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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 766 में से

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पृष्ठ 33

( ३० ) कबीरजीकी कथा ।
बैठों तख्त माँह जब शाहा । वीरभानु कहँ बहुत सराहा ॥
पुनि विरसिंहहि कह दिल्लिशा । अब हम तुमको देत अशीशा ॥
दोहा-बारहिं राजा करि स्ववश, करहु राज्य चहुँओर ।
बांधवगढ़ निज वसनको, लीजै नृपशिरमोर ॥ ३० ॥
असकहि लिखित दियो दिल्लिशा । चल्यो तबै विरसिंह महीशा ॥
दिल्लीपति प्रयाग लै आयो । करि मेहमानी भवन पठायों ॥
लै दल पुनि विरसिंह भुवारा । दक्षिण चल्यो सहित परिवारा ॥
आयो तमस नदीके तीरा । तब लाडिल परिहार सुवीरा ॥
नरो शैल महँ दुर्ग बनाई । वसत रहै सो बली महाई ॥
सो मारग महँ कियो लड़ाई । तासु नरो गढ़ लियो छँड़ाई ॥
नरो जीति विरसिंह भुवाला । बाँधा नगर रह्यो तेहि काला ॥
तहाँ कछुक दिन कियो निवासा । पुनि गवनतमो दक्षिण आसा ॥
रहे रतवपुर करचुलि राजा । तुव पितुकेर कियो तहँ काजा ॥
सोदायज महँ बाँधव दीन्ह्यो । तहँ विरसिंह वास चलि कीन्ह्यो ॥
वीरभानुको दै पुनि राजू । आय प्रयाग बस्यो कृतकाजू ॥
कह्यो तोरि वंशावलि ऐसी । जानी रही मोरि यह जैसी ॥
दोहा-सुनि अपनी वंशावली, बहुरि कह्यो शिरनाइ ॥
अब भविष्य यहि वंशकी, दीजै कथा सुनाइ ॥ ३१ ॥
बांधव दुर्ग बसीकी नाहीं । राज्य चली यहि भाँति सदाहीं ॥
आगे कैसो ह्वैहै बंशा । यह सिगरो अब करहु प्रशंसा ॥
तब कबीर बोले मुसुकाई । राजाराम सुनहु चित लाई ॥
तुम्हरे दशयें वंशहि माहीं । लैहौ तुमही जन्म तहाँहीं ॥
सुत समेत बांधवगढ ऐहौ । बीजक ग्रंथ मोर तहँ पैहौ ॥
ताको अर्थ समर्थन करिहौ । संत समाजनको सुखभारिहौ ॥
वीरभद्र तुम्हरो सुत होई । करिहै राज्य सदा सुख मोई ॥
संवत अष्टादश नवषटमें । ऐहौ बांधव गढ़ अटपटमें ॥
तबते ताहि विशेष बसैहौ । अपनो विमल महलरचवैहौ ॥