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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

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रमैनी । ( १०१ )
वेद पढ़ैहै तब देवतनकी बड़ाई कहै स्तुति करैहै अथवा अपनी बड़ाई करैहै
कि मैं महापण्डितहौं संशयकी गांठिनो परिगई है सो अजहूं नहीं जाइहै वेदांत
शास्त्र आदि पढ़ैहै आत्मा सर्वत्रहै या कहैहै पै चैतन्य जो जीवहै ताको मूड
काटिकै पाषाण की मूर्त्तिहै ताके आगू धरैहै ॥ ३ । ४ ॥
साखी ॥ कहकबीर पाखण्डते, बहुतक जीव सताय ॥
अनुभवभाव न दर्शई, जियत न आपुलखाय ॥५॥
कबीरजी कहैहैं कि यहिपाखण्डते बहुत जीवनकों सतावत भये उनको
अनुभवको भाव नहीं दर्शैहै कि जैसे हममारैंहैं तैसे येऊ हमको मारैंगे जब
भरिजियैहैं तबभर अपनी इच्छानहीं करै हैं जेहिते बचैं ॥ ५ ॥
इति इकतीसवीं रमैनी समाप्त ।
अथ बत्तीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
अंध सो दर्पण वेद पुराना।दरवी कहा महारस जाना॥१॥
जसखर चन्दनलादेभारा।परिमलबास न जानगँवारा॥२॥
कहकबीरखोजैअसमांना।सोनमिलाजोजायअभिमाना३॥
जैसे आँधरको दर्पण वह आपनो मुख कहादेखे औदरवी जो करछुल्लीहैसो
पाकके रसको कहाजानै ॥१॥ औगदहा चन्दनकोलादे चन्दनकी सुबास कहा-
जानै तैसे गँवारजेहैं ते बेदपुराणको तात्पर्यार्थजे साहबहैं तिनको कहाजानैं जो
गरवीपाठहोय तो या अर्थहै अहंकारी लोगमधुर रसको काजानैं २ सोकबीरजी
कहैहैं कि आसमान जो निराकार धोखाब्रह्मताको खोजै हैं सोवातो झूठईहै सो
पुरुष याको न मिला जाके उपदेशते अहंब्रह्म को अभिमान जाय औ साहब
को जानिलेय ॥ ३ ॥
इति बत्तीसवीं रमैनी समाप्त ।