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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 298

( २४८ ) बीजक कबीरदास ।
जाइहैं अर्थात् तीनिऊं अनित्यहैं औ एक जो है मोक्ष सोतो बहुत दूरि है यत्नही
यत्न करत कोई बिरला पावै है । अर्थात् निगमतौ रसालहै रसमय है तात्पर्य-
वृत्तिकरिके साहबईको बतावैहै सो वह तो कोई जानै नहींहै यह कहैहै कि
चारिफल लागे हैं ॥ ३ ॥
गयउ बसंत ग्रीष्म ऋतु आई बहुरि न तरुवर आवै ।
कहै कबीर स्वामी सुखसागर राम मगन है पावै ॥ ४ ॥
अरु जो कोई निगमरूपी वृक्षको मोक्षरूपी फल पायोहै वाको पायो है
ताको बसंत ऋतु जाइ रहैहै ग्रीष्म ऋतु है जाइहै कहे आत्माको स्वस्वरूप
भूलि गयो । सुखको आस्वादन न रहिगयो कहनलगयो कि मैंहीं ब्रह्महौं।ग्रीष्म-
ऋतुमें प्रकाश बढ़ै है सोयहौ प्रकाशमें समाइगयो सो फेरि जोचाहै कि, रामोपा-
सनारूप ब्रह्मकी भक्तिरूप छायामिलै तौ नहीं मिलै । श्रीकबीरजीकहै हैं कि-
सुखसागर स्वामी जे परमपरपुरुष श्रीरामचन्द्रहैं तिनके रामराम रसमें जब
मग्नहोय है तबहीं पावै है जीवको स्वरूप ॥ “ आत्मदास्यंहरेस्स्वाम्यंस्वभावं
चसदास्मर ” ॥ औ शुकाचार्य या फलको चाखिनहै तामें प्रमाण ॥ “ निग-
मकल्पतरोर्गलितंफलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुक्तम् । पिवतभागवंतरसमालयंमुहुरहोर-
सिकाभुविभावुकाः ” ॥ ५ ॥ इतिभागवते ॥ ४ ॥
इति बीसवां शब्द समाप्त ।
अथ इक्कीसवां शब्द ॥ २१ ॥
राम न रमसि कौन दँड लागा।मरि जैहै को¹ करिहै अभागा १
कोइ तीरथ कोई मुण्डित केशा।पाखंड भर्म मंत्र उपदेशा २
विद्या वेद पढ़ि करहंकारा । अंतकाल मुख फांकै क्षारा ३
१ क्या ।