कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
( २६२ ) बीजक कबीरदास ।
भाई अद्भुत रूप अनूप कथा है कहौं तोको पतिआई ।
जहँजहँ देखों तहँ तहँ सोई सबघट रह्यो समाई ॥ १ ॥
जाति करिकै सबजीव एकही हैं तातेजीवनको भाई कह्यो कि, हे भाई
जीवो ! वे जे हैं परमपुरुष श्रीरामचन्द्र तिनको अद्भुतरूपहै, अरु वहि रूपकी
अनूपकथाहै सो मैं जो वाको दृष्टांत दैके समुझाऊं हौं कि, बाको रंग दूर्बा दलकी
नाईं है, अरसी कुसुमकी नाईं, नील कमलकी नाईं, तौ येई सबमें भेदपरै एक
एककी तरह नहीं है वहतो मनबचनकें परे है । ऐसेनाम रूप लीला धाम सबहै
वाको तौ कैसे समुझाऊं। काहेते जोमैं वाको समुझाइकें कहौं तौ कैसे कहो औ जों
कहबऊकरौं तौ कोई पतिआय कैसे । सो यहितरहको जो याको रूपहै सो जहां
जहां देखोहौं तहां तहां वहै रूप देखायहै । काहेते कि, सबघटमें समाय रह्यो
है । यहां सबघटमें समान्यों जोकह्यो ताते चितहू अचितहू में समाइरह्यो यह-
आयो जो व्यंग्य पदार्थहै जीव ब्रह्म माया काल कर्म स्वभाव ताहीको सब देखैहैं
औ जो व्यापक पदार्थ है ताको कोई नहीं देखैहै । जो चितहू अचितमें जो
कहो वही धोखा ब्रह्मको तुमहूं कहतेहौ जो सर्वत्र फैलि रह्यो है तौ वाको कोई-
नहीं कहतेंहैं; काहेते किं, अद्वैतबादी कहै हैं कि, सब पदार्थ वही ब्रह्मही है
वातें भिन्न दूसरो पदार्थ नहींहै औ हम कहैहैं कि, सबपदार्थ चित् अचित्
रूपते व्याप्य है औ हमारो साहब सर्वत्र व्यापक है सो जाको बिश्वास होइ
ताको वे साहब साकेत निवासी परम पुरुष श्रीरामचन्द्र सहजही प्रकट ह्वै
जायैं । सो जो मैं कहौंहौं ताको नहीं प्रतीत करै हैं। चित् जो है जीव औ ब्रह्म
ताहूमें श्रीरामचन्द्र व्यापक हैं तामेंप्रमाण ॥ “औंयोवैश्रीरामचन्द्रोभगवान्
द्वैतपरमानन्दात्मा यः परंब्रह्मेतिरामतापिन्याम्” ॥ जीवहूमें व्यापकहैं तामें
प्रमाण ॥ “यआत्मनितिष्ठन् यआत्मानं वेद्यस्यात्माशरीरमिति” ॥ मायादिक
सबमें व्यापक हैं तामेंप्रमाण ॥ “यस्यभासासर्वमिदंविभातीतिश्रुतिः” ॥ १ ॥
लछि बिनु सुख दरिद्र बिनु दुख है नींद विना सुख सोवै ।
जस बिनु ज्योति रूप बिन आशिक रतन विहूना रोवै॥२॥
कैसो साहब सर्वत्र पूर्णहै सो बतावैहैं । लछिबिनु सुखकहै जो पदार्थ
प्रत्यक्ष नहीं होइ है तामें सुखनहीं होइहै देखो तो नहीं परै है साहब पै जौं
कोई स्मरण करै है सर्वत्र ताको सुखहोयहै । साहबको कौनौ बातको दरिद्र
नहीं है जो चाहै सो करिदारै समर्थहै परन्तु नानाजीवनको अज्ञानमेंपरेदेखिकै
साहिबोको यही दुःख है कि, मेरे अंश जीव माया में परिकै नरक स्वर्ग
जाय हैं । काहेते यहदुःखहै कि, साहब अतिदयालुहैं तामेंप्रमाण ॥ “ताव-
त्तिष्ठतिदुःखीवयावद्दुःखं न नाशयेत् । सुखीकृत्यपरान्भक्तानस्वयम्पश्चात्सुखीभवेत्
इति” ॥ ध्वनि यह है कि,साहब दयालु हैं ते सर्वत्र पूर्णहैं यह बिचारिकै किं
जीव मोको जहँ स्मरणकरै मैं तहँ उबारिलेउँ । फिरिकैसो साहब है कि,
मोहनिद्रा नहीं है सदाजगै है अपने भक्तनकी रक्षाकरिबेको । ऐसेहू साहबके
सम्मुख जो जीव नहीं होइहैं तिनकी और सदा सुखमय साहब सोवै है अर्थात्
कबहूंनहीं देखैहै । फिरकैसो साहबहै जाकी ज्योति जो ब्रह्म है अर्थात् जाको
लोकमकाश जो है ब्रह्म सो बिना कौनौ कथै है वा कौनौ लीलैकियो अकथहैं
ऐसे साहबके बिना रूपमें आशिकभये साहबको ज्ञानरत्न विहीना जीवसंगर में
जनन मरण पाइपाइ रोवैहै ॥ २ ॥
भ्रम बिनु ज्ञान मनै बिनु निरखै रूप बिना बहुरूपा ।
थिति बिनु सुरति रहस बिनु आनँद ऐसो चरित अनूपा॥३॥
कहै कबीर जगत बिन माणिक देखौ चित अनुमानी ।
परि हरि लाभै लोभ कुटुंब सब भजहु न शारँग पानी॥४॥
फिर कैसोहै साहब भ्रमबिनाहै अर्थात् कबहूं मायासबलित ह्वैकै जगतमेंहीं
उत्पत्तिकियो । सदा ज्ञान गुण सदा ज्ञान स्वरूप है । तौने साहबको मानै बिना
निरखै कहे बिना ह्वैकै हंस स्वरूप पाइकै तैं देखै । कैसे हैं साहब कि, चिद्
अचित जेरूपहैं तेहि बिनाहैं अर्थात् ये स्पर्श नहीं करिसकै हैं औचित अचितके
शरीरी हैं बहुत रूपौ हैं सब उन्हींके रूपहैं । फिरि कैसेहैं जब साहब सुरति दीन
है तब जीवन की स्थिति भई है । औ सुरति नहीं है साहबकी स्थिति वालोक
में बनी है । औ आनंदजो मनबचनमें आवै है सो नहीं है वहां आनंद बनों
( २६४ ) बीजक कबीरदास ।
है। ऐसे साहबके अनूप चरित हैं। अर्थात् जो रहस कहिआये सोऊ मन
बचनके परे है। सो कबीरजी कहैं हैं कि, जोचित्तमें अनुमानकरि देखौ तौ
यावत् उपासना औ ज्ञान तुम करौ हौ, जगत् मुक्तिरूप माणिक काहूते न
मिलैगी। ऐसी मुक्तिके लाभ को लोभत्यागिकै औ सब कुटुंब जे गुरुवालोग
तिनको त्यागिकै शारंगपानी कहे धनुषको ^न्हे साहब तिनको काहे नहीं
भजौहौ अर्थात् भजौ ॥ ३ ॥ ४ ॥
इति सत्ताईसवां शब्द समाप्त ।
अथ अठाईसवां शब्द ॥ २८ ॥
भाई रे गैया एक विरंचि दियोहै भार अभर भो भाई ।
नौ नारीको पानि पियतिहै तृषा तऊ न बुताई ॥ १ ॥
कोठा बहत्तरि औ लौलाये वज्र केवाँर लगाई ।
खूंटा गाड़ि डोरी दृढ़बांधो तेहिबो तोरि पराई ॥ २ ॥
चारि वृक्ष छौ शाखा वाके पत्र अठारह भाई ।
एतिक लै गैया गम कीन्हो गैया अति हरहाई ॥ ३ ॥
ई सातौ अवरण हैं सातौ नौ औ चौदह भाई ।
एतिक गयै खाइ बढ़ायो गैया तौ न अघाई ॥ ४ ॥
खूंटामें राती है गैया श्वेत सींग हैं भाई ।
अवरण वरण कछू नहिं वाके भक्ष अभक्षै खाई ॥ ५ ॥
ब्रह्मा विष्णु खोज कै आये शिवसनकादिक भाई ।
सिद्ध अनंत वहि खोज परेहैं गैया किनहुं न पाई ॥ ६ ॥
कहै कबीर सुनो हो संतो जो या पद अर्थाई ।
जो या पद को गाइ विचारि है आगे है तरिजाई॥ ७॥
शब्द । ( २६५ )
भाई रे गैया एक विरंचि दियोहै भार अभर भो भाई ।
नौ नारीको पानि पियति है तृषा तऊ न बुताई ॥ १ ॥
हे भाई जीवो! एक वाणीरूप गैया तुम्हीं सबको विरंचि जे ब्रह्माहैं ते दियो
है । सो गैयाको जो तात्पर्य दूधहै ताको तुम न पायो गैयाको भारा अभर
ह्वैगयो तुम्हरो सँभारो न सँभारिगयो । अर्थात् जोनो वाणीमें विधि निषेध
लिखै हैं सो तुम्हारो कियो एकौ नहीं ह्वै सकैहै । सो ये मायिक विधि निषेध
तो तुम्हारे किये ह्वै नहींसकैहै । वाणी जो तात्पर्य वृत्तिते बतावैहै सो तो
अमायिकहै कैसे जानौगे? वह गैया कैसी है सो बतावैहैं नौ कहे नवो जे व्याक-
रण हैं तिनकी जो नारी कहे राहहै तिनकर जो शब्दरूपी जलहै ताको पियै है
अर्थात् वोहीके पेटते वेदशास्त्र सब निकसै हैं औ वहीके पेटमें हैं ते शास्त्र वेद
वोही नवो व्याकरणके शब्दरूपी जलते शोधे जायहैं । अर्थात् वही बाणीमें
जल समाईहै परन्तु तृषा तबहूं नहीं बुझाइहै कहे वोही नवो व्याकरण करिकै
शोधैहै शास्त्रार्थ करतही जायहै बोध नहीं होइहै किं, शुद्धह्वैगयो पुनि प्रणीतन
में आर्ष कहिदेयहै ॥ १ ॥
कोठा बहत्तरि औ लौलाये वज्र केवाँर लगाई ।
खूंटा गाड़ि डोरी दृढ़ बांधो तेहिवो तोरि पराई ॥ २ ॥
पातंजल शास्त्रवाले वही गायत्री गैयाको बांधन चह्यो बहत्तरिउ कोठाते
लौलगाइकै कहे श्वास खैंचिकै खेचरी मुद्राकारि घेंटीके ऊपर बज्र कपाट जो
लग्यो है ताको जीभते टार्यो तब वहां अमृत श्रवो तब नागिनी उठी श्वासाके
साथ ऊपरको चढ़ी ताके साथ आत्मौ खूंटा जो ब्रह्मांडहै ब्रह्मज्योति तहां
पहुंच्योजाई सो ज्योतिरूप ब्रह्मखूंटाहै तामें प्रणागिनी जो गैयाहै ताको बांध्यो
तेहिवो तोरि पराई कहे जब समाधि उतरी तबफिरि जसकोतस संसारी ह्वै गयों
नागिनीशक्ति उतारिआइ पुनि जीवनको संसारमें डारिदियो ॥ २ ॥
चारि वृक्ष छौ शाखा वाके पत्र अठारह भाई ।
एतिक लै गैया गमकीन्हो गैया तउ न अघाई ॥ ३ ॥
( २६६ ) बीजक कबीरदास ।
पातंजल शास्त्रमें योगक्रियाहै सो कायाते होयहै ताते अलग कह्यो अब सब
मेटिकै कहैहैं। चारि वेदजेहैं तेई वृक्षहैं औ छहउ शास्त्रजे हैं तेई शाखा हैं अठा-
रहौंपुराण पत्रहैं सो अकेलेकहै यहां लगे । गैयागमनकै जातभई कहे प्रवेश
कैजातभई सो गैया बड़ी हरहाई है अर्थात् जहां जहां आरोपकियो तौन तौन
वह खाय लियो अर्थात् जौन जौन आरोप कियौहै तौन वाके पेटते बाहर नहीं
है भीतरहीहै ॥ ३ ॥
ई सातौ अवरणहैं सातौ नौ औ चौदह भाई ।
एतिक गैया खाय बढ़ायो गैया तउ न अघाई ॥ ४ ॥
ई सातौ जे कहिआये छःचक्र औ सातौ सहस्रार जहां ब्रह्मज्योतिमें जीव-
को मिलावैहै अरु सातौ आवरणजेहैं पृथ्वी अप तेज वायु आकाश अहंकार
महत्तत्त्व अथवा सातौ बार काल अरु नौ खंड जे हैं अरु चौदहौ भुवन जे हैं
सोई सबनको गैया खाइकै बड़ाइ डारचो तऊ न अघातभई अर्थात् सब
वाणीमय ठहरे ॥ ४ ॥
खूंता में राती है गैया श्वेत सींग हैं भाई ।
अवरण वरण कछू नहिं वाके भक्ष अभक्षौ खाई ॥ ५ ॥
ब्रह्मा विष्णु खोजकै आये शिव सनकादिक भाई ।
सिद्ध अनंत वहिखोज परे हैं गैया किनहुं न पाई ॥ ६ ॥
सो वह गैया खूंता जो धोखाब्रह्महै तामें राती है अर्थात् ब्रह्म माया सबलि-
तैहै । अरु वहि गैयाके सींग श्वेत हैं कहे सतोगुणी हैं सोई ब्रह्ममें बांधिबो है
औ अवरण कहे असत् औ वरण कहे सत् ई वाके कोई नहीं है अर्थात्
सत् असत्ते विलक्षणहै अथवा अवरणकहे नहीं है वरण जाके निरक्षर ब्रह्म
नाम रूपादिक नहीं है जाके औ वरणकहे अक्षर ब्रह्म जीव ईदोनों नहीं है वाकें
अर्थात् ईदोनोंतें विलक्षणहै । औ भक्ष अभक्षौ खाइहै कहे कर्म करावन लाय-
कहै सो करावैहै औ जोकर्म करावन लायक नहीं है सोऊ करावैहै । अर्थात्
विद्यारूपते शुभकर्म करावैहै सो वाको शिव सनकादिक ब्रह्मा विष्णु महेश
शब्द । ( २६७ )
अनन्त सिद्ध खोज मरे पै गैयो कोऊ न खोजे पायो कि, सत् है कि, असत् है
तात्पर्यऊ न जाने ॥ ५ ॥ ६ ॥
कहै कबीर सुनो हो संतो जो या पद अर्थाई ।
जो या पदको गाइ विचरि हे आगे ह्वै तरिजाइ ॥ ७ ॥
श्री कबीरजी कहै हैं कि, हे संतो ! सुनौ जो यह पदको अर्थ है कहै अर्थ
विचारि है औ जौन पद हम वर्णन करिआये सब ब्रह्माण्ड सत्तावरण आदिदै कै
जे पद हैं कहै स्थान तिनको जोकोई गाइ कहै मायाको रूपही विचारैगो कि
यहां भरतो मायाही है सो मायाके आगे हैकै साहबको लोक विचारैगो सोई
तरैगो ॥ ७ ॥
इति अट्ठाईसवां शब्द समाप्त ।
अथ उन्तीसवां शब्द ॥ २९ ॥
भाई रे नयन रसिक जो जागै ।
परब्रह्म अविगत अविनाशी कैसेहु कै मन लागै ॥ १ ॥
अमलीलोग खुमारी तृष्णा कतहुं सँतोष न पावै ।
काम क्रोध दोनों मतवाले माया भरिभरि प्यावै ॥ २ ॥
ब्रह्म कलारचढ़ाइन भाठी लै इन्द्री रस चाखै ।
सँगहि पोच ह्वै ज्ञान पुकारै चतुर होइ सो नाखै ॥ ३ ॥
संकट सोच पोच या कलिमें बहुतक व्याधि शरीरा ।
जहँवां धीरगंभीर अतिनिर्मल तहँउठि मिलहु कबीरा ॥४॥
यहां अब मायाकेपरे जे साहबहैं तिनको बतावैं हैं ।
भाई रे नयन रसिक जो जागै ।
परब्रह्म अविगत अविनाशी कैसेकै मन लागै ॥ १ ॥
( २६८ ) बीजक कबीरदास ।
हे भाइउ ! नयन रसिकजौहै संसारी चर्म चक्षुते भिन्नभिन्नदेखि विषयरस
लेनवारो सो जो जागै कहे मुमुक्षुहोइ तौ ब्रह्मके पार औ अबिगत कहे बिगत
नहीं सर्वत्र पूर्ण औ अबिनाशी कहे जाको नाश कबहूं नहीं होईहै ऐसे जे
परम परपुरुष श्रीरामचन्द्र हैं तिनमें कैसेकै मन लागै जो कैसेहुके पाठहोय तौ
यह अर्थ है जो कैसेहुकै मन लगबो करै तौ बीचमें बहुत अवरोधहैं ॥ १ ॥
अमली लोग खुमारी तृष्णा कतहुँ सँतोष न पावै ।
काम क्रोध दोनों मतवाले माया भरिभरि प्यावै ॥ २ ॥
सबलोग अमली हैं विषय छांड़्यो पैतृष्णाकी खुमारी लगी है अरु कहूं
संतोषको नहीं पावै है । फिरि काम मत जो कोकशास्त्रादिक क्रोधमत जो
मुद्राराक्षसादि ग्रन्थनमें प्रतिपाद्य जे मतहै तेई प्यालाहैं तिनको काम क्रोध रूप
जो मद सो माया भरिभरि उन को पिआवै है ॥ २ ॥
ब्रह्मकलार चढ़ाइनि भाठी लैइन्द्री रसचाखै ।
सँगहि पोच होइ ज्ञान पुकारै चतुर होइ सो नाखै॥३॥
प्रथम तों काम क्रोधादिकनते जागन नहीं पावैहै जो कदाचित् जाग्यो तों ब्रह्म
जो कलारहै जे अहंब्रह्म बुद्धि करै है गुरुवालोग जे भाटी चढ़ाइन ज्ञान सिखवै
लगे कि तुहीं ब्रह्महै ताहीं में इन्द्रिनको लैकरिकै अहंब्रह्मास्मिको रसचाखन
लग्यो अर्थात् ब्रह्मानंदको अनुभव करनलग्यो जो मदपियै है ताको ज्ञान भूलि
जायहै यहै कहैहै कि मैंहीं मालिकहौं सो जो गुरुवालोगन को संगकियो ब्रह्मानंद
पानकियो सो मैं साहबकोहौं यहअङ्ग भूलिगई वही गुरुवा लोगनको ज्ञानदियो
पुकारन लग्यो कि मैंहीं ब्रह्महौं।परं जो चतुराहाइ सो बिघननको नाकि जाइहै॥ ३॥
संकट सोच पोच या कलिमें बहुतक व्याधि शरीरा ।
जहँवां धीर गँभीर अति निर्मल तहँ उठि मिलहु कबीरा ॥४॥
पोचकहे अज्ञानी जे जीवहैं तिनको यहि कलिमें कहे माया ब्रह्मकें झग-
ड़ामें बहुतसंकट शोच औ व्याधिशरीर को है सोजहां अति धीर है कहे चला-
यमान नहीं है निश्चलपद है औ गंभीर कहे गहिरहै औ निर्मल कहे माया
शब्द । ( २६९ )
ब्रह्मको लेश नहीं है सो हे कबीर ! कायाके बीर जीवो ! मायाब्रह्मके तुम परे
हौ तहांते उठिकै कहै मायाब्रह्मके विघ्नन्ते निकसिकै साहबको मिलौ तबहीं
तिहारों जनन मरण छूटैगो ॥ ४ ॥
इतिउन्तसीवां शब्द समाप्त ।
अथ तीसवां शब्द ॥ ३० ॥
भाई रे!दुइ जगदीश कहांते आये कहु कौने भरमाया ।
अल्लाः राम करीम केशव हरि हजरत नाम धराया ॥ १ ॥
गहना एक कनक ते गहना तामें भाव न दूजा ।
कहन सुननको दुइ करि थापे यक निमाज यक पूजा ॥२॥
वही महादेव वही महम्मद ब्रह्मा आदम कहिये ।
कोइ हिंदू कोइ तुरुक कहावै एक ज़िमीं पर रहिये ॥ ३ ॥
वद किताब पढ़ें वे खुतवा वे मोलना वे पांडे ।
विगत विगतकै नाम घरायो यक माटी के भांड़े ॥ ४ ॥
कह कबीर वे दूनौं भूले रामहिं किनहुं न पाया ।
वे खसिया वे गाय कटावैं वादै जन्म गँवाया ॥ ५ ॥
अब यहां यह वर्णन करै हैं कि दूसरो जगदीश नहीं है परमपरपुरुष जे
श्रीरामचन्द्रहैं तेई जगदीशहैं ॥
भाई रे ! दुइ जगदीश कहांते आये कहु कौने भरमाया ।
अल्लाः राम करीम केशव हरि हजरत नाम धराया ॥ १ ॥
गहना एक कनकते गहना तामें भाव न दूजा ।
कहन सुननको दुइकरि थापे यकनेवाज यकपूजा ॥ २ ॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि, हे भाइउ ! दुइजगदीश कहांते आये तोको कौनै
भरमायो है । अल्ला राम करीम केशव हरि हजरत ये तौ सब नामभेद हैं
( २७० ) बीजक कबीरदास ।
कहत तो एकही को हैं ॥१॥ जैसे एक गहना को सुवर्ण ते गहना कहे गहिलेई
कहे सुवर्ण बिचारिलेइ तामें भाव दूजा नहीं है वह सुवर्ण है जैसे कोई चूड़ा कोई
बिजायत इत्यादिक नाम कहै हैं परन्तु है सुवर्णही तैसे कहिबे सुनिबेको दुइ करि
थाप्यो ह यक निमाज़ यक पूजा परन्तु है सब साहबकी बंदगीही परम परपुरुष
श्रीरामचन्द्रही को सेवै हैं ॥ २ ॥
वही महादेव वही महम्मद ब्रह्मा आदम कहिये ।
कोइ हिंदू कोइ तुरुक कहावै एक जिमीं पर रहिये ॥ ३ ॥
वोही परम परपुरुष श्रीरामचन्द्रको महादेव औ महम्मद औ ब्रह्मा औ
आदम सब कहिये कहे कहतभये कोई राम कहिकै कोई अल्लाह कहिकै
कुरानमें लिखै है कि सब नामनमें अल्लाहनाम ऊपर है औ यहां वेदपुराण में
लिखै है कि सबनामनमें रामनाम ऊपरहै तामें प्रमाण ॥ “ सर्वेषामपिमंत्राणांरा-
ममंत्रफलाधिकम् ” ॥ इति ॥ “ सहस्रनामतत्तुल्यंरामनमावरानने ” ॥ यातै
सबके मालिक परम पुरुष श्रीरामचन्द्रही जगदीशहैं दूसरो जगदीश नहीं है । उन
हींके अल्लाहनामको सब नामनते परे महम्मद कुरानमें लिख्योह औ उनहीं नाम
को महादेवने तंत्रमें लिख्योहं औ ब्रह्मा वेदमें कहतभये आदम किताबमें कहत-
भये अरु इहांतो एक जे परमपुरुष श्रीरामचन्द्रहैं तिनहीं के जिमींमें कहे जगतमें
रहत भये । नामके भेदते कोई हिन्दू कोई मुसलमान कहावै है ॥ ३ ॥
वेद किताब पढ़ें वे खुतुबा वे मोलना वे पांड़े ।
विगत विगतके नाम धरायो यक माटी के भाँड़े ॥ ४ ॥
जिनके पोथी जमा होयहैं ते कहावैं खुतुबा वे वेदपुराण जमा कैकै पढैहैं वे
किताब जमाकैकै पढै हैं वे पंडितकहावै हैं वे मोलना कहावै हैं वेद पढ़िकै पंडित
किताब पढ़िकै मोलना कहावैं विगत विगत कहैं जुदा जुदा नाम धराय लेते
भये हैं एकई माटीकेभांड़े कहै हैं सब पांचभौतिकही हैं ॥ ४ ॥
कह कबीर वे दूनौं भूले रामहिं किनहुं न पाया ।
वे खसिया वे गाय कटावैं बादै जन्म गँवाया ॥ ५ ॥
शब्द । ( २७१ )
श्रीकबीरजी कहैहैं कि हिंदूतो बोकरा मारिके मुसल्मान गायमारिकें नानाप्र-
कारके वाद विवाद करिके अथवा बादिकहे वृथाही दोऊ भूलिके जन्म गँवाइ
दियो परमपुरुष पर जे श्रीरामचन्द्र तिनको न पावत भये हिन्दू तुरुककें खुद-
खाविंद एकई है कोई विरले जानैहैं ते वहां पहुंचे तामें प्रमाण झूलना ॥
“छोड़ि नासूतमलकूत जबरूत लाहूत हाहूत बाजी । और साहूतराहूत इहांडा-
रिदेकूद आहूत जाहूत जाजी ॥ जायजाहूतमें खुदखाविंद जहँ वही मक़ान-
साकेत साजी । कहै कबीरह्वां भिस्त दोजख थके वेदकीताबकाहूतकाजी”॥५॥
इति तीसवां शब्दसमाप्त ।
अथ इकतीसवां शब्द ॥३१॥
हंसा संशय छुरी कुहिया । गैया पियै बछरुवै दुहिया १
घरघर सावज खेलै अहेरा पारथ वोटा लेई ।
पानी माहिं तलफिग भूभुरि धूरि हिलोरा देई ॥ २ ॥
धरती वरसै वादल भीगै भीटभया पैराऊ ।
हंस उड़ाने ताल सुखाने चहले बीधा पाऊ ॥ ३ ॥
जौ लगि कर डोलै पगु चलई तौ लगि आश न कीजै ।
कह कबीर जेहि चलत न दीखै तासुवचन का लीजै॥४॥
हंसा संशय छुरी कुहिया । गैया पियै बछरुवै दुहिया १
घरघर सावज खेलै अहेरा पारथ वोटा लेई ।
पानी माहिं तलफिंगै भूभुरि धूरि हिलोरा देई ॥ २ ॥
कबीरजी कहै हैं कि हे हंसा! संशयरूप छूरिते मारिगयो तोको उलटों ज्ञान
है गयो । बछरुवा जो है तेरोस्वरूप औरं ज्ञानरूप जो है दूध ताको गैया जो
माया सो दुहिकै पीलियो ॥ १ ॥ सावज जो या मनहै सो घरघरमें कहे शरीर
Here is the accurate transcription of the page into Devanagari text, with line-by-line markers preserved:
( २७२ ) बीजक कबीरदास ।
शरीरमें शिकारखेलैहै । पारथ कहे शिकारी जो तैं सो बोटालइहै अर्थात् नाना
उपासना नानाज्ञान करत फिरै है पै मन तोको नहीं छोड़ै है । साउज ते नहीं
बचैहै। वाणी रूप जो है पानी नानाशास्त्र तौनेमें( भूभुरि जोसूर्य्यनके तापते तपेत
भूमि होयहै सोभूभुरि कहावै है; ऐसे संसार तापते तपितजो)तेरा अंतःकरण सो
तलफिगयो अर्थात् अधिकअधिक शङ्का होतभई तिनते अधिकतप्त भयो शीतल न
भयो काहेते कि, धूरि जो सूखा ब्रह्मज्ञान सो हिलोरा देनलग्यो कहेशारूत्रनमें वही
धोखा ब्रह्मही देखपरन लग्यो । शास्त्रनको तात्पर्य्य साहब तिनको न जान्यो॥२॥
धरती बर्षै बादल भीजै भीट भया पैराऊ ।
हंस उड़ाने ताल सुखाने चहले बीधा पाऊ ॥ ३ ॥
बुद्धिजोहै सो धरती है काहेते सब मतनको आधारयहीहै बाणीरूप पानी
बरसै है कहे नानामटनको निश्चय कैकै प्रकट करै है । अरु यह बाणी
जीवनही ते प्रथम निकसी है सो जीव बादल है सो भीजै कहे वोई मतनको
ग्रहणकियो । यह लोकोक्तिहै किं, फलाने फलानेमें भीजिरहे हैं कहे आसक्त
द्वैरहे हैं। भीट चारो वेदहैं मर्यादाते पैराउह्वैगये कहे उनकी थाह कोई न
पावतभयो अर्थात् तात्पर्य्य कारिकै जोपरमपुरुष श्रीरामचन्द्रको वर्णनकरेहै सोकोई
न पावतभयो । ताल सूखे हंस उड़ैहै यहां हंसउड़े तालसूखे हैं जब हंस उड़ो कहैं
यहजीव निकसिगयो तबताल जोशरीरहै सोसूखि गयो । तब बासना जेहैं तेई
चहला हैं तिनमें पाँउ बँधिरह्यो । जैसे तलाउ जबसूखेउ औ पुनिचौमासेमें
जब जल बरसयो तब जस को तस द्वैगयो, तैसे बासनामें पाँउफँसिरह्योहै दूसर
शरीर जब पायो तब फिर वही शरीरमें तलाउमें हंसजीव बूडन उतरान
लग्यो है । सो भाव यह कि, उड़नको तो करै है पर शरीर तालते अंतै नहीं
जाइ सकैहै कोई योनियैमें रहै है ॥ ३ ॥
जौलखि करडोलै पगचलई तौलखि आश न कीजै ।
कह कबीर जेहि चलत न दीखै तासु वचन का लीजै॥४॥
जबलग पाँउ चलैहै करडोलै है कहे शरीर बनोहै तबलगि गुरुवालोगनकी
आश न करिये जो आश करोगे तो याहीभांति बँधि रहैगो । सो कबीरजी कहैं
हैं जे गुरुवा लोग नाना पदार्थनमें आश लगाइ देइहैं तिनहींते नहीं चलत
बनै है तौ तिनको कह्यो वचन कैसे कीजिये कहे कैसे मानिये ? अर्थात् उनके
यहां न जाइये काहेते कि, वे साहबको भुलाइकै और में लगाइ देंगे । संसार
ही में फँसो रहैगो यामें धुनि यहहै कि, जे संसारते छूटेहैं रामोपासकहैं तिनहीं
को बचन मानिये तिनहीं के यहां जाइये ॥ ४ ॥
इति इकतीसवां शब्द समाप्त ।
अथ बत्तीसवां शब्द ॥ ३२ ॥
हंसाहो ! चित चेतु सबेरा।इन्ह परपंच करल बहुतेरा ॥१॥
पाखंड रूप रच्यो इन्ह तिरगुण यहि पाखंड भूल संसारा ।
घरको खसम बधिक भो राजा परजा काधौं करै बिचारा॥२॥
भक्ति न जानै भक्त कहावै तजि अमृत विष कैलिय सारा।
आगे बड़े ऐसही भूले तिनहुं न मानल कहा हमारा ॥३॥
कहल हमार गांठी बांधो निशि वासर हि होहु हुशियारा ।
ये कलिके गुरु बड़ परपंची डारि ठगौरी सब जग मारा॥४॥
वेद किताव दोय फंद पसारा ते फंदे पर आप बिचारा ।
कह कबीर ते हंस न बिछुड़े जेहिमैं मिल्यो छोड़ावनहारा ५
हंसाहो चितचेतु सवेरा । इन्ह परपंच करल बहुतेरा ॥१॥
पाखंडरूप रच्यो इन्ह तिरगुण तेहि पाखंड भूल संसारा ।
घरको खसम बधिक भो राजा परजा काधौं करै बिचारा २
हे हंसा जीवौ ! सबेरेते कहे तबहीँते चित्तमें चेतकरौ । सबेरेते कह्योँ
ताको भाव यहहै कि, जब काल नियराइ आवैगो तब कछू न करत बनैगो
तिहारे फांसिबेको यह माया बहुत परपंच कियो है ॥ १ ॥ पहिले पाखंड-
१८
( २७४ ) बीजक कबीरदास ।
रूप जो वह धोखाब्रह्म है ताको रच्यो तामें मिलिकै तिरगुण जे सत रज तम
हैं तिनको तिहारे फांसिबेको प्रकट कियो । सो तीनों गुणाभिमानी जे तीनों
देवता हैं अरु पाखंडरूप जो धोखा ब्रह्म है तामें सब भूलिगये । घरको
खसम जब स्त्रीको बधिक कहे दुःख देन लाग्यो मारन लाग्यो तब स्त्री कहा
करै । तैसे जो राजा प्रजाको बधिक कहे मारन लाग्यो दुःख देन लाग्यो तब
बिचारे प्रजा कहा करें । सो यह मनतो सबको मालिक ह्वै रह्योहै सो यही
ने सबको दुःख देन लाग्यो तौ जीव कहाकरै ॥ २ ॥
भक्ति न जानै भक्त कहावै तजि अमृत बिष कैलिय सारा।
आगे बड़े ऐसही भूले तिनहुं न मानल कहा हमारा ॥ ३ ॥
भक्तिको तो जानै नहीं हैं भक्त कहावै हैं । अमृत जो है परमपर पुरुष
श्रीरामचन्द्रकी भक्ति ताको छोड़िकै विष जो है और और की भक्ति ताको
सारमानि लियोहै सो आगे जे बड़ेबड़े ह्वैगये हैं तेऊ ऐसेही भूलिगये हमारो
कह्यो नहीं मान्यो साहबकी भक्ति छोड़िकै और की भक्ति करिकै संसारही
में परतभये ॥ ३ ॥
कहल हमारा गांठी बँधो निशि वासरहि होहु हुशियारा ।
ये कलिके गुरु बड़ परपंची डारि ठगौरी सब जग मारा ४
सो हमारो कहो गांठीबांधो । जो अबहूं हमारो कह्यो न मानौगे साहबकी
भक्ति न करोगे तौ संसारही में परौगे । कलियुगके जे गुरुवा हैं ते बड़े पर-
पंची हैं सब जगका ठगौरी कहे ठगिकै परमपुरुष पर जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनकी
भक्तिको छोड़ाइकौ और और मतनमें डारिदेइहैं । सो निशिबासर हुशियार रहो
अर्थात् निशिबासर रामनामको स्मरण करतरहो साहबको जानतरहो गुरुवा
लोगनको कहा न मानो ॥ ४ ॥
वेद किताव दोय फंद पसारा ते फंदे पर आप विचारा ।
कह कबीर ते हंस न विछुरे जेहि मैं मिलो छोड़ावन हारा ५॥
वोई जे गुरुवालोगहैं तेये वेद किताबको फंदा पसारि कै नाना मत में गुरुआई
करतभये । सो वहींफंदमें आप परतभये औ औरहू को वहींफंदमें डारिकै नानाम-
शब्द । ( २७५ )
तनमें लगाय देने भये । वेद किताबको तात्पर्य न जानतभये । सो कबीरजी
कहैंहैं कि, जौने जीवको मैं फंदते छोड़ायनहार मिल्योहों औ परमपुरुषमें लगाइ
दियो ते आजलौं नहीं विछुरे न बिछुरैंगा। सो तुम्हहूं पारिखकरिके मेरोकह्यो मानिकै
हे हंसजीवो! तुम्हहूं फंद छोड़ि परमपुरुष परजेश्रीरामचन्द्र हैं तिनमें लगौ ॥५॥
इति बत्तीसवां शब्द समाप्त ।
अथ तेंतीसवां शब्द ॥ ३३ ॥
हंसा प्यारे सरवर तेजे जाय ।
जेहि सरवर विच मोतिया चुनते बहु विधि केलि कराय १
सूखे ताल पुरइनि जल छोड़े कमल गयो कुंभिलाइ ।
कह कबीर जो अबकी विछुरै बहुरि मिलै कब आइ॥ २ ॥
हे प्यारे हंस ! सरवर जो शरीरहै ता तेजे जाय कहे जिनके शरीर छूटि-
जायहैं । जौने सरवर शरीरको प्राप्तहोइकै मोतिया चुनै हैं कहे ज्ञान योगादिक
साधन करिकै मुक्तिकी चाहकरै हैं औ बहु विधिकी केलि करै है । जो त्याजे
पाठहोय तौ या अर्थ है । हे हंसाजीव ! प्यारो जो सरवर शरीर ताकोत्यागे
जायहै जौन सरवर शरीरमें नाना देवतनकी उपासनारूप मोती चुने नाना
विषयनको भोग कीन्हे सो छोड़ेजायहै ॥ १ ॥ सोशरीररूपी ताल जब सूख्यो
कहे रोग करिके ग्रस्तभयो तब पुरइनि जल छोड़ि दियो अर्थात् वह ज्ञान
बुद्धि तुम्हारे न रहिगयो । अरु अनुभव तो तुमकरतहो सोई कमलहै सोकुं-
भिलाइगयो अर्थात् भूलिगयो सो कबीरजी कहैं कि, यहि तरहते जो अबकी
बिछुरै कहे शरीर छूटिजाय तब पुनि कबै ऐसो शरीर पावैगो । चौरासीलाख
योनि भटकेगो तब फेरि कबहूं जैसे तैसे मिलैगो शरीर छूटे ज्ञान योगादिक साधन
भूलिजाय हैं । तेहिते मानुष शरीर पायकै साहबको जानै । वह शरीरहू छूटे
नहीं भूलै है काहेते कि साहबही अपनो ज्ञान देइहै औ हंसस्वरूप देइहै ॥ २ ॥
इति तेंतीसवां शब्दसमाप्त ।
(२७६) बीजक कबीरदास ।
अथ चौंतीसवां शब्द ॥ ३४ ॥
हरिजन हंस दशा लिये डोलैं।निर्मल नाम चुनी चुनि बोलैं १
मुक्ताहल लिये चोंच लोभावै।मौन रहै की हरि गुण गावै॥२॥
मान सरोवर तटके वासी।राम चरण चित अंत उदासी ॥३॥
काग कुबुद्धि निकट नहिं आवै।प्रति दिन हंसा दर्शन पावै४॥
नीर क्षीरको करै निवेश।कह कबीर सोई जन मेरा ॥ ५ ॥
जे साहबको नहीं जाने हैं तिनको कहिआये अब जे साहबको जानै तिनकी
दशा कहैं ॥
हरि जन हंस दशा लिये डोलैं।निर्मल नाम चुनीचुनी बोलैं १
हरिजे.परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्रहैं तिनके जे जन हैं ते हंस दशा जो है
शुद्धजीव पार्षद रूपता तौनी दशाको लिये सर्वत्र डोलै हैं कहे फिरै हैं । यहां
हरि जो कह्यो ताको हेतु यह है कि, अपने भक्तनकी सिगरी बाधाहरै सोहरि
कहावै है । सो परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्र उनकी सिगरी बाधा हरिलेइहैं तब
तिनके जन सुख पूर्वक संसारमें फिरै हैं, उनको संसार स्पर्श नहीं करै है ।
अरु जो नाम माया सवलित है तिनको छोड़िदेइहै औ निर्मल जो नाम राम
नामहै मन बचनके परे अमायिक ताको चुनिचुनि कहे साहब मुख अर्थ ग्रहण
करिके औ संसारमुख अर्थ छोड़िके बोलै है कहेरामनाम उच्चारण करै हैं । यहां
मनबचनके परे जो नाम है ताको कैसे बोलै है ऐसो जो कहो तो ये हंस दशा-
लिये डोलै है कहे जब शुद्ध जीव रहिजाय है तब साहब अपनी इन्द्रिय देइहैं
तिनते तौने नामको बोले है। जैसे सूमा जरिजायहै तब वाकी ऐंठनभर रहिजा-
इहै । तैसे यहशरीरकी आकृतिमात्र रहि जाइहै वह पार्षदही शरीरमें स्थितरहैहै
जब शुद्ध शरीर है जाइहै तब आपनो पार्षदरूप पावैहै यह आगे लिखि आये हैं॥ १॥
मुक्ताहललिये चोंचलोभावै । मौनरहै की हरिगुणगावै॥२॥
हंस मुक्ताहल चोंच में लिये बचनको लोभावै है जौन मांगै है ताके मुंहमें
डारिदेइहै । ऐसे साधुन्के मुखमें पांचमुक्तिहैं १ सामीप्य २ सारूप्य ३
शब्द । ( २७७ )
सायुज्य ४ सालोक्य ५ साष्टर्च तिनते जीवको लोभावै है कहे संब यह जाने है
कि इनहींकी देई दैजाइहै । जो जौनमुक्तिकी चाहकरिकै उनके समीप जाइहै ।
ताको श्रीरामनामके उपदेश करिकै तौन भाव बताइकै मुक्ति देइहैं । औ
आर मौनही रहै है कि, साहबके गुणगाइकै छके रहै हैं ॥ २ ॥
मान सरोवर तटके वासी।राम चरण चित अंत उदासी॥३॥
हंस जेहैं ते मानसरोवरके तटकेवासी हैं अरु वे साधुकैसे हैं कि मनरूपी जो
सरोवरहै ताके तटके वासीहैं कहे मनते भिन्न ह्वै रहैहै जामें हंसकी दशा है साह-
बकी दीन ऐसोजो चित्मात्रआपनो स्वरूपहै ताको परमपुरुष श्रीरामचन्द्रहैं
तिनहींके चरणनमें लगाइ राखैहैं अरुअंत उदासी कहे जो वह धोखा ब्रह्ममें अहं
ब्रह्मास्मि मानिकै आत्माको अंत ह्वै जाइहै आपै ब्रह्म मानिलेइहै वहजो है आत्मा
के अंत ह्वैबेको मन धोखा तेहित
( २७८ ) बीजक कबीरदास ।
अथ पैंतीसवां शब्द ॥ ३५ ॥
हरि मोरपीवमैंरामकीबहुरिया।राममोरबड़ामैंतनकीलहुरिया १
हरिमोररहँटामैरतनपिउरिया।हरिकोनामलैकातलबहुरिया २
छःमासतागवर्षदिनकुकुरी।लोगबोलेभलकातलबपुरी॥३॥
कहै कबीर सूत भल काता।रहँटा न होय मुक्तिको दाता॥४॥
हरि मोरपीवमैंरामकीबहुरिया।राममोरबड़ामैंतनकीलहुरिया १
मोर पीव हरि है । पीव कहे वे मोको प्यारहैं मैं उनकोऊ प्यार हैं ।
अरुमैं परमपुरुषपर श्रीरामचन्द्र की बहुरिया कहे नारी हौं । यहां नारी कह्यो
सो यह जीव साहबकी चितंशक्ति है तामें प्रमाण कबीरजीके आदि टकसार
ग्रन्थ को ॥ “आतम शक्ति सुबश है नारी । अमर पुरुष जेहि रची धमारी
॥ १ ॥ दूसरो प्रमाण सायर बीजकको ॥ “ दुलहिनि गाऊ मंगलचार ।
हमारे घर आये राम भतार ॥ तनरति करि मैं मनरति करिहौं पांचो तत्व
बराती । राम देव मोरे ब्याहन ऐहें मैं यौवन मद माती ॥ सरिर सरोवर
बेदी करिहौं ब्रह्मा वेद उचारा।राम देव संग भांवरि लेहौं धन २ भाग हमारा ॥
सुर तेंतीसौ कौतुक आये मुनिवर सहस अठाशी । कह कबीर हम ब्याह
चले हैं पुरुष एक अबिनाशी ॥ २ ॥ अरु श्रीरघुनाथजी मोरबड़ेहैं अरु मैं
तनकी लंहुरियाहौं, कहे उनके शरीर सर्वत्र व्यापक बिभुहैं औ मैं अणुहौं
तामें प्रमाण ॥ अणुमात्रोप्ययंजीवःस्वदेहंव्याप्यतिष्ठति । इतिस्मृतिः ॥ १ ॥
हरिमोररहँटामैरतनपिउरिया।हरिकोनामलैकातलबहुरिया
अरु हरिजै परमपुरुष श्रीरामचन्द्र हैं ते मोर रहँटा कहे चित् अचित्तरूपतें
जगतबोई हैं । अरुमैं रतनपिउरियाहौं यह जगत् जीवंही के वास्ते बन्योहै॥
“जीव सूत ह्वैकै लपटि रहै हैं । मैं रतनकी पिउरियाहौं तामे मैं नहीं लपटौहौं।
हरिजे श्रीरामचन्द्रहैं तिनको नाम लैके बहुरिया कहे उलटिकै मैं कात्यो अर्थात्
जगत्को जगद्रूप करिकैनहीं देख्यो जगत्को चित् अचितरूप करिकै देख्यो है
रामनाममें बहुरिकै साहब मुखअर्थ देख्यो जगत् मुखअर्थ नहीं ग्रहणकियो ॥२॥
शब्द । ( २७९ )
छः मासतागवर्षदिनकुकुरी। लोग कहल भलकातलवपुरी ३
छः महीनामें एक ताग कात्यो, छःमहीनामें एक ताग और कात्यो तब
वर्षदिनमा एक कुकुरीभै दोनों ताग मिलायकै । अर्थात् छः महीनामें अपनौ
स्वरूप समुझ्यो कि, मैं साहबकी नारीहौं औ छः महीनामें मैं साहबको
स्वरूप समुझ्यो । वर्षदिनमें साहबको मिल्यो सो मैंतो इतनीदेर करिकै मिल्यो
साहब तो हजूरहरि हैं ताहूमें लोग कहै हैं कि, वपुरी भलकात्यो जो अनंत-
कोटि जन्मते नहींजानैहै सोसाहबको वपु आपनो वपु वर्षै दिनमें समुझ्यो ॥३॥
कहै कबीर सूत भल काता । रहँटा न होय मुक्तिको दाता ॥४॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि, जौने रहँटा जगतते सूत भल कात्यो है । कतवैया
कबीरजीको विवेकहै सो रहँटा न होय यह मुक्तिको दाताहै, काहेते कि, जब
शुद्ध आत्मा रह्योहै याको परमपुरुष श्रीरामचन्द्रहैं न तिनको ज्ञानरह्यो औ न
संसारको ज्ञानरह्यो यह शुद्धरूप भरो रह्यो है तामें प्रमाण ॥ “नित्यः
सर्वगतस्थाणुरचलोयं सनातनः” ॥ इतिगीतायाम् ॥ जब यह याके मन भयो
तब संसारको कात्योहै औ संसारमें परिकै दुःख सुख भोग कियो है । औ
जब पूरागुरु मिल्योहै तब परमपुरुष जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनको पाइकै संसारते
छूटिगयोहै औ पुनि संसारमें नहींआयो । सो कबीरजी कहै हैं कि यह रहँटा
कहे संसार न होय मुक्तिको दाताहै जो संसार बुद्धि करिकै देखैहै सो संसारमें
रहै है औजो संसारको साहबको चित अचितरूप करिकै देखैहै ताको मुक्तिही
देइहैं या संसारमें आये मुक्त भयोहै ॥ ४ ॥
इति पैंतीसवां शब्द समाप्त ।
अथ छत्तीसवां शब्द ॥ ३६ ॥
हरि ठग जगत ठगौरी लाई। हरि वियोग कस जियहु रे भाई १
कोकाकोपुरुषकौनकाकीनारी।अकथकथायमजालपसारी २
को काको पुत्र कौन काको बापा । कोरे मरै को सहै संतापा ३
( २८० ) बीजक कबीरदास ।
ठगि ठगि मूल सबनको लीन्हा। राम ठगौरी विरलै चीन्हा ४
कह कबीर ठगसो मन माना। गई ठगौरी ठग पहिचाना॥५॥
हरिठगजगतठगौरीलाई । हरिवियोगकसजियहु रेभाई॥१॥
हरिठग कहे हरिरूप द्रव्यके चोरावरनहारे गुरुवालोगते जगत् में ठगौरी
लगाइकै कहे उपदेश करिकै जीवको ठगि लेइहैं और और में लगाइकै सो
हेजीवो ! हरिके वियोगते तुम कैसे जिऔहौ ॥ १ ॥
कोकाकोपुरुषकौनकाकीनारी। अकथकथायमजालपसारी ॥
कोकाकोपुत्रकौनकाकोबापा। कोरेमरै कोसहैं संतापा॥२॥
यहसंसारमें जबसांचे साहबको भूल्यो तबको काको पुरुषहैको किसकी नारी हे
अकथकथा कहे कहिवेलायक नहीं है काहेते कि जिनकी उपासना करै हैं आपन
स्वामीमानैहैं तिनके स्वामी कबहूंहोयहै वोई याकी नारीहोयहै दासहोइहै
शब्द । ( २८१ )
अथ सतीसवाँ शब्द ॥ ३७ ॥
हरिठगठगत सकलजगडोला।गवनकरतमोसोंमुखहुनबोला
बालापनके मीत हमारे । हमें छोड़ि कहँ चले सकारे॥२॥
तुम अस पुरुष हौं नारि तुम्हारी।तुम्हारि चाल पाहनहुँते भारी
माटिक देह पवनको शरीरा।हरि ठग ठगतसोडर ल कबीरा४
हरिठगठगतसकलजगडोला।गवनकरतमोसोंमुखहुनबोला १
जीव कहे हैं कि, हरिको ठग जो गुरुवाहै सो ठगहारी करिकै सब जीवन
को ठगतकहैं हरिते विमुख करत जगडोलाकहे संसारमें फिरै है । अरु जब
गमनकरनलगे यम घेरिलियो तब मोसों मुखहूते न बोले कि, एतेदिन जौने
जौनमें लगेरहे ब्रह्ममें अथवा जीवात्मामें ते न बचायो । यह खबरिकहि समु-
झाय न दियो कि, हम को धोखा हैगयो तुमहूं धोखामें न परौ ॥ १ ॥
बालापनके मीत हमारे । हमें छोड़ि कहँ चले सकारे ॥२॥
तुमअसपुरुष हौं नारितुम्हारी।तुम्हारी चालपाहनहुँतेभारी
सो तुम बालापनके हमारे मीतहौ जबभर रह्यो जियो तबभर हमको धोखाही-
में लगायेरहे अब हमें छोड़िकै सकारे कहे हमहींते आगे कहांजाहुगे काहेते
कि, तुमतो काहू को रक्षक मान्यो नहीं वही धोखामें लगेरहे, आपही को
मालिक मानेरहे, अब तुम्हारी रक्षा कौन करै ? सो जब तुम्हारी कोई न कियो
यम लैहीगये तौ जौन ज्ञान हमको दियो है तौनेते हमारी रक्षाकौन करैगो॥२॥
तुम ऐसो हमारे पुरुषहै तुम्हारी हम नारी हैं काहेते कि, बीजमंत्र हम को
उपदेश दियो है सो तुम्हारी चाल पाहनौते भारी है कहे पाहनौ ते जड़ है तेहिते
साहबको भुलाइदियो ॥ ३ ॥
माटिकि देह पवनकोशरीरा।हरिठग ठगतसोडरलकबीरा४
माटीकी यह देह है सो स्थूल शरीर नाशवानहै औ पवनको शरीर सूक्ष्म
शरीर है सो मनोमय चंचलहै ज्ञानभये वहौ नाशमानहै तामें स्थित जे कबीर कहे