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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 158

( १०८ ) बीजक कबीरदास ।
ब्राह्मण क्षत्री वैश्य उपदेशपावै है कहो मुक्ति केहिकी भई है काहेते वाकोता-
त्पर्य तौ यहहै कि जबसाहब को स्वरूप अरु आपनो स्वस्वरूप जानै तौ
मुक्तिहोइ सो साहेबको स्वरूपऔ आपनो स्वरूपतो जानतई नहीं है मुक्ति
कैसे पावै ॥ ३ ॥
और के छुये लेतहौ सींचा। तुमते कहौ कौनहै नीचा ॥ ४॥
यहगुणगर्व करौ अधिकाई।अतिकेगर्व न होइभलाई ॥ ५ ॥
जासु नाम है गर्व प्रहारी । सोकसगर्वहि सकैसहारी ॥ ६ ॥
औरको छुबौहौ तौ गंगाजल सींचौहौ कि पवित्रहैजाय सोकहों
तुमते कौननीचहै ॥ ४ ॥ मलमूत्रादिक तुमहू में भरे हैं औ अपने गुणको
गर्व अधिक तुम करतेहौ सो अतिगर्व किये भलाई नहीं होइहै काहेते कि ॥५॥
जाको नाम गर्व प्रहारी है सोकैसे गर्वको संहारि सकै वह जो परमपुरुषहै सो
गर्व प्रहारीहै तिहारोगर्व कैसे सहैगो ॥ ६ ॥
साखी ॥ कुल मर्यादा खोइकै, खोजिनि पदनिर्वांन ॥
अंकुर बीज नशाइकैकै, भये विदेही थान ॥ ७ ॥
जेकर्मको त्यागकियेहैं तिनको गांठिहूको धर्मगयो अपनीकुलमर्यादा तो
पहिले खोइदयो है औ निर्वाणं पदको खोजत भये अंकुर जो है सुरतिबीज
जो है शुद्धजीवआत्माबीजजो है साहेब ताको नशायके बिदेहीजौहै ब्रह्म निरा-
कार ताहीके थानभये कहे आपनेको ब्रह्म मानतभये सो जाको अनुभवहै ब्रह्म
ताको तौ भूलिही गये बिनाअंकुरपाले कैसे होइगो अर्थात् धोखेहीमें परेरहिं
गये वामें कुछनहीं मिलै है तामें प्रमाण कबीरजी को ( अंकुर बीज जहां
नहीं, नहीं तत्त्व परकाश । तहांजाय का लेउगे, छोड़हु झूठी आश ॥ ) अर्थात्
चेष्टारहित ब्रह्मको खोजतभये सो वातो कुछ वस्तुही नहीं है मिलिबोई
कहां कैर ॥ ७ ॥
इति पैंतीसवीं रमैनी समाप्त ।