कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । ( १०९ )
अथ छत्तीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
ज्ञानीचतुर विचक्षण लोई। एकसयान सयान न होई ॥१॥
दुसरसयानको मर्मनजाना।उत्पतिपरलयैरैनिविहाना ॥२॥
वाणिजएकसवनमिलिठाना। नेमधर्म संयम भगवाना ॥३॥
हरि अस ठाकुरते जिनजाई। बालनभिस्तगांवदुलहाई ॥४॥
साखी ॥ तेनर मरिकै कहँ गये, जिन दीन्हो गुरु छोट ॥
राम नाम निज जानिकै, छोड़हु वस्तू खोट ॥५॥
ज्ञानीचतुरविचक्षण लोई । एक सयानसयाननहोई ॥ १ ॥
दुसरसयानकोमर्मनजाना । उत्पतिपरलैरैनिविहाना ॥ २॥
ज्ञानीजे हैं चतुरजे हैं विचक्षणजेहैं तिनहींलौ जे ई लोगहैं अर्थात् सूक्ष्म ते सूक्ष्म
ताहूतेसूक्ष्मलौबिचारनवारे जे अद्वैतबादी सबलोगहैं ते एक जो ब्रह्म ताहीमें सयानजों
भये कि, मैंहीं ब्रह्महौं यही मानतभये तौ वे सयान नहीं हैं॥ १॥दूसर सयानजे
द्वैतवादी हैं जे साहबको औ अपनेहीको मानै हैं ताको तौ मरमई नहीं जानै हैं
भूलिकै उत्पति परलै कहे संसारकी जो उत्पत्ति प्रलय होतरहै है ताहीमें रैनि
बिहाना कहे दिनराति जनमतमरतरहै हैं ॥ २ ॥
वाणिजएकसवनमिलिठाना । नेमधर्मसंयमभगवाना ॥३॥
हरिअसठाकुरते जिनजाई । बालनभिस्तगाँवदुलहाई ॥४॥
एक वणिज तब मिलि ठानतभये नेम धर्म संयम इत्यादिक जे सब साधनहैं
तिनहींको भगकहे ऐश्वर्य मानिकै तिनमें सब लागतभये ॥३॥ हरिकहे आरतकें
हरनहारे जे साहबहैं तिनते जिन जाइकहे जेजेफरकह्वैगयेहैं ते बालनकहे बालककी
ऐसीहैं बुद्धि जिनकी ऐसे जेजीवहैं ते भिस्तगाँव दुलहाई कहे भिस्त जोस्वर्गहै