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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 28

कबीरजीकी कथा । (२५)

दोहा- सादर ल्याइ कबीर को, करि उत्सव हर्षाइ ॥
शिष्य भये परिवारयुत, भवभय दियो मिटाइ ॥ १७ ॥
भक्तमालकी यह कथा, किय संक्षेप बखान ॥
अब कबीर इतिहासको, विस्तर सुनहु सुजान ॥ १८ ॥
देश गहोरा युत परिवारा । भयो शिष्य विरसिंह भुवारा ॥
कछुक काल लगि नृप ढिग माहीं । वस्यो कबीर सुमिरि हरि काहीं ॥
येक समय विरसिंह नरेशै । दियो बोलाई कबीर निदेशै ॥
देहैं तोहिं कछू हम ज्ञाना । ताते कर अस भूप विधाना ॥
यक ब्राह्मणी रचै यक धोती । वरष दिवसमहँ अतिहि उदोती ॥
लेइ पाणिमहँ तोरि कणसू । सूत भूमि परशै नहिं तासू ॥
सो धोती लै आवहु राजा । तब ह्वै हौ तुरंत कृतकाजा ॥
सुनि विरसिंह तुरंत सुखारी । गो ब्राह्मणीसमीप सिधारी ॥
धोती माग्यो तब द्विज नारी । सुनु महीप सो गिरा उचारी ॥
धोती वर्ष प्रयंत बनाऊं । जगन्नाथको जाय चढ़ाऊं ॥
लेहु महीश शीश बरु मोरा । धोती लेब उचित नहिं तोरा ॥
राजा फिरि कबीर ढिग आयो । सकल ब्राह्मणी वचन सुनायो ॥
दोहा- कह कबीर जगन्नाथकौ, धोती देइ चढ़ाइ ॥
प्रतीहार करि साथ नृप, तियको दियो पठाइ ॥ १९ ॥
जाय ब्राह्मणी वसन चढ़ायो । प्रभु ढिग ते तुरंत फिरि आयो ॥
कियो ब्राह्मणी धरन तहांहीं । स्वप्ने कह्यो नाथ तेहिं काहीं ॥
मांग्यो हम बांधवगढ़ काहीं । काहे दियो मोहिं लै नाहीं ॥
जाय कबीरै देइ चढ़ाई । तब जैहै पूरण फल पाई ॥
द्विज तिय फिरि बांधवगढ़ आई । दियो कबीरहि वसन चढ़ाई ॥
वसन पहिरि जब बैठि कबीरा । तब आयो विरसिंह प्रबीरा ॥
महितै यक कर ऊँच निहारा । तब कीन्हो अस वचन उचारा ॥
जो हरिको हरि लोकहु काहीं । दीजै म्वहिं देखाइ सुखमाहीं ॥
तौ प्रतीति मोरे परि जाई । ये तो सत्य कबीरै आई ॥