कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 161, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । (१११)
एकसयान सयान न होई।दुसर सयान नजानै कोई ॥ १ ॥
तिसरसयान सयानैखाई । चौथ सयान तहां लै जाइ॥२॥
एक जो ब्रह्म ताहीमें जे सयानहैं अर्थात् वाही को सांचमानै हैं और सब
मिथ्याहै ते सयान नहीं हैं औ दूसरमायामें जेसयान हैं वे कहैंहैं कि, मायाको
हम जानै हैं सो माया तौ सतअसत ते विलक्षणहै ताको कोई जानतही
नहींहै कि, कौन वस्तुहै॥१॥अरु तीसर जो जीव तामें जे सयानहैं कि,जीवातैमै
सबका मालिकहै या बिचौरहैं ऐसे जे गुरुवालोगहैं ते सयान जोजीवहै ताकोखा-
इहैं कहे पाखण्डमतमें लगाय नरकमें डारिदेइहैं चौथ जो ईश्वर और सब
देवता तामें जे सयान हैं अर्थात् उनकी उपासना जो करै हैं ईश्वर देवता
तिनको अपने लोकको लैजाय हैं ॥ २ ॥
पँचयें सयान न जानैकोई । छठयें महँ सबगयेबिगोई ॥३॥
सतयें सयान जो जानौभाई । लोक वेद महँ देहुदेखाई॥ ४ ॥
औ पाँचौइन्द्रिनकी विषय तिनमें जे सयानहैं ते तौ वे कछू जानतही नहीं
हैं बद्धही हैं अरु छठौँ है मन ताहीते सबैगैल बिगोइगई है॥३॥सातवें सयान
नौं साहब ताको जो जानौ तौ हे भाई ! लोक वेदमैं मैं देखाय देउँ कि जेते
वर्णन करिआये तिनते साहब परे है ॥ ४ ॥
साखी ॥ बिजकबतावै बित्तको, जोवितगुप्तहोइ ॥
शब्द बतावै जीवको, बूझै विरला कोइ ॥ ५ ॥
श्री कबीरजी कहैंहैं कि जैसे जोन बित्त गुप्तहोयहै कहे गाड़ा होइ तौने
धनको बीजक बतावैहै तैसे सारशब्द जोरामनामबीजक सो साहब मुख अर्थमें
जीवकों बतावै है कि तू साहब को है तेरोधन साहिबै है सो या बात कोई
बिरलासाधु बूझैहै ॥ ५ ॥
इति सैंतीसवीं रमैनी समाप्ता ।