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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 300

( २६० ) बीजक कबीरदास ।
कह कबीर यह कलि है खोटी। जोह करवा निकसल टोटी५
कलिनाम झगड़ाको है सो कबीरजी कहैहैं यह माया ब्रह्मको झगड़ा बहुत-
खोटहै अथवा यह कलिकाल अतिखोटहै । जोवस्तु करवामेंरहैहै सोईटोटीतेनि-
कसैहै तैसेजोकर्म यहजीवकरै है सोई दुःखसुख वह जन्मभोगकरै है अरु नाना
देवतनकी उपासनाअब करैहै ताहीकी वासना बनीरहै है तेहिते पुनिसोई देवतन
में लागै है अरु जो ब्रह्मविचार अबकरैहै सोई ब्रह्मविचार पुनिजन्मलैकै करैहैं
अर्थात् बिना परमपरपुरुष श्रीरामचन्द्रके जाने जन्ममरण नहीं छूटैहै जोबासना
अंतःकरणमें बनी रहैहै सोई पुनि होयहै ॥ ५ ॥
इति इक्कीसवां शब्द समाप्त ।
अथ बाईसवां शब्द ॥ २२ ॥
अवधू छोड़ो मन विस्तारा ।
सो पद गहहु जाहिते सद्गति परब्रह्मते न्यारा ॥ १ ॥
नहीं महादेव नहीं महम्मद हरि हजरत तब नाहीं ।
आदम ब्रह्म नहीं तब होते नहीं धूप नहिं छाहीं ॥ २ ॥
असी सहस पैगंबर नाहीं सहस अठासी मुनी ।
चन्द्र सूर्य तारागण नाहीं मच्छ कच्छ नाह दूनी ॥ ३ ॥
वेद किताब स्मृति नहिं संयम नहीं यम न पारसाही ।
बांगनेवाज कलिमा नहिं होते रामो नहीं खोदाही ॥ ४ ॥
आदि अंत मन मध्य न होते आतश पवन न पानी ।
लखचौरासी जीवजन्तु नहीं साखी शब्द न वानी ॥ ५ ॥
कहै कबीर सुनो हो अवधू आगे करहु विचारा ।
पूरणब्रह्म कहांते प्रकटे किरतमकिनउपचारा ॥ ६ ॥