कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ११० ) बीजक कबीरदास ।
ताहीको दुहाहैकै गावतभये अर्थात् संयम नेमकरि स्वर्ग में जाइ अप्सरन तें
भोगकरै यही गावतभये ॥ ४ ॥
साखी ॥ ते नर मरिकै कहँ गये, जिन्हदीन्होंगुरुछोट ॥
राम नामनिज जानिकै, छोड़हु वस्तू खोट ॥ ५ ॥
जिनको गुरुछोट दियोहै अर्थात् थोरे अक्षरको मंत्रदियो औ जो घोट
पाठहोइ तो यह अर्थहै कि, गुरु उनको मूड़घोटि दियो अर्थात् मूड़ मूड़िदियो
अथवा झुंठप्यालाको घोटादैदियो पियाय दियो ते नर जेहैं हिंदू मुसलमान तेम-
रिकै कहां गये अर्थात् कहूं नहीं गये संसारहीमें परे हैं सो अपनो जो रामनाम
ताको जानिकै खोट बस्तुजो नाना देवतनकी उपासना धोखाब्रह्म स्वर्गकी चाह
ताको छाड़ो अंतमें उद्धार रामनामही करैगो तामें प्रमाण ॥ ( मनरे
जवने राम कह्योरे । फिरिकाहिबे को कछुनरह्योरे ॥ काभोयोग यज्ञजप-
दाना । जोतें रामनामनहिंजाना ॥ १॥ कामक्रोधदोउभारे । गुरुप्रसाद सबतारे ॥
कहैकबीरभ्रमनाशी । राजाराम मिले अविनाशी ) ॥ ५ ॥
इतिछत्तीसर्वी रमैनी समाप्त ।
अथसैंतीसवीरमैनी ।
चौपाई ।
एक सयान सयान न होई।दुसर सयान न जानै कोई॥१॥
तिसर सयान सयाने खाई । चौथ सयान तहां लै जाई॥२॥
पँचये सयान न जानैकोई । छठयें महँ सब गैल विगोई॥३॥
सतयें सयानजो जानौभाई। लोक वेद मो देहु देखाई॥ ४ ॥
साखी ॥ बिजक बतावै वित्तको, जोवित्त गुप्ताहोइ ॥
शब्द बतावै जीवको, बूझै विरला कोइ ॥ ५ ॥