सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 766 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 22

कबीरजीकी कथा । (१९)

आवते कबीर लजाहीं । छूंछे हाथ कौन विधि जाहीं ॥
परचो सोच तब हरिको भारी । मम जनके पितु मातु दुखारी ॥
धरि व्यापारी रूप मुरारी । भरि बैलन बहु चाउर चारी ॥
आय कबीर भवन महँडारे । कह्यो पठायो पूत तिहारे ॥
माता कह्यो कहां सुत मोरा । कोहूकी वस्तु लेत नहिं छोरा ॥
तब कबीर घरमें व्यापारी । डारि अन्न गे अनत सिधारी ॥
जब कबीर गे भवन सिधारी । देखि अन्न हरि कृपा विचारी ॥
साधु तुरंत बोलाय लुटायो । यक दिनको घर नाहिं धरायो ॥
तुरत तोरि निज तानो बानो । राम भरोसा को उर आनो ॥
दोहा-तब काशीके विप्र सब, बैठ कबीरहिं घेरि ॥
मुडिअनको रोटी दियो, हमहिं बैठ मुख फेरि ॥५॥
कह्यो कबीर न करौ सँदेहू । मोहिं बजार भर गवननदेहू ॥
भागि गये कबीर मिसि येही । प्रभु कबीर हित भे संदेही ॥
आये धरि कबीरको रूपा । सबको भोजन दियो अनूपा ॥
यथा योग दै सबन बिदाई । पुनि लिय अपनो वेष छिपाई ॥
तब कबीरको बढ्यो प्रभाऊ । मानै रंकहु राजा राउ ॥
श्रोता सुनहु पुरान प्रमाना । रागभक्ति है धर्म प्रधांना ॥
राम विमुख जो कोउ जग होई । मूल सकल पापनको सोई ॥
लखि कबीर अति निज प्रभुताई । गुन्यौ उपद्रव ताहि महाई ॥
मेटन हेतु महा प्रभुताई । गणिका द्वार गये प्रगटाई ॥
दै धन गणिकाको गहि हाथा । चले बजार बजारहि साथा ॥
यह लखि भये संत जन शोकी । लहे अनंद असंत अशोकी ॥
इक दिन गये भूप दरबारा । उठ्यो न राजा तुच्छाविचारा ॥
दोहा-तब कबीर मनमें गुन्यो, भयो अनादर मोर ।
आदर और अनादरौ, सहि जातौ है थोर ॥ ६ ॥
रहे भरे जल घट बहुतेरे । ढरकायो तिनको कर फेरें ॥
राजा पूछ्यो का यह कीजै । तब कबीर बोल्यो सुनि लीजै ॥