कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 20, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुरुवे नमः ।
अथ श्रीकबीरजी की कथा ।
دوهـ
दोहा-अब कबीरजी की कथा, श्रोता सुनहु विशाल ॥
जो हिंदू अरु तुर्क को, उपदेश्यो सब काल ॥ १ ॥
हरि विमुखी सब धर्मिन काहीँ । कह्यो अधर्म अखंड सदाहीँ ॥
योग यज्ञ तप दान अचारा । राम भजन बिन कह्यो असारा ॥
कह्यों रमैनी साखी जेती । अटपट अर्थ शास्त्रमय तेती ॥
जो बीजकको ग्रंथ बनायो । तासु तिलक मो पितु निरमायो ॥
आगे कहिहौं मति अनुसारा । पूरुव पूरुष बंश विस्तारा ॥
श्री कबीरजी को इतिहासू । पूर्व पूरुष मम वर्णन तासू ॥
निज कुल वर्णत लागति लाजू । जनि हैं अस सब सुमति समाजू ॥
निजकुलको महत्व प्रगटायो । गाथा सकल मृषा मुख गायो ॥
पै श्रोता सब यदुपति दासा । ताते लागति कछु नहिं त्रासा ॥
सहि लेहैं सब मोरि ढिठाई । मैं न मृषा प्रभुता कछु गाई ॥
जस कबीर वर्ण्यौ निजग्रंथा । वर्णों निजकुल सोई पंथा ॥
और कबीर कथा सुखदाई । प्रियादास नाभा जस गाई ॥
दोहा-सोई मैं वर्णन करौं, संक्षेपहु विस्तार ॥
प्रथमहि जन्म कबीर को, श्रोता सुनहु उदार ॥ २ ॥
रामानंद रहे जग स्वामी । ध्यावत निशि दिन अंतर्यामी ॥
तिनके ढिग विधवा इक नारी । सेवा करै बड़ो श्रमधारी ॥
प्रभु यक दिन रह ध्यान लगाई । विधवा तिय तिनके ढिग आई ॥
प्रभुहिं कियो वंदन बिन दोषा । प्रभु कह पुत्रवती भरि घोषा ॥
तब तिय अपनो नाम बखाना । यह विपरीत दियो वरदाना ॥
स्वामी कह्यो निकसि मुख आयो । पुत्रवती हरि तोहिं बनायो ॥
ह्वै है पुत्र कलंक न लागी । तब सुत ह्वै है हरि अनुरागी ॥
२