभेख ॥
योगी जंगमसिद्धउदास ॥ घरको त्यागि फिरेबनबास ॥ <sup>४३</sup>कैन्द
<sup>४४</sup>मूल <sup>४५</sup>फल करतअहार ॥ कोइकोइ जटाधरे शिरभार ॥ मन-
मलीन मुखलायेधूर ॥ आगे पीछेअग्रिऔ <sup>४६</sup>सूर ॥ नग्रहोयनर
<sup>४७</sup>खोरि नफिरे ॥ पीतरपाथरमेंशिरधरे ॥ साक्षी ॥ कालशब्द-
केसोरते, <sup>४८</sup>होरपरीसंसार ॥ देखा देखीभागिया, कोईनकरे
विचार ॥ ६ ॥ रमैनी ॥ जब <sup>४९</sup>पुँनिआयलखी यह <sup>५०</sup>बाँनि ॥
तबपुनिचित्तमाकियो अनुमनि ॥ महीं ब्रह्म कर्त्ताजगकेर ॥
॥ ३४ अग्नि ३३ पृथ्वी ३५ वायु ॥ ३६ शब्द आकाश का विषय स्पर्श
वायुका ॥ रूप अग्नि का रसजलका गंध पृथ्वीका ३७ उदान ॥ ३८ स्थान॥
३९ शास्त्र ॥ ४० वेद ॥ ४१ अविद्या अज्ञानता ॥ ४२ दुख ॥ ४३ जो
पृथ्वी के नीचे होता है जैसे आलू शकरकंद केसउर फर इत्यादि ॥ ४४ जो
मूल से होता है अर्थात् काठ फोड कर जो निकलता है जैसे कट हल; गूलर
ईत्यादि ॥ ४५ जो फूल से पैदा है जैसे आंब ( केरी ) अमरूद(जामफळ)
इत्यादि ॥ ४६ सूर्य्य ॥ ४७ बेशर्म ॥ ४८ शोर हल्ला ॥ ४९ फिर ॥
शब्द ॥ ५० ॥