कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
गुरुवे नमः ।
अथ श्रीकबीरजी की कथा ।
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दोहा-अब कबीरजी की कथा, श्रोता सुनहु विशाल ॥
जो हिंदू अरु तुर्क को, उपदेश्यो सब काल ॥ १ ॥
हरि विमुखी सब धर्मिन काहीँ । कह्यो अधर्म अखंड सदाहीँ ॥
योग यज्ञ तप दान अचारा । राम भजन बिन कह्यो असारा ॥
कह्यों रमैनी साखी जेती । अटपट अर्थ शास्त्रमय तेती ॥
जो बीजकको ग्रंथ बनायो । तासु तिलक मो पितु निरमायो ॥
आगे कहिहौं मति अनुसारा । पूरुव पूरुष बंश विस्तारा ॥
श्री कबीरजी को इतिहासू । पूर्व पूरुष मम वर्णन तासू ॥
निज कुल वर्णत लागति लाजू । जनि हैं अस सब सुमति समाजू ॥
निजकुलको महत्व प्रगटायो । गाथा सकल मृषा मुख गायो ॥
पै श्रोता सब यदुपति दासा । ताते लागति कछु नहिं त्रासा ॥
सहि लेहैं सब मोरि ढिठाई । मैं न मृषा प्रभुता कछु गाई ॥
जस कबीर वर्ण्यौ निजग्रंथा । वर्णों निजकुल सोई पंथा ॥
और कबीर कथा सुखदाई । प्रियादास नाभा जस गाई ॥
दोहा-सोई मैं वर्णन करौं, संक्षेपहु विस्तार ॥
प्रथमहि जन्म कबीर को, श्रोता सुनहु उदार ॥ २ ॥
रामानंद रहे जग स्वामी । ध्यावत निशि दिन अंतर्यामी ॥
तिनके ढिग विधवा इक नारी । सेवा करै बड़ो श्रमधारी ॥
प्रभु यक दिन रह ध्यान लगाई । विधवा तिय तिनके ढिग आई ॥
प्रभुहिं कियो वंदन बिन दोषा । प्रभु कह पुत्रवती भरि घोषा ॥
तब तिय अपनो नाम बखाना । यह विपरीत दियो वरदाना ॥
स्वामी कह्यो निकसि मुख आयो । पुत्रवती हरि तोहिं बनायो ॥
ह्वै है पुत्र कलंक न लागी । तब सुत ह्वै है हरि अनुरागी ॥
२
( १८ ) कबीरजीकी कथा ।
तब तिय कर फुलका परि आयो । कछु दिनमें ताते सुत जायो ॥
जनत पुत्र नभ बजे नगारा । तदपि जननि उर सोच अपारा ॥
सो सुत लै तिय फेंक्यो दूरी । कढ़ी जोलाहिन तहँ यक रूरी ॥
सो बालकहि अनाथ निहारी । गोद राखि निज भवन सिधारी ॥
लालन पालन किय बहुभाँती । सेयो सुतहि नारि दिन राती ॥
दोहा-कछुक सयान कबीर जब, भये भई नभवानि ॥
सो प्रियदास कवित्तको, इक तुक कह्यो बखानि ॥ ३ ॥
( भई नभवानी देह तिलक रमानी करो
करो गुरु रामानंद गरे माला धारिये )
पुनि कबीर बोल्यो अस वानी । मोहिं मलेच्छ लियो गुरु जानी ॥
रामानंद मंत्र नहिं दैहैं । पै उपाय हम कछु रचि लैहैं ॥
अस कहि गंगा तीरे आयो । सीढ़ी तर निज वेष छुपायो ॥
मज्जन हित रामानंद आये । तेहि अँगुरी निज चरण चपाये ॥
रोय उठ्यो तहँ तुरत कबीरा । रामानंद कह्यो मतिधीरा ॥
राम राम कहु रौवे नाहीं । गुन्यो कबीर मंत्र सोइ काहीं ॥
रामानंदी तिलकहि धार्यो । माल पहिरि मुख राम उच्चार्यो ॥
मातपिता मान्यो बौराना । रामानंदहि वचन बखाना ॥
याको प्रभु किमि वैकलवायो । राम कहत सब काज भुलायो ॥
रामानंद कबीर बोलायो । ताके बिच परदा बँधवायो ॥
कहौ मंत्र तोको कब दीन्हो । कह्यो कबीर जौन बिधि कीन्हो ॥
रामनाम सब शास्त्रन सारा । वार तीनि मोहिं कियो उचारा ॥
दोहा-रामानंद कबीरको, गुनि अनन्य हरिदासु ॥
परदा टारिसु मिलत भे, दृगन बहावत आँसु ॥ ४ ॥
सुरति राम नामहि महँ लागी । कछु गृहकाज करहिं बड़भागी ॥
लै विकनन पट जाहि बजारै । जो माँगे ताही दैडारै ॥
परखें रहें मातु पितु ताके । गनैं न कछु दुख क्षुधा तृषाके ॥
कबीरजीकी कथा । (१९)
आवते कबीर लजाहीं । छूंछे हाथ कौन विधि जाहीं ॥
परचो सोच तब हरिको भारी । मम जनके पितु मातु दुखारी ॥
धरि व्यापारी रूप मुरारी । भरि बैलन बहु चाउर चारी ॥
आय कबीर भवन महँडारे । कह्यो पठायो पूत तिहारे ॥
माता कह्यो कहां सुत मोरा । कोहूकी वस्तु लेत नहिं छोरा ॥
तब कबीर घरमें व्यापारी । डारि अन्न गे अनत सिधारी ॥
जब कबीर गे भवन सिधारी । देखि अन्न हरि कृपा विचारी ॥
साधु तुरंत बोलाय लुटायो । यक दिनको घर नाहिं धरायो ॥
तुरत तोरि निज तानो बानो । राम भरोसा को उर आनो ॥
दोहा-तब काशीके विप्र सब, बैठ कबीरहिं घेरि ॥
मुडिअनको रोटी दियो, हमहिं बैठ मुख फेरि ॥५॥
कह्यो कबीर न करौ सँदेहू । मोहिं बजार भर गवननदेहू ॥
भागि गये कबीर मिसि येही । प्रभु कबीर हित भे संदेही ॥
आये धरि कबीरको रूपा । सबको भोजन दियो अनूपा ॥
यथा योग दै सबन बिदाई । पुनि लिय अपनो वेष छिपाई ॥
तब कबीरको बढ्यो प्रभाऊ । मानै रंकहु राजा राउ ॥
श्रोता सुनहु पुरान प्रमाना । रागभक्ति है धर्म प्रधांना ॥
राम विमुख जो कोउ जग होई । मूल सकल पापनको सोई ॥
लखि कबीर अति निज प्रभुताई । गुन्यौ उपद्रव ताहि महाई ॥
मेटन हेतु महा प्रभुताई । गणिका द्वार गये प्रगटाई ॥
दै धन गणिकाको गहि हाथा । चले बजार बजारहि साथा ॥
यह लखि भये संत जन शोकी । लहे अनंद असंत अशोकी ॥
इक दिन गये भूप दरबारा । उठ्यो न राजा तुच्छाविचारा ॥
दोहा-तब कबीर मनमें गुन्यो, भयो अनादर मोर ।
आदर और अनादरौ, सहि जातौ है थोर ॥ ६ ॥
रहे भरे जल घट बहुतेरे । ढरकायो तिनको कर फेरें ॥
राजा पूछ्यो का यह कीजै । तब कबीर बोल्यो सुनि लीजै ॥
(२०) कबीरजीकी कथा ।
श्रीजगदीश पुरी यहि काला । गई आगि लागि पाकहि शाला ॥
पुरी पठायो तुरत सवारा । पुरी लोग सब कियो उचारा ॥
जो कबीर वह दिन न बुझावत । तौ सिगरी नगरी जरि जावत ॥
यह सुनि भूपति बहुतं डेराना । रानी सों अस वचन बखाना ॥
हैं कबीर मूरति भगवाना । याको हम कीन्हो आपमाना ॥
ताते अब अस करहु विधाना । पैदल तेहिं ढिग करहिं पयाना ॥
त्राहि त्राहि कहि चरणन गिरहीं । जो वह कहै तबै घर फिरहीं ॥
अस विचारि राजा अरु रानी । राज विभव तहँ तजि डर मानी ॥
पैदर चले सुलाज विहाई । सचिव प्रजा सबै लिय पछि आई ॥
दोहा-राजा रानीकी विनय, सुनि कबीर मतिधीर ॥
बहत नीर हग पीर बिन, कियो धीर युत भीर ॥ ७ ॥
तहँ कवित्त प्रियदास यह, कीन्हो सुभग बखान ॥
सो मैं इत लिखि देतहौं, श्रोता सुनहु सुजान ॥ ८ ॥
कवित्त-कही राजा रानी सो जो बात यह सांच भई आंच लागी हियें
अब कहो कहा कीजिये । चलेही बनत चले शीश तृण बोझ भारी गरे सो
कुल्हारी बांधि तिया संग भीजिये ॥ निकसे बजार ह्वैकै डारि देई लोक लाज
कियो मैं अकाज छिन छिन तन छीजिये । दूरि ते कबीर देखि ह्वै गये अधीर
महा आये उठि आगे कह्यो डारि मति रीझिये ॥ १ ॥
रह्यो सिकंदर शाह सुजाना । सुनेहु कबीर प्रभाव महाना ॥
तब लिखि पठयो येक खलीता । सुनियत तुम्हें कबीर पुनीता ॥
न्याय ब्याकरण शास्त्र अनंता । करै एक जेहि संमत संता ॥
हिंदू मुसलमान दोउ दीना । निज निज मत देखो सुख भीना ॥
ऐसो शास्त्र देहु पठवाई । तो हम जानै अजमत भाई ॥
तब कबीर लिखि उतर पठायो । सहस शकट कागज पठवायो ॥
ऐसो सुनि कबीर खत शाहा । अति विस्मित ह्वैकै मनमाहा ॥
सहस शकट भरि कागज़ कोरा । पठयो दूत कविरकी ओरा ॥
सहस शकट कागज़ जब आयो । तब कबीर अति आनंद पायो ॥
सबके उपर शकट यक माहीं। लिख्यो राम अक्षर द्वै काहीं ॥
सहसहु शकट साहढिग भेजा। प्रगट्यो राम नाम कर तेजा ॥
सकल शास्त्र सब कागज़ माहीं। लिखिगे आपहि ते श्रम नाहीं ॥
दोहा-हिंदू और मलेच्छहू, चहँ जो मतके ग्रंथ ॥
सो तेहि ते निकसन लगे, और सकल सतपंथ॥ ९ ॥
जानि प्रभाव सिकंदर शाहा। काशीको आयो सउछाहा ॥
तब सह पंडित चलि फिरियादा। छूटी दोउ दीन मर्यादा ॥
यक जोलहा चेटक पढ़ि आयो। करि जादू विश्वास बढ़ायो ॥
तब कबीरको शाह बोलायो। जब कबीर दरबारहि आयो ॥
काजी कह करु साह सलामा। तब कबीर बोल्यो सुखधामा ॥
जानहिं राम सलाम न जानै। सुनत शाह कियं कोप महानै ॥
दियो हुकुम करियो नहिं देरी। गंगा बोरहु भरि पग बेरी ॥
सुनि अनुचर पग पाइ जँजीरे। बोरयो गंगा माहँ कबीर ॥
रहिगै बेरी नीर गँभीरा। गंग तीर भो ठाढ़ कबीरा ॥
पुनि लकड़ी पट अंगणि बांधी। आगि लगायो कोठरि धांधी ॥
भयो भस्म तनुको सब मैला। निकस्यो कंचनरूप उतैला ॥
पुनि इक मत्त मतंग बोलायो। कचरावन हित सौ हँधवायो ॥
दोहा-गजको सिंह स्वरूपसो, देखो परो कबीर ॥
भग्यो चिकारत नाग तब, भरयो महा भय भीर ॥ १० ॥
बादशाह अस देखि प्रभाऊ। पकरयो आय कबीरहि पाऊ ॥
देख्यों करामात मैं तेरी। अब रक्षा करु जगते मेरी ॥
मोसे भयो बडो अपराधा। दीन्हो रामदासको बाधा ॥
देशगाउँ धन जो कहि दीजै। सो याही क्षण प्रभु लैलीजै ॥
कह्यो कबीर रामको चाहैं। ग्राम दामसों काम कहा हैं ॥
तबै विरोधी पंडित जेते। विरचे यह उपाइ तहँ तेते ॥
श्रीवैष्णव दश पांच बनाई। दियो सकल देशन गोहराई ॥
यह कबीरको नेवतो जानो। सबकबीर घर करो पयानो ॥
(२२) कबीरजीकी कथा ।
यह सुनि साधु विप्र समुदाई । लियो कबीरहि को समुहाई ॥
लाखन विप्र साधु जुरि आए । तब कबीर मन माँहँ डेराए ॥
अपनो भवनत्यागि द्रुत भाग्यो । रघुपतिको यह नीक न लाग्यो ॥
धरि कबीरको रूप तुरंतै । शत शत मुद्रा दिय प्रति संतै ॥
दोहा-साधुनको सत्कार करि, विदा कियो रघुनाथ ॥
उदर पूर पूजन दियो, सबको गहि गहिहाथ ॥११॥
सब देशन विख्यात भो नामा । कह कबीर अनुकंपा रामा ॥
येहू विधि पंडित जब हारे । तब गोरखको तुरत हँकारे ॥
गोरख आय गयो जब कासी । लखि कबीरकों भयो हुलासी ॥
कूप उपर रचि पांचहि सूता । बैठ्यो ताहि प्रभाव अकूता ॥
तुरत कबीरहि लियो बोलाई । मोसो करहु विवाद बनाई ॥
अन्तरिक्ष तब बैठ कबीरा । देखत गोरख भयो अधीरा ॥
तेहि दिन गवन्यों गोरख हारी । आयो भोरहि सिंह सवारी ॥
कह्यो कबीरहिसों गोहराई । आवै वाद करै मन जाई ॥
तब मृगको रचि सिंह कबीरा । आयो चलो चलावत धीरा ॥
तब गोरख कह सुनहुँ कबीरा । गंगामें डूबै दोउ वीरा ॥
को काको हेरै यहि काला । कूदे गोरख प्रथम उताळा ॥
तब गोरख गूलर है गयऊ । जानि कबीर पकारि तेहि लयऊ ॥
दोहा-गोरख सुनहुँ कबीर कह, प्रगटो अबहुं तुरंत ।
नातो कर मलि डारि हौं, दोषदेहिंगेसंत ॥ १२ ॥
तब प्रसन्न गोरख प्रगटाना । तेहि कबीर अस वचन बखाना ॥
मैं अब छिपहूँ हेरि तुम लेहू । कह गोरख छिपु बिनु संदेहू ॥
तब डूब्यो मधि गंग कबीरा । है गो तुरत गंगको नीरा ॥
तब गोरख करि योग प्रभाऊ । जान्यो सकल कबीर दुराऊ ॥
दोऊ सिद्ध फेरि प्रगटाने । गोरख वंदन किय हुलसाने ॥
कह्यो सत्य साहब तुम रूपा । संत शिरोमणि शुद्ध अनूपा ॥
एक समय कबीर लै माता । चले जात कोउ देश विख्याता ॥
कबीरजीकी कथा। (२३)
तहँ इक मारग मोहर थैली। परी रही अतिशय तहँ मैली॥
माता थैली दौरि उठाई। तब वार्यो कबीर तहँ जाई॥
परधन ले न मातु दे डारी। परधन दुइ मुहँकी तरवारी॥
बैठ वृक्षतर देख तमासा। यह करि है केतेनको नासा॥
माता पूत बैठ तरु छांहीं। चारि सिपाही कढ़े तहाँहीं॥
दोहा-थैली चारि निहारिकै, हर्षित लियो उठाइ॥
चलत भये तेहि पंथको, लिय कबीर पछिआइ॥१३॥
जाय सिपाही इक पुरमाहीं। डेरा किये वणिक घर माहीं॥
सो तहँ कियो कबीरहु डेरा। एक सिपाही यक कहँ टेरा॥
डेरामें तुम दोउ रहि जाहू। द्वै जन जाहिं करन निरवाहू॥
अस कहि द्वै जन गये सिधाई। लियो हाटमहँ कछुक मिठाई॥
बैठि कुवाँ लागे जब खाने। तब आपसमहँ संमत ठाने॥
माहुर भरैं मिठाई माँहीं। जामें द्वै खाते मरिजाँहीं॥
नातो हिस्सां हैंहैं चारी। हम तुम होहिं उभय हिसदारी॥
अस विचारि भरि माहुर दीन्हे। उत विचारि डेरा दोउ कीन्हे॥
जब वै आइ खाइ इत सोवैं। तिनके तुरत प्राण हम खोवैं॥
इतनेमें दोउ लियो मिठाई। आय गए डेरै श्रमछाई॥
कह्यो दुहुँनसों खाहु मिठाई। इन कह थके अहैं हम भाई॥
अस कहि दोउ सिपाही सोये। श्वास बजत तिनको तहँ जोये॥
दोहा-तबै मिठाई खायकै, दोहुनके गलमाहिं॥
मारि कटारी पार किय, दोऊ मरे तहाँहिं॥१४॥
कछुक कालमहँ विष तहँ लाग्यो। ते दोऊ तुरतै तनु त्याग्यो॥
भोर वणिकलखि शोणितधारा। कोतवालके जाय पुकारा॥
कोतवाल तेहिं दोष लगायो। ताकी संपति सकल लुटायो॥
मोहर और वणिक धन जेतो। गयो भूप भंडारहि तेतो॥
कह कबीर लखु मातु तमाशा। ये मोहर दोउ ओर विनाशा॥
माता कह्यो सुवन चलु अनतै। कह कबीर लखु और दृगनतै॥
( २८ ) कबीरजीकी कथा।
थैली परी रही जेहिं ठौरा। सो थल रहै भूपको औरा॥
सो पठयो तुरंत असवारा। कह्यो देउ धन अहै हमारा॥
जेहिं वह नगर कह्यो सो राजा। हम न देब बिनसमर दराजा॥
यह सुनि भूप तुरत चढ़ि आयो। उभय भूप अति युद्ध मचायो॥
दोऊ लरि मरिगये तहांही। तब कबीर कह माता काहीं॥
जो चहै आपन कल्याना। तौ परधन नहिं लेय सुजाना॥
दोहा-जो परधन लेतो जननि, तासु हाल यह होथ॥
लगति न हाथ बराटिका, नाहक कलह उदोय॥ १५॥
येक अप्सरा आयकै, मोहन चह्यो कबीर॥
ताहि मातु कहि किय बिदा, करी न मनसिज पीर॥ १६॥
कबित्त।
येक समै जाय जगदीश पुरी वास कीन्हो भयो तहँ संतन समागम सोहावनो।
कोई संत बोल्यो कियो काशीमें चरित्र केते इते कीन्हौ काहे नहिं महिमा देखावनो॥
ताही समय कौतुक कबीर कीन्हो रघुराज देखि सब संतनको मंडल भो पावनो।
एक रूप हाथ चौर हांकते जगतनाथै एक रूप साधुन समाज प्रगटावनो॥ १॥
पुनि जगदीश पुरी ते सोई। चल्यो कबीर महामुद मोई॥
बांधव गढ मम दुर्ग महाना। शिवसंहिता जासु परमाना॥
सतयुग वरुणाचल कहवायो। कलि बांधवगढ नाम कहायो॥
पूरुव पुरुष रहे जे मोरा। रहे ते सब गुजरातहि ठोरा॥
तेऊ पाइ कबीर निदेशा। विंध्य पृष्ठ आये यहि देशा॥
तब ते बांधवगढै भुवालै। कीन्हों नृप बघेल निज आलै॥
आगे तासु कथा मैं गैहौं। सब श्रोतनको सविधि सुनैहौं॥
विरसिंहदेव बघेल भुवाला। सुनि कबीर आवनको हाला॥
चहुँकित दूत दियो बैठाई। दियो कबीरहि खबरि जनाई॥
और पंथ है नहिं कढि जाई। सावधान रहियो सब भाई॥
गुणि विरसिंहदेव अभिलाषा। ताको शिष्य करन चित राखा॥
बांधवगढै कबीर सिधारे। राजा आगु लेन पधारे॥
कबीरजीकी कथा । (२५)
दोहा- सादर ल्याइ कबीर को, करि उत्सव हर्षाइ ॥
शिष्य भये परिवारयुत, भवभय दियो मिटाइ ॥ १७ ॥
भक्तमालकी यह कथा, किय संक्षेप बखान ॥
अब कबीर इतिहासको, विस्तर सुनहु सुजान ॥ १८ ॥
देश गहोरा युत परिवारा । भयो शिष्य विरसिंह भुवारा ॥
कछुक काल लगि नृप ढिग माहीं । वस्यो कबीर सुमिरि हरि काहीं ॥
येक समय विरसिंह नरेशै । दियो बोलाई कबीर निदेशै ॥
देहैं तोहिं कछू हम ज्ञाना । ताते कर अस भूप विधाना ॥
यक ब्राह्मणी रचै यक धोती । वरष दिवसमहँ अतिहि उदोती ॥
लेइ पाणिमहँ तोरि कणसू । सूत भूमि परशै नहिं तासू ॥
सो धोती लै आवहु राजा । तब ह्वै हौ तुरंत कृतकाजा ॥
सुनि विरसिंह तुरंत सुखारी । गो ब्राह्मणीसमीप सिधारी ॥
धोती माग्यो तब द्विज नारी । सुनु महीप सो गिरा उचारी ॥
धोती वर्ष प्रयंत बनाऊं । जगन्नाथको जाय चढ़ाऊं ॥
लेहु महीश शीश बरु मोरा । धोती लेब उचित नहिं तोरा ॥
राजा फिरि कबीर ढिग आयो । सकल ब्राह्मणी वचन सुनायो ॥
दोहा- कह कबीर जगन्नाथकौ, धोती देइ चढ़ाइ ॥
प्रतीहार करि साथ नृप, तियको दियो पठाइ ॥ १९ ॥
जाय ब्राह्मणी वसन चढ़ायो । प्रभु ढिग ते तुरंत फिरि आयो ॥
कियो ब्राह्मणी धरन तहांहीं । स्वप्ने कह्यो नाथ तेहिं काहीं ॥
मांग्यो हम बांधवगढ़ काहीं । काहे दियो मोहिं लै नाहीं ॥
जाय कबीरै देइ चढ़ाई । तब जैहै पूरण फल पाई ॥
द्विज तिय फिरि बांधवगढ़ आई । दियो कबीरहि वसन चढ़ाई ॥
वसन पहिरि जब बैठि कबीरा । तब आयो विरसिंह प्रबीरा ॥
महितै यक कर ऊँच निहारा । तब कीन्हो अस वचन उचारा ॥
जो हरिको हरि लोकहु काहीं । दीजै म्वहिं देखाइ सुखमाहीं ॥
तौ प्रतीति मोरे परि जाई । ये तो सत्य कबीरै आई ॥
( २६ ) कबीरजीकी कथा ।
तब राजहि कबीर बैठायों । ध्यानावस्थित ताहि करायों ॥
योग मार्ग ते तेहि लै गयऊ । हरि हरि लोक देखावत भयऊ ॥
तब बिरसिंह भूप विश्वासे । लहन विज्ञानहि हिये हुलासे ॥
दोहा-श्रीकबीरजी तहँ कियो, सुभग ज्ञान उपदेश ॥
मिटे सकल संसारके, ताके काय कलेश ॥ २० ॥
कह कबीर लै चलहु शिकारा । भूप कियो तेहिं नाग सवारा ॥
गजके ऊपर हाथ सवाऊ । बैठ कबीर लखे सब काऊ ॥
बांधवगढ़के पूरुब ओरा । सदल तृषित भो नृप तेहि ठोरा ॥
कह्यो कबीरै गुरु भगवाना । जल बिन जात सबैके प्राना ॥
तब कबीर परभाव दिखायो । तुरत सकल तरु सफल बनायो ॥
प्रगटी वापी निर्मल नीरा । तहँ अंतर्हित भयो कबीरा ॥
अब बघेल वंशावलि जोई । श्रीकबीर विरचित है सोई ॥
अरु आगम निदेशहू ग्रंथा । तामें है बघेल सतपंथा ॥
उक्ति कबीरहि की लै नीकी । वर्णों मोरि उक्ति नहिं ठीकी ॥
यदपि वंश महिमा निजवरणत । उपजति लाज तदपि अतिसुखरत ॥
तेहि अनुसर वर्णों कर जोरी । श्रोता दियो मोहिं नहिं खोरी ॥
करि दरशन जगदीश कबीरा । उत्तर दिशा चल्यो मतिधीरा ॥
दोहा-बांधवदुर्ग बघेलको, ताढिग जबहिं कबीर ॥
आए तब नृप रामसिंह, आनँद युत मतिधीर ॥ २१ ॥
लै आगे ल्याए तुरत, बांधवदुर्ग लेवाइ ॥
अति सत्कार कियो तहाँ, मानि रूप यदुराइ ॥ २२ ॥
पुनि कबीर स्थानमें, भूपति गये अकेल ॥
तब कबीर नृपसों कह्यो, मोहिं गुरु कियो बघेल ॥ २३ ॥
तेरे पूरबके पुरुष, कियो गुरु जस मोहिं ॥
मैं लै आयो हंस ह्वै, सकल सुनाऊं तोहिं ॥ २४ ॥
वाराणसी जन्म मैं लीन्हों । जगन्नाथ दरशन मन दीन्हो ॥
तहँ समुद्रको करि मर्यादा । गमन्यो गुजरातै अविषादा ॥
तहँ को भूप पुत्र ते हीना । विनती कियो मोहिं अति दीना ॥
मैं वरदान दियो नृप काहीं । द्वै सुत हैंहें तुव तिय माहीं ॥
मोर अंश ते जो एक होई । वदन बाघ देखी सब कोई ॥
तब सुलंक नृप आनँद पायो । द्वै सुत निज तिय महँ जनमायो ॥
व्याघ्रदेव भो जेठ व्याघ्रमुख । अनुज तासु भो सुंदर हरदुख ॥
व्याघ्रवदन लखि पंडित आये । जानि अशुभ वनमहँ फिकवाये ॥
तब कबीर धरि पंडित वेशा । जाइ भूपको दियो निदेशा ॥
ल्याबहु व्याघ्रवदन सुत काहीं । ताते चलिहै वंश सदाहीं ॥
भूप सुलंकदेव बिन शंका । ल्यायो तुरत सुतहि अकलंका ॥
व्याघ्रदेव तेहि नाम सुहंसा । तिनते चल्यो बघेलहि वंसा ॥
दोहा-तब कबीर अस वर दियो, जगमें सहित प्रसंश ॥
अचल राज बांधौ रही, चली बयालिस वंश ॥ २५ ॥
व्याघ्रदेवके सुत नहिं रहेऊ । सो कबीरसों निज दुख कहेऊ ॥
तब कबीर किय मनमहँ ध्याना । कियो तुरत गिरिनार पयाना ॥
चंद्र विजय नृप रह्यो तहाँहीं । रानी इंदुमती रति छाहीं ॥
तेहि पूरब कबीर उपदेशा । दंपति किय हरिपुरहि प्रवेशा ॥
सो कबीर हरिलोक सिधारी । दंपति काहिं योग मति धारी ॥
ल्यायो द्रुत गुजरातहि देशा । कीन्हो व्याघ्रदेव सुतवेशा ॥
दियो नाम जैसिद्ध प्रसिद्धा । पूरित बुद्ध ऋद्वि अरु सिद्धा ॥
युवा बैस जैसिद्धहि आई । निशिमहँ चिंता भई महाई ॥
केहि विधि नाम चलै चहुँओरा । क्षत्रीधर्म विजय बरजोरा ॥
व्याघ्रदेवसों कह्यो प्रभाता । सो कह पितामहै कहु बाता ॥
तबै सुलंक देव ढिग जाई । निज मनकी शंका सब गाई ॥
सो सादर शासन तेहि दीन्हों । लै कछु सैन्य पयानो कीन्हों ॥
दोहा-गढा देशमहँ सो वस्यौ, भूप नर्मदा तीर ॥
कर्णदेव ताके भयो, तासु सरिस रणधीर ॥ २६ ॥
( २८ ) कबीरजीकी कथा ।
गंगापार हाँडिया खेरा । बैसनको तहँ रहै बसेरा ॥
तहँ कीन्हो विवाह सुत केरा । डार्यो चित्रकूट पुनि डेरा ॥
बीती तहँ बहुत दिन राती । व्याघ्रदेवके भयो पनाती ॥
बहुत काल जब बीतत भयऊ । तब जयसिंह छोंडि तनु दयऊ ॥
कर्ण देव तब भयो नरेशा । तासु पुत्र केशरी सुवेशा ॥
भयो केशरीसिंह जुमाना । तब कालिंजर कियो पयाना ॥
कालिंजर भूपति चंदेला । तासों कियो केशरी मेला ॥
लै चंदेल चतुरंग महाना । कीन्हो देश गहोरा थाना ॥
बहुत काल लगि वसे गहोरा । चल्यो केशरी उत्तर ओरा ॥
रह नवाब राजा तहँ भारी । कीन्हौं अमल केशरी सारी ॥
सुनि नवाब दल ले चढि आयो । सुनि केशरी निसान बजायो ॥
माच्यौ तहँ महा संत्रामा । विजय लह्यो केशरी ललामा ॥
दोहा-पुनि नवाब तहँ आइक, कियो केसरी मेल ॥
अर्ध राज्य देबे लग्यो, सो न लयो गुणिखेल ॥ २७ ॥
पुनि नवाब केशरी बघेला । गोरखपुर पर कीन्हों हेला ॥
तब नवाब अति प्रीति देखायो । गोरखपुर महँ तेहि बैठायो ॥
कहत भयो रक्षहु अब मोही । मह दल कोश लाज है तोही ॥
गोरखपुर वस केशरि भूपा । प्रगटायो यक पुत्र अनूपा ॥
इत नृप कर्ण देव मतिधीरा । चित्रकूटमहँ तज्यो शरीरा ॥
पुत्र केशरी को जो भयऊ । तेहिमल्हार नाम अस भयऊ ॥
सुत मलारके शारंग देवा । शारँगके भीमल हरि सेवा ॥
भीमल देव प्रचंड प्रतापी । अतिसुंदर हरि नामहि जापी ॥
भीमलदेव पुत्र जो भयऊ । ब्रह्मदेव तेहिं नामहि ठयऊ ॥
सो मगहरमहँ कीन्हो थाना । तहाँ वसत बहुकाल बिताना ॥
ब्रह्मदेव लै कटक महाई । मिले गहरवाननसों आई ॥
पुनि सिरनेतनदेश सिधारा । कीन्हो व्याह उछाह अपारा ॥
कबीरजीकी कथा । (२९)
दोहा-तहँ कोउ भूपति बंधु इक, कीन्हे रहै विरोध ॥
ताहिपकारि ल्यायो सदल, करि चहुँ दिशि अवरोध२८
ब्रह्मदेवके भो सिध देवा । नरहरि देव तासु सुत भवा ॥
नरहरिके भइ भेदसुधन्या । व्याहीसो शिरनेतन कन्या ॥
नरहरि वस्यो कछुक दिनकाशी । भेदचल्यो लै दल अरि नाशी ॥
भयो शालिवाहन सुभेद सुत । विरसिंहदेव तासु सुत नृप नुत ॥
भो विरसिंह महान भुवाला । वस्यो प्रयाग आइ तेहि काला ॥
लियो अमल सब देशन काहीं । लाख सवार रहैं सँगमाहीं ॥
वीरभानु सुत भो पुनि ताके । राजाराम भये तुम जाके ॥
जबै प्रयाग देश चहुँओरा । अमल्यो विरसिंह निजभुज जोरा॥
तबै प्रजा किय जाय पुकारा । दिल्ली शाह हिंमाऊद्वारा ॥
आयो कोउ कबीर बघेला । लाख सवार चलै बगमेला ॥
अमल कियो सो मुलुक तुम्हारा । सो सुनि शाह तुरंतसिधारा ॥
चित्रकूट आयो जब शाहा । चलन लग्यो विरसिंह नरनाहा ॥
दोहा-वीरभानु तब आयकै, वारम कियो बुझाइ ॥
तुम न जाहु म्लेच्छहि मिलै, ऐहै सो इतधाय ॥ २९ ॥
तब पुत्रहि विरसिंह बुझाई । चल्यो तुरंत निशान बजाई ॥
चित्रकूट विरसिंह सिधारा । सुनत शाह आगू पगधारा ॥
दोउदल भये बरोबर जबहीं । सादर शाह बोलायो तबहीं ॥
जब भूपति गो शाह समीपा । बिहँसि शाह कह सुनहु महीपा ॥
कवन हेतु परजन दुखदीन्हे । काहे मुलुक हमारो लीन्हे ॥
तब विरसिंह बोल्यो मुसकाई । कोहूसों किय नहीं लराई ॥
जे हमहीं मारें तेहि मारे । अमल्यो तिनके देश अपारे ॥
कह्यो शाह कहँ सुवन तुम्हारा । वीरभानु कहँ भूप हँकारा ॥
वीरभानु तब वाजि उड़ाई । परचोशाह हौदामहँ जाई ॥
शाह उतर हाथीते आयो । वीरभानु गोदहि बैठायो ॥
( ३० ) कबीरजीकी कथा ।
बैठों तख्त माँह जब शाहा । वीरभानु कहँ बहुत सराहा ॥
पुनि विरसिंहहि कह दिल्लिशा । अब हम तुमको देत अशीशा ॥
दोहा-बारहिं राजा करि स्ववश, करहु राज्य चहुँओर ।
बांधवगढ़ निज वसनको, लीजै नृपशिरमोर ॥ ३० ॥
असकहि लिखित दियो दिल्लिशा । चल्यो तबै विरसिंह महीशा ॥
दिल्लीपति प्रयाग लै आयो । करि मेहमानी भवन पठायों ॥
लै दल पुनि विरसिंह भुवारा । दक्षिण चल्यो सहित परिवारा ॥
आयो तमस नदीके तीरा । तब लाडिल परिहार सुवीरा ॥
नरो शैल महँ दुर्ग बनाई । वसत रहै सो बली महाई ॥
सो मारग महँ कियो लड़ाई । तासु नरो गढ़ लियो छँड़ाई ॥
नरो जीति विरसिंह भुवाला । बाँधा नगर रह्यो तेहि काला ॥
तहाँ कछुक दिन कियो निवासा । पुनि गवनतमो दक्षिण आसा ॥
रहे रतवपुर करचुलि राजा । तुव पितुकेर कियो तहँ काजा ॥
सोदायज महँ बाँधव दीन्ह्यो । तहँ विरसिंह वास चलि कीन्ह्यो ॥
वीरभानुको दै पुनि राजू । आय प्रयाग बस्यो कृतकाजू ॥
कह्यो तोरि वंशावलि ऐसी । जानी रही मोरि यह जैसी ॥
दोहा-सुनि अपनी वंशावली, बहुरि कह्यो शिरनाइ ॥
अब भविष्य यहि वंशकी, दीजै कथा सुनाइ ॥ ३१ ॥
बांधव दुर्ग बसीकी नाहीं । राज्य चली यहि भाँति सदाहीं ॥
आगे कैसो ह्वैहै बंशा । यह सिगरो अब करहु प्रशंसा ॥
तब कबीर बोले मुसुकाई । राजाराम सुनहु चित लाई ॥
तुम्हरे दशयें वंशहि माहीं । लैहौ तुमही जन्म तहाँहीं ॥
सुत समेत बांधवगढ ऐहौ । बीजक ग्रंथ मोर तहँ पैहौ ॥
ताको अर्थ समर्थन करिहौ । संत समाजनको सुखभारिहौ ॥
वीरभद्र तुम्हरो सुत होई । करिहै राज्य सदा सुख मोई ॥
संवत अष्टादश नवषटमें । ऐहौ बांधव गढ़ अटपटमें ॥
तबते ताहि विशेष बसैहौ । अपनो विमल महलरचवैहौ ॥
कबीरजीकी कथा । (३१)
और भविष्य कबीर जी गायो । वर्णत तेहि मैं पार न पायो ॥
यक कबीर आगम निर्देशा । मम शासित वर्णत युगलेशा ॥
तामें सकल अहँ विस्तारा । जानिलेहु सब संत उदारा ॥
दोहा-और कबीर कथा अमित, वरणि लहौं किमिपार ॥
संक्षेपैते इत लिख्यो, कीन्ह्यो नहिं विस्तार ॥ ३२ ॥
यथा बघेलवंशकी गाथा । वर्ण्यौ भूत भविष्यहु नाथा ॥
तैसेहि अबलौं प्रगट देखाती । पलहू बढ़ै न पल घटि जाती ॥
मगहर गे यक समय कबीरा । लीला कीन्ही तजन शरीरा ॥
अतिशय पुष्प तुरंत मँगाई । तामें निजतन दियो दुरोई ॥
सबके देखत तज्यो शरीरा । हिंदू यमनहुकी भै भीरा ॥
हिंदू यमन शिष्य रहे दोउ । आपूस में भाषे सब कोउ ॥
यमन कह्यो माटी हम दैहैं । हिंदू कहैं अनलमें लैहैं ॥
तब दोउ जाय पुष्पकहँ टारयो । नाहिं कबीर शरीर निहारयो ॥
आधे आधे लै दोउ सुमना । दीह्यो हिंदू गाड़्यो यमना ॥
भये कबीर प्रगट मथुरामें । विचरन लगे सकल वसुधामें ॥
यहि विधि अहँ अनेकनगाथा । सति कबीर है वपु जगनाथा ॥
यह लीला करि सकल कबीरा । आयो बांधव पुनि मतिधीरा ॥
दोहा-अबलौं गुहा कबीरकी, बांधवडुर्ग मँझार ॥
जगन्नाथको पंथ सो, पावत नहिं कोउ पार ॥ ३३ ॥
इति श्रीभक्तमालान्तर्गत श्रीकबीरजीकी कथा स्वामी युगलानन्द कबीरपंथी
भारतपथिकद्वारा संशोधित समाप्ता ।
( ३२ ) शेष दोनोंशब्द ।
शब्द एकसौ चौदह ॥ ११४ ॥
सार शब्द से बांचि हो मानहु एतवारा हो।
आदि पुरुष एक बृक्ष है निरंजन डारा हो ॥
त्रिदेवा शाखा भये पत्ती संसारा हो।
ब्रह्मा वेद सही किये शिव योग पसारा हो ॥
विष्णु माया उतपति किया उरला व्यवहारा हो।
तीन लोक दशहूं दिशा यम रोकिन द्वारा हो ॥
कीर है सब जीयरा लिय विषका चारा हो।
ज्योति स्वरूपी हाकिमा जिन अमल पसारा हो॥
कर्मकी बंसी लायके पकरचो जग सारा हो।
अमल मिटाऊं तासुका पठऊं भव पारा हो ॥
कह कबीर निर्भय करौं परखो टकसारा हो।
शब्द एक सौ पन्द्रह ॥ ११५ ॥
सन्तौ ऐसी भूल जगमाहीं जाते जिव मिथ्या में जाहीं ॥
पहिले भूले ब्रह्म अखण्डित झाईं आपुहि मानी।
झाईं मानत इच्छा कीन्हा इच्छाते अभिमानी ॥
अभिमानी करता ह्वै बैठे नाना पंथ चलाया।
वही भूल में सब जग भूले भूलक मर्म नहिं पाया ॥
लख चौरासी भूल ते कहिये भूलहि जग विटमाया।
जो है सनातन सो भूला अब सोइ भूलहि खाय ॥
भूल मिटै गुरु मिलै पारखी परख देइ लखाई।
कहहि कबीर भूल की औषध परख सब की भाई ॥११५॥
इति ।
श्रीकबीरजीकी कथा । ( ३३ )
( श्रीनाभाजीके भक्तमालसे टीकासहित )
॥ मूल ॥ कबीर कानि राखी नहीं वर्णाश्रमषटदरशनी ॥ भक्तिविमुखजोधर्म
सोअधर्मकरिगायो । योगयज्ञव्रतदानभजनविनतुच्छदिखायो ॥ हिंदूतुरकप्रमानर-
मैनी सबदीसाषी । पक्षपात नहिं वचनसबहिंकेहितकीभाषी ॥ आरूढ़दशाहैजगतपर
मुखदेखीनाहिंनभनी । कबीरकानिराखीनहींवर्णाश्रमषटदरशनी ॥ ६० ॥
टीका ॥ अतिहीँगँभीरमतिसरसकवीरहियोलियोभक्तिभावजातिपाँतिसबटारिये॥
भई नभवाणीदेहतिलक रवानीकरौ करौगुरुरामानंद गरेमालधारिये । देखेनहींमुखमे
रोज़ानिकैम्लेच्छमोको जातन्हानगंगाकहीमगतनडारिये । रजनीकेशेषमयआवेश-
सोंचलतआपपरै पगरानीकहेंमंत्रसोंविचारिये ॥ २६५ ॥ कीनीवहीबातमालाति-
ळकबनाइगातमानिउतपातमातशोर कियोभार
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मूल रमैनी प्रारम्भ ।
( अक्षर खण्डकी रमैनी )
प्रथमशब्दहैशून्याकार ॥ परा^१अव्यक्त सोकह्रै बिचार॥अंतः
करणउदयजबहोय ॥ पश्यंति^२अर्धमात्रासोय ॥ स्वर^३सोकंठ
मँध्यमा^४जान ॥ चौंतिस^५अक्षरमुखस्थान ॥ अनवनिबानि^६तेहि-
केमांहि ॥ विनजानेनरभटका^७खांहि ॥ बानी अक्षर स्वर संमु-
दाय ॥ अर्ध^८पश्यंतिजातनशाय ॥ शून्याकारसोप्रथमारहै ॥
अक्षरब्रह्मसनातनकह्रै ॥ निर्वृति^९ ॥ प्रवृति^१०हैशब्दाकार ॥ प्रण-
व^११जानेइहेबिवार ॥ साक्षी ॥ अँकुलाहट^१२केशब्दजो, भई
चारसोभेष ॥ बहुबानीबहुरूपकै पृथकपृथकसबदेश ॥ १ ॥
रमैनी॥अनवनिबानीचारप्रकार ॥ १ काल २ संधि ३ झांई ४
औ सार॥ हेतुशब्दबूझियेजोय ॥ जानिय येंथारथ^१३ द्वारा^१५सोय॥
भ्रमिक^१४झांईसंधिकऔकाल ॥ सारशब्दकाटेभ्रमजाल ॥ द्वारों
चारअर्थपरमान ॥ पद^१६ारथ व्यंग^१७ाथपहिचान भौार्थ^१८ १९
ध्वन्यार्थचार ॥ द्वाराशब्दकोइलखेविचार ॥ पैरा^२० पराइति
मुखसोजान ॥ मोरे सोरहकला निदान ॥ साक्षी ॥ विन-
जानेसोरहकला, शब्दीशब्द कौआयै^२१ ॥ शब्द सुधारप-
१ इसका स्थान नाभी ॥ २ इसका स्थान हृदय ॥ ३ सोलह स्वर अ
आ इत्यादि ॥ ४ इसका स्थान कंठ ॥ ५ व्यंजन ॥ ६ नाना प्रकारकी ॥
७ इकट्ठा ॥ ८ पश्यंति होय फिर परा अवस्था को प्राप्त होता है ॥ ९ लय॥
१० उत्पत्ति ॥ ११ ओंकार ॥ १२ उबिआहट ॥ १३ सच्चा ॥ १४
भरमाने ॥ १५ मार्ग, रस्ता ॥ १६ पद, अर्थ, शब्दका जो अर्थ, शब्दार्थ॥
१७ व्यंग, अर्थ, व्यंग भाव से जो कहा जावे ॥ १८ मतलब आशय
वाला जो अर्थ १९ ध्वनिमात्र ॥ २० परा और अपरा दो विद्या कोई शब्द
परा विद्या को वर्णन करता है कोई अपरा को ॥ २१ भटकता है ॥
( ३६ ) रमैनी ।
हिचानियै, कौनकहावौआय ॥२॥ रमैनी ॥ अक्षरवेदपुराणब
खान ॥ धरमकरमतीरथअनुमान ॥ अक्षरपूजासेवाजाप॥और
महातमजेतेथाप॥यहीकहावतअक्षरकाल॥जाएगडीउरह्योके
भालै ॥ ओंहं सोहं आतमराम ॥ मायामंत्रादिकसब काम ॥
येसबअक्षर संधि कहै ॥ जेहिमानिनिशिवासर जिव रहै ॥ नि-
रगुणअलखअकहनिर्वाण ॥ मनबुधि इन्द्रिय जायनजान ॥
विधिनिषेधजहं ब्वैैंनितादोय ॥ कहैंकबीरपदझांईसोय ॥
साक्षी ॥ प्रथमेझांई झांकते, पैठासंधिककाल ॥ पुनिझांईकी
झांईरही, गुरुबिन सकेकोढाल ॥ ३ ॥ रमैनी ॥ प्रथमही
संभैवशब्द अमान ॥ शब्द्दीशब्दकियोअनुमान ॥ मानमहा
तममानभुलान ॥ मानत मानत बावनठान ॥ फेरा फिरतभ-
यो भ्रमजाल ॥ देहादिकजगभयें विशाल ॥ देहभईतेदेहिक-
होय ॥ जगतभईतेकती कोय ॥ कती कौंरणकर्महिलाग ॥
घरघर लोगकियो अनुराग ॥ २७छौ दरशनवर्णश्रमचार ॥ २९नौ
छौ भए पाखंडबेकार ॥ कोई ३१त्यागी ३२अनुरागी कोय ॥ विधि-
निषेधमाबधियादोय ॥ कल्पेउग्रंथपुराणअनेक ॥ भरभिरहें
सबबिनाबिवेक ॥ साक्षी ॥ भरभिरहासब शब्दमें, सबदी-
शब्दनजान ॥ गुरुकृपानिजपरखैबल, परखोधोखाज्ञान ॥ ४ ॥
२२ तीर ॥ २३ जगत को निषेधकर और ब्रह्मका प्रतिपादन करना यह
है स्त्री जिसका ॥ २४ होताभया ॥ २५ शब्दका मालिक शब्द कहने वाला ॥
२६ हेतु॥२७ १योगी२ जंगम३ सेवड़ा ४ सन्यासी५दर्भेश ६ छठांकहिये ब्राह्म
ण छ घर छ है भेश ॥ २८ ब्राह्मण १ क्षत्री २ वैश्य ३ शूद्र ४ वर्ण और
ब्रह्मचर्य्य १ गृहस्थ २ बाणप्रस्थ ३ सन्यास ४ आश्रम ॥ २९-३०=
छ्यानवेपाखण्ड ३१ विरक्त ॥ ३२ गृहस्थ ॥