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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 766 में से

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पृष्ठ 30

तहँ को भूप पुत्र ते हीना । विनती कियो मोहिं अति दीना ॥
मैं वरदान दियो नृप काहीं । द्वै सुत हैंहें तुव तिय माहीं ॥
मोर अंश ते जो एक होई । वदन बाघ देखी सब कोई ॥
तब सुलंक नृप आनँद पायो । द्वै सुत निज तिय महँ जनमायो ॥
व्याघ्रदेव भो जेठ व्याघ्रमुख । अनुज तासु भो सुंदर हरदुख ॥
व्याघ्रवदन लखि पंडित आये । जानि अशुभ वनमहँ फिकवाये ॥
तब कबीर धरि पंडित वेशा । जाइ भूपको दियो निदेशा ॥
ल्याबहु व्याघ्रवदन सुत काहीं । ताते चलिहै वंश सदाहीं ॥
भूप सुलंकदेव बिन शंका । ल्यायो तुरत सुतहि अकलंका ॥
व्याघ्रदेव तेहि नाम सुहंसा । तिनते चल्यो बघेलहि वंसा ॥
दोहा-तब कबीर अस वर दियो, जगमें सहित प्रसंश ॥
अचल राज बांधौ रही, चली बयालिस वंश ॥ २५ ॥
व्याघ्रदेवके सुत नहिं रहेऊ । सो कबीरसों निज दुख कहेऊ ॥
तब कबीर किय मनमहँ ध्याना । कियो तुरत गिरिनार पयाना ॥
चंद्र विजय नृप रह्यो तहाँहीं । रानी इंदुमती रति छाहीं ॥
तेहि पूरब कबीर उपदेशा । दंपति किय हरिपुरहि प्रवेशा ॥
सो कबीर हरिलोक सिधारी । दंपति काहिं योग मति धारी ॥
ल्यायो द्रुत गुजरातहि देशा । कीन्हो व्याघ्रदेव सुतवेशा ॥
दियो नाम जैसिद्ध प्रसिद्धा । पूरित बुद्ध ऋद्वि अरु सिद्धा ॥
युवा बैस जैसिद्धहि आई । निशिमहँ चिंता भई महाई ॥
केहि विधि नाम चलै चहुँओरा । क्षत्रीधर्म विजय बरजोरा ॥
व्याघ्रदेवसों कह्यो प्रभाता । सो कह पितामहै कहु बाता ॥
तबै सुलंक देव ढिग जाई । निज मनकी शंका सब गाई ॥
सो सादर शासन तेहि दीन्हों । लै कछु सैन्य पयानो कीन्हों ॥
दोहा-गढा देशमहँ सो वस्यौ, भूप नर्मदा तीर ॥
कर्णदेव ताके भयो, तासु सरिस रणधीर ॥ २६ ॥