कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८ ) कबीरजीकी कथा ।
तब तिय कर फुलका परि आयो । कछु दिनमें ताते सुत जायो ॥
जनत पुत्र नभ बजे नगारा । तदपि जननि उर सोच अपारा ॥
सो सुत लै तिय फेंक्यो दूरी । कढ़ी जोलाहिन तहँ यक रूरी ॥
सो बालकहि अनाथ निहारी । गोद राखि निज भवन सिधारी ॥
लालन पालन किय बहुभाँती । सेयो सुतहि नारि दिन राती ॥
दोहा-कछुक सयान कबीर जब, भये भई नभवानि ॥
सो प्रियदास कवित्तको, इक तुक कह्यो बखानि ॥ ३ ॥
( भई नभवानी देह तिलक रमानी करो
करो गुरु रामानंद गरे माला धारिये )
पुनि कबीर बोल्यो अस वानी । मोहिं मलेच्छ लियो गुरु जानी ॥
रामानंद मंत्र नहिं दैहैं । पै उपाय हम कछु रचि लैहैं ॥
अस कहि गंगा तीरे आयो । सीढ़ी तर निज वेष छुपायो ॥
मज्जन हित रामानंद आये । तेहि अँगुरी निज चरण चपाये ॥
रोय उठ्यो तहँ तुरत कबीरा । रामानंद कह्यो मतिधीरा ॥
राम राम कहु रौवे नाहीं । गुन्यो कबीर मंत्र सोइ काहीं ॥
रामानंदी तिलकहि धार्यो । माल पहिरि मुख राम उच्चार्यो ॥
मातपिता मान्यो बौराना । रामानंदहि वचन बखाना ॥
याको प्रभु किमि वैकलवायो । राम कहत सब काज भुलायो ॥
रामानंद कबीर बोलायो । ताके बिच परदा बँधवायो ॥
कहौ मंत्र तोको कब दीन्हो । कह्यो कबीर जौन बिधि कीन्हो ॥
रामनाम सब शास्त्रन सारा । वार तीनि मोहिं कियो उचारा ॥
दोहा-रामानंद कबीरको, गुनि अनन्य हरिदासु ॥
परदा टारिसु मिलत भे, दृगन बहावत आँसु ॥ ४ ॥
सुरति राम नामहि महँ लागी । कछु गृहकाज करहिं बड़भागी ॥
लै विकनन पट जाहि बजारै । जो माँगे ताही दैडारै ॥
परखें रहें मातु पितु ताके । गनैं न कछु दुख क्षुधा तृषाके ॥