कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 25, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ें(२२) कबीरजीकी कथा ।
यह सुनि साधु विप्र समुदाई । लियो कबीरहि को समुहाई ॥
लाखन विप्र साधु जुरि आए । तब कबीर मन माँहँ डेराए ॥
अपनो भवनत्यागि द्रुत भाग्यो । रघुपतिको यह नीक न लाग्यो ॥
धरि कबीरको रूप तुरंतै । शत शत मुद्रा दिय प्रति संतै ॥
दोहा-साधुनको सत्कार करि, विदा कियो रघुनाथ ॥
उदर पूर पूजन दियो, सबको गहि गहिहाथ ॥११॥
सब देशन विख्यात भो नामा । कह कबीर अनुकंपा रामा ॥
येहू विधि पंडित जब हारे । तब गोरखको तुरत हँकारे ॥
गोरख आय गयो जब कासी । लखि कबीरकों भयो हुलासी ॥
कूप उपर रचि पांचहि सूता । बैठ्यो ताहि प्रभाव अकूता ॥
तुरत कबीरहि लियो बोलाई । मोसो करहु विवाद बनाई ॥
अन्तरिक्ष तब बैठ कबीरा । देखत गोरख भयो अधीरा ॥
तेहि दिन गवन्यों गोरख हारी । आयो भोरहि सिंह सवारी ॥
कह्यो कबीरहिसों गोहराई । आवै वाद करै मन जाई ॥
तब मृगको रचि सिंह कबीरा । आयो चलो चलावत धीरा ॥
तब गोरख कह सुनहुँ कबीरा । गंगामें डूबै दोउ वीरा ॥
को काको हेरै यहि काला । कूदे गोरख प्रथम उताळा ॥
तब गोरख गूलर है गयऊ । जानि कबीर पकारि तेहि लयऊ ॥
दोहा-गोरख सुनहुँ कबीर कह, प्रगटो अबहुं तुरंत ।
नातो कर मलि डारि हौं, दोषदेहिंगेसंत ॥ १२ ॥
तब प्रसन्न गोरख प्रगटाना । तेहि कबीर अस वचन बखाना ॥
मैं अब छिपहूँ हेरि तुम लेहू । कह गोरख छिपु बिनु संदेहू ॥
तब डूब्यो मधि गंग कबीरा । है गो तुरत गंगको नीरा ॥
तब गोरख करि योग प्रभाऊ । जान्यो सकल कबीर दुराऊ ॥
दोऊ सिद्ध फेरि प्रगटाने । गोरख वंदन किय हुलसाने ॥
कह्यो सत्य साहब तुम रूपा । संत शिरोमणि शुद्ध अनूपा ॥
एक समय कबीर लै माता । चले जात कोउ देश विख्याता ॥