कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६२ ) बीजक कबीरदास ।
येते लवँगहि फल नहिं लागै चंदन फूल न फूलै ।
मच्छ शिकारी रमैजँगलमें सिंह समुद्रहिफूलै ॥ २ ॥
रेंडा रूख भया मलयागिरि चहुँदिशि फूटी वासा ।
तीनि लोक ब्रह्मांड खण्डमें देखै अंध तमासा ॥ ३ ॥
पंगुल मेरु सुमेरु उलंधै त्रिभुवन मुक्ता डोलै ।
गूंगा ज्ञान विज्ञान प्रकाशै अनहद वाणी बोलै ॥ ४ ॥
बांधि अकास पाताल पठावै शेष स्वर्गपर राजै ।
कहै कबीर राम हैं राजा जो कछु करैं सो छाजै ॥ ५ ॥
जोपूर्व यह कहि आये कि रामौनहीं खोडाइउ नहीं हैं जिनते समीची
गतिहोइ है तिनके पदगहौ ते कौन पुरुष हैं तिनकी सामर्थ्य कहिकै खोलिकै
या शब्दमों बतायो है । अब याकी टीका लिखते हैं ।
अवधू कुदरतिकी गति न्यारी
रंक निवाज करै वह राजा भूपति करै भिखारी ॥ १ ॥
येते लवँगहि फल नहिं लागे चंदन फूल न फूलै ।
मच्छ शिकारी रमै जंगलमें सिंह समुद्रहि झूलै ॥ २ ॥
हे अवधू जीवौ ! परम परपुरुष जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनकी कुदरति कहे सामर्थ्य
की गति न्यारी है । सुग्रीव जे पुत्रकलत्रते हीन, भिखारीकी नाईं बन बन
पहाड़ पहाड़ बागत रहे तिनको निवाजिकै राजा बनाइ दियो । औ सबराज-
नके जीतनवारे जे क्षत्रिय तिनको मारि कै पृथ्वी भूसुरन दैडारेउ । नारायण
के अवतार ऐसे परशुराम तिनको भिखारी करि दियो ॥ १ ॥ लवंगमें फल
नहीं लागे सोऊ लागै, चंदनमें फूल नहीं फूलै सोऊ फूलै है जाकी सामर्थ्य
ते । सो बाल्मीकीयमें लिख्यो है जब श्रीरघुनाथजी अयोध्याजी आये हैं
तब जे वृक्षफलै फूलैवाले नहीं रहे सूखेरहे तेऊ फलि फूलिआये हैं । औ