कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 154, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । ( १०३ )
कठिन है काहेते कि जो अहंब्रह्मास्मि मान सर्व कर्मनको त्यागिदियो औ दूसरी
बुद्धिन गई तौ पतितहै जाय है । तामें एक इतिहासहै। एकराजाके गोहत्यालगी
सो हत्याआई तब राजाकह्यो कि सर्वत्र ब्रह्मही है हमहूं ब्रह्महैं हमको हत्याका-
हेको लगेगी हाथके देवता इन्द्रहैं सो इन्द्रही को लगेगी इत्यादिक जवाब देत-
भयो तब वहहत्या राजाकी बेटीके पासगई सो वो श्रृंगारकरि रानीके पलंगमें
परिरही तहां राजाआये कन्याको परी देखी तब कह्योकि तू कहापरीहैं
तब कन्याकह्यो जैसैरानी तैसे मैं ब्रह्मतौ एकही है तब राजा उलटिचले
हत्या राजाके शिरमें चढ़िबैठी । या भांति ज्ञानकाण्डहूको तात्पर्य निवृत्तिहीमें
है कि जौनसरल उपाय वेद तात्पर्य कैकै बतावैहै कि मनादिकन को
छोड़िकै रामनामकोजपै साहबको ह्वैजाय तौमुक्ति ह्वैजाय तामें प्रमाण ॥
( द्वापरान्ते नारदोब्रह्माणंप्रतिजगाम कथंनु भगवन् गांपर्य्यटन्कलिसंतरेयमिति ।
सहोवाच भगवत आपुरुषस्यनारायणस्यनाम्नेति नारदःपुनःपप्रच्छभगवतःकिंत-
न्नामेतिसहोवाच हरेरामहरेरामरामरामहरेहरे श्रुतिः ॥)आदिपुरुष भगवान् नारा-
यणके नामहैं उद्धार करनवारे सो नारायणनाम सुनावहू कियो औ पूछ्यो कि
कौननामहैं तब रामनामको बताये तेहिते उद्धारकर्त्तारामनामही है पुनि स्मृतिहू
कहैहै ॥ “सप्तकोटिमहामंत्राश्चित्तविभ्रमकारकाः । एकएवपरोमंत्रोरामइत्यक्षर-
द्वयम्॥” ताते वेदको तात्पर्य कर्मकांड उपासनाकांड ज्ञानकांड तीनोंके त्यागमेंहै
साहबकेमिलायबेमेंहैतामें प्रमाण ॥“सर्वेवेदायत्पदःमामनांति इतिश्रुतेः”॥ औ क-
बीरजीहू कह्यो है कि वेदकोअर्थ उलटिकैकहै तात्पर्यते समुझैतौतौने अर्थ वेदकें
सांचहैं अपरोक्ष अर्थतौझूठो है तामें प्रमाण “दौड़धूप सबछोड़ो सखिया, छोड़ो
कथापुरान । उलटि वेदका भेदळखौ, गहि सारशब्द गुरुज्ञान॥” दूजोप्रमाण॥
आसन पवन किये दृढ़रहुरे । मनको मैल छांड़िदेबौरे ॥ काश्रृंगीमूड़ा चमकाये।
क्या बिभूति सब अंगलगाये ॥ क्याहिंदूक्य मुसलमान । जाको साबित रहै
इमान॥क्याजो पंड़ियावेदपुरान । सोब्राह्मणबूझैब्रह्मज्ञान ॥ कहैकबीर कछु आनन-
कीजे । राम नामजपिलाहालीजे ॥” सोस्मृतिमें जोतुमको नानाअर्थ भासमान
होय है सोई बंधनरूपजेवरि करमें लेतै आई है सो वा जेवरि तुम्हा-
रही बरी है ॥ १ ॥