कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
( ९६ ) बीजक कबीरदास ।
अरु तार जोहै प्रणव ताको हजारन दोनों कुम्भकमें जपत भये अजहूंलौं ,
बाहींमें लगेहैं औ यहकहेंहैं कि, कठिन दूरिहै ॥ ३ ॥ कबीरजी कहैहैं जब तानाको-
ताग टूटिजाइहै तब कोरी भिजै कै जोरिदेइहै ऐसे वह साधक अभ्यासरूप
कर्मते जोरिदेइहै सोकर्म को लाठिनमें बांधिकै सूतजो हे जीव कुसूत जोहै वाणी
ताको जोलहा जो मनहै सो विनयहै अथवा विद्या अविद्या सूतकुसूत विनय है
जब बस्तु तय्यार होइजायहै तब जोलहाको बिनिबो छूटै है सो धोखा ब्रह्ममें
लागि अनादिकालते बिनतई है जब साहबको जानै तब साधनरूप कर्मकरिवो
छूटिजाइ हंसरूप साहबदइ जरामरणमिटिजाइ ॥ ४ ॥
इति अट्ठाईसवीं रमैनी समाप्तम् ।
अथ उनतीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
बज्रहु ते तृण क्षणमें होई । तृणते बज्रकरै पुनि सोई ॥ १ ॥
निझरूनरू जानि परिहरई।कर्मकबांधल लालच करई॥२॥
कर्मधर्मबुधिमतिपरिहरिया । झूठनाम सांचलै धरिया॥३॥
रजगति त्रिविधकीनपरकाशा।कर्म धर्म बुधिकेर विनाशा ४
रविकेउदय ताराभो छीना । चरवेहर दोनों में लीना ॥५॥
विषकेखाये बिष नहिं जावै।गारुड़सो जो मरतजिआवै॥६॥
साखी ॥ अलखजोलागी पलकमों, पलकाहिमोँडसिजाय ॥
विषहर मन्त्र न मानही, गारुड़ काह कराय ॥७॥
बज्रहुते तृण क्षणमें होई । तृणते बज्रकरै पुनि सोई ॥ १ ॥
निझरूनरूजानिपरिहरई । कर्मकबांधललालचकरई ॥२॥
रमैनी । ( ९७ )
बज्रहुते तृण क्षणमें करिदेइहै अरु तृणते बज्रकरिदेइहै ऐसेपरमपुरुष श्रीरामच-
न्द्रको जानो ॥१॥ निझरूनरूकहे जिनको मायाब्रह्मको धोखा निझरि गयो कहें
मिटिगयो ऐसे जे नर हैं ते पूरा गुरुपाइकै परमपुरुष जे श्रीरामचन्द्र तिनको
जानिकै संपूर्ण जगत्के कर्म त्यागिदेइँ हैं औ जे कर्ममें बँधे हैं ते अनेक लालचकरै
हैं कोई द्रव्यादिक की कोई ब्रह्ममिलन की कोईईश्वरनकी ॥ २ ॥
कर्मधर्मबुधिमतिपरिहरिया। झूठानामसांचलैधरिया ॥३॥
रजुगतित्रिविधिकीनपरकाशा। कर्मधर्मबुधिकेरविनाशा ४॥
साहबके मिलनवारो जो कर्मधर्म बुधिहै ताको त्यागिदेतेभये झूठेझूठे जे
देवताहैं तिनको नाम सांचमानिकैजपतभये ॥३॥ गुरुवालोग रजोगुणी तमोगुणी
सतोगुणी तीनप्रकारके मत प्रकाशकैकै साहबके मिलनवारो जो कर्म धर्म बुधि
है ताको नाशकरि देत भये ॥ ४ ॥
रविकेउदयतारा भोछीना । चरवेहरदोनों में लीना ॥ ५ ॥
विषकेखायेविषनहिंजावै । गारुड़सोजोमरतजिआवै ॥६॥
हे जीवो ! गुरुवालोग तुमको उपदेश देयँ हैं जैसे सूर्यके उदय मो ताराकों
तेजक्षीण ह्रैजायहै ऐसे जबज्ञानभयो जीवत्वमिट्यो तब चर औ वेहर जो अचर ये
दोनोंमें लीन ह्रै जाय है चरअचर ब्रह्मरूपते आपनेनको मानैहै॥५॥सो साहब कहैं हैं
कि हेजीवो! ऐसो उपदेश जो गुरुवालोग तुम्हें दियो सो ठीकनहीं है काहेतें
कि संसार बिष उतारिबेको तुम धोखा ब्रह्ममें लगैहै। सो बिषके खाये बिष
नहीं जाइहै यह धोखाब्रह्म बिषरूपैहै संसार देनवारोहै गारुड़ सो कहावैहै जो
मरतमें जिआइलेइ सोमेरोज्ञान धोखा ब्रह्मबिषते बचाई कालते बचाइलेइ ताकों
जानो ॥ ६ ॥
साखी ॥ अलखजोलागीपलकमों, पलकहि मोंडसिजाय ॥
विषहरमंत्र न मानही, गारुड़ काह कराय ॥ ७ ॥
७
( ९८ ) बीजक कबीरदास ।
अलख जो वह ब्रह्महै सो सबके पलकमें लाग्योहै अर्थातपलपलमें ध्यानकरैहै
औ एक पलही में डसिजायहै अर्थात् जो गुरुवनके मुंहतै कढ़्यो सो पलै में वा-
ज्ञान लगिजायहै सो साहब कहैं हैं कि तैं मेरोहै मेरी तरफ आउ यहि विषको
हरनवारो जो ज्ञान ताको तो मानतही नहीं है मैं जो गरुड़ सो काहकरौ ॥७॥
इति उनतीसवीं रमैनी समाप्त ।
अथ तीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
औ भूले षटदरशन भाई । पाखँडवेष रहा लपटाई ॥ १ ॥
जीवसीवका आयन सौना।चारो वद्ध चतुरगण मौना ॥२॥
जैनी धर्मकमर्म न जाना । पातीतोरी देव घर आना ॥३॥
द्वना मरुवा चंपा फूला । मानोंजीव कोटि समतूला ॥४॥
औ पृथिवी को रोम उचारै । देखत जन्म आपनो हारै५॥
मन्मथ बिन्दुकहै असरारा।कलपैबिन्दुखसै नहिंद्वारा॥६॥
ताकर हाल होय अघकूचा।छादरशनमें जैन विगूचा ॥७॥
साखी ॥ ज्ञान अमर पद बाहिरे, नियरे ते है दूरि ॥
जो जानै तेहि निकटहै, रह्यो सकल घटपूरि ॥ ८ ॥
औभूले षट दरशन भाई । पाखँडवेषरहा लपटाई ॥ १ ॥
जीवसीवकाआयनसौना । चारोवद्धचतुरगुण मौना ॥ २ ॥
पाखण्ड वेष जो धोखा ब्रह्म सो सर्वत्र लपटाइ रह्योहै ताहीमें षट्दर्शन
जेहैं तेऊ भूलिमये ॥१॥यह जो धोखा ब्रह्मको ज्ञानहै सो जीव जोहै ताको
सीव जो कल्याणहै सो नशावनवारोहै औचारों प्रकारके जीव जे हैं तेऊ बद्धहैं
जे चतुर हैं तेगुणमौनाकहे गुणातीत हैं परंतु वोउ धोखा ब्रह्मही में हैं ॥ २ ॥
रमैनी । ( ९९ )
जैनी धर्मक मर्म न जाना । पाती तोरि देवघर आना ॥३॥
दवना मरुवा चंपा फूला । मानों जीव कोटि समतूला ॥४॥
अरुजैनी जे नास्तिकहैं ते धर्मको मर्म नहीं जान्यो कांहते कि बांधे तो मुंहै
पट्टीरहैंहैं कि कहूं किरवा न घुसिजाय जीवको बचावैहैं कि हिंसा हम न करेंगे
सो जिन वृक्षनमें जीव हैं तिनकी पातीको तोरिकै पाषाण जे पारसनाथ देवहैं
तिनमें चढ़ावै हैं ॥ ३ ॥ दवना औ मरुवा औचंपाके फूलको तोरिकै कोटिन
जे जीवहैं तेसूंघिकै अघायहैं तिनको तोरि तोरिकै पारसनाथकी मूर्तिमें चढ़ावै हैं
सो अरे मूढ़ा! प्रतक्ष जे जीव वृक्षहैं तिनका पत्रको तोरिकै जड़ जो पाषाणहै तामें
काहेको चढ़ावो हौ तुम तो प्रत्यक्ष प्रमाण मानौहौ कर्म किये फल होय है यह
मानतही नहीं हौ पाषाणपूजे कहा फल होइगो ॥ ४ ॥
औ पृथिवीको रोमउचारै । देखत जन्म आपनो हारै ॥ ५ ॥
मन्मथ बिंदु करै असरारा । कलपैविन्दुखसैनाहिंद्वारा॥६॥
ताकरहालहोयअघकूचा । छादर्शनमेंजैनबिगूचा ॥ ७ ॥
औ पृथ्वी के रोमाजेहैं वृक्ष तिनको चेलनते उखरावै हैं औ शिष्यनकी स्त्रिन-
को देखिकै भोगकारिकै अपनो जन्म हारिदेइहैं कहे नरकको जायैं ॥ ५ ॥
साधन करिकै मन्मथ के बिन्दुको असरारा कहे सरलकरै हैं औ कन्यनते भगि-
नी नाते औ उनकी स्त्रिनते भोग करै हैं तब वह बिन्दु ऊपरते नीचेको कल्प-
तैहै कहे बढ़तहै औ पुनि नीचेते मेरु दंडद्वैकै ऊपरको चढ़ाइ लैजाइहै ॥ ६ ॥
सो जे जैनधर्मी हैं छः दर्शन में बिगूचा कहे भूलि गये हैं तिनकी औ जिनको
कहिआये हैं बीर्य बढ़ावन वारे तिनको हाल अघ कूचा कहे नरकनमें कूचे
जाहि हैं ॥ ७ ॥
साखी ॥ ज्ञान अमरपद बाहिरे, नियरेतेहै दूरि ॥
जो जानै तेहि निकटहै, रह्योसकलघटपूरि ॥ ८ ॥
( १०० ) बीजक कबीरदास ।
अमरपद कहे आत्माको जो स्वस्वरूपहै सो साहबकोअंशहै दासहै सोई
अमरहै ताको ज्ञान नियरेते दूरिहै औबाहिरैहै इहा नियरेते दूरि कह्यो तातें
अपनेको ज्ञाननहीं है औ बाहिरै है कहे बहुत दूरि देखि परैहै परन्तु जो सतगुरु
भेद बतावै है तौ ज्ञान होइहै आत्माके स्वरूपको जानैहै ताको साहब निकटही है
काहे घटघटमें तौ पूर्ण है तौ आत्माके निकटहै ॥ ८ ॥
इति तीसवीं रमैनी समाप्त ।
अथ इकतीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
स्मृतिआहि गुणनकोचीन्हा।पापपुण्यको मारगलीन्हा १॥
स्मृति वेद पढ़ेअसरारा । पाखंड रूप करै अहँकारा॥ २ ॥
पढ़ै वेद औ करै बड़ाई । संशय गाँठिअजहुंनहिंजाई ॥ ३ ॥
पढ़िकैशास्त्रजीवबधकरई । मूड़ काटि अगमनकै धरई॥४॥
साखी ॥ कह कबीर पाखण्डते, बहुतक जीव सताय ॥
अनुभवभाव न दर्शई, जियत न आपुलखाय॥५॥
स्मृति आहिगुणनकोचीन्हा । पापपुण्यकोमारगलीन्हा १॥
स्मृतिवेदपढ़े असरारा । पाखँडरूप करै अहंकारा ॥ २ ॥
स्मृति गुणनको चीन्हा आहि कहे तीनोंगुण स्मृति में देखिपरै है काहेतें
कि पाप पुण्यको मार्ग चीन्हे हैं अर्थात् पापपुण्यके मार्ग वाहीते जानिपरैहैं ॥ १॥
रारा जो जीव स्मृति वेदका असपढ़ताहै पाखण्डरूप ह्वैकै या अहंकार करैहै
जानिबेकेलिये नहीं पढ़ैहै अर्थात् हमविद्यामें जीतै कोई विद्यामानजानि हमें
मानै चेलाहोइ इत्यादिकछू आपने न पढ़े है ॥ २ ॥
पढ़ै वेद औ करै बड़ाई । संशय गाँठि अजहुंनहिंजाई ॥३॥
पढ़िकैवेदजीववध करई । मूड़काटिअगमनकै धरई॥ ४॥
रमैनी । ( १०१ )
वेद पढ़ैहै तब देवतनकी बड़ाई कहै स्तुति करैहै अथवा अपनी बड़ाई करैहै
कि मैं महापण्डितहौं संशयकी गांठिनो परिगई है सो अजहूं नहीं जाइहै वेदांत
शास्त्र आदि पढ़ैहै आत्मा सर्वत्रहै या कहैहै पै चैतन्य जो जीवहै ताको मूड
काटिकै पाषाण की मूर्त्तिहै ताके आगू धरैहै ॥ ३ । ४ ॥
साखी ॥ कहकबीर पाखण्डते, बहुतक जीव सताय ॥
अनुभवभाव न दर्शई, जियत न आपुलखाय ॥५॥
कबीरजी कहैहैं कि यहिपाखण्डते बहुत जीवनकों सतावत भये उनको
अनुभवको भाव नहीं दर्शैहै कि जैसे हममारैंहैं तैसे येऊ हमको मारैंगे जब
भरिजियैहैं तबभर अपनी इच्छानहीं करै हैं जेहिते बचैं ॥ ५ ॥
इति इकतीसवीं रमैनी समाप्त ।
अथ बत्तीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
अंध सो दर्पण वेद पुराना।दरवी कहा महारस जाना॥१॥
जसखर चन्दनलादेभारा।परिमलबास न जानगँवारा॥२॥
कहकबीरखोजैअसमांना।सोनमिलाजोजायअभिमाना३॥
जैसे आँधरको दर्पण वह आपनो मुख कहादेखे औदरवी जो करछुल्लीहैसो
पाकके रसको कहाजानै ॥१॥ औगदहा चन्दनकोलादे चन्दनकी सुबास कहा-
जानै तैसे गँवारजेहैं ते बेदपुराणको तात्पर्यार्थजे साहबहैं तिनको कहाजानैं जो
गरवीपाठहोय तो या अर्थहै अहंकारी लोगमधुर रसको काजानैं २ सोकबीरजी
कहैहैं कि आसमान जो निराकार धोखाब्रह्मताको खोजै हैं सोवातो झूठईहै सो
पुरुष याको न मिला जाके उपदेशते अहंब्रह्म को अभिमान जाय औ साहब
को जानिलेय ॥ ३ ॥
इति बत्तीसवीं रमैनी समाप्त ।
( १०२ ) बीजक कबीरदास ।
अथ तैंतीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
वेदकी पुत्री स्मृति भाई । सो जेवरि कर लेतै आई ॥ १ ॥
आपुहि बरी आपु गरबंधा । झूठी मोह कालको धंधा ॥ २ ॥
बँधवतबंध छोड़िना जाई । विषयस्वरूपभूलिदुनियाई ३
हमरेलखतसकलजगलूटा । दासकबीर रामकहिछूटा ॥ ४ ॥
साखी ॥ रामहि राम पुकारते, जीभ परिगोरोस ॥
मूधाजल पीवैनहीं, खोदिपियनकी होस ॥ ५ ॥
वेदकी पुत्री स्मृति भाई । सो जेवरि कर लेतै आई ॥ १ ॥
यहांकर्मकाण्ड उपासनाकाण्ड ज्ञानकाण्ड ये तीनोंकी कठिनतादेखाइ तात्पर्य
वृत्तितेछुड़ाइ साहबमें लगावैहै । कबीरजी कहै हैं कि हेभाइउजौनीस्मृतिको कर्म
प्रतिपादक अर्थकरि कर्मरूप जेवरीमें तुम बँधिगयेहै। स्मार्त्त भयेहौ सो स्मृति
वेदकी पुत्री है तौने वेदहीको अर्थ तुम नहीं जानतेहौ धौं वाको तात्पर्य कर्म
के छुड़ाइबेमें है धौंकर्मके बांधिबेमें है तौ स्मृतिको अर्थ कबजानोगे ? सो वेदकों
तात्पर्य तौ कर्मते छड़ायबेहीमेंहै कैसे जैसेजीवनकी मांसमें आसक्ति स्वभावहीतें
है वैसे छोड़वै तौ न छूटै ताते वेद नियम बंतावै है कि मांसखाय तौयज्ञमें
खाय ताते या आयो कि जब बहुत श्रमकारि बहुत द्रव्यलगाय यज्ञकरैगो तब
थोड़ामांस बिनास्वादका पावैगो तामें या बिचारैगोकि या थोड़ेमांसबिना स्वाद-
के खाये यामें कहैहै या बिचारि मांसछोड़ि देयगो याभांति कर्मकांडको तात्पर्य
निवृत्तिहीमेंहै औ स्मृति नाना देवतनकीउपासना कहैहैं सो उन पूजनकी यंत्र
मंत्रकी पुरश्चरणकी बिधि कठिनहै जोकरतमें सिद्धिभयो तौ उनके लोककों
गयों जो कछू बीच परिगयो तौ बैकलाइकै मरिजाइ है या भांति उपासना
काण्डको तात्पर्य निवृत्तिहीमें है औ स्मृतिज्ञानकाण्डजोकहैहैं सो मनको साधन
रमैनी । ( १०३ )
कठिन है काहेते कि जो अहंब्रह्मास्मि मान सर्व कर्मनको त्यागिदियो औ दूसरी
बुद्धिन गई तौ पतितहै जाय है । तामें एक इतिहासहै। एकराजाके गोहत्यालगी
सो हत्याआई तब राजाकह्यो कि सर्वत्र ब्रह्मही है हमहूं ब्रह्महैं हमको हत्याका-
हेको लगेगी हाथके देवता इन्द्रहैं सो इन्द्रही को लगेगी इत्यादिक जवाब देत-
भयो तब वहहत्या राजाकी बेटीके पासगई सो वो श्रृंगारकरि रानीके पलंगमें
परिरही तहां राजाआये कन्याको परी देखी तब कह्योकि तू कहापरीहैं
तब कन्याकह्यो जैसैरानी तैसे मैं ब्रह्मतौ एकही है तब राजा उलटिचले
हत्या राजाके शिरमें चढ़िबैठी । या भांति ज्ञानकाण्डहूको तात्पर्य निवृत्तिहीमें
है कि जौनसरल उपाय वेद तात्पर्य कैकै बतावैहै कि मनादिकन को
छोड़िकै रामनामकोजपै साहबको ह्वैजाय तौमुक्ति ह्वैजाय तामें प्रमाण ॥
( द्वापरान्ते नारदोब्रह्माणंप्रतिजगाम कथंनु भगवन् गांपर्य्यटन्कलिसंतरेयमिति ।
सहोवाच भगवत आपुरुषस्यनारायणस्यनाम्नेति नारदःपुनःपप्रच्छभगवतःकिंत-
न्नामेतिसहोवाच हरेरामहरेरामरामरामहरेहरे श्रुतिः ॥)आदिपुरुष भगवान् नारा-
यणके नामहैं उद्धार करनवारे सो नारायणनाम सुनावहू कियो औ पूछ्यो कि
कौननामहैं तब रामनामको बताये तेहिते उद्धारकर्त्तारामनामही है पुनि स्मृतिहू
कहैहै ॥ “सप्तकोटिमहामंत्राश्चित्तविभ्रमकारकाः । एकएवपरोमंत्रोरामइत्यक्षर-
द्वयम्॥” ताते वेदको तात्पर्य कर्मकांड उपासनाकांड ज्ञानकांड तीनोंके त्यागमेंहै
साहबकेमिलायबेमेंहैतामें प्रमाण ॥“सर्वेवेदायत्पदःमामनांति इतिश्रुतेः”॥ औ क-
बीरजीहू कह्यो है कि वेदकोअर्थ उलटिकैकहै तात्पर्यते समुझैतौतौने अर्थ वेदकें
सांचहैं अपरोक्ष अर्थतौझूठो है तामें प्रमाण “दौड़धूप सबछोड़ो सखिया, छोड़ो
कथापुरान । उलटि वेदका भेदळखौ, गहि सारशब्द गुरुज्ञान॥” दूजोप्रमाण॥
आसन पवन किये दृढ़रहुरे । मनको मैल छांड़िदेबौरे ॥ काश्रृंगीमूड़ा चमकाये।
क्या बिभूति सब अंगलगाये ॥ क्याहिंदूक्य मुसलमान । जाको साबित रहै
इमान॥क्याजो पंड़ियावेदपुरान । सोब्राह्मणबूझैब्रह्मज्ञान ॥ कहैकबीर कछु आनन-
कीजे । राम नामजपिलाहालीजे ॥” सोस्मृतिमें जोतुमको नानाअर्थ भासमान
होय है सोई बंधनरूपजेवरि करमें लेतै आई है सो वा जेवरि तुम्हा-
रही बरी है ॥ १ ॥
( १०४ ) बीजक कबीरदास ।
आपूहि बरी आपुगरबंधा । झूठामोह कालकोधंधा ॥ २ ॥
सो आपही स्मृतिको कर्म प्रतिपादनकरि कर्मरूप रसरीबरिकै आपही
गरबांधत भयो अर्थात् कर्म करमलग्यो झूठाजोमोहहै तामें परिकै कालको
धन्धाबनावतभयो अर्थात् नानादेहधरतभयो कालमारतभयो साहबको जो तात्पर्य
ते स्मृति बतावै है ताको ना संबुझावत भयो ॥ २ ॥
बँधवतबंधछोड़िनाजाई । विषयस्वरूपभूलिदुनियाई ॥३॥
हमारेदेखत सबजगलूटा । दासकबीर रामकहि छूटा ॥४॥
सो बांध तो बांध्यो पै वह बंधते छोड़्यो नहीं छूटैहै विषयमें सब दुनियां
भूलिगई मांस खाइबे को चाह्यो तौ छागरमारि बलिदानदै खाइलियो औसु-
रापानहू करिबेको चाह्यो औ वेश्या राखिबो चाह्यो तौ बाममार्गलियो इत्या-
दिक अर्थ करिकै ॥ ३ ॥ सो कबीरजी कहै हैं कि हमारे देखत देखत यह-
माया संपूर्ण जगको लूटिलियो सो मैंतौ रामै कहिकै छूटिगयो सो मैं सबको
बताऊं हौं सो दुष्टजीव नहीं मानै ॥ ४ ॥
साखी ॥ रामहिंराम पुकारते, जीभपरिगोरोस ॥
सूधाजलपीवैनहीं, खोदिपियनकीहोस ॥५॥
मोको रामैराम पुकारत पुकारत कि राममें लगौ जीभमें रोस परिगयों
कहे ठहर परिगयो पै जीव न मानत भये सो सूधा जल तो पीवै नहीं है कि
सीधे रामकहै तरिजाय वही धोखा ब्रह्ममें लगाइकै नानामत दक्षिण बामा-
दिक करिकै खोदिकै जलपियन की हवस करैहै कहे आशा करैहै सो ये तो सब
धोखाई है मुक्तिकैसे होयगी सीधे रामजपि स्वामी सेवक भावकरि संसार साग-
रते उतरि कांहे नहीं जायेहे ॥ ५ ॥
इति तेतीसवीं रमैनी समाप्त ।
रमैनी । ( १०५ )
अथ चौंतीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
पढ़िपढ़िपंडितकरिचतुराई । निजमुक्तिहिंमोहिंकहहुबुझाई १
कहँवसै पुरुष कवनसोगाऊँ।सोम्वहिंपण्डितसुनावहुनाऊँ२
चारिवेद ब्रह्मा निज ठाना । मुक्तिक मर्म उन्हौं नहिंजाना ३
दानपुण्यउनबहुतबखाना । अपनेमरनकिखबरिनजाना४
एकनाम है अगम गँभीरा।तहँवाँ अस्थिर दास कबीरा ५
साखी ॥ चींटी जहां न चढ़ि सकै, राई नहिं ठहराय ॥
आवागमन कि गमनहीं तहँसकलौ जगजाय॥६॥
पढ़िपढ़िपंडितकरिचतुराई । निजमुक्तिहिमोहिंकहहुबुझाई १
कहँबसैपुरुष कवनसोगाउँ । सोम्वहिं पंडितसुनावहुनाउँ २
हे पण्डितौ ! पढ़ि पढ़ि के चतुराई करौहौ सो अपनी मुक्तितौ समुझाइ कहौ
कहां ते तिहारी मुक्तिहोइहै जौने को मुक्ति माने
( १०६ ) बीजक कबीरदास ।
वही धोखामें पण्डित लोग लगावतभये कि वह जो ब्रह्म सर्वत्र पूर्ण है सो
तुहीं है अहंब्रह्मास्मि यह भावना करु सो वातो जीवहीको अनुभवहै जीव ब्रह्म
कैसे होइगो अरु पण्डित कहा बतावै वाको तौ अनामाकहें हैं अरु वाको बस्तु
गाउँ कहां बतावैं वाको तो देशकाल बस्तुके रहित कहै हैं सो जाके नाम
रूप नहीं है देशकाल बस्तुते रहितईहै सो वहहै कि नहीं है जो कहो अनु-
भवमें तौ आवैहै तौतौ अनुभवौ तौ जीवहीको है जो यह विचारिबो धोखाइ
भयो तौ जीवब्रह्म कैसे होईगो ॥ ३ ॥
दानपुण्यउनबहुतबखाना।अपनेमरनकीखबरिनजाना॥४॥
एक नामहैअगमगँभीरा। तहवांअस्थिरदासकबीरा ॥ ५ ॥
अरुकर्मकांडवारे दानपुण्य बहुतबखान्योहै पै अपनेमरिबेकी खबरि नहीं
जान्यों कि यहकाल बहुतदान पुण्यवारेनको खाइ लियोहै हमकैसेबचेंगे ॥ ४ ॥
जौने नाममेंलगे जन्म मरणनहीं होइहै औअगमहै कहे जेसंतलोगहैं तेईपावैं
हैं अरु गँभीरपद है कहेगहिर अर्थ है सो कबीरजी कहै हैं कि तौने नाममें मैं
स्थिरहौं ॥ ५ ॥
साखी ॥ चीटी जहां न चढिसकै, राई नहिं ठहराय ॥
आवागमन कि गमनहीं,तहँ सकलौजगजाय ॥६॥
वो ब्रह्म कैसो है कि चीटी जो बाणी है सो नहीं पहुँचे औ राई जो बुद्धि
है सो नहीं ठहराय अर्थात् मन बचन के परे है औ आवागमनकी गमनहीं है
अर्थात् न वहांते कोई आवै है न यहां ते कोई जाय है अर्थात मिथ्याहै तहां
सिगरो जग जायहै ॥ ६ ॥
इति चौंतीसवीं रमैनी समाप्ता ।
( १०८ ) बीजक कबीरदास ।
ब्राह्मण क्षत्री वैश्य उपदेशपावै है कहो मुक्ति केहिकी भई है काहेते वाकोता-
त्पर्य तौ यहहै कि जबसाहब को स्वरूप अरु आपनो स्वस्वरूप जानै तौ
मुक्तिहोइ सो साहेबको स्वरूपऔ आपनो स्वरूपतो जानतई नहीं है मुक्ति
कैसे पावै ॥ ३ ॥
और के छुये लेतहौ सींचा। तुमते कहौ कौनहै नीचा ॥ ४॥
यहगुणगर्व करौ अधिकाई।अतिकेगर्व न होइभलाई ॥ ५ ॥
जासु नाम है गर्व प्रहारी । सोकसगर्वहि सकैसहारी ॥ ६ ॥
औरको छुबौहौ तौ गंगाजल सींचौहौ कि पवित्रहैजाय सोकहों
तुमते कौननीचहै ॥ ४ ॥ मलमूत्रादिक तुमहू में भरे हैं औ अपने गुणको
गर्व अधिक तुम करतेहौ सो अतिगर्व किये भलाई नहीं होइहै काहेते कि ॥५॥
जाको नाम गर्व प्रहारी है सोकैसे गर्वको संहारि सकै वह जो परमपुरुषहै सो
गर्व प्रहारीहै तिहारोगर्व कैसे सहैगो ॥ ६ ॥
साखी ॥ कुल मर्यादा खोइकै, खोजिनि पदनिर्वांन ॥
अंकुर बीज नशाइकैकै, भये विदेही थान ॥ ७ ॥
जेकर्मको त्यागकियेहैं तिनको गांठिहूको धर्मगयो अपनीकुलमर्यादा तो
पहिले खोइदयो है औ निर्वाणं पदको खोजत भये अंकुर जो है सुरतिबीज
जो है शुद्धजीवआत्माबीजजो है साहेब ताको नशायके बिदेहीजौहै ब्रह्म निरा-
कार ताहीके थानभये कहे आपनेको ब्रह्म मानतभये सो जाको अनुभवहै ब्रह्म
ताको तौ भूलिही गये बिनाअंकुरपाले कैसे होइगो अर्थात् धोखेहीमें परेरहिं
गये वामें कुछनहीं मिलै है तामें प्रमाण कबीरजी को ( अंकुर बीज जहां
नहीं, नहीं तत्त्व परकाश । तहांजाय का लेउगे, छोड़हु झूठी आश ॥ ) अर्थात्
चेष्टारहित ब्रह्मको खोजतभये सो वातो कुछ वस्तुही नहीं है मिलिबोई
कहां कैर ॥ ७ ॥
इति पैंतीसवीं रमैनी समाप्त ।
रमैनी । ( १०९ )
अथ छत्तीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
ज्ञानीचतुर विचक्षण लोई। एकसयान सयान न होई ॥१॥
दुसरसयानको मर्मनजाना।उत्पतिपरलयैरैनिविहाना ॥२॥
वाणिजएकसवनमिलिठाना। नेमधर्म संयम भगवाना ॥३॥
हरि अस ठाकुरते जिनजाई। बालनभिस्तगांवदुलहाई ॥४॥
साखी ॥ तेनर मरिकै कहँ गये, जिन दीन्हो गुरु छोट ॥
राम नाम निज जानिकै, छोड़हु वस्तू खोट ॥५॥
ज्ञानीचतुरविचक्षण लोई । एक सयानसयाननहोई ॥ १ ॥
दुसरसयानकोमर्मनजाना । उत्पतिपरलैरैनिविहाना ॥ २॥
ज्ञानीजे हैं चतुरजे हैं विचक्षणजेहैं तिनहींलौ जे ई लोगहैं अर्थात् सूक्ष्म ते सूक्ष्म
ताहूतेसूक्ष्मलौबिचारनवारे जे अद्वैतबादी सबलोगहैं ते एक जो ब्रह्म ताहीमें सयानजों
भये कि, मैंहीं ब्रह्महौं यही मानतभये तौ वे सयान नहीं हैं॥ १॥दूसर सयानजे
द्वैतवादी हैं जे साहबको औ अपनेहीको मानै हैं ताको तौ मरमई नहीं जानै हैं
भूलिकै उत्पति परलै कहे संसारकी जो उत्पत्ति प्रलय होतरहै है ताहीमें रैनि
बिहाना कहे दिनराति जनमतमरतरहै हैं ॥ २ ॥
वाणिजएकसवनमिलिठाना । नेमधर्मसंयमभगवाना ॥३॥
हरिअसठाकुरते जिनजाई । बालनभिस्तगाँवदुलहाई ॥४॥
एक वणिज तब मिलि ठानतभये नेम धर्म संयम इत्यादिक जे सब साधनहैं
तिनहींको भगकहे ऐश्वर्य मानिकै तिनमें सब लागतभये ॥३॥ हरिकहे आरतकें
हरनहारे जे साहबहैं तिनते जिन जाइकहे जेजेफरकह्वैगयेहैं ते बालनकहे बालककी
ऐसीहैं बुद्धि जिनकी ऐसे जेजीवहैं ते भिस्तगाँव दुलहाई कहे भिस्त जोस्वर्गहै
( ११० ) बीजक कबीरदास ।
ताहीको दुहाहैकै गावतभये अर्थात् संयम नेमकरि स्वर्ग में जाइ अप्सरन तें
भोगकरै यही गावतभये ॥ ४ ॥
साखी ॥ ते नर मरिकै कहँ गये, जिन्हदीन्होंगुरुछोट ॥
राम नामनिज जानिकै, छोड़हु वस्तू खोट ॥ ५ ॥
जिनको गुरुछोट दियोहै अर्थात् थोरे अक्षरको मंत्रदियो औ जो घोट
पाठहोइ तो यह अर्थहै कि, गुरु उनको मूड़घोटि दियो अर्थात् मूड़ मूड़िदियो
अथवा झुंठप्यालाको घोटादैदियो पियाय दियो ते नर जेहैं हिंदू मुसलमान तेम-
रिकै कहां गये अर्थात् कहूं नहीं गये संसारहीमें परे हैं सो अपनो जो रामनाम
ताको जानिकै खोट बस्तुजो नाना देवतनकी उपासना धोखाब्रह्म स्वर्गकी चाह
ताको छाड़ो अंतमें उद्धार रामनामही करैगो तामें प्रमाण ॥ ( मनरे
जवने राम कह्योरे । फिरिकाहिबे को कछुनरह्योरे ॥ काभोयोग यज्ञजप-
दाना । जोतें रामनामनहिंजाना ॥ १॥ कामक्रोधदोउभारे । गुरुप्रसाद सबतारे ॥
कहैकबीरभ्रमनाशी । राजाराम मिले अविनाशी ) ॥ ५ ॥
इतिछत्तीसर्वी रमैनी समाप्त ।
अथसैंतीसवीरमैनी ।
चौपाई ।
एक सयान सयान न होई।दुसर सयान न जानै कोई॥१॥
तिसर सयान सयाने खाई । चौथ सयान तहां लै जाई॥२॥
पँचये सयान न जानैकोई । छठयें महँ सब गैल विगोई॥३॥
सतयें सयानजो जानौभाई। लोक वेद मो देहु देखाई॥ ४ ॥
साखी ॥ बिजक बतावै वित्तको, जोवित्त गुप्ताहोइ ॥
शब्द बतावै जीवको, बूझै विरला कोइ ॥ ५ ॥
रमैनी । (१११)
एकसयान सयान न होई।दुसर सयान नजानै कोई ॥ १ ॥
तिसरसयान सयानैखाई । चौथ सयान तहां लै जाइ॥२॥
एक जो ब्रह्म ताहीमें जे सयानहैं अर्थात् वाही को सांचमानै हैं और सब
मिथ्याहै ते सयान नहीं हैं औ दूसरमायामें जेसयान हैं वे कहैंहैं कि, मायाको
हम जानै हैं सो माया तौ सतअसत ते विलक्षणहै ताको कोई जानतही
नहींहै कि, कौन वस्तुहै॥१॥अरु तीसर जो जीव तामें जे सयानहैं कि,जीवातैमै
सबका मालिकहै या बिचौरहैं ऐसे जे गुरुवालोगहैं ते सयान जोजीवहै ताकोखा-
इहैं कहे पाखण्डमतमें लगाय नरकमें डारिदेइहैं चौथ जो ईश्वर और सब
देवता तामें जे सयान हैं अर्थात् उनकी उपासना जो करै हैं ईश्वर देवता
तिनको अपने लोकको लैजाय हैं ॥ २ ॥
पँचयें सयान न जानैकोई । छठयें महँ सबगयेबिगोई ॥३॥
सतयें सयान जो जानौभाई । लोक वेद महँ देहुदेखाई॥ ४ ॥
औ पाँचौइन्द्रिनकी विषय तिनमें जे सयानहैं ते तौ वे कछू जानतही नहीं
हैं बद्धही हैं अरु छठौँ है मन ताहीते सबैगैल बिगोइगई है॥३॥सातवें सयान
नौं साहब ताको जो जानौ तौ हे भाई ! लोक वेदमैं मैं देखाय देउँ कि जेते
वर्णन करिआये तिनते साहब परे है ॥ ४ ॥
साखी ॥ बिजकबतावै बित्तको, जोवितगुप्तहोइ ॥
शब्द बतावै जीवको, बूझै विरला कोइ ॥ ५ ॥
श्री कबीरजी कहैंहैं कि जैसे जोन बित्त गुप्तहोयहै कहे गाड़ा होइ तौने
धनको बीजक बतावैहै तैसे सारशब्द जोरामनामबीजक सो साहब मुख अर्थमें
जीवकों बतावै है कि तू साहब को है तेरोधन साहिबै है सो या बात कोई
बिरलासाधु बूझैहै ॥ ५ ॥
इति सैंतीसवीं रमैनी समाप्ता ।
( ११२ ) बीजक कबीरदास ।
अथ अड़तीसवींरमैनी ।
चौपाई ।
यहिविधिकहौं कहानहिंमाना।मारगमाहिंपसारिनि ताना १
रातिदिवसमिलिजोरिनितागा।ओटतकाततभर्म न भागा २
भर्मै सबघट रह्यो समाई। भर्मछोड़ि कतहूं नहिं जाई॥३॥
परैनपूरि दिनोंदिन छीना।जहां जाहु तहँ अंगविहीना ॥४॥
जोमतआदिअंतचलिआया।सोमतिउनसवप्रगटसुनाया ५
साखी ॥ वहसंदेश फुरमानिकै, लीन्हो शीशचढ़ाय ॥
संतोहै संतोषसुख, रहहु तौ हृदय जुड़ाय ॥ ६ ॥
यहिविधिकहौंकहानहिंमाना।मारगमाहिंपसारिनिताना १॥
कबीरजी कहैहैं कि सत्ययुगमें सत्यसुकृत नामते, त्रेतामें मुनीन्द्र नामतें,
द्वापरमें करुणामय नामते, कलियुगमें कबीर नामते, मैं चारो युगमें जीवनको
रामनामको अर्थ साहबमुख समुझायो पै कोई जीव कहा न मान्यो वेदमार्गमें
ताना पसारतभये कहे अपने कहे अपने अपने मतमें अर्थ करिलेतेभये ॥ १ ॥
रातिदिवसामिलिजोरिनितागा।ओटतकाततभर्मनभागा २॥
औ रातिउ दिन तागा जोरतभये कहे वेदार्थको अपने अपने मतमें लगावत
भये अर्थात् जहां जहां अर्थ नहीं लगैहै तहांतहां अपने मतमें योजित
करतभये औ ओटत कातत कहै शंकासमाधान करत करत भर्म न भाग्यो यहां
ताना प्रथम कह्यो ओटब कातब पीछे कह्यो सो प्रथम शंका समाधान करिकै
काति ओटि कै ताना तनतभये अर्थ बनावत भये जब बन्यो तब फेरफेर शंका
समाधान करि ओटिकाति अर्थको ताना पसारत भये भर्म न भाग्यो एक
सिद्धांत न भयो ॥ २ ॥
रमैनी । (११३)
भर्मै सबघट रह्योसमाई । भर्मछोड़ि कतहूं नहिं जाई ॥३॥
परैनपूरदिनौदिनछीना। जहां जाहु तहँ अंग विहीना ॥४॥
जोमतआदिअंतचलि आया। सोमतउनसबप्रकटलखाया ५
वही भर्म घट घटमें समाइ रह्यो है भर्म छोड़िकै अनत न जात भये वही
संशयमें रहिगये॥ ३॥पूर नहीं परैहै कहै निश्चय नहीं होइहै दिनौदिन क्षीण होत
जाइहै क्षीणकहां होइहै कि, यह जानैहै कि हमारो अज्ञान दूरिभयो पै जहां
जाईहै तहँ निराकार धोखई मिलैहै हाथ कछु नहीं लगैहै ॥४॥ वेदको अर्थ तौ
परोक्षहैकहै अमरहै तात्पर्य वृत्तिकरिकै साहबको लखावैहै तौन अनादिमत ताकों
न समुझतभये वहवेदको अर्थ गुरुवालोग प्रगट करिकै अर्थात् अपरोक्ष जौन
आदि अंतते चलो आयो है ताको बऊ परिगयो ॥ ५ ॥
साखी ॥ वहिसंदेश फुरमानिकै, लीन्हों शीशचढ़ाइ ॥
संतोहै संतोषसुख, रहहुतौहृदय जुड़ाइ ॥ ६ ॥
वही तत्त्वमसि उपनिषत्को संदेश शीश चढ़ाइ लेतेभये वेदनमें वाणीमें
तात्पर्य करिकै सांचपदार्थ कह्यो ताको न जानतभये संतपद संतोष सुखहै तौने
जो रहौ तौ हृदय जुड़ाइ औरेमें तो तापई होइगो काहेते सबतें परे है जाकों
साहब दूसरो नहींहै ऐसे जे चक्रवर्ती श्रीरामचन्द्रहैं तिनको जबपायो तब उनते कम
ब्रह्महोबेकी ईश्वरके मिलिबेकी और मायिक जेपदार्थ हैं तिनके मिलिबेकीचाहई
न होइगी काहेते कि वहचक्रवर्ती के मिलिवेकेसमसुख नहीं है ब्रह्मानंद विषया-
नंद आदिकनमें जबलगैगो तहहीं सबते संतोष है याको मन शांतहै जाइगो॥६॥
इति अड़तीसवीं रमैनी समाप्त ।
अथ उन्तालीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
जिन्हकालिमा कालिमाहँ पढ़ाया। कुदरतखोजि तिन्हौं नहिं पाया
करिसतकर्म करै करतूती । वेद किताबभयासवरीती ॥२॥
८
( ११४ ) बीजक कबीरदास ।
करमतसो जो गर्भऔतरिया। करमत सोजोनामहिंधररिया ३
करमत सुन्नति और जनेऊ । हिंदू तुरुक न जानै भेऊ ॥४॥
साखी ॥ पानीपवन सँजोयकै, रचिया ई उतपात ॥
शून्यहिंसुरतिसमानिया, कासोकहियेजात ॥५॥
जिन्हकलिमाकलिमाहँ पढ़ाया। कुदरतखोजितिन्हौंनाहिंपाया
कारिसतकर्मकरैक रतूती । वेदकिताब भया सबरीती ॥ २ ॥
जिन्ह महम्मद सबको कलियुगमें कलिमा पढ़ायोहै तेऊकह्योहै कि हम
अल्लाहके कुदरतको खोजकहे अंतनहीं पायो ॥ १ ॥ आपन आपन मतकरिकै
करतूति कैकै कर्म करनलगे सो वेदकिताब सबरीति हैजातभये ॥ २ ॥
करमतसोजोगर्भऔतरिया । करमतसोजोनामहिंधररिया ३
करमत सुन्नति और जनेऊ । हिंदू तुरुक न जानैभेऊ ॥४॥
कर्महिंते गर्भमें आय अवतार लेतेभये अरु कर्महीते नामधरतभये ॥ ३ ॥
औ कर्मैते सुन्नति औ जनेऊ चलतभयो ताको भेद हिंदू तुरुक दूनो न
जानत भये ॥ ४ ॥
साखी ॥ पानी पवन संजोयकै, रचिया ई उतपात ॥
शून्यहिंसुरतिसमानिया, कासोकहियेजात ॥५॥
पानी कहैविंदु अरुपवन ये दूनौके संयोग ते गर्भभयो कहे शरीररूपी उतपात
खड़ाभयो सो कर्म में लगे जन्म मरणादिक येते उतपात भये पै कर्म न छोड़
तभये अरु जिन कर्म छोड़िबोऊकियो तिनकी सुरति शून्यैंमें समाइ जाती
भई सो वहांकी बात कासों कही जातहै अर्थात् काहूसों नहीं कहिजातहै नेति-
नेतिकहिदेइ हैं अर्थात् उहां तौ शून्यहै कुछहाथ न लग्यो ॥ ५ ॥
इति उन्तालीसवीं रमैनी समाप्त ।
रमैनी । ( ११५ )
अथ चालीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
आदम आदि सुद्धि नहिंपावा।मामाहौवा कहँ ते आवा॥ १ ॥
तबहोते न तुरुक औ हिन्दू।मायके रुधिर पिताकेविन्दू॥२॥
तवनहिंहोते गाय कसाई।कहुबिसमिल्लहकिनफुरमाई॥३॥
तवनरहोहै कुलऔजाती।दोजकभिस्तकहां उतपाती॥४॥
मनमसलेकीख़वरि न जानै।मतिभुलानदुइदीनवखानै॥५॥
साखी ॥ संयोगे का गुनरवै, विनयोगे गुणजाय ॥
जिह्वास्वादकेकारणे, कीन्हे वहुत उपाय ॥ ६ ॥
आदमआदिसुद्धिनहिंपावा । मामाहौवाकहँते आवा ॥१॥
तबहोते न तुरुक औ हिंदू । मायकेरुधिरपिताकेविंदू॥२॥
आदि आदम जे ब्रह्मा ते मामाकहे जगतपिता हौवा नामऐसी जो वाणी
ब्रह्माकी नारी सो ब्रह्माही सुधि ना पायो कि कहां ते आई है ॥ १ ॥ तब
आदिमें न हिंदू रहे न तुरुक रहे औ मायके रुधिरते पिताके बिंदुते गर्भ
होइहै सोऊ नहीं रह्यो ॥ २ ॥
तवनहिंहोतेगायकसाई । कहुबिसमिल्लहकिनफुरमाई ॥३॥
तवनरहोहैकुल औजाती । दोजकभिस्तकहांउतपाती॥४॥
मनमसलेकीखवरिनजानै।मतिभुलानदुइदीनवखानै ॥५॥
तब न गाइ रही न कसाई रहे सो जो बिसमिल्ला कहिकैहलाल करै है
सो किन फुरमांईहै ॥ ३ ॥ अरु तब न कुलरह्यो औ न जाति रही दोजक
भिस्त कहांरहोहै ॥ ४ ॥ मनके मसलेकी सुधि न जान्यो कि ई मेरेमनके
बनाये हैं दोनोंदीन । औ अपने आत्माको मत न जान्यो कि यह न
हिंदू हैं न मुसलमान है मतिहीन दुइदीन बखानत भये ॥ ५ ॥
(११६) बीजक कबीरदास ।
साखी । संयोगेका गुणरवै, विनयोगे गुणजाय ॥
जिह्वास्वादके कारणे, कीन्हे बहुत उपाय ॥६॥
जब मनको आत्माको संयोग होइहै तबहीं संकल्प होइहै औ तबहीं गुणहों-
यहै अरुजब मनको आत्माको संयोग नहीं होइ है तबगुण जाइहै कहेगुणी
नहीं रहैहै अरुसंकल्पौ नहीं रहैहै सोनर जेहैं ते जिह्वा सुखके कारण औ शिश्न
(इन्द्रिय) सुखकेकारण बहुत उपाय करतभये औ मन औ आत्माको संयोग
छोड़ावनको उपाय करतभये औ जे मन आत्माको संयोग छोड़यौहै ते आपनें
स्वस्वरूप को प्राप्त भये हैं ॥ ६ ॥
इति चालीसवीं रमैनी समाप्तौ ।
अथ इकतालीसवीं रमैनी।
चौपाई ।
अंबुकिराशिसमुद्रकिखाई।रवि शशिकोटि तैंतिसौभाई॥१॥
भँवरजालमें आसनमाड़ा।चाहतसुखदुखसंग न छाड़ा॥२॥
दुखकामर्म काहुनहिं पाया।बहुतभांतिकै जग बौराया॥३॥
आपुहिबाउर आपुसयाना।हृदयावसत रामनहिंजान॥४॥
साखी ॥ तेई हरि तेइ ठकुरा, तेई हरिके दास ॥
जामें भया न यामिनी,भामिनिचलीनिरास॥५॥
अम्बुकिराशिसमुद्रकीखाई । रविशशिकोटितैंतिसौ भाई १
भँवरजालमें आसनमाड़ा । चाहतसुखदुखसङ्गनछाड़ा॥२॥
अंबुकहै बिंदु ताकीराशि शरीरहै समुद्र जो है संसारसागर ताकीखाई है
अर्थात् संसारहीमें सबशरीरपरेहैं जैसे जलजीव समुद्रमें रहैहै तैसे ताना जीवनकें