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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 155

( १०४ ) बीजक कबीरदास ।
आपूहि बरी आपुगरबंधा । झूठामोह कालकोधंधा ॥ २ ॥
सो आपही स्मृतिको कर्म प्रतिपादनकरि कर्मरूप रसरीबरिकै आपही
गरबांधत भयो अर्थात् कर्म करमलग्यो झूठाजोमोहहै तामें परिकै कालको
धन्धाबनावतभयो अर्थात् नानादेहधरतभयो कालमारतभयो साहबको जो तात्पर्य
ते स्मृति बतावै है ताको ना संबुझावत भयो ॥ २ ॥
बँधवतबंधछोड़िनाजाई । विषयस्वरूपभूलिदुनियाई ॥३॥
हमारेदेखत सबजगलूटा । दासकबीर रामकहि छूटा ॥४॥
सो बांध तो बांध्यो पै वह बंधते छोड़्यो नहीं छूटैहै विषयमें सब दुनियां
भूलिगई मांस खाइबे को चाह्यो तौ छागरमारि बलिदानदै खाइलियो औसु-
रापानहू करिबेको चाह्यो औ वेश्या राखिबो चाह्यो तौ बाममार्गलियो इत्या-
दिक अर्थ करिकै ॥ ३ ॥ सो कबीरजी कहै हैं कि हमारे देखत देखत यह-
माया संपूर्ण जगको लूटिलियो सो मैंतौ रामै कहिकै छूटिगयो सो मैं सबको
बताऊं हौं सो दुष्टजीव नहीं मानै ॥ ४ ॥
साखी ॥ रामहिंराम पुकारते, जीभपरिगोरोस ॥
सूधाजलपीवैनहीं, खोदिपियनकीहोस ॥५॥
मोको रामैराम पुकारत पुकारत कि राममें लगौ जीभमें रोस परिगयों
कहे ठहर परिगयो पै जीव न मानत भये सो सूधा जल तो पीवै नहीं है कि
सीधे रामकहै तरिजाय वही धोखा ब्रह्ममें लगाइकै नानामत दक्षिण बामा-
दिक करिकै खोदिकै जलपियन की हवस करैहै कहे आशा करैहै सो ये तो सब
धोखाई है मुक्तिकैसे होयगी सीधे रामजपि स्वामी सेवक भावकरि संसार साग-
रते उतरि कांहे नहीं जायेहे ॥ ५ ॥
इति तेतीसवीं रमैनी समाप्त ।