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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 297

शब्द । ( २४७ )
कोइ राम रसिक रसपियहुगे सुख जियहुगे ॥ १ ॥
फल अमृतै बीज नहिं वोकला शुक पक्षी रस खाई ।
चुवै न बुंद अंग नहिं भीजै दास भँवर सग लाई॥ २ ॥
हे जीवौ ! कोई तुम रामरसिकनते रामरस पिऔगे अथवा रामरसिकह्वैकै
रामरस पिऔगे । जो रामरसिकनते रामरस पिऔगे तबहीं सुखते जिऔगे
कहे जन्म मरणते छूटोगे अरुआनंदरूप होउगे ॥ १ ॥ वह रामरस कैसोहै
अमृतको फलहै कहे वाके खायेते जन्म मरण नहीं होइहै औ तौने फलमें
बीज बोकला नहींहैं अर्थात् सगुण निर्गुणरूप बीज बोकला नहींह औ न मीठों
फल होइहै ताही फलमें सुवा चोंच चलावैहै यह लोकमें प्रसिद्धहै । यहां शुकाचार्य
रामरसको मुक्त है आस्वादन कियोहै ताते यह व्यंजित भयो कि, रामरसते
ब्रह्मानंद कमही है अर्थात् श्रीमद्भागवतमें है॥ "वंदेमहापुरुषतेचरणारविंदम्"॥
ऐसो कहि शुकाचार्य परम परमपुरुष श्रीरामचन्द्रहीके चरणनको वंदना कियो हैं
औ श्रीरघुनंदनहीके शरण गये हैं । यह वर्णन श्रीमद्भागवतहीमें है॥ "तन्नाक-
पालवसुपालकिरीटजुष्टं पादांबुजंरघुपतेःशरणंप्रपद्ये"॥ इतिभागवते ॥ औ श्रीराम-
चन्द्रहीको परतत्त्व तात्पर्यते वर्णन कियोहै सो कोई बिरला संतजन याकोअर्थ
जानैहै। औ जो यह पाठहोइ "फल अंकृतै बीजनहिं बोकला" तौयह अर्थहै कि
फलकी अंकृति कहे आकृति तौहै परन्तु बीजबोकला जे निर्गुण सगुणहैं ते
इनमें नहीं आवैहैं इनते भिन्न है । सो रामरसरूपी फल है तो रस रूपई है
परन्तु वाको रसबुन्दहू नहींचुवैहै अर्थात् अंतकबहूं नहींहोइ है अनादि अनंतहै।
औ काहूके पांचौ शरीरके अंगनहीं भीजैहैं अर्थात् कोई पांच शरीरते भिन्न
नहीं होइहै । जब पार्षदरूप रामोपासक तेई भँवरहैं ते वाके संग लगे रहैं हैं
अर्थात् रामरस पान करतई रहै हैं ॥ २ ॥
निगम रसाल चारि फल लागे तामें तीनि समाई ।
यक है दूरि चहै सब कोई यतन यतन कोइ पाई ॥ ३ ॥
सो कबीरजी कहै हैं कि, निगम जोहै रसाल कहे आमको वृक्ष तामें चारि-
फल लागे हैं अर्थ धर्म काम मोक्ष तिनमें तीनिफल तहैं समातैं हैं कहे नष्टहै-