कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसबके उपर शकट यक माहीं। लिख्यो राम अक्षर द्वै काहीं ॥
सहसहु शकट साहढिग भेजा। प्रगट्यो राम नाम कर तेजा ॥
सकल शास्त्र सब कागज़ माहीं। लिखिगे आपहि ते श्रम नाहीं ॥
दोहा-हिंदू और मलेच्छहू, चहँ जो मतके ग्रंथ ॥
सो तेहि ते निकसन लगे, और सकल सतपंथ॥ ९ ॥
जानि प्रभाव सिकंदर शाहा। काशीको आयो सउछाहा ॥
तब सह पंडित चलि फिरियादा। छूटी दोउ दीन मर्यादा ॥
यक जोलहा चेटक पढ़ि आयो। करि जादू विश्वास बढ़ायो ॥
तब कबीरको शाह बोलायो। जब कबीर दरबारहि आयो ॥
काजी कह करु साह सलामा। तब कबीर बोल्यो सुखधामा ॥
जानहिं राम सलाम न जानै। सुनत शाह कियं कोप महानै ॥
दियो हुकुम करियो नहिं देरी। गंगा बोरहु भरि पग बेरी ॥
सुनि अनुचर पग पाइ जँजीरे। बोरयो गंगा माहँ कबीर ॥
रहिगै बेरी नीर गँभीरा। गंग तीर भो ठाढ़ कबीरा ॥
पुनि लकड़ी पट अंगणि बांधी। आगि लगायो कोठरि धांधी ॥
भयो भस्म तनुको सब मैला। निकस्यो कंचनरूप उतैला ॥
पुनि इक मत्त मतंग बोलायो। कचरावन हित सौ हँधवायो ॥
दोहा-गजको सिंह स्वरूपसो, देखो परो कबीर ॥
भग्यो चिकारत नाग तब, भरयो महा भय भीर ॥ १० ॥
बादशाह अस देखि प्रभाऊ। पकरयो आय कबीरहि पाऊ ॥
देख्यों करामात मैं तेरी। अब रक्षा करु जगते मेरी ॥
मोसे भयो बडो अपराधा। दीन्हो रामदासको बाधा ॥
देशगाउँ धन जो कहि दीजै। सो याही क्षण प्रभु लैलीजै ॥
कह्यो कबीर रामको चाहैं। ग्राम दामसों काम कहा हैं ॥
तबै विरोधी पंडित जेते। विरचे यह उपाइ तहँ तेते ॥
श्रीवैष्णव दश पांच बनाई। दियो सकल देशन गोहराई ॥
यह कबीरको नेवतो जानो। सबकबीर घर करो पयानो ॥