कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २८ ) कबीरजीकी कथा।
थैली परी रही जेहिं ठौरा। सो थल रहै भूपको औरा॥
सो पठयो तुरंत असवारा। कह्यो देउ धन अहै हमारा॥
जेहिं वह नगर कह्यो सो राजा। हम न देब बिनसमर दराजा॥
यह सुनि भूप तुरत चढ़ि आयो। उभय भूप अति युद्ध मचायो॥
दोऊ लरि मरिगये तहांही। तब कबीर कह माता काहीं॥
जो चहै आपन कल्याना। तौ परधन नहिं लेय सुजाना॥
दोहा-जो परधन लेतो जननि, तासु हाल यह होथ॥
लगति न हाथ बराटिका, नाहक कलह उदोय॥ १५॥
येक अप्सरा आयकै, मोहन चह्यो कबीर॥
ताहि मातु कहि किय बिदा, करी न मनसिज पीर॥ १६॥
कबित्त।
येक समै जाय जगदीश पुरी वास कीन्हो भयो तहँ संतन समागम सोहावनो।
कोई संत बोल्यो कियो काशीमें चरित्र केते इते कीन्हौ काहे नहिं महिमा देखावनो॥
ताही समय कौतुक कबीर कीन्हो रघुराज देखि सब संतनको मंडल भो पावनो।
एक रूप हाथ चौर हांकते जगतनाथै एक रूप साधुन समाज प्रगटावनो॥ १॥
पुनि जगदीश पुरी ते सोई। चल्यो कबीर महामुद मोई॥
बांधव गढ मम दुर्ग महाना। शिवसंहिता जासु परमाना॥
सतयुग वरुणाचल कहवायो। कलि बांधवगढ नाम कहायो॥
पूरुव पुरुष रहे जे मोरा। रहे ते सब गुजरातहि ठोरा॥
तेऊ पाइ कबीर निदेशा। विंध्य पृष्ठ आये यहि देशा॥
तब ते बांधवगढै भुवालै। कीन्हों नृप बघेल निज आलै॥
आगे तासु कथा मैं गैहौं। सब श्रोतनको सविधि सुनैहौं॥
विरसिंहदेव बघेल भुवाला। सुनि कबीर आवनको हाला॥
चहुँकित दूत दियो बैठाई। दियो कबीरहि खबरि जनाई॥
और पंथ है नहिं कढि जाई। सावधान रहियो सब भाई॥
गुणि विरसिंहदेव अभिलाषा। ताको शिष्य करन चित राखा॥
बांधवगढै कबीर सिधारे। राजा आगु लेन पधारे॥