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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 32

कबीरजीकी कथा । (२९)
दोहा-तहँ कोउ भूपति बंधु इक, कीन्हे रहै विरोध ॥
ताहिपकारि ल्यायो सदल, करि चहुँ दिशि अवरोध२८
ब्रह्मदेवके भो सिध देवा । नरहरि देव तासु सुत भवा ॥
नरहरिके भइ भेदसुधन्या । व्याहीसो शिरनेतन कन्या ॥
नरहरि वस्यो कछुक दिनकाशी । भेदचल्यो लै दल अरि नाशी ॥
भयो शालिवाहन सुभेद सुत । विरसिंहदेव तासु सुत नृप नुत ॥
भो विरसिंह महान भुवाला । वस्यो प्रयाग आइ तेहि काला ॥
लियो अमल सब देशन काहीं । लाख सवार रहैं सँगमाहीं ॥
वीरभानु सुत भो पुनि ताके । राजाराम भये तुम जाके ॥
जबै प्रयाग देश चहुँओरा । अमल्यो विरसिंह निजभुज जोरा॥
तबै प्रजा किय जाय पुकारा । दिल्ली शाह हिंमाऊद्वारा ॥
आयो कोउ कबीर बघेला । लाख सवार चलै बगमेला ॥
अमल कियो सो मुलुक तुम्हारा । सो सुनि शाह तुरंतसिधारा ॥
चित्रकूट आयो जब शाहा । चलन लग्यो विरसिंह नरनाहा ॥
दोहा-वीरभानु तब आयकै, वारम कियो बुझाइ ॥
तुम न जाहु म्लेच्छहि मिलै, ऐहै सो इतधाय ॥ २९ ॥
तब पुत्रहि विरसिंह बुझाई । चल्यो तुरंत निशान बजाई ॥
चित्रकूट विरसिंह सिधारा । सुनत शाह आगू पगधारा ॥
दोउदल भये बरोबर जबहीं । सादर शाह बोलायो तबहीं ॥
जब भूपति गो शाह समीपा । बिहँसि शाह कह सुनहु महीपा ॥
कवन हेतु परजन दुखदीन्हे । काहे मुलुक हमारो लीन्हे ॥
तब विरसिंह बोल्यो मुसकाई । कोहूसों किय नहीं लराई ॥
जे हमहीं मारें तेहि मारे । अमल्यो तिनके देश अपारे ॥
कह्यो शाह कहँ सुवन तुम्हारा । वीरभानु कहँ भूप हँकारा ॥
वीरभानु तब वाजि उड़ाई । परचोशाह हौदामहँ जाई ॥
शाह उतर हाथीते आयो । वीरभानु गोदहि बैठायो ॥