कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । ( ९९ )
जैनी धर्मक मर्म न जाना । पाती तोरि देवघर आना ॥३॥
दवना मरुवा चंपा फूला । मानों जीव कोटि समतूला ॥४॥
अरुजैनी जे नास्तिकहैं ते धर्मको मर्म नहीं जान्यो कांहते कि बांधे तो मुंहै
पट्टीरहैंहैं कि कहूं किरवा न घुसिजाय जीवको बचावैहैं कि हिंसा हम न करेंगे
सो जिन वृक्षनमें जीव हैं तिनकी पातीको तोरिकै पाषाण जे पारसनाथ देवहैं
तिनमें चढ़ावै हैं ॥ ३ ॥ दवना औ मरुवा औचंपाके फूलको तोरिकै कोटिन
जे जीवहैं तेसूंघिकै अघायहैं तिनको तोरि तोरिकै पारसनाथकी मूर्तिमें चढ़ावै हैं
सो अरे मूढ़ा! प्रतक्ष जे जीव वृक्षहैं तिनका पत्रको तोरिकै जड़ जो पाषाणहै तामें
काहेको चढ़ावो हौ तुम तो प्रत्यक्ष प्रमाण मानौहौ कर्म किये फल होय है यह
मानतही नहीं हौ पाषाणपूजे कहा फल होइगो ॥ ४ ॥
औ पृथिवीको रोमउचारै । देखत जन्म आपनो हारै ॥ ५ ॥
मन्मथ बिंदु करै असरारा । कलपैविन्दुखसैनाहिंद्वारा॥६॥
ताकरहालहोयअघकूचा । छादर्शनमेंजैनबिगूचा ॥ ७ ॥
औ पृथ्वी के रोमाजेहैं वृक्ष तिनको चेलनते उखरावै हैं औ शिष्यनकी स्त्रिन-
को देखिकै भोगकारिकै अपनो जन्म हारिदेइहैं कहे नरकको जायैं ॥ ५ ॥
साधन करिकै मन्मथ के बिन्दुको असरारा कहे सरलकरै हैं औ कन्यनते भगि-
नी नाते औ उनकी स्त्रिनते भोग करै हैं तब वह बिन्दु ऊपरते नीचेको कल्प-
तैहै कहे बढ़तहै औ पुनि नीचेते मेरु दंडद्वैकै ऊपरको चढ़ाइ लैजाइहै ॥ ६ ॥
सो जे जैनधर्मी हैं छः दर्शन में बिगूचा कहे भूलि गये हैं तिनकी औ जिनको
कहिआये हैं बीर्य बढ़ावन वारे तिनको हाल अघ कूचा कहे नरकनमें कूचे
जाहि हैं ॥ ७ ॥
साखी ॥ ज्ञान अमरपद बाहिरे, नियरेतेहै दूरि ॥
जो जानै तेहि निकटहै, रह्योसकलघटपूरि ॥ ८ ॥