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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 26

कबीरजीकी कथा। (२३)
तहँ इक मारग मोहर थैली। परी रही अतिशय तहँ मैली॥
माता थैली दौरि उठाई। तब वार्यो कबीर तहँ जाई॥
परधन ले न मातु दे डारी। परधन दुइ मुहँकी तरवारी॥
बैठ वृक्षतर देख तमासा। यह करि है केतेनको नासा॥
माता पूत बैठ तरु छांहीं। चारि सिपाही कढ़े तहाँहीं॥
दोहा-थैली चारि निहारिकै, हर्षित लियो उठाइ॥
चलत भये तेहि पंथको, लिय कबीर पछिआइ॥१३॥
जाय सिपाही इक पुरमाहीं। डेरा किये वणिक घर माहीं॥
सो तहँ कियो कबीरहु डेरा। एक सिपाही यक कहँ टेरा॥
डेरामें तुम दोउ रहि जाहू। द्वै जन जाहिं करन निरवाहू॥
अस कहि द्वै जन गये सिधाई। लियो हाटमहँ कछुक मिठाई॥
बैठि कुवाँ लागे जब खाने। तब आपसमहँ संमत ठाने॥
माहुर भरैं मिठाई माँहीं। जामें द्वै खाते मरिजाँहीं॥
नातो हिस्सां हैंहैं चारी। हम तुम होहिं उभय हिसदारी॥
अस विचारि भरि माहुर दीन्हे। उत विचारि डेरा दोउ कीन्हे॥
जब वै आइ खाइ इत सोवैं। तिनके तुरत प्राण हम खोवैं॥
इतनेमें दोउ लियो मिठाई। आय गए डेरै श्रमछाई॥
कह्यो दुहुँनसों खाहु मिठाई। इन कह थके अहैं हम भाई॥
अस कहि दोउ सिपाही सोये। श्वास बजत तिनको तहँ जोये॥
दोहा-तबै मिठाई खायकै, दोहुनके गलमाहिं॥
मारि कटारी पार किय, दोऊ मरे तहाँहिं॥१४॥
कछुक कालमहँ विष तहँ लाग्यो। ते दोऊ तुरतै तनु त्याग्यो॥
भोर वणिकलखि शोणितधारा। कोतवालके जाय पुकारा॥
कोतवाल तेहिं दोष लगायो। ताकी संपति सकल लुटायो॥
मोहर और वणिक धन जेतो। गयो भूप भंडारहि तेतो॥
कह कबीर लखु मातु तमाशा। ये मोहर दोउ ओर विनाशा॥
माता कह्यो सुवन चलु अनतै। कह कबीर लखु और दृगनतै॥