कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६ ) कबीरजीकी कथा ।
तब राजहि कबीर बैठायों । ध्यानावस्थित ताहि करायों ॥
योग मार्ग ते तेहि लै गयऊ । हरि हरि लोक देखावत भयऊ ॥
तब बिरसिंह भूप विश्वासे । लहन विज्ञानहि हिये हुलासे ॥
दोहा-श्रीकबीरजी तहँ कियो, सुभग ज्ञान उपदेश ॥
मिटे सकल संसारके, ताके काय कलेश ॥ २० ॥
कह कबीर लै चलहु शिकारा । भूप कियो तेहिं नाग सवारा ॥
गजके ऊपर हाथ सवाऊ । बैठ कबीर लखे सब काऊ ॥
बांधवगढ़के पूरुब ओरा । सदल तृषित भो नृप तेहि ठोरा ॥
कह्यो कबीरै गुरु भगवाना । जल बिन जात सबैके प्राना ॥
तब कबीर परभाव दिखायो । तुरत सकल तरु सफल बनायो ॥
प्रगटी वापी निर्मल नीरा । तहँ अंतर्हित भयो कबीरा ॥
अब बघेल वंशावलि जोई । श्रीकबीर विरचित है सोई ॥
अरु आगम निदेशहू ग्रंथा । तामें है बघेल सतपंथा ॥
उक्ति कबीरहि की लै नीकी । वर्णों मोरि उक्ति नहिं ठीकी ॥
यदपि वंश महिमा निजवरणत । उपजति लाज तदपि अतिसुखरत ॥
तेहि अनुसर वर्णों कर जोरी । श्रोता दियो मोहिं नहिं खोरी ॥
करि दरशन जगदीश कबीरा । उत्तर दिशा चल्यो मतिधीरा ॥
दोहा-बांधवदुर्ग बघेलको, ताढिग जबहिं कबीर ॥
आए तब नृप रामसिंह, आनँद युत मतिधीर ॥ २१ ॥
लै आगे ल्याए तुरत, बांधवदुर्ग लेवाइ ॥
अति सत्कार कियो तहाँ, मानि रूप यदुराइ ॥ २२ ॥
पुनि कबीर स्थानमें, भूपति गये अकेल ॥
तब कबीर नृपसों कह्यो, मोहिं गुरु कियो बघेल ॥ २३ ॥
तेरे पूरबके पुरुष, कियो गुरु जस मोहिं ॥
मैं लै आयो हंस ह्वै, सकल सुनाऊं तोहिं ॥ २४ ॥
वाराणसी जन्म मैं लीन्हों । जगन्नाथ दरशन मन दीन्हो ॥
तहँ समुद्रको करि मर्यादा । गमन्यो गुजरातै अविषादा ॥