कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १०६ ) बीजक कबीरदास ।
वही धोखामें पण्डित लोग लगावतभये कि वह जो ब्रह्म सर्वत्र पूर्ण है सो
तुहीं है अहंब्रह्मास्मि यह भावना करु सो वातो जीवहीको अनुभवहै जीव ब्रह्म
कैसे होइगो अरु पण्डित कहा बतावै वाको तौ अनामाकहें हैं अरु वाको बस्तु
गाउँ कहां बतावैं वाको तो देशकाल बस्तुके रहित कहै हैं सो जाके नाम
रूप नहीं है देशकाल बस्तुते रहितईहै सो वहहै कि नहीं है जो कहो अनु-
भवमें तौ आवैहै तौतौ अनुभवौ तौ जीवहीको है जो यह विचारिबो धोखाइ
भयो तौ जीवब्रह्म कैसे होईगो ॥ ३ ॥
दानपुण्यउनबहुतबखाना।अपनेमरनकीखबरिनजाना॥४॥
एक नामहैअगमगँभीरा। तहवांअस्थिरदासकबीरा ॥ ५ ॥
अरुकर्मकांडवारे दानपुण्य बहुतबखान्योहै पै अपनेमरिबेकी खबरि नहीं
जान्यों कि यहकाल बहुतदान पुण्यवारेनको खाइ लियोहै हमकैसेबचेंगे ॥ ४ ॥
जौने नाममेंलगे जन्म मरणनहीं होइहै औअगमहै कहे जेसंतलोगहैं तेईपावैं
हैं अरु गँभीरपद है कहेगहिर अर्थ है सो कबीरजी कहै हैं कि तौने नाममें मैं
स्थिरहौं ॥ ५ ॥
साखी ॥ चीटी जहां न चढिसकै, राई नहिं ठहराय ॥
आवागमन कि गमनहीं,तहँ सकलौजगजाय ॥६॥
वो ब्रह्म कैसो है कि चीटी जो बाणी है सो नहीं पहुँचे औ राई जो बुद्धि
है सो नहीं ठहराय अर्थात् मन बचन के परे है औ आवागमनकी गमनहीं है
अर्थात् न वहांते कोई आवै है न यहां ते कोई जाय है अर्थात मिथ्याहै तहां
सिगरो जग जायहै ॥ ६ ॥
इति चौंतीसवीं रमैनी समाप्ता ।