कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
खि आवैनहीं करत कल्लोलबहु भाँतिपागे । कामऔक्रोध मदलोभ अभिमान
सब छाँड़िपाखंड सतशब्दलागे ॥९॥ पुरुषके बदनकी कौनमहिमाकहौं जगत्में
उपमायकछुनाहिंपाई । चन्द्रऔरसूरगणज्योतिलागैनहीं एकहीनक्खयपरकाशभाई ।
पानपरवानजिनबंशका पाइया पहुंचियापुरुषकेलोकजाई । कहैंकबीर यहिभांति
सो पाइहैं सत्यकीराह सोप्रकट गई" ॥ १० ॥ औ वहलोकको बर्णन वेदसा-
रार्थ जो सदाशिवसंहिता है ताहूमें है । श्रीसौमित्रिरुवाच " महर्लोकः क्षितेरू-
र्ध्वमेककोटिप्रमाणतः । कोटिद्वयेनविख्यातो जनलोकोव्यवस्थितः ॥ १ ॥ चतु-
ष्कोटि प्रमाणंतु तपोलोकोविराजितः । उपरिष्टात्ततः सत्यमष्टकोटिप्रमाणतः ॥२॥
आयुःप्रमाणंकौमारंकोटिशोडशसंभवम् । तदूर्ध्वंपरिसंख्यातमुमालोकंसुनिष्ठतम्
॥ ३ ॥ शिवलोकतदूर्ध्वंतु प्रकृत्याच समागतम् । विश्वस्यपुरतोवृत्तिः शिव-
स्यपुरतोबहिः ॥ ४ ॥ एतस्माद्वहिरावृत्तिःसप्तावरणसंज्ञका । तदूर्ध्वंसर्वत-
त्वानांकार्यकारणमानिनाम् ॥ ५ ॥ निलयं परमंदिव्यंमहावैष्णवसंज्ञकम् । शुद्ध-
स्फटिकसंकाशनित्यस्वच्छमहोदयम् ॥ ६ ॥ निरामयंनिराधारंनिरंबुधिसमा-
कुलम् । भासमानंस्ववपुषावयस्यैश्चविजृंभितम् ॥ ७ ॥ मणिस्तंभसहस्रैस्तु
निर्मितंभवनोत्तमम् । वज्रवैदूर्यमाणिक्यग्रथितंरत्नदीपकम् ॥ ८ ॥ हेमप्रासादं
मावृत्यतरवःकामजातयः । रत्नकुंडैरसंख्यातर्नरैमर्लयवासिभिः ॥ स्त्रीरत्नैःपर-
माह्लादैःसंगीतध्वनिमोदितैः । स्तुतंचसेवितंरम्यरत्नतोरणमंडितम् ॥ १० ॥
कारुण्यरूपंतन्नी रंगगायस्माद्विनिःसृता । अनंतयोजनोच्छ्रायमनंतयोजनायतम्
॥ ११ ॥ यत्रशेतेमहाविष्णुर्भगवान्जगदीश्वरः । सहस्रमूर्द्धाविश्वात्मा सहस्राक्षः
सहस्रपात् ॥ १२ ॥ यन्निमेषाज्जगत्सर्वंलयीभूतंव्यवस्थितम् । इन्द्रकोटिसहस्राणां
ब्रह्मणांचसहस्रशः ॥ १३ ॥ उद्भवंतिविनश्यंति कालज्ञानविडंबनैः । यदंशेन-
समुद्भूता ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥ १४ ॥ कार्य्यकारणसंपन्ना गुणत्रयविभावकाः ।
यत्रावर्त्ततेविश्वं यत्रचैवप्रलीयते ॥ १५ ॥ तद्वेदपरमधाममदीयं पूर्वसूचितम् ।
एतद्गुह्यसमाख्यानं ददातु वांछितंहिनः ॥ १६॥ तदूर्ध्वंतु परंदिव्यं सत्यमन्यदू-
व्यवस्थितम् । न्यासिनांयोगिनांस्थानंभगवद्भावितात्मनाम्॥१७॥ महाशंभुर्मोदितेऽ
त्रसर्वशक्तिसमन्वितः । तदूर्ध्वंतुस्वयंभातं गोलोकंप्रकृतेः परम् ॥ १८ ॥"
अरुसहस्रशीर्षपुरुष जो लिख्या है तहँ शुद्धजीव समिटे रहे हैं। वे सम-
ष्टीहैं ताके रोमरोममें अनंतकोटि ब्रह्माण्ड हैं। तहँते अनेक ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति
होइ हैं औ तहँ महाप्रलयमें लीन होइ हैं औ दूसरे सत्यलोकमें जो महा-
शम्भुको वर्णनकियो सो परमगुरुको रूपहै। तामें प्रमाण ॥ “वंदेशंभुंजगद्गुरुं”
औ गुरुसों औ साहबसों अभेदतामें प्रमाणहै ॥ “ आचार्यंमाविजानीयान्नाव-
मन्येतकर्हिचित् इतिभागवते ” औ महाशंभुसों औ महाविष्णुसों अभेदहै तामें-
प्रमाण “ शिवस्यश्रीविष्णोर्यैह गुणनामादिसकलं धिया भिन्नंपश्येत् स ख-
ल्हरिनामाहितकरः ॥ इति स्कंदपुराणे ॥ ” औ नारायण जे वर्णन करिआयें
तेऊ श्रीरामचन्द्रईके रूपहैं तामे प्रमाण ॥ सदाशिवसंहितायाम् ॥ “ वासुदेवो
घनीभूतं तनुतेजो महाशिवः ॥ ” औ गोलोकमें श्रीकृष्णरूपते रघुनाथजी
विहारकरैं औ गोलोकके मध्यसाकेतमें रामरूपते रघुनाथजी विहारकरैं हैं
तामेंप्रमाण सदाशिवसंहिताके बिस्तारते वर्णन करिआये कि, पश्चिमद्वार वृन्दावन
है, उत्तरद्वार जनकपुर है, पूर्वद्वार आनंदबन है, दक्षिणद्वार चित्रकूट है ताके-
आगे यहलोक है तेहिते इहां प्रयोजनमात्र लिख्यो है ॥ “ तेषांमध्ये पुरंदिव्यं
साकेतमितिसंज्ञकम् इति ॥ ” औ साकेत ऊपर कछु नहीं है औ साकेत औ
अयोध्या सत्यासत्य लोक इत्यादिक नाम सब वही लोकके पर्यायहैं तामेंप्रमाण॥
“साकेतान्परंकिंचित्तेदवहिपरात्परम् ॥ ” औ गोलोकजे श्रीकृष्णचन्द्र हैं तेईश्री
रामचन्द्रईके महत॥“सीतारामात्मकं युग्मंमाविशन्प्रतिपूर्वकम् ॥ १॥” श्रीजानकीजी
श्रीरघुनाथजीसों कह्यो कि, वृन्दावनको बिहार करिये, तब रघुनाथजी कह्यो जब
तुम कह्यो तैं एक दूसरा बिहारस्थल बनाइये तब हम वृन्दावन बनायो, राधि-
का तुमभई कृष्णहमभये। सो बिहार करते भये सो हमारई, तुम्हाररूप राधाकृ-
ष्णहैं । या कहिकै आकर्षण करिकै वृन्दावन बोलाइलियो । राधाकृष्ण आइगये
तब राधिकाजी जानकीजीमें लीनभई श्रीकृष्णचंद्र रामचंद्रमें लीनभये । अरु
पुनि बिहारकियो जब बिहार करिचुके तब जानकी रघुनाथ ते निकसिकै बृन्दा
बन समेत राधाकृष्ण चलेगये गोलोकको । सो यह कथा शुकसंहितामें है ताको
एक इलोक लिख्यो है औ विस्तारसे देखिलीजयो । तेई श्रीकृष्णके नखके
प्रकाश ब्रह्म है वहीप्रकाशको मुसल्मान लामकान कहै हैं । औ जे दशमुकाम
रेखतामें कहिआये औ दश वोई मुकाम सदाशिवसंहितामें वर्णन करिआर्ये
१६
( २४२ ) बीजक कबीरदास ।
तिनमें पांच मुकाम मुसलमाननके कहै हैं औ पांचमुकाम छोड़िदेइहैं तिनकों
उनहींमें गतार्थ मानिलेइहैं । मुसलमाननमें वोई पांच मुकामके दुइनामहैं “ नासू-
तको आलम अजसामकहे शरीरधारी । ” याते यहलोकके सब आइगये औ
मलकूत को “ आलम मिसाल फिरिस्तनकै दुनियां देवलोक ” औ जबरूतको
आलम अर्थात् कहे पृथ्वी अप तेज बायु तत्त्वरूपहै “ औ लाहूतको आलम
कूर्ब कहे नूर अर्थात् श्रीकृष्णको मुख्यप्रकाशजोहै ब्रह्म वहीको कही लोकप्रकाश
लिख्योहै ” औ “ हाहूतको मुकाम महम्मदकैकहे जहांभर महम्मद पहुंचे है ”
श्रीकृष्णके लोक अब इनके मंत्रऊ लिखे हैं॥ जिकर नासूत “लाईला हइलाहू”
जिकिर मलकूत “इल्लिल्लाहू” जिकिरजबरूत “अल्ला: अल्ला:” जिकिरलाहूत
अल्लाह जिकिरहाहूत “हूंहूं” ॥ सोइनको रातिदिन पांचहज़ारबार जपकैरै ।
जब पांचहज़ारहोय तबध्यानकरै औध्यानमें गड़ै औ आपको भूलै फिरिजहानकों
भूलै पुनि जिकिरि कहे मंत्रको भूलै तब क्रमते मजकूरको पहुंचै अर्थात् अल्हा-
हीजे श्रीकृष्णचंद्र हंसस्वरूप देइँ तामें स्थित ह्वैकै जिनको प्रकाश निराकार जो हैं
ऐसेजे श्रीकृष्णहैं तिनकेपास होत उनके बताये मन बचनके परे जे खुद खाविंद
सबके बादशाह जे श्रीरामचंद्र है तिनके पास जाताहै । सो यह मत महम्म-
दजे साहबके बंदे हैं तिनको साहब भेजा । तब जे साहबके पास पहुंचनवारे रहे
तिनको महम्मद भेद बताइदियो । सो बिरले कोई कोई यह भेद जानै हैं जे जानै हैं
ते साहबके पासपहुंचै हैं । अब याको क्रम बतावैं हैं जौनी भांति साहबके पास
पहुंचै तामें प्रमाण॥पीरानपीरसाहबके पासपहुंचे ऐसेजेहैं सलोकके मालिक पनाह
अता तिनको कबित्त ॥ “देह नासूत सुरै मलकूत औ जीव जबरूतकी रूह
बखानै । अरबीमें निराकार कहै जेहि लाहुतै मानिकै मंजिल ठानै॥आगे हाहूत
लाहूत है जाहूत खुद खाविंद जाहूतमें जानै । सोई श्री रामपनाह सब जग-
नाह पनाह अता यह गानै ॥ १ ॥दोहा॥तजै कर्मनासूतलहि, निरखै तब मलकूत ।
पुनि जबरूतै छोड़िकै, दृष्टि परै लाहूत ॥ २ ॥ इन चारोंतजि आगेही, पना-
हअता हाहूत। तहां न मरै न बीछुरै, जात न तहँ यमदूत ॥३॥ औ “जुलजला-
लअव्वल” एकराम मुसलमानोंके कहै हैं किताबनमें प्रसिद्धहै साहब बुजुर्गीका
साहब बख्शीश का अर्थात् वह सबते बुजुर्गी कहे बड़ा है उससे बड़ा कोई नहीं
शब्द । (२४३)
है । औ वही गुनाहका बख्शनेवाला है औरे के छुड़ाये न छूटैगो । जब श्रीरा-
मचन्द्र जीवको छोड़ावेंगे तबहीं छूटैगो । औ खोदाके सौ नाम हैं निन्नानब
सगुणनाम हैं, औ मुक्तिको देनवारो निर्गुण अल्लाह नामही है वही खुद खाविं-
दका नाम है । तौने बात वेद शास्त्रनमें भी सिद्धान्त कियो है । कोई कोई जे
साहवके पहुंचे हैं ते बेग्रंथ जानै हैं सो लिख्यो है कि, और देवतनके नामतें
अधिक और सब नाम भगवान्के हैं औ भगवान्के सब नामते अधिक रामनाम
है । सो महादेवजी पार्वतीजी ते कह्यो है ॥ “सहस्रनामतत्तुल्यंरामनामं वरा-
नने । सप्तकोटिमहामंत्राश्चित्तविभ्रमकारकाः । एकएव परोमंत्रोरामइत्यक्षरद्व-
यम् । विष्णोरेकैकनामापि सर्ववेदाधिकंमतम् । तादृङ्नामसहस्त्रेणरामनामसमंस्मृ-
तम्” ॥ इतिपाद्मे॥ औ गोसाईंजीहू लिख्यो है। “रामसकल नामनते अधिका”॥
सो यही रामनाम तै अल्लाहनाम निकस्यो । “राम नामके
मकारको रकार भये आगेका पीछे आया तब अरभया सो अर राके पीछे आया
तब “अर राम भयो रलके अभेदसे अल्लाभयो” व्याकरण वर्णविकार वर्णकार
वर्णविपर्यय पृषोदरादि पाठसे सिद्ध शब्दको साधनके वास्ते प्रसिद्धहै । औ
जो सदाशिव संहितामें दशमुकाम लिखि आये हैं औ पहिले रेखतामें लिखि-
आये हैं सो कबीरजी पुनि खुद खाविंदको दूसरे रेखतामें वहीबात लिख्यो है
“जुलमत नासूत मलकूतमें फिरिस्ते नूर जल्लाल जबरूतमें जी । लाहूतमें नूर
जम्माल पहिंचानिये हक मकान हाहूतमें जी ॥ बका बाहूत साहूत मुर्शिद
वारहै जोरब्ब राहूतमें जी । कहत कबीर अबिगति आहूतमें खुद खाविन्द
जाहूत में जी ॥ १ ॥” सो वे जे परम परपुरुष श्रीरामचन्द्र हैं तिनके गुण
सबते न्यारे हैं औ उनको धाम सबते परेहै वाकोकोई अंतनहीं पायो सो तिनके
गुण हे जीवो ! तुम कैसे पावोगे ॥ ५ ॥
इति अठारहवां शब्द समाप्त ।
अथ उन्नीसवां शब्द ॥ १९ ॥
एतत राम जपो हो प्राणी तुम बूझो अकथ कहानी ।
जाको भाव होत हरि ऊपर जागत रैनि विहानी ॥ १ ॥
( २४४ ) बीजक कबीरदास ।
डाइन डारे सोनहा डोरे सिंह रहे वन घेरे ।
पांच कुटुंब मिलि जूझन लागे बाजन वाज घनेरे ॥ २ ॥
रोह मृगा संशय बन हाँकै पारथ वाना मेलै ।
सायर जरै सकल बन डाहै मक्ष अहेरा खेलै ॥ ३ ॥
कहै कबीर सुनो हो संतो जो यह पद निरधारै ।
जो यहि पदको गाय विचारै आप तरै अरुतारै ॥ ४ ॥
एतत राम जपोहो प्राणी तुम बूझौ अकथ कहानी ।
जाको भाव होत हरि ऊपर जागत रैनि बिहानी ॥ १ ॥
एतत कहे ई जे निर्गुण सगुणके परे परमपुरुष श्रीरामचन्द्रहैं तिनको जपो।
कैसे जपो कि, अकथ कहानी कहे मनबचनके परे जाह रामनाम सो बूझ
अर्थात् रामनाममें साहबमुख अर्थ बूझिकै जपो । श्रीरघुनाथ जीके ऊपर जाकों
भाव होय है ताको यहसंसाररूपी जो है निशा बिहानई है जायहै; सोवंततें
जागिउठैहै । ताते यह ध्वनित होय है जाकौ रघुनाथजी के ऊपर भाव नहीं हैं
ताको यह संसार रूपी निशा बनी रहैहै बिहान नहीं होयहै; जागै नहीं है;
कहे ज्ञाननहीं होयहै; भ्रमरूपी निशामें सोवैते रहै है । यहीसंसारमें जीव कैसे
घेरे रहते हैं सो कहै हैं ॥ १ ॥
डाइन डोरे सोनहा डोरे सिंह रहे बन घेरे ।
पांच कुटुंब मिलि जूझन लागे बाजन वाज घनेरे ॥२॥
डाइनि जेहैं गुरुवालोग छालाके डारनेवाले ने वाके कानमें अपनी विद्या-
डारिदियो । इहां गुरुवालोग डाइनैं हैं ने सिंहको मंत्रते बाँधि देयहैं वा
बनत्यागि और बननहीं जायहैं । औ सोनहा जोहै सो हंसमंत्र तौनेमों
डौंरा बांध्यो अर्थात् यह कहो कि; तूहींब्रह्महै और कहां खोजहै, तैंवा है। यह-
मंत्रको अर्थबतायो सो सिंह जो है जीव या सामर्थ है सो उनही बाणीरूप बन-
में घेरि रह्यो कहे बँधिरह्यो तबपांचौ जे ज्ञानेन्द्रियहैं पांचौ जे कर्मेन्द्रियहैं अथवा
शब्द । ( २४५ )
पाचौ जे प्राणहैं प्राण अपान समान उदान व्यान तैई कुटुम्ब हैं तिनमें मिलिकै
जूझैलाग पांच कुटुम्ब सिंहके पंचआनन जब सिंहको मारन जाय है तब झुनका
बाजा बजावै है तैसे यहां गुरुवालोग अनहद सुननकी युक्ति बतावनलगे सों
दशौ अनहदकी धुनि सुननलग्यो तेई बाजा हैं ॥ २ ॥
रोह मृगा संशय वन हांकै पारथ बाना मेलै ।
सायरजरै सकल वन डाहे मच्छ अहेराखेलै ॥ ३ ॥
रोह कौनकहावै कि, जो कमरीमें आगीबारत जायहै झुनका बजावत जायहै
तामें मृगा मोहि जायहैं सो वाहीकी छाया में पीछे धनुष बाणकी बांसकी बंदूकादि
आयुध लिये खड़े रहै है शिकारी सोई मारैहै यही रोहहै. सो मृगराज जोहै जीव
ताको गुरुवालोग जब योगाभ्यास कैकै धोखा ब्रह्मको मकाश बतायो तामें-
रहिगयो कहे मोहिगयो जो कहौ हाँकि कौन लायो? तौ संशय रूप हँकबैया है
जैसे आगी बरत देखिकै वा बाजा सुनिकै टेममें मोहिकै मृग मृगराज जायहै या
कैसो बाजा बाजै है या कैसी टेमहै या संशयजो है ज्ञानमिलनकी चाह सो याकों
हाँकिले आयों ऐसे गुरुवा लोगनकी जोबताई बाणीबनहै जौन अनहद सुनिबेकी युक्ति
बतायो तौन अनहदकी धुनिसुनिकै औ जौन ज्योति बतायो सोऊ योगाभ्यास
करिकै ज्योतिरूप ब्रह्म देखिकै जीव या संशय कैकै निकट जायहै औ याबिचा-
चारै है कि, याः ज्योतिरूप ब्रह्ममैंहीं हौं कि, मोते भिन्नहै तब शिकारी जैसे
ढुको रहैहै ऐसो मूलाज्ञान रूप शिकारी अहं ब्रह्मास्मि वृत्तिरूप बाण मारि वा
जीवको अनुभव कराय देयँ कि, महीं ब्रह्महौं वाके जीवत्वको नाश कै देयहै
यहीमारिबौहै ॥ औ जैसे बाण लागे मृग राजको अंतःकरण जर उठै है अधि-
क कोपै है बनमें जोई आगे वृक्ष परैहै तौने पर चोटँ करैहै, जो मारनवालेकों
देखै है तो वाहूको चीर खायहै ऐसे जब आपनेको ब्रह्ममान्यो तबसायर जो
संसारहै सो जरैहै अर्थात् संसार याको मिथ्या जानि परैहै औ वन डाहैहै कहे
वा दशामें बाणीरूप बन सोऊ भूलिजायहै । ऐसे बधिक मारयो बधिककों बाघ
मारयो वधिकको जबमारिकै दोऊ गलिकै नदी में मिल्यो तब मछरी खायो ।
अथवा मारिकै दोऊ बहैरहै कीड़ापरे जब बाढ़को जलआयो तबमछरी खायों
( २४६ ) बीजक कबीरदास ।
ऐसें ब्रह्महु में लीनहै अठईं अवस्थाको प्राप्तभये तब न जीवत्वरह्यो न मूलाज्ञान
रह्यो ऐसैहूबये तथापि साहबको बिना जाने मच्छ जो काल है सो खायलेइहै,
फिरि संसारमें परै है तामें प्रमाण॥"येऽन्येऽरविंदाक्षविमुक्तमानिनस्त्वय्यस्तभावाद्वि-
शुद्धबुद्धयः। आरुह्यकृच्छ्रेणपरंपदंततःपतन्त्यधोनादृतयुष्मदंघ्रयः॥" इतिभा-
गवते ॥ कबीरजीकोप्रमाण ॥ "कोटि करम कटपलमें, जोराचै यक नाम । अने-
क जन्म जो पुन्य करै, नहीं नाम बिनु धाम ॥ ३ ॥
कहै कबीर सुनो हो संतो, जो यह पद निरधारै ॥
जो यह पदको गाइ बिचारै आपु तरै अरु तारै ॥ ४ ॥
सो कबीरजी कहैहैं कि, हेसंतो ! जो यह पदको निराधारै कहे सारासार
बिचारकरै औ जौन ब्रह्मपद कहियाये तौनेको गाइ बिचारै कहे माया बिचारै
सों आपु तरै है और आनहूको तारै है अर्थात् साहबको बा जानै औ औरहूकौं
जनाइ देइ ॥ ४ ॥
इति उन्नीसवां शब्द समाप्त ।
अथ बीसवां शब्द ॥ २० ॥
कोइ राम रसिक रस पियहुगे । पियहुगे सुख जिय हुगे ॥१॥
फल अमृतै बीज नहिं बोकला शुकपक्षी रस खाई ।
चुवै न बुन्द अंग नहिं भीजै दास भँवर सँगलाई ॥ २ ॥
निगमरसाल चारि फल लागे तामें तीनि समाई ।
एक है दूरि चहै सब कोई यतन यतन कोइ पाई ॥ ३ ॥
गयउ वसंत ग्रीष्म ऋतु आई बहुरि न तरुवर आवै ।
कहै कबीर स्वामी सुख सागर राम मगन है पावै ॥ ४ ॥
शब्द । ( २४७ )
कोइ राम रसिक रसपियहुगे सुख जियहुगे ॥ १ ॥
फल अमृतै बीज नहिं वोकला शुक पक्षी रस खाई ।
चुवै न बुंद अंग नहिं भीजै दास भँवर सग लाई॥ २ ॥
हे जीवौ ! कोई तुम रामरसिकनते रामरस पिऔगे अथवा रामरसिकह्वैकै
रामरस पिऔगे । जो रामरसिकनते रामरस पिऔगे तबहीं सुखते जिऔगे
कहे जन्म मरणते छूटोगे अरुआनंदरूप होउगे ॥ १ ॥ वह रामरस कैसोहै
अमृतको फलहै कहे वाके खायेते जन्म मरण नहीं होइहै औ तौने फलमें
बीज बोकला नहींहैं अर्थात् सगुण निर्गुणरूप बीज बोकला नहींह औ न मीठों
फल होइहै ताही फलमें सुवा चोंच चलावैहै यह लोकमें प्रसिद्धहै । यहां शुकाचार्य
रामरसको मुक्त है आस्वादन कियोहै ताते यह व्यंजित भयो कि, रामरसते
ब्रह्मानंद कमही है अर्थात् श्रीमद्भागवतमें है॥ "वंदेमहापुरुषतेचरणारविंदम्"॥
ऐसो कहि शुकाचार्य परम परमपुरुष श्रीरामचन्द्रहीके चरणनको वंदना कियो हैं
औ श्रीरघुनंदनहीके शरण गये हैं । यह वर्णन श्रीमद्भागवतहीमें है॥ "तन्नाक-
पालवसुपालकिरीटजुष्टं पादांबुजंरघुपतेःशरणंप्रपद्ये"॥ इतिभागवते ॥ औ श्रीराम-
चन्द्रहीको परतत्त्व तात्पर्यते वर्णन कियोहै सो कोई बिरला संतजन याकोअर्थ
जानैहै। औ जो यह पाठहोइ "फल अंकृतै बीजनहिं बोकला" तौयह अर्थहै कि
फलकी अंकृति कहे आकृति तौहै परन्तु बीजबोकला जे निर्गुण सगुणहैं ते
इनमें नहीं आवैहैं इनते भिन्न है । सो रामरसरूपी फल है तो रस रूपई है
परन्तु वाको रसबुन्दहू नहींचुवैहै अर्थात् अंतकबहूं नहींहोइ है अनादि अनंतहै।
औ काहूके पांचौ शरीरके अंगनहीं भीजैहैं अर्थात् कोई पांच शरीरते भिन्न
नहीं होइहै । जब पार्षदरूप रामोपासक तेई भँवरहैं ते वाके संग लगे रहैं हैं
अर्थात् रामरस पान करतई रहै हैं ॥ २ ॥
निगम रसाल चारि फल लागे तामें तीनि समाई ।
यक है दूरि चहै सब कोई यतन यतन कोइ पाई ॥ ३ ॥
सो कबीरजी कहै हैं कि, निगम जोहै रसाल कहे आमको वृक्ष तामें चारि-
फल लागे हैं अर्थ धर्म काम मोक्ष तिनमें तीनिफल तहैं समातैं हैं कहे नष्टहै-
( २४८ ) बीजक कबीरदास ।
जाइहैं अर्थात् तीनिऊं अनित्यहैं औ एक जो है मोक्ष सोतो बहुत दूरि है यत्नही
यत्न करत कोई बिरला पावै है । अर्थात् निगमतौ रसालहै रसमय है तात्पर्य-
वृत्तिकरिके साहबईको बतावैहै सो वह तो कोई जानै नहींहै यह कहैहै कि
चारिफल लागे हैं ॥ ३ ॥
गयउ बसंत ग्रीष्म ऋतु आई बहुरि न तरुवर आवै ।
कहै कबीर स्वामी सुखसागर राम मगन है पावै ॥ ४ ॥
अरु जो कोई निगमरूपी वृक्षको मोक्षरूपी फल पायोहै वाको पायो है
ताको बसंत ऋतु जाइ रहैहै ग्रीष्म ऋतु है जाइहै कहे आत्माको स्वस्वरूप
भूलि गयो । सुखको आस्वादन न रहिगयो कहनलगयो कि मैंहीं ब्रह्महौं।ग्रीष्म-
ऋतुमें प्रकाश बढ़ै है सोयहौ प्रकाशमें समाइगयो सो फेरि जोचाहै कि, रामोपा-
सनारूप ब्रह्मकी भक्तिरूप छायामिलै तौ नहीं मिलै । श्रीकबीरजीकहै हैं कि-
सुखसागर स्वामी जे परमपरपुरुष श्रीरामचन्द्रहैं तिनके रामराम रसमें जब
मग्नहोय है तबहीं पावै है जीवको स्वरूप ॥ “ आत्मदास्यंहरेस्स्वाम्यंस्वभावं
चसदास्मर ” ॥ औ शुकाचार्य या फलको चाखिनहै तामें प्रमाण ॥ “ निग-
मकल्पतरोर्गलितंफलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुक्तम् । पिवतभागवंतरसमालयंमुहुरहोर-
सिकाभुविभावुकाः ” ॥ ५ ॥ इतिभागवते ॥ ४ ॥
इति बीसवां शब्द समाप्त ।
अथ इक्कीसवां शब्द ॥ २१ ॥
राम न रमसि कौन दँड लागा।मरि जैहै को¹ करिहै अभागा १
कोइ तीरथ कोई मुण्डित केशा।पाखंड भर्म मंत्र उपदेशा २
विद्या वेद पढ़ि करहंकारा । अंतकाल मुख फांकै क्षारा ३
१ क्या ।
शब्द । ( २४९ )
दुखित सुखितसबकुटुंब जेंवइवे।मरणबेर यकसरदुखपइवे४
कह कबीर यहकलिहै खोटी।जो रहकरखा निकसललोटी५
राम न रमसि कौन दँड लागा । मरि जैहै का करिहै अभागा
सबको दंड छोड़ाय देनवारे जे सबते परे परमपुरुष श्रीरामचंद्र हैं तिनमें
जौतैंनहीं रमैहै सो तोको गुरुवा लोगनको कौन दंड लगौहै यहतो सबयहींके
साथी हैं साहबके भुलायदेनवारे हैं जेउपदेश करनवारेगुरुवनके कहे माया ब्रह्म
आत्माको ज्ञानरूपी दंडचवावमें जोते परे हैं सो हे अभागा! जबतैंमरिहै तबवे
गुरुवा तोको न बचासकेंगे तब क्याकरोगे ॥ १ ॥
कोई तीरथ कोई मुंडितकेशा। पाखंड भर्म मंत्र उपदेशा२
तीर्थनमें जाइकै कोई चहौहै कि, बिना ज्ञानही मुक्तिहै जाइहै औकोई मूड़-
मुड़ायकै वेषबनाइकै संन्यासीहैकै औ अपने आत्माहीको मालिक मानिकै
चाहौहौ कि मुक्तहैजायँ । औकोई नास्तिकादिकनके जेनानापाखंड मतहैं तिनमें
लागिके जानौकि मुक्त ह्वैगये औ कोई भ्रमजो धोखाब्रह्महै तामें लागिकै अपने-
कोब्रह्म मानिकै जानौहौ कि हममुक्तह्वैगये औकोई और और देवनके मंत्रउप-
देश पायकै जानौहौ किं हममुक्तह्वैगये ॥ २ ॥
विद्या वेद पढ़ि कर अहङ्कारा।अंतकाल मुखफांकै क्षारा॥३॥
अरुकोई वेदबाह्य जे नाना विद्या अपने अपने गुरुवनकी भाषा तिनको पढ़िकै
औ कोई वेद पढ़िकै वेदमैं शास्त्र औ चौंसठ कलादिक सब आइगये अहङ्कारकरोहो
कि हम मुक्तह्वैगये सोमुक्ति तों जिनको वेदतात्पर्य करिकै बतावैहै ऐसेजे परमपरपुरुष
श्रीरामचंद्रहैं तिनके बिनाजाने न होयगी । होयगो कहां ? कि जबअंतकाल तेरो
होइगो तब यहौ मुखमें क्षार फांकैगो औ पुनिजब पुण्यक्षीणहोइगो तब लोक
आवोगे तबहूं मरबै करोगे क्षारई फांकौगे ॥ ३ ॥
दुखितसुखितसबकुटुंबजेंवइवे । मरणबेरयकसरदुखपइवे४
दुःखसुखमें सबकुटुम्बनको जेंवावैहै तेमरणसमय कोईकाम नहीं आवैहैं तैं
अकेलही दुःखपावैहैं परन्तु सहायतेरी कोई नहीं करिसकैं हैं ॥ ४ ॥
( २६० ) बीजक कबीरदास ।
कह कबीर यह कलि है खोटी। जोह करवा निकसल टोटी५
कलिनाम झगड़ाको है सो कबीरजी कहैहैं यह माया ब्रह्मको झगड़ा बहुत-
खोटहै अथवा यह कलिकाल अतिखोटहै । जोवस्तु करवामेंरहैहै सोईटोटीतेनि-
कसैहै तैसेजोकर्म यहजीवकरै है सोई दुःखसुख वह जन्मभोगकरै है अरु नाना
देवतनकी उपासनाअब करैहै ताहीकी वासना बनीरहै है तेहिते पुनिसोई देवतन
में लागै है अरु जो ब्रह्मविचार अबकरैहै सोई ब्रह्मविचार पुनिजन्मलैकै करैहैं
अर्थात् बिना परमपरपुरुष श्रीरामचन्द्रके जाने जन्ममरण नहीं छूटैहै जोबासना
अंतःकरणमें बनी रहैहै सोई पुनि होयहै ॥ ५ ॥
इति इक्कीसवां शब्द समाप्त ।
अथ बाईसवां शब्द ॥ २२ ॥
अवधू छोड़ो मन विस्तारा ।
सो पद गहहु जाहिते सद्गति परब्रह्मते न्यारा ॥ १ ॥
नहीं महादेव नहीं महम्मद हरि हजरत तब नाहीं ।
आदम ब्रह्म नहीं तब होते नहीं धूप नहिं छाहीं ॥ २ ॥
असी सहस पैगंबर नाहीं सहस अठासी मुनी ।
चन्द्र सूर्य तारागण नाहीं मच्छ कच्छ नाह दूनी ॥ ३ ॥
वेद किताब स्मृति नहिं संयम नहीं यम न पारसाही ।
बांगनेवाज कलिमा नहिं होते रामो नहीं खोदाही ॥ ४ ॥
आदि अंत मन मध्य न होते आतश पवन न पानी ।
लखचौरासी जीवजन्तु नहीं साखी शब्द न वानी ॥ ५ ॥
कहै कबीर सुनो हो अवधू आगे करहु विचारा ।
पूरणब्रह्म कहांते प्रकटे किरतमकिनउपचारा ॥ ६ ॥
शब्द । ( २६१ )
हे अवधू जीवौ ! तुम्हारे तो बधू कहे स्त्री नहीं है अर्थात् तुम तौ मायातें
भिन्नहौ । जेतनो तुम देखोहो सुनोहौ ताको मायामें मिलिकै तुम्हारे मनही
विस्तार कियो है सो यह मनको बिस्तार छोड़ि देउ अरु जिनतें सद्गति कहे
समीचीन गति है मन बचनके परे धोखा ब्रह्मके पार ऐसो जो लोक प्रकाश
ताहूते न्यारे ऐसे साकेतनिवासी परमपरपुरुष श्रीरामचन्द्र तिनके पदगहौ ।
कबीरजी कहै हैं कि, हेजीवौ ! बिचार तो करौ ( जोजो बात यहि पदमें स्पष्ट
वर्णन करिगये ते ) ये कोऊ तब नहीं रहे । अरु वासौं भिन्न जो तुम कहौ हौ
कि, पूर्णब्रह्म है कहे सर्वत्र ब्रह्मही है वासो भिन्नदूसरो नहीं है सो यह धोखा
कहांत प्रकट भयो है । औ किरितम जोमाया है ताको किन उपचार कहे किन
आरोपण कियो अर्थात् यह शुद्ध समष्टि जीवको मनहीं किरितम जों माया है
ताको आरोपण कियोहै औ मनहीं वह ब्रह्मको अनुमान कियोहै, ताहीको कियो
राम खोदाय आदिजे मन बचनमें आवैं हैं जे वर्णन करि आये हैं तेई बिस्तार हैं
सो पूर्व मंगलमें औ प्रथम रमैनीमें वर्णन करि आयेहैं । औ यहां रामको औ
हरिको जो कहै हैं सो नारायण जे रामावतार लेइ हैं तिनको कहै हैं । नहीं
यमन परसाही कहे चौदहौ यमनके परेजे निरंजन हैं तिनहूंकी साही नहीं रही ।
परम परपुरुष श्रीरामचन्द्रको नहीं कहै हैं काहेते कि, वेतौ मन बचनके परे हैं
सो पूर्वलिखि आये हैं सोबांचि लेहुगे । सोजब मनको त्यागो तब परमपरपुरुष
श्रीरामचन्द्र तिहारो स्वरूपदेइँ तामेंप्रमाण-“मुक्तस्यविग्रहोलाभः” ॥ यह
श्रुति तौने स्वरूपते साहबको अनिर्वचनीय रामनामनामादिक तुमको स्फुरित
होइँगे । तामें प्रमाण-“वाङ्मनोगोचरातीत: सत्यलोकेश ईश्वरः । तस्यना-
मादिकं सर्वं रामनाम्ना प्रकाश्यते ॥” इति महारामायणे ॥ ६ ॥
इति बाईसवां शब्द समाप्त ।
अथ तेईसवां शब्द ॥ २३ ॥
अवधू कुदरतकी गतिन्यारी ।
रङ्क निवाज करै वह राजा भूपति करै भिखारी ॥ १ ॥
( २६२ ) बीजक कबीरदास ।
येते लवँगहि फल नहिं लागै चंदन फूल न फूलै ।
मच्छ शिकारी रमैजँगलमें सिंह समुद्रहिफूलै ॥ २ ॥
रेंडा रूख भया मलयागिरि चहुँदिशि फूटी वासा ।
तीनि लोक ब्रह्मांड खण्डमें देखै अंध तमासा ॥ ३ ॥
पंगुल मेरु सुमेरु उलंधै त्रिभुवन मुक्ता डोलै ।
गूंगा ज्ञान विज्ञान प्रकाशै अनहद वाणी बोलै ॥ ४ ॥
बांधि अकास पाताल पठावै शेष स्वर्गपर राजै ।
कहै कबीर राम हैं राजा जो कछु करैं सो छाजै ॥ ५ ॥
जोपूर्व यह कहि आये कि रामौनहीं खोडाइउ नहीं हैं जिनते समीची
गतिहोइ है तिनके पदगहौ ते कौन पुरुष हैं तिनकी सामर्थ्य कहिकै खोलिकै
या शब्दमों बतायो है । अब याकी टीका लिखते हैं ।
अवधू कुदरतिकी गति न्यारी
रंक निवाज करै वह राजा भूपति करै भिखारी ॥ १ ॥
येते लवँगहि फल नहिं लागे चंदन फूल न फूलै ।
मच्छ शिकारी रमै जंगलमें सिंह समुद्रहि झूलै ॥ २ ॥
हे अवधू जीवौ ! परम परपुरुष जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनकी कुदरति कहे सामर्थ्य
की गति न्यारी है । सुग्रीव जे पुत्रकलत्रते हीन, भिखारीकी नाईं बन बन
पहाड़ पहाड़ बागत रहे तिनको निवाजिकै राजा बनाइ दियो । औ सबराज-
नके जीतनवारे जे क्षत्रिय तिनको मारि कै पृथ्वी भूसुरन दैडारेउ । नारायण
के अवतार ऐसे परशुराम तिनको भिखारी करि दियो ॥ १ ॥ लवंगमें फल
नहीं लागे सोऊ लागै, चंदनमें फूल नहीं फूलै सोऊ फूलै है जाकी सामर्थ्य
ते । सो बाल्मीकीयमें लिख्यो है जब श्रीरघुनाथजी अयोध्याजी आये हैं
तब जे वृक्षफलै फूलैवाले नहीं रहे सूखेरहे तेऊ फलि फूलिआये हैं । औ
शब्द । ( २६३ )
मच्छ जो मत्स्योदरी सो शिकारी जो शांतनु ताकेसाथ भय ते रमन लगी ।
सिंहसमर्थ को कहै हैं सो समर्थ जे बड़े बड़े दानव थलके रहैया ते समुद्रमें
बसे जाय ॥ २ ॥
रेड़ा रूख भया मलयागिरि चहुं दिशि फूटी वासा ।
तीनि लोक ब्रह्मांड खंडमें देखै अंध तमासा ॥ ३ ॥
रेड़ा रूख जेहैं, सबरी, वानर, निषादादिक जिनको वेदकाअधिकार नहीं रह्यो,
तेऊ चंदनहैगये । उनकी बास चारिउदिशा फूटी कहै उनको यश सबकोई गावै
है । चंदन औरौ वृक्षनको चंदन करै है ऐसे औरहूको साधु बनावनवारे ये सब
भये तामें प्रमाण ॥ “नजन्म नूनं महतोनसौभगं नवाङ्नबुद्धिर्नाकृतिस्तोषहेतुः । तैर्य-
द्विसृष्टानपिनोवनौकसश्चकारसख्येबतलक्ष्मणाग्रजः ” इतिभागवते ॥ औ आँध-
रेजे हैं धृतराष्ट्र तिनको कृष्णचन्द्र ब्रह्माण्ड भरेको तमाशा जिनकी सामर्थ्यते
शरीरहीमें देखायदियो । नारायण औ कृष्णचन्द्र साहबकी सामर्थ्यते करै हैं
तामेंप्रमाण ॥ “ यस्यप्रसादाद्देवेशमम सामर्थ्यमीदृशम् । संहरामिक्षणादेवत्रैलो-
क्यंसचराचरम् ॥ धातासृजतिभूतानि विष्णुर्द्धारयतेजगत् ” । इतिसारस्वततंत्रे ॥
कृष्णचंद्रको अवतार विष्णुहीते होइहै सो पुराणनमें प्रसिद्धहै ॥ ३ ॥
पंगुल मेरु सुमेरु उलंधै त्रिभुवन मुक्ताडोलै ।
गूंगा ज्ञान विज्ञान प्रकाशै अनहद वाणी बोलै ॥ ४ ॥
औ जिनके अघटित घटना सामर्थ्यते पंगु जे हैं अरुण ते पृथ्वीकी कीला
जे हैं सुमेरु तिसको रोज उलंधै हैं नांघै हैं । अथवा पंगुजो हैं राहु जाके शिरे
भरहै गोड़ हाथ नहीं है सोसुमेरु का नाघत रहे है औ मुक्ते जे हैं नारद
शुक कबीर आदिक जे संसार ते मुक्त हैकै मनादिकन को छोड़िकै साहब के
पास गये हैं औ यह शास्त्रमें लिखे है कि, उहांके गयेपुनि नहीं आवै है
परन्तु तेऊ साहबकी सामर्थ्यते त्रिभुवनमें डोलै हैं संसारबाधा नहीं करिसकै
है । आ जब शुकाचार्य निकसे हैं तब व्यास पछुआन जात रहे हैं तब गूंगे जे
बृक्ष हैं तेऊ व्यासको समुझायो है । औ मध्वाचार्य जब भिक्षाटन को निकसे
( २६४ ) बीजक कबीरदास ।
तब शिष्यनके पढ़ाइबेको बरदाको कह्यो तबबरदा शिष्यनको पढ़ायो है । औ
जे साहबकी सामर्थ्यते ऐसी सामर्थ्य उनके दासनेके द्वैगई कि, वोई अनहद
वाणीको बोले हैं जाकी हद नहीं है ॥ ४ ॥
बाँधि अकाश पताल पठावै शेषस्वर्ग परराजै ।
कहै कबीर रामहै राजा जोकुछ करै सो छाजै ॥ ५ ॥
औ आकाश जो है आकाशवत् ब्रह्म तौनेको जोमानै है कि वह ब्रह्म
मैंहीं हौं ताको साहब अपनो ज्ञान कराइकै धोखा ज्ञानको बाँधि कै पतालमें
पठै दैहै । अर्थात् तेहि जीवको मूलज्ञान निर्मूलई करि देयहै । जैसे लोकमें
या बात कहै हैं कि, या खनिकै गाड़देव ऐसे गाड़दियो फिरि वा अज्ञानको अंकुर
नहीं होयहै । औ शेष कहे भगवत् शेषजो है जीव सो जे साहबकी सामर्थ्यते
स्वर्गादिकन के परे जोहै साहबको लोक तहाँ राजै हैं । "स्वर्गपदको अर्थ जो
दुःखते भिन्न स्थान होयहै सो कहावै स्वर्ग" । औ जो लोक मकाश ब्रह्म ताहूते परे
जो साहब तहाँराजैहै दुःखरहितस्थानको स्वर्ग कहै हैं तामें प्रमाण। "यन्नदुःखेनसंभिन्नं
नचग्रस्तमनंतरम् । अभिलाषोपनीतंच तत्पदंस्वःपदास्पदम्" इति॥ सो कबीरजी
कहै हैं कि यह अघटित घटना सामर्थ्य परम परपुरुष श्रीरामचन्द्रही हैं वे रा-
जा हैं वे जोकुछकरैं सो सब छाजैहै चाहे रंकको राजा करैं चाहे राजाको रंक करैं
चाहे लौंगमें फल लगावैं चाहे चंदनमें फूल फुलाय देयँ चाहे मछरीको बनमें
रमावै चाहे सिंहको समुद्र में रमावैं चाहे रेंडारूखको चंदनकरैं. चाहै अंधाको
तीनउ लोक देखाय देयँ चाहे पंगुको सुमेरु नँघायदेयँ चाहे गूंगाको ज्ञान
कहवायदेइँ.चाहे आकाशको बाँधिके पातालैपठावैं चाहे पातालवासी जे शेष तिनको
स्वर्गपरराखैं, या सामर्थ्य उनमेंहै श्रीरामचंद्र तौराजा हैं तामेंप्रमाण ॥ "राजाधि-
राजस्सर्वेषां रामएवनसंशयः ॥"औ उनहींकी भयते सूर्य चन्द्रमा अवसरमेंउये हैं
औमृत्यु जबसमय आवैहै तबखायहै तामें प्रमाण॥ यद्भयाद्वाति वातोयं सूर्यस्त-
पतियद्भयात् ॥ वर्षतींद्रो दहत्यग्निर्मृत्युश्चरति पंचमः ॥ इतिश्रीमद्भागवते ॥५॥
इति तेईसवां शब्द समाप्त ॥
शब्द । ( २५५ )
अथ चौबीसवां शब्द ॥ २४ ॥
अवधू सो योगी गुरु मेरा । जो ई पदको करै निवेरा ॥ १॥
तरुवर एक मूल विन ठाढो विन फूले फल लागा ।
शाखा पत्र कछू नहिं वाके अष्ट गगन मुख जागा ॥ २ ॥
पौ बिनु पत्र करह बिनु तुम्बा बिनु जिह्वा गुण गावै ।
गावनहारके रूप न रेखा सतगुरु होइ लखावै ॥ ३ ॥
पक्षी खोज मीनको मारग कहे कबीर दोउ भारी ।
अपरम पार पार पुरुषोत्तम मूरतिकी बलिहारी ॥ ४ ॥
अवधू सो योगी गुरुमेरा । जो ई पदको करै निवेरा ॥ १॥
तरुवर एक मूल विन ठाढ़ो विन फूलै फल लागा ।
शाखा पत्र कछू नहिं वाके अष्ट गगन मुख जागा ॥ २ ॥
वधू जाके न होइ सो अबधू कहावै सो हे अबधु जीवो! जो यह पदके अर्थको
निबेरा करिके जानै सो योगी गुरु कहे श्रेष्ठ है औमेरा है कहे मैं वाको आपनो
मानौहौं ॥ १ ॥ एकजो तरुवरहै सो बिन मूल ठाढ़ो है अरु वामें बिनाफूल
फल लागो हैं सो यहां तरुवर मनहै सो जड़है अरु आत्मा चैतन्य है शुद्ध है जो
कहिये आत्माते उत्पत्तिहै सो जो आत्माते उत्पन्नहोतो तौ आत्मा चतन्य है
याते यहू चैतन्य हो तो ताते आत्माते नहीं उत्पन्नभयी । यह आपई आत्माते
प्रकाशभयो जो बिचारैतौ वाकोमूल भगवत् अज्ञान सत नहीं है बिनामूल ठाढ़े
भयोहै अरु बिना फूलै फल लागोहै कहे जगत् उत्पादक क्रिया मननहीं कियो
मिथ्या संकल्पमात्रते जगद्रूप फललागवई भयो अरु वाके शाखापत्र कछू नहीं है
अर्थात् अंगनहीं है चित्त बुद्धि अहंकार येऊमिथ्याहैं निराकारहैं अरु यह मनैके
मुखते आठौ गगन जागतभये। सात सप्तावरणके आकाश अथवा चैतन्याकाश ॥ २ ॥
( २५६ ) बीजक कबीरदास ।
पौविनुपत्रकरहविनुतुम्बा बिनुजिह्वागुणगावै ।
गावनहारकेरूप न रेखा सतगुरुहोइलखावै ॥ ३ ॥
अब श्रीकबीरजी जीवात्मा को वृक्षरूप हैकै बर्णन करैं हैं पौबिनु कहे आत्माको
जगत्को अंकुर नहीं है मनके संयोगते दुःख सुखरूप पत्रदुइ लागबेई कियो औ
करहूजो कर्म है सो नहीं रह्यो आत्मामें जगतरूप तुम्बा लागबेई कियो । यह
जीवात्माकी दशाकाहेतेभई कि, बिनु जिह्वा जांहै निराकार ब्रह्म ताके जे गुणहैं
देश काल बस्तु परिच्छेद ते शून्यत्व सो आपने में लगावन लग्यो । ये गुण
मोहीं में हैं मेरोस्वरूप यही है सो जो या आपनेको ब्रह्ममान्यो तौ आत्माके
ब्रह्मकेरूपको रेखनहीं है काहेते याको देश बनो है समष्टि जीवलोक प्रकाशमें
रहैहैं, औ कालबन्यो है जैनेकालमें समष्टिते व्यष्टि होयहै, औ या देश काल
बस्तु परिच्छेदते संहितहै काहेते अणुहै भगवद्दासहै तामें प्रमाण॥ "बालाग्रशत-
भागस्यशतधाकल्पितस्यच॥ भागोजीवःसविज्ञेयः सचानंत्यायकल्पते" इतिश्रुतिः
अंशोनानाव्यपदेशांत्ते ॥ ३ ॥
पक्षी खोज मीनको मारग कहे कबीर दोउ भारी ।
अपरम पार पार पुरुषोत्तम मूरति की बलिहारी ॥४॥
ताते मीनकी नाईं संसारते उलटी गति चलिकै पक्षी जो हंस स्वरूप आपनो
ताको खोज कबीरजी कहैं हैं ये दोऊ भारी हैं संसारते उलटी गति होइबो:यह
भारी है, आपनो हंसरूप पाइबो यहू भारी है । सोसंसारते उलटी गति करि
हंसरूप पाइकै परमपर जो आत्मारूप पार्षदरूप ताहूते उत्तम जे परमपुरुष
पर श्रीरामचन्द्र तिनकी बलिहारी जाय । भाव यह है तब तेरो जनन मरण
छूटैगो ॥ ४ ॥
इति चौबीसवां शब्द समाप्त ।
शब्द । ( २५७ )
अथ पचीसवां शब्द ॥ २५ ॥
अवधू वोत तुरावल राता । नाचै वाजन वाज बराता ॥१॥
मौरके माथे दूलह दीन्हो अकथा जोरि कहाता ।
मड़येके चारन समधी दीन्हो पुत्र विवाहल माता ॥ २ ॥
दुलहिनि लीपि चौक वैठाये निरभय पद परभाता ।
मातहि उलटि बरातहिं खायो भली वनी कुशलाता ॥३॥
पाणि ग्रहण भये भव मंडौ सुषुमानि सुराति समाता ।
कहै कबीर सुनो हो संतो बूझो पण्डित ज्ञाता ॥ ४ ॥
अवधू वोत तुराबल राता । नाचै वाजन वाज वराता॥१॥
हे जीवौ ! आपतौ अबधू रहेहौ कहे आपके बधू जो है मायासो नहीं रही
है परंतु रौर अब वह तत्त्वमें राते हैं । अथवा हे अबधू ! यह शरीरको राजा
है जीव सो अब वह तत्त्वमें राता है । कौन तत्त्वमें राता है ? सोकहै हैं;
जहां बाजन नाचै है, बरातंबजै है । सो इहां शरीर बाजनहै सो नाचै है
कहे जाग्रत् अवस्थामें स्थूल, स्वप्नअवस्थामें सूक्ष्म, औ सुषुप्ति में कारण, तुरि-
यामें महाकारण, येई नाचै हैं । तिनको जब इकट्ठा कियो अर्थात् एकाग्र मन
कियो उन्मनी मुद्राआदिक साधन करिकै तब पचीसौ जे तत्त्व हैं तेई बरात हैं
तेई बाजै हैं कहे तिनको जो संघट्ट हैबो है इंद्रियनमें तिनते जो ध्वनि निकसै
है तेई दशौ अनहदकी ध्वनि सुनि परती हैं तामेंप्रमाण कबीरहीजीको ॥
“उठतशब्द घनघोर शंखध्वनि अतिघना । तत्त्वोंकी झनकार बजतझी-
नीझना” ॥ १ ॥
मौरके माथे दूलह दीन्हो अकथा जोर कहाता ।
मड़येके चारन समधी दीन्हो पुत्र विवाहल माता॥२॥
नाभीमें चक्र है तामें नागिनीको बास है सो चक्रके द्वारमें मुड़दिये परी
है । आत्मानीचे है सो वह आत्मा दूलह है ताहीकी नागिनी मौर ह्वै रही
१७
है सो जब पांचहजार कुंभक कियों तब नागिनी जागी सो ऊपर को चढ़ी तब
चक्रको द्वार खुलिगयो तब आत्मातो दूलहहै सो चढ़िकै मौर जो नागिनीहै
ताके माथेपर गैब गुफ़ामें बैठयो जाइ । औ बरातनमें जो नहीं कहिबेलायक
झूठीबात सो गारीमें कहैहैं इहां शरीरमें ब्रह्म ह्वैजैबो अकथहै कहिबे लायक नहीं
है । सो कहै हैं कि, हम ब्रह्मह्वैगये । औ मड़ये के चारनको नेग समधी देइहै;
इहां मड़येके चारनके तेगनमें समधीही दीन्हेहै । मायाको पिता जो मनहै सो
एक समधीहै औ मनके समधी साहबहैं काहेते कि, यहजीव भगवद्वात्सल्यको
पात्रहै जबयह आत्मा विषयनमें रह्यो है तब बेजाने कबहूं कहतहू सुनतरह्यो
जबते ब्रह्मांड मड़वामें गयो तबते कबीरजी यहकूट करै हैं कि, मड़येके चारन में
समधीको दैराख्यो है कहे समधी जो साहब ताको कहिबो सुनिबो मिटिगयो ।
सो जानैतो यहहै कि, हम मायाते छूटिगये पै नागिनीको जै बुन्दसुधा देइहै तै
वर्ष वहां समाधि लागै है सो नागिनी ही वहां गोहरौख है सो पुत्र जो जीवहै
सो माता जो माया है ज्योतिरूप आदिशक्ति ताको बिवाहि लेयहै कहे वाहीके
संग ज्योतिमें लीनह्वै के वहां रहै है ॥ २ ॥
दुलहिनि लीपि चौक बैठाये निर्भय पद परभाता ।
भातहिं उलटि बरातहिं खायो भली बनी कुशलाता॥३॥
चौक लीषिकै दुलिहिन को बैठावै हैं । यहां दुलहिन जो है माया जो जगत
रूप करिकै नानारूपहै ताको लीषिकै एक करिदार्यो कहे एक ब्रह्मही मान
भयो ताके ऊपर चौकबैठायो कहे चौक देत भयो । अर्थात् अन्तःकरणावच्छि
जो चैतन्य सो प्रमातृचैतन्य कहावै है । वृत्त्यवच्छिन्न जो चैतन्य सो
प्रमाणचैतन्य कहावै है । विषयावच्छिन्न चैतन्य प्रमेय चैतन्य कहावै है।
स्फूर्त्यवच्छिन्नचैतन्य स्फूर्त चैतन्य कहावै है । सो ये चारों चैतन्यकें
चौकबैठायो कहे चौक पूरच्यो अर्थात् चारो चैतन्यको एक करिकै स्थितकियो।
बिवाह होत होत भिनसार होइ जायहै तब यह मन भयो कि, हम निर्भय
पदको पहुंचिगये प्रभात ह्वैगयो, मोहरात्री व्यतीत ह्वैगई । नागिनीको जो
अमृत सरोवर में अमृत पियावै है सोई भातहै सो नागिनी जब अमृतपियो तब
वहै भात बरात जो आगेवर्णनकरि आये पंचतत्त्व पचीसप्रकृति ताकोखाय
लियो अर्थात् कुछ सुधि न रहगई । सो कबीरजी कहै हैं कि भली कुशलात
बनीहै कि तब तो कुछसुधिहू रही अब कछू सुधिनहीं रहिगई ॥ ३ ॥
पाणि ग्रहण भये भव मंड्यो सुषुमनि सुरति समाता ।
कहै कबीर सुनो हो संतो बूझो पंडित ज्ञाता ॥ ४ ॥
वहां मंडप परे पर पाणिग्रहणहोयहै यहां पाणिग्रहणभयेपर भव मंड्यो
अर्थात् जब पाणि ग्रहण मायाको ह्वै चुक्यौ कहैं नागिनी को जब सुधा पिआइ
चुक्यौ तब जै मुहुँ नागिनीको पानी दियो तैसेहि फल मिल्यो । एक मुंह
दियो तौ महीना भरेकी समाधि लगी औ दुइमुंहदियो तौ तीन महीनाकी
समाधिलगी औ चारि मुंहदियो तौ छः महीनाकी समाधि लगी. औ पांचमुंहदियों
तौ वर्षदिनकी, औछःमुंहदियो तौ तीन वर्षकी, औसातमुंहदियो तौ बारहवर्षकी,
समाधिलगी । और जो हजारनवर्ष समाधि लगावाचाहै तौ और मुंहदेय । सो
जब नागिनीको सुधा पिआयो तब जे मुँह दियो तेतनेनदिन भर सुषुमनि
सुरति समाता । अर्थात् सुषुम्णामें 'जीवकी सुरति समाईहै । पुनि जब समाधि
उतरी तब फिर भव मंड्यो कहे संसारी भयो अर्थात् पुनि ब्रह्मांड मंड्यो कि,
शरीरकी सुधि भई । सो कबीरजी कहै हैं कि, हे संतो ! हे ज्ञाता पंडितौ !
तुम सुनौ तौ बूझौ तौ वे कहां मुक्तभये ? नहीं भये फेरि तौ संसारही में
उलटि आवै हैं ॥ ४ ॥
इति पचीसवां शब्द समाप्त ।
अथ छब्बीसवां शब्द ॥ २६ ॥
कोई विरला दोस्त हमारा भाई रे बहुतका कहिये ।
गाठन भजन सवोरे सोइ ज्यों राम रखै त्यों रहिये ॥ १ ॥
आसन पवन योग श्रुति संयम ज्योतिष पढ़ि वैलाना ।
छौ दर्शन पाखंड छानबे येकल काहु न जाना ॥ २ ॥