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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 147

( ९६ ) बीजक कबीरदास ।
अरु तार जोहै प्रणव ताको हजारन दोनों कुम्भकमें जपत भये अजहूंलौं ,
बाहींमें लगेहैं औ यहकहेंहैं कि, कठिन दूरिहै ॥ ३ ॥ कबीरजी कहैहैं जब तानाको-
ताग टूटिजाइहै तब कोरी भिजै कै जोरिदेइहै ऐसे वह साधक अभ्यासरूप
कर्मते जोरिदेइहै सोकर्म को लाठिनमें बांधिकै सूतजो हे जीव कुसूत जोहै वाणी
ताको जोलहा जो मनहै सो विनयहै अथवा विद्या अविद्या सूतकुसूत विनय है
जब बस्तु तय्यार होइजायहै तब जोलहाको बिनिबो छूटै है सो धोखा ब्रह्ममें
लागि अनादिकालते बिनतई है जब साहबको जानै तब साधनरूप कर्मकरिवो
छूटिजाइ हंसरूप साहबदइ जरामरणमिटिजाइ ॥ ४ ॥
इति अट्ठाईसवीं रमैनी समाप्तम् ।
अथ उनतीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
बज्रहु ते तृण क्षणमें होई । तृणते बज्रकरै पुनि सोई ॥ १ ॥
निझरूनरू जानि परिहरई।कर्मकबांधल लालच करई॥२॥
कर्मधर्मबुधिमतिपरिहरिया । झूठनाम सांचलै धरिया॥३॥
रजगति त्रिविधकीनपरकाशा।कर्म धर्म बुधिकेर विनाशा ४
रविकेउदय ताराभो छीना । चरवेहर दोनों में लीना ॥५॥
विषकेखाये बिष नहिं जावै।गारुड़सो जो मरतजिआवै॥६॥
साखी ॥ अलखजोलागी पलकमों, पलकाहिमोँडसिजाय ॥
विषहर मन्त्र न मानही, गारुड़ काह कराय ॥७॥
बज्रहुते तृण क्षणमें होई । तृणते बज्रकरै पुनि सोई ॥ १ ॥
निझरूनरूजानिपरिहरई । कर्मकबांधललालचकरई ॥२॥