कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २८ ) कबीरजीकी कथा ।
गंगापार हाँडिया खेरा । बैसनको तहँ रहै बसेरा ॥
तहँ कीन्हो विवाह सुत केरा । डार्यो चित्रकूट पुनि डेरा ॥
बीती तहँ बहुत दिन राती । व्याघ्रदेवके भयो पनाती ॥
बहुत काल जब बीतत भयऊ । तब जयसिंह छोंडि तनु दयऊ ॥
कर्ण देव तब भयो नरेशा । तासु पुत्र केशरी सुवेशा ॥
भयो केशरीसिंह जुमाना । तब कालिंजर कियो पयाना ॥
कालिंजर भूपति चंदेला । तासों कियो केशरी मेला ॥
लै चंदेल चतुरंग महाना । कीन्हो देश गहोरा थाना ॥
बहुत काल लगि वसे गहोरा । चल्यो केशरी उत्तर ओरा ॥
रह नवाब राजा तहँ भारी । कीन्हौं अमल केशरी सारी ॥
सुनि नवाब दल ले चढि आयो । सुनि केशरी निसान बजायो ॥
माच्यौ तहँ महा संत्रामा । विजय लह्यो केशरी ललामा ॥
दोहा-पुनि नवाब तहँ आइक, कियो केसरी मेल ॥
अर्ध राज्य देबे लग्यो, सो न लयो गुणिखेल ॥ २७ ॥
पुनि नवाब केशरी बघेला । गोरखपुर पर कीन्हों हेला ॥
तब नवाब अति प्रीति देखायो । गोरखपुर महँ तेहि बैठायो ॥
कहत भयो रक्षहु अब मोही । मह दल कोश लाज है तोही ॥
गोरखपुर वस केशरि भूपा । प्रगटायो यक पुत्र अनूपा ॥
इत नृप कर्ण देव मतिधीरा । चित्रकूटमहँ तज्यो शरीरा ॥
पुत्र केशरी को जो भयऊ । तेहिमल्हार नाम अस भयऊ ॥
सुत मलारके शारंग देवा । शारँगके भीमल हरि सेवा ॥
भीमल देव प्रचंड प्रतापी । अतिसुंदर हरि नामहि जापी ॥
भीमलदेव पुत्र जो भयऊ । ब्रह्मदेव तेहिं नामहि ठयऊ ॥
सो मगहरमहँ कीन्हो थाना । तहाँ वसत बहुकाल बिताना ॥
ब्रह्मदेव लै कटक महाई । मिले गहरवाननसों आई ॥
पुनि सिरनेतनदेश सिधारा । कीन्हो व्याह उछाह अपारा ॥