कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३२ ) शेष दोनोंशब्द ।
शब्द एकसौ चौदह ॥ ११४ ॥
सार शब्द से बांचि हो मानहु एतवारा हो।
आदि पुरुष एक बृक्ष है निरंजन डारा हो ॥
त्रिदेवा शाखा भये पत्ती संसारा हो।
ब्रह्मा वेद सही किये शिव योग पसारा हो ॥
विष्णु माया उतपति किया उरला व्यवहारा हो।
तीन लोक दशहूं दिशा यम रोकिन द्वारा हो ॥
कीर है सब जीयरा लिय विषका चारा हो।
ज्योति स्वरूपी हाकिमा जिन अमल पसारा हो॥
कर्मकी बंसी लायके पकरचो जग सारा हो।
अमल मिटाऊं तासुका पठऊं भव पारा हो ॥
कह कबीर निर्भय करौं परखो टकसारा हो।
शब्द एक सौ पन्द्रह ॥ ११५ ॥
सन्तौ ऐसी भूल जगमाहीं जाते जिव मिथ्या में जाहीं ॥
पहिले भूले ब्रह्म अखण्डित झाईं आपुहि मानी।
झाईं मानत इच्छा कीन्हा इच्छाते अभिमानी ॥
अभिमानी करता ह्वै बैठे नाना पंथ चलाया।
वही भूल में सब जग भूले भूलक मर्म नहिं पाया ॥
लख चौरासी भूल ते कहिये भूलहि जग विटमाया।
जो है सनातन सो भूला अब सोइ भूलहि खाय ॥
भूल मिटै गुरु मिलै पारखी परख देइ लखाई।
कहहि कबीर भूल की औषध परख सब की भाई ॥११५॥
इति ।