कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
रमैनी । (८१)
सुनत सुनत वाको डेरात डेरात तदाकारहै भृङ्गीहीरूप ह्वै जाय है तैसे रामनाम
जपतजाइहै, वाको सुनतजाइहै, जगत्मुख अर्थते डेरातजायहै; औ साहबमुख
अर्थमें साहबकी रूप औ अपनो हंसस्वरूप बिचारत निज हंसस्वरूप में तदाकार
ह्वैजायहै, मनादिक मिंटिजायहै शुद्ध रहिजाय है सो अपनेरूप पायजायहै । तब
मन वचनके परे जो रामनाम सो आपनेते अस्फूर्त्तिहोइ है तामें लौलगायकै
जैसे कीटभृङ्गी बनिकै औरे कीटको भृङ्गी बनावैहै तैसे यहौ जीव उपदेश करिकै
औरेहूको हंसरूप बनावै है । सो जो भृङ्गीको शब्द कीट न ग्रहणकरै तौ कीट-
ही रहिजाय ऐसे जो रामनामको जीव ना ग्रहणकरै तौ असारही रहिजायहै
तामें प्रमाण अनुरागसागरको॥ ( ज्यों भृङ्गीगै कीट के पासा । कीटहिगहि गुरग
मि परगासा ॥ बिरला कीट होय सुखदाई । प्रथम अवाज गहै चितलाई॥ कोइ
दूजे कोई तीजे मांनै । तन मन रहित शब्दहित जानै ॥ तबलगै भृङ्गी निजगे-
हा । स्वाती दैकर निज समदेहा ) ॥ ३ ॥
भोअतिगरुवादुखकैभारी । करुजियतनजोदेखुविचारी४
मनकीबातहैलहरिविकारा। त्वहिंनहिंसूर्झैवारनपारा ॥ ५॥
यह संसार भारी दुःखक.रिकै अति गरुवा बोझाहै जीव तू बिचारि देखु जौ
तोको बोझालगै तौ रामनामको यतन करु ॥४॥ मनकी बातकहै मनते गुरुवन
को धोखा ब्रह्म तेहिते उठी जो काररूप लहरि माया ताको कौनो मन कहिकै
तोको वारपार नहीं सूझै है ॥ ५ ॥
साखी ॥ इच्छाकेभवसागरै, वोहितरामअधार ॥
कहैकबीरहरिशरणगहु, गोबछखुरविस्तार ॥६॥
यह जो समष्टि जीवको इच्छारूप भवसागर तामें वोहित जो नौका रामना-
म सोई आधार है और नहीं है सो कबीरजी कहैं हैं हरि जे साहेबहैं तिनकी
शरणगहु यह भवसागर गऊके बछवाके खुरके सम उतरि जायगो यामें
संदेह नहीं है ॥ ६ ॥
इति बीसवीं रमैनी समाप्त ।
६
( ८२ ) बीजक कबीरदास ।
अथ इक्कीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
बहुतदुखै है दुखकी खानी । तबवचिहौजवरामहिजानी १
रामहि जानियुक्ति जोचलई । युक्तिहिते फंदा नहिं परई २
युक्तिहि युक्ति चलत संसारा । निश्चयकहा न मानुहमारा ३
कनक कामिनी घोरपटोरा । संपत्ति बहुत रहे दिनथोरा ४
थोरेहि संपतिगो बौराई । धरमरायकी खबरि न पाई ५
देखित्रासमुखगोकुम्हिलाई । अमृत धोखे गो विष खाई ६
साखी ॥ मैं सिरजों मैं मारहूँ, मैं जारों मैं खाउँ ॥
जलथलमैंहींरमरह्यों, मोरनिरंजननाउँ ॥ ७ ॥
बहुतदुखै हैदुखकीखानी । तबबचिहौजवरामहिजानी ॥१॥
रामहिजानियुक्तिजोचलई । युक्तिहितेफंदानहिपरई ॥ २ ॥
युक्तिहियुक्तिचलतसंसारा । निश्चयकहानमानुहमारा॥३॥
यह दुःखकी खानि जो संसारसो बहुतदुःखैहै अर्थात् बहुतदुःख देइहै तुम तबहीं
यातेबचोगे जब सबकेमालिक रक्षक जे श्रीरामचन्द्रतिनकोजानौगे आनउपाय न
बचौगे ॥१॥ काहेते जे श्रीरामचंद्र को जानिकै युक्ति सहित चलैहै तेई वही यु-
क्तिहीते संसारके फंदामें नहीं परैहैं सो कबीरजी कहैहैं सो युक्ति आगे लिखैंगे॥२॥
यासंसार केवल अपनी अपनी युक्तिहीते चलै है कबीरजी कहैहैं मैं जो निश्चय
बात कहौहौं कि, रामनामहीते तेरो उद्धार होयगो याकी युक्ति कोई नहीं मानैहै
अपनेही मनकी युक्ति चलैहै ॥ ३ ॥
कनककामिनी घोरपटोरा । संपतिबहुत रहेदिनथोरा ॥४॥
थोरेहि संपति गो बौराई । धर्मराजकी खबरि न पाई ॥ ५ ॥
कनक जेहै कामिनी जेहै घोड़े जैहैं हाथी जैहैं पटंबर जैहैं ये संपति तो
बहुतहै परंतु इनके भोग करिबेको दिनतो थोरही है अर्थात् आयुर्दाय थोरी है
सोतौ भोगमें बितावै है साहबको कब जानैगो ॥ ४ ॥ सो तै तो थोगी
संपत्तिमें बौराय गयो धर्मराज की खबरि तै नहीं पाई कि, जब मोको ६
जाइँगे तब सारी संपत्ति दियई परीरहि जायगी तब कौन भोगकरैगो
बिचारि साहब को जानो ॥ ५ ॥
देखित्रासमुखगोकुम्हिलाई । अमृतधोखेगोबिषखाई ॥६॥
औ दैवयोगजो कदाचित् तुम्हे धर्मराजको त्रासदेखिकै मुख जब कुम्हिलां-
यगयो कहे संसारते बैराग्यभई तब गुरुवालोगनके निकटजाइ अपनो स्वरूप
समुझौ कि, मैं अमृतहौं मन मायादिक ते भिन्नहौं सो बाततो तू सांचिबिचारी
ऐसहीहै परंतु भगवत् अंशत्व तेरे स्वरूपमें है सो गुरुवालोग नहीं बतायो और-
हीमें लगाय दियो सो अपनो स्वरूप समुझबो जो अमृत ताही के धोखे ते
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( ८४ ) बीजक कबीरदास ।
धंधा बँधा कीन्ह व्यवहारा । कर्म विवर्जित बसै निनारा ॥३॥
षटआश्रमषटदरशनकीन्हा । षटरसवस्तुखोटसबचीन्हा ॥४॥
चारि वृक्ष छाशाख बखानै । विद्याअगणितगनै न जानै॥५॥
औरौ आगम करै विचारा। तेहिनहिंसूकै वार न पारा ॥६॥
जप तीरथ व्रत पूजे भूता । दान पुण्य औ किये बहूता॥७॥
साखी ॥ मंदिर तो है नेहको,मति कोइ पैठे धाइ ॥
जोकोइपैठे धाइकै, बिन शिर सेंतीजाइ ॥ ८ ॥
अलखनिरंजनलखैनकोई । जेहिकेबँधे बँधासवकोई ॥ १ ॥
जेहिझूठो सो बँधो अयाना । झूठीवातसांचकैमाना ॥ २ ॥
धंधाबँधाकीन्ह व्यवहारा । कर्मविवर्जितबसैनिनारा ॥ ३ ॥
कबीरजी कहैहैं कि, हे जीव! तूतो अपनेको निरंजन मान्यो सो निरंजन तों
अलखहै वाको कोईनहीं लखैहै जाके बँधतेकहे मायामें सब कोई बँधे हैं ॥ १ ॥
हे अजानौ ! जौने झूठे सो तुम बँधे हौ सो झूठही है तुम सांच मानौहौ सो न
मानौ ॥ २ ॥ धन्धा जो साहबकीसेवा ताको बँधाकहे बांधनवारे तौनेको व्यव-
हार तुम कीन अर्थात् व्यवहार मानि कर्मते वर्जित ब्रह्म सबते
न्यारही रहै है या परमार्थ तुमलोग कहौहौ औ वाहीमें आरूढ़ होतहौ साह-
बको नहीं जानौहौ ॥ ३ ॥
षटआश्रमषटदरशनकीन्हा । षटरसवस्तुखोटसबचीन्हा ॥४॥
चारिवृक्षछाशाखबखानै । विद्याअगणितगनैनजानै ॥ ५ ॥
षटरसनको खोटमानि त्यागन करिकै औ षटआश्रम करिकै षट दर्शन
करिकै वही धोखा ब्रह्मही को सिद्धांत मानते भये ॥ ४ ॥ पुनि चारि वेद
छवोशास्त्र अगणित विद्या वाच्यार्थ करिकै धोखा ब्रह्मको कहैहैं ताको तो तुम
ग्रहणकियो तात्पर्य वृत्ति ते जो साहबको कहैहै सो तुम न जानत भये ॥ ५ ॥
रमैनी । ( ८५ )
औरो आगम करेविचारा । त्यहिनहिंसूझैवारनपारा॥ ६ ॥
जप तीरथ ब्रत पूजेभूता । दान पुण्य औ कियेबहूता ॥ ७ ॥
अरु औरौ आगम जेहैं ज्योतिष यंत्र मंत्र आदिदैकै तेऊ तात्पर्य वृत्तितें
जौने साहबको कहैहैं ताको वारपार तो तुमको न सूझिपर्यो वाच्यार्थ प्रतिपाद्य
जो धोखा ब्रह्म और और देवता ताही में लागत भये॥६॥सो यहिप्रकार नाना
मतन करिकै मानते भये कोई नाना देवतन के जपकिये कोई तीर्थ किये कोई
ब्रत किये कोई भूतनकी पूजाकिये कोई दानकिये कोई पुण्य जो यज्ञादिक कर्म
ते किये ॥ ७ ॥
साखी ॥ मंदिरतोहै नेहको, मतिकोइ पैठेधाई ॥
जोकोइपैठेधाइके, बिनुशिरसेंती जाई ॥ ८ ॥
सो यह सब मतमा एक नानोदेवता धोखा ब्रह्म इनमें जो प्रीति है सो
नेहको मंदिरहै तामें तू धायकै मतिपैठै जो इनमें धायकै पैठैगो तौ बिनु
शिरकहे सबकेशिरे जे साहब तिनके बिना सेंतिही जाईगो कछुहाथ न लगैगो
तेरेसाधन मुक्तिदेनवाले न होवेंगे संसारही देनवाले होइँगे अथवा तुम्हारोमाथा
काटो जायगो वृथा मारेजाउगे ॥ ८ ॥
इति बाईसवीं रमैनी समाप्त ।
अथ तेईसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
अल्पसौख्यदुखआदिहुअंता । मन भुलानमैगर मैमंता॥१॥
सुख विसराय मुक्तिकहँपावै। परिहरिसांचझूंठनिजधावै॥२॥
अनल ज्योति डाहै यकसंगा।नयन नेह जसजरै पतंगा॥३॥
करु बिचारज्यहिसबदुखजाई।परिहरिझूठा केरि सगाई॥४॥
लालच लागे जन्म सिराई।जरामरणनियरायलआई॥५॥
( ८६ ) बीजक कबीरदास ।
साखी ॥ भ्रमको बांधल ई जगत, यहिविधि आवैजाई ॥
मानुष जन्महि पाइनर, काहे को जहँडाइ ॥ ६ ॥
अल्पसौख्यदुखआदिहुअंता। मनभुलानमैगरमैमंता ॥ १ ॥
सुखबिसरायमुक्तिकहँपावै।परिहरिसांचझूठनिजधावै ॥ २॥
अनलज्योति दाहै यकसंगा।नयननेह जसजरैपतंगा॥३॥
जौने संसारमें अल्प तो सुखहै औ आदिहूमें अंतहूमें दुःखहै ऐसे संसारमें
मैगर मैमंताकहे मतवारो हाथी जो मन सोभुलाईकै मैमंताकहे मेंहीं ब्रह्महौं या
मानिलियो अथवा मैंहीं देहहौं या मानिलियो॥१॥सुखरूप जे साहब हैं तिनकों
बिसराइ कै कबीरजी कहैहैं कि मुक्ति कहां पावै सांचको छोड़िकै झूठ जो
धोखा ब्रह्महै तामें तो धावैहै यह जीव कैसे सुखपावै ॥ २ ॥ अनलज्योतिजो
ब्रह्महै सो एकसंग सब ज्ञानिनको दाहैहै अग्नि ब्रह्मको नाम है 'अज्ञातवह्निनामा
सौ' ॥ कैसेदाहैहै जैसे नयननेह कहे देखनके लालचलगे दीपककर्ज्योतिमें पतं-
गजरैहैं ॥ ३ ॥
करुविचारज्याहिसबदुखजाई।परिहरिझूठाकेरिसगाई॥ ४ ॥
लालचलागेजन्मसिराई।जरामरण नियरायलआई॥ ५ ॥
झूठ जो या धोखा ब्रह्महै औ अपनो कलेवर तौनें की सगाई त्यागिकै
परमपुरुष जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनको बिचारकरु जाते तेरे सब दुःख जाइँ ॥४॥
धोखा ब्रह्मके लालच में लगे कि, हमारी मुक्ति होयगी हमको विषयही तें
सुख होयगो याहीमें लगेलगे जन्मसिरायगयो जरा जो बुढ़ाई औ मरण सों
नियराय आयो ॥ ५ ॥
साखी ॥ भ्रमको बांधल ई जगत, यहि बिधिआवैजाय ॥
मानुषजन्महि पायनर, काहेकोजहँडाय ॥ ६ ॥
यही रीतिते भ्रमको बांधा या जगत है वही ब्रह्मते आवै है कहे उत्पन्न
होइहै औ जाइहै कहे लीन होइ है 'मानुष जन्महि पायनर काहेको जहँडाय'
रमैनी । (८७)
कहे काहे जड़वत् होयहै मनुष्य जन्म याते कह्यो अथवा जहँडाय कहे काहें
भूले जाते हैं कि, मनुष्य के मनुष्यै होय हैं हाथीके हाथी होय हैं कछू हाथी
के मनुष्य नहीं होयहैं ऐसे जो तैं निराकार ब्रह्मको हो तो तोहूं निराकार
होतो सो तैं मनुष्य है ताते मनुष्यरूपजे श्रीरामचन्द्रहैं तिनही को है ॥ ६ ॥
इति तेईसवीं रमैनी समाप्त ।
अथ चौबीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
चंद्रचकोर कसिवातजनाई । मानुषबुद्धिदीन पलटाई॥१॥
चारि अवस्था सपनो कहई । झूठे फुरे जानत रहई ॥२॥
मिथ्यावात न जानै कोई।यहिविधि सिगरे गये विगोई॥३॥
आगेदैदै सबन गँवावा । मानुष बुद्धि न सपनेहु पावा॥४॥
चौंतिस अक्षरसौं निकलै जोई।पापपुण्य जानैगा सोई॥५॥
साखी । सोइकहते सोइ होउगे,निकलि न बाहेरआउ ॥
होहुजूरठाढ़ो कहौं, धोखे न जन्म गँवाउ ॥ ६ ॥
चन्द्रचकोरकसिवातजनाई । मानुषबुद्धिदीनपलटाई॥१॥
साहब कहैहैं कि,हे जीवो ! तुमको गुरुवालोग चन्द्रचकोर कैसो दृष्टांत जना-
यकै नानाईश्वरमें लगायदियो कैसे जैसे चन्द्रमा को ताकत ताकत चकोर
चन्द्ररूपहै या बुद्धिमान्है तब चकोरको अग्निकी गरमी नहीं लगहै अग्नि खाय-
जायहै तैसेअपनोस्वरूप जो ब्रह्म ताको जबजानिलेहुगे तबतुमको दुःखसुख न
जानिपैरैगो कोई यह कहैहैं कि,जैसे चन्द्रमा चकोरमें नेहकरैहै ऐसे तुम ईश्वर-
नमें प्रीतिकरौगे तौ दुःखसुख न जानिपैरैगो यह जो तुम्हारी मनुष्यबुद्धि कि, मैं
हंसस्वरूपहौं द्विभुजहौं द्विभुजई को होऊँगो सो पलटायकै ब्रह्ममें लगायदियें
नानादेवतनमें लगायदिये ॥ १ ॥
(८८) बीजक कबीरदास ।
चारि अवस्था सपनो कहई । झूठैफूरे जानत रहई ॥ २ ॥
मिथ्यावातनजानैकोई । यहिविधिसिगरेगयेविगोई ॥ ३ ॥
चारिअवस्थाजेहैं जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तुरिया ते सपनकहाती हैं तो झूठी
फुरि जानत रहै हैं॥२॥वह कैवल्य जो है पाँचईं अवस्था तद्रूप है जाइबो कि,
मैंहीं ब्रह्महौं सोमिथ्याहै यहबात कोई नहीं जानै है यहीविधि सिगरे जीव
बिगरिगये कहे बिगोइगये ॥ ३ ॥
आगे दैदै सबन गँवावा । मानुषबुद्धि न सपनेहुपावा॥ ४ ॥
चौंतिसअक्षरसौंनिक लैजोई । पापपुण्य जानैगासोई॥५॥
वहीधोखा ब्रह्मके आगे और कुछ नहीं रह्यो आदिकी उत्पत्ति वहीतेहै यही
बात आगे दैदै कहे विचारि कै सिगरे जे ऋषिमुनि हैं ते आजअपने स्वस्वरू-
पको गँवावतभये मनुष्यरूपजो मैं तिन के जाननेवाली बुद्धि सपन्यो न पावत-
भये ॥ ४ ॥ चौंतिसअक्षरके जो निकरैगा सोई पापपुण्यजानैगा मैं साहबको हौं
और मैं लागौंहौं सो पापै करौंहौं या बातमेरो अनिर्वचनीय निर्वाण जो नाम
है ताको जपिकै जानैगो और अपने स्वस्वरूप जानैगो ॥ ५ ॥
साखी ॥ सोइकहते सोइ होउगे, निकलि न बाहेरआउ ॥
हो हुजूरठाढ़ो कहौं, धोखे न जन्म गँवाउ ॥ ६ ॥
जोपदार्थ देखोगे जो सुनौगे जो कहैगे जो स्मरण करौगे संसारमें सोई
होउगे वही धोखामें लागिकै पुनिसंसारी होउगे वा में ते निकरिकै बाहर न
होउगे काहेते कि, वहतो अकर्त्ताहै तुम्हारी रक्षाकौन करैगो सो साहब कहै हैं
कि, सर्वत्र पूर्णहौं तेरे हुजूर ठाढ़ कहतई हौं कि, तैं मेरो है तू काहे धोखा ब्रह्म
में ईश्वरनमें जगतके नाना पदार्थमें लागिकै जन्मगँवाये देतहै ॥ ६ ॥
इति चौबीसवीं रमैनी समाप्त ।
रमैनी । ( ८९ )
अथ पचीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
चौंतिस अक्षरकोयहैबिशेखा । सहसौ नामयहैमें देखा १
भूलिभटकि नर फिरिघरआवैं । होतज्ञान सोसवन गवाँवैं २
खोजहिंब्रह्माविष्णु शिवशक्ती । अनंतलोगखोजहिंबहुभक्ती ३
खोजहिंगणगँधर्वमुनिदेवा । अनंतलोकखोजहिंबहुसेवा ४
साखी ॥ यतीसती सबखोजहीं, मनै न मानै हारि ॥
बड़ेबड़े बीरवाचें नहीं, कहहिं कबीरपुकारि ॥ ५॥
चौंतिसअक्षरकोयहैबिशेखा । सहसौनामयहैमेंदेखा ॥ १॥
भूलिभटकिनरफिरिघरआवै । होतज्ञानसोसवनगवाँवै ॥ २॥
चौतिस अक्षर को विशेष धोखई है काहेते हजारनाम यही चौतिस अक्षरैमें
देखेहैं अर्थात जे भरि वचनमें आवै है ते माया ब्रह्मरूप धोखईहै मिथ्याही सो
चौतिसै अक्षरके भीतर सबहै अनिर्वचनीयपदार्थ तोको कैसे मिले ॥ १ ॥ चौतिस
अक्षरको बिस्तार जो निगम अगम तामें साहब को ज्ञानभूलि भटकिकै जब-
पार नहीं पावै है तब फिरि थकिकै आपने घटमें आय या कहै है कि एकये-
डूनहीं है वेदहू तौ नेतिनेतिकहैं तब अपनो स्वरूपमें आयो सो साहबके ज्ञान
होतही गुरुवा लोग भटकाइकै अज्ञानमें डारि दिये जौन यह बिचारकियो कि ये
सब अनिर्वचनीय नहीं हैं सो गँवायंदियो अनिर्वचनीय धोखाब्रह्महीको
मानतभये ॥ २ ॥
खोजहिंब्रह्माविष्णुशिवशक्ती । अनंतलोगखोजहिंबहुभक्ती ३
खोजहिंगणगँधर्वमुनिदेवा । अनंतलोकखोजहिंबहुसेवा ४
( ९० ) बीजक कबीरदास ।
अनंत जे लोकहैं तिनमें अनंत जे ब्रह्मा बिष्णु महेश शक्ति तिनकी भक्ति
करिकै वही ब्रह्माण्डमें अनिर्वचनीय को खोजन लगे अरु वही को अनंत
लोकमें बहुत सेवाकरि गंधर्ब मुनि देबता खोजनलगे ॥ ३ ॥ ४ ॥
साखी ॥ यती सती सबखोजहीं, मनै न मानैहारि ॥
बड़े बड़े वीरवाचैनहीं, कहाहिकवीरपुकारि ॥ ५॥
औ यती सती सब मनमें हारि ना मानिकै वही अनिर्वचनीय जो मायाब्रह्म
ताहीको खोजैहै सो कबीरजी कहै हैं कि, मैं पुकारिकै कहौंहीं या माया ब्रह्मके
धोखाते बड़े बड़े बीर नहीं बाचे है जे कोई बिरले संत साहबको जानै हैं तेई
बाचे हैं तामें प्रमाण कबीरजीको ॥ (रसना रामगुणर मिरमि पीजै । गुणातीत
निर्मूलक लीजै । निरगुण ब्रह्मजपौ रे भाई । जेहि सुमिरत सुधिबुधि सब पाई॥
विषतजिराम न जपसि अभागे । काबूडैलालचकेलागे ॥ ते सब तरे रामरस
स्वादी । कह कबीर बूड़े बकवादी ) ॥ ५ ॥
इति पचीसवीं रमैनी समाप्तम् ।
अथ छब्बीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
आपुहि करता भे करतारा । बहुविधि वासनगढ़ै कुम्हारा १
बिधनासबैकीनयक ठाऊं । अनेक यतनकै बनकवनाऊं२
जठरअग्निमहँदियरजाली । तामें आपुभये प्रतिपाली ३
बहुत यतनकै बाहर आया । तब शिवशक्ती नामधराया ४
घरको सुत जो होय अयाना । ताके संग न जायसयाना५
सांचीवात कहौं मैं अपनी । भया देवाना और कि सपनी६
गुप्त प्रगट है एकै मुद्रा । काको कहिये ब्राह्मण शुद्रा ॥ ७॥
झूठ गर्व भूलै मति कोई । हिन्दू तुरुक झूठ कुल दोई ॥८॥
रमैनी । ( ९१ )
साखी ॥ जिनयह चित्र बनाइया, सांचा सूत्रधारि ॥
कहही कबीरते जन भले, चित्रवंतहिंलेहिविचारि॥६॥
आपुहिकरताभेकरतारा । बहुविधिबासनगढ़ैकुम्हारा ॥१॥
विधनासवैकीनयकठाऊं । अनेकयतनकैकनकवनाऊं ॥२॥
बिधि जे ब्रह्मःहैं ते अपनेको कर्त्ता मानि सब साजुजोरि अनेक यतन
कै जगत् बनावतभये जैसे कुम्हार दण्ड चक्र सब साज जोरिकै बासन
गढ़ै है सो करतार जो अपनेको कर्त्ता मान्यो सो वाकी अज्ञानताहै
काहेते कबीरजी कहै हैं कि सबसाजु आगेही उत्पन्न हैरही है कौन
नईसाज बनाइ करतार अपनेको कर्त्तामानै साजुतो सब आगेकी उत्पन्न भई है
सो कहै हैं ॥ १ ॥ २ ॥
जठरअग्निमहँदियपरजाली । तामेंआपुभयेप्रतिपाली॥३॥
बहुतयतनकैवाहरआया । तबशिवशक्तीनामधराया ॥४॥
जब महाप्रलय होइ जाइहै तबजौनकालरहिजायहै सोकाल सदा शिवरूपहै
ताके जठरमें कहे पेटमें अग्नि जो लोकप्रकाश ब्रह्म तामें समष्टि जीवपर
जालिदिये पराशक्ति को जाल लगाइ दिये अर्थात् अग्नि जो लोकप्रकाश ब्रह्म
सो महीं हौ यह मानि माया सबलित होतभयो तामें तौने माया के प्रति-
पाली आप ही होतभये अर्थात् जीवनके मानेमात्र मायाहै ॥ ३ ॥ सो माया
सबलित जो ब्रह्म समष्टि जीवरूप सो अनेक यत्न कहे रामनामको संसारमुख अर्थ
करि पांचौ ब्रह्म आदि सब बस्तु उत्पन्नकै समष्टितै ब्यष्टिद्वैकै जगत् उत्पन्न
कियो ताको शिव शक्त्यात्मक नाम धरावतभये ॥ ४ ॥
घरकोसुतजोहोयअयाना । ताकेसंग न जाहिसयाना ॥५॥
सोकबीरजी कहैहैं कि, हे जीवो! येब्रह्मादिकतुम्हारही सुत हैं तुम्हीं समष्टि
तै ब्यष्टि भयेहौ कि, जो घरकोपूत अयान होइ है ताकेसंग सयान नहीं जायहै
( ९२ ) बीजक कबीरदास ।
ऐसेही ब्रह्मादिक जे अनेकमत करिकै आपनेको कर्त्तामानि लिये हैं तिनकें संग
तुम न लागौ अर्थात् अनेक मतनमें तुम न परौ तुम साहब को जानो ॥ ५ ॥
साँचीबातकहौंमैंअपनी । भयादेवानाऔरकिसपनी ॥ ६ ॥
सो कबीरजी कहै हैं कि, सांचीबात मैं अपनी कहौंहौं अपनी कौनकी मैं
नाना मतनको छांड़ि साहबको जान्यो है सोतुम नहीं बूझौहै। और की सपनी
कहे स्वप्नवत् झूठी नानामतनकी वाणीमें देवाना कहे बिकल ह्वै रहेहौ हैं
जीवो ! सो नातामत त्यागि साहबको जानो कहे और की पुनि जो या पाठहोय
ताको अर्थ या है साँचोबात अपनी मैं कहताहूं जोमेरे मतमें साहबको जानता
है सोई साँचहै यासुनि पुनि और का जा भया सोई दिवाना ॥ ६ ॥
गुप्त प्रगट है एकै मुद्रा । काकोकहिये ब्राह्मणशूद्रा ॥ ७ ॥
झूठगर्व भूलै मतिकोई । हिंदू तुरुक झूठ कुल दोई ॥ ८ ॥
सो हेजीवौ! गुप्तकहे जब समष्टिमें रहे हौ तबहूं औ जबप्रगट कहे व्यष्टिमें रहेहौ
तबहूं एकही मुद्रारहेहौ अर्थात् साहिबै के रहे हौ तुम ने नाना मतनमें परि
नाना साहब मानि ब्राह्मण शूद्रकहतेहौ सो झूठेहौ जीवत्व तो एकही है ॥ ७॥
मैं हिंदूहौं मैं तुरुकहौं यह झूठो गर्वकरिकै मति कोई भूलौ विचारिकै देखौ
तौ हिंदू तुरुक कुल ये दोऊ झूठे हैं तुमतौ साहबके हौ ॥ ८ ॥
साखी ॥ जिन यह चित्र बनाइया, साचा सो सूत्रधार ॥
कहहिकविरतेइजनभले,चित्रवंतहिलेहिविचार ॥६॥
जिन यह नाना चित्र बनाइया कहे जिन यह जीवको मन नाना शरीर जगत्में
बनायो है तौनै को सूत्रधारी साहब साँचो है जोन सबको सुरतिदियो है सो
कबीरजी कहहै चित्रवंत जो या मन नानादेह देनेवालो याको जो कोई बिचा-
रिलियो कि या मिथ्याहै औ साँच साहब को जानिलियो ते जन भले हैं ॥६॥
इति छब्बीसवीं रमैनी समाप्ता ।
रमैनी । ( ९३ )
अथ सत्ताईसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
ब्रह्मा को दीन्हो ब्रह्मण्डा । सात द्वीप पुहुमी नौखण्डा ॥१॥
सत्य सत्यकै विष्णुदृढाई । तीनि लोकमहँ राखिनिजाई॥२॥
लिंग रूप तब शंकरकीन्हा। धरतीकीलि रसातलदीन्हा॥३॥
तब अष्टंगीरची कुमारी । तीनि लोक मोहनिसवझारी ॥४॥
द्वितीयानामपार्वतीभयऊ।तपकरता शंकर को दयऊ ॥५॥
एकै पुरुष एक है नारी । ताते रचिनि खानि भौ चारी॥६॥
शर्मन वर्मन देवो दासा। रजगुण तमगुण धरनिअकासा॥७॥
साखी ॥ एक अंडॐकारते, सब जग भयो पसार ॥
कहकबीरसबनारिरामकी, अविचलपुरुषभतार ८
ब्रह्माकोदीन्होंब्रह्मण्डा । सातद्वीपपुहुमीनौखण्डा ॥ १ ॥
सत्यसत्यकैविष्णुदृढाई । तीनि लोकमहँराखिनिजाई॥ २ ॥
अष्टांगकौन हैं ॥ ( भूमिरापोऽनलोवायुःखंमनोबुद्धिरेवच ॥ अहंकारइतीयंमेभि-
न्नाप्रकृतिरष्टधा) ॥ ऐसी जो इच्छारूपी नारिअष्टांगीसो ब्रह्माको ब्रह्मांड देत-
भई औ सात दीप नवखण्ड पृथ्बी बिष्णुको दैके तीनि लोकमें राखिनि कहे
व्यापक करिदेतभई औ बिष्णुको नाम सत्य धरावतभई सो आठ नाममें प्रसिद्धहै॥
“हरिः सत्योजनार्दनः” ॥ सो जब ब्रह्मा बिष्णु दोऊ अपने अपनेको मालिक
मानि लरे तब महादेवजी कह्यो कि, हम लिंग बढ़ावै हैं जोई अंत लै आवै
सोई बड़ो ॥ १ ॥ २ ॥
लिंगरूपतबशंकरकीन्हा। धरतीकीलरसातलदीन्हा ॥३॥
तब महादेवजी सातलोक नीचे के सात ऊंचेके तामें कीलवत् लिंग बढ़ावत
भये ब्रह्मा विष्णु दोऊकोपठयो कि, जाय अंतलै आवो सो विष्णु जायकै या कह्यो
( ९४ ) बीजक कबीरदास ।
कि, हम अंत नहीं पाये ब्रह्माकह्यो हम अंत लै आये सुरभीके दूधते नहवाय
केतकीके फूलतेपूज्यो है सोसुरभी औ केतकी साखीहैं तब महादेवतीनोंको झूठा-
जानि तीनोंको शापदियो ब्रह्माको कह्यो लोकमें अपूज्यहोउ सुरभीको कह्यो
तुम्हारोमुख अशुद्धहोइ केतकीको कह्यो हमपर न चढ़ो औ विष्णुको प्रसन्न
ह्वैकै या कह्यो कि, तीन लोकमें पूज्य होउ तुम सत्य कह्योहै यह पुराणमें कथा
प्रसिद्धहै ॥ ३ ॥
तबअष्टंगीरचोकुमारी । तीनिलोकमोहनिसवझारी ॥ ४ ॥
द्वितीयानामपार्वतिभयऊ । तपकरताशंकरकोदयऊ ॥ ५ ॥
तबअष्टंगी जो कारणरूपाशक्ति सोप्रसन्न ह्वैकै तीनि लोककी मोहनहारी कुमारी
सती रचिकै तपकरता जेदक्षहैं तिनकेद्वारामहादेवजीको देतभई तौनेही को दूसरो
पार्वती नाम भयो ॥ ४ ॥ ५ ॥
एकैपुरुषएकहै नारी । ताते रचिनि खानि भै चारी ॥ ६ ॥
शर्मनबर्मनदेवोदासा । रजगुणतमगुणधरणिअकासा ॥ ७ ॥
एकै पुरुष जोहै ब्रह्म अरु एकै नारी जोहै माया ताते चारिखानिके जीव
उत्पत्ति होतभये अंडज पिंडज स्वेदज उद्भिज॥६॥औ शर्मन बर्मन देवो दासा
कहे शर्मन ब्राह्मण बर्मन क्षत्री देवो वैश्य दासा शूद्र अथवा शर्मन कहे श्रोता
बर्मन कहेवक्ता अरुदेवता औ उनकेदास रजोगुणी तमोगुणी औधरती औआ-
काश होतभये ॥ ६ ॥ ७ ॥
साखी ॥ यकअंड ॐकारते, सब जग भयो पसार ॥
कह कबीर सबनारिरामकी,अविचलपुरुषभतार८
मंगलमें पांच ब्रह्म पांच अंडमें राख्यो है या कहि आये हैं सो तामें
शब्द ब्रह्मरूप जोहै अंडप्रणव ता प्रतिपाद्य जो ब्रह्म सोमायासबलितहै इच्छा
आदि अष्टांगी उत्पन्नकै जगत् पैदाकियो है सो कबीरजी कहै हैं कि, धोखा
वही है प्रणवप्रतिपाद्य श्रीरामचन्द्रही हैं काहेते रामनामहीके जगतमुख अर्थते
रमैनी । ( ९५ )
प्रणव प्रगटभयो है ताते प्रणवप्रतिपाद्य श्रीरामचन्द्रही हैं यह रामनामको साह
बेदमुख अर्थ रामतापनीमें प्रसिद्धहै ताते हेजीवो! तुमसब रामचन्द्रहीकी नारीहौ
अविचल कहे न चलायमान निर्विकार सदा एकरस ऐसे भतार कहे स्वामी
तुम्हारे श्रीरामचन्द्रही हैं जीव चित्शक्ति माया अष्टांगीआदि अचित् शक्ति
ई दूनों शक्ति उनहींकी हैं याते पति श्रीरामचन्द्रही हैं इहां कबीरजी मायामें
सब परे हैं या देखाय साहबको लखायो इहां सब जीवनको या देखायो कबी-
रजी कि, तुम रामकी नारीहौ और पुरुषकरौगी तौ मारी जाउगी ॥ ८ ॥
इति सत्ताईसवीं रमैनी समाप्तम् ।
अथ अट्ठाईसवींरमैनी ।
चौपाई ।
अस जोलहाकामर्म न जाना।जिनजगाइपसारलताना १
महि अकास दुइ गाड़वनाई।चन्द्र सूर्य दुइ नरा भराई॥२॥
सहस तार लै पूरिन पूरी । अजहूं विनै कठिनहैदूरी ॥ ३ ॥
कहहिं कबीर कर्म सों जोरी।सूतकुसूत बिनै भलकोरी ॥ ४ ॥
अस जोलहाकामर्मनजाना । जिनजगआयपसारलताना १
महिअकाशदुइगाड़वनाई । चंद्र सूर्य दुइनरा भराई २
यहि भांतिको जोल्हा जो मनहै जौन जगतमें तानपसारचो है कहे बाणी
पसारचोहै ताकोमर्म कोई न जानतभयो भतारश्री रामचन्द्रको भूलिगये धोखा-
ब्रह्म नानापति खोजनलग्यो १ महि औ आकाशकहे अधः ऊर्ध्व दुइगड़वा
बनावतभये तामें चन्द्र सूर्य इडा पिंगलाहै तिनकर नराभरावत भये ॥ २ ॥
सहसतारलै पूरिनपूरी । अजहूं विनैकठिनहै दूरी ॥ ३ ॥
कहहिंकबीरकर्मसोंजोरी । सूतकुसूत बिनैभलकोरी ॥ ४ ॥
( ९६ ) बीजक कबीरदास ।
अरु तार जोहै प्रणव ताको हजारन दोनों कुम्भकमें जपत भये अजहूंलौं ,
बाहींमें लगेहैं औ यहकहेंहैं कि, कठिन दूरिहै ॥ ३ ॥ कबीरजी कहैहैं जब तानाको-
ताग टूटिजाइहै तब कोरी भिजै कै जोरिदेइहै ऐसे वह साधक अभ्यासरूप
कर्मते जोरिदेइहै सोकर्म को लाठिनमें बांधिकै सूतजो हे जीव कुसूत जोहै वाणी
ताको जोलहा जो मनहै सो विनयहै अथवा विद्या अविद्या सूतकुसूत विनय है
जब बस्तु तय्यार होइजायहै तब जोलहाको बिनिबो छूटै है सो धोखा ब्रह्ममें
लागि अनादिकालते बिनतई है जब साहबको जानै तब साधनरूप कर्मकरिवो
छूटिजाइ हंसरूप साहबदइ जरामरणमिटिजाइ ॥ ४ ॥
इति अट्ठाईसवीं रमैनी समाप्तम् ।
अथ उनतीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
बज्रहु ते तृण क्षणमें होई । तृणते बज्रकरै पुनि सोई ॥ १ ॥
निझरूनरू जानि परिहरई।कर्मकबांधल लालच करई॥२॥
कर्मधर्मबुधिमतिपरिहरिया । झूठनाम सांचलै धरिया॥३॥
रजगति त्रिविधकीनपरकाशा।कर्म धर्म बुधिकेर विनाशा ४
रविकेउदय ताराभो छीना । चरवेहर दोनों में लीना ॥५॥
विषकेखाये बिष नहिं जावै।गारुड़सो जो मरतजिआवै॥६॥
साखी ॥ अलखजोलागी पलकमों, पलकाहिमोँडसिजाय ॥
विषहर मन्त्र न मानही, गारुड़ काह कराय ॥७॥
बज्रहुते तृण क्षणमें होई । तृणते बज्रकरै पुनि सोई ॥ १ ॥
निझरूनरूजानिपरिहरई । कर्मकबांधललालचकरई ॥२॥
रमैनी । ( ९७ )
बज्रहुते तृण क्षणमें करिदेइहै अरु तृणते बज्रकरिदेइहै ऐसेपरमपुरुष श्रीरामच-
न्द्रको जानो ॥१॥ निझरूनरूकहे जिनको मायाब्रह्मको धोखा निझरि गयो कहें
मिटिगयो ऐसे जे नर हैं ते पूरा गुरुपाइकै परमपुरुष जे श्रीरामचन्द्र तिनको
जानिकै संपूर्ण जगत्के कर्म त्यागिदेइँ हैं औ जे कर्ममें बँधे हैं ते अनेक लालचकरै
हैं कोई द्रव्यादिक की कोई ब्रह्ममिलन की कोईईश्वरनकी ॥ २ ॥
कर्मधर्मबुधिमतिपरिहरिया। झूठानामसांचलैधरिया ॥३॥
रजुगतित्रिविधिकीनपरकाशा। कर्मधर्मबुधिकेरविनाशा ४॥
साहबके मिलनवारो जो कर्मधर्म बुधिहै ताको त्यागिदेतेभये झूठेझूठे जे
देवताहैं तिनको नाम सांचमानिकैजपतभये ॥३॥ गुरुवालोग रजोगुणी तमोगुणी
सतोगुणी तीनप्रकारके मत प्रकाशकैकै साहबके मिलनवारो जो कर्म धर्म बुधि
है ताको नाशकरि देत भये ॥ ४ ॥
रविकेउदयतारा भोछीना । चरवेहरदोनों में लीना ॥ ५ ॥
विषकेखायेविषनहिंजावै । गारुड़सोजोमरतजिआवै ॥६॥
हे जीवो ! गुरुवालोग तुमको उपदेश देयँ हैं जैसे सूर्यके उदय मो ताराकों
तेजक्षीण ह्रैजायहै ऐसे जबज्ञानभयो जीवत्वमिट्यो तब चर औ वेहर जो अचर ये
दोनोंमें लीन ह्रै जाय है चरअचर ब्रह्मरूपते आपनेनको मानैहै॥५॥सो साहब कहैं हैं
कि हेजीवो! ऐसो उपदेश जो गुरुवालोग तुम्हें दियो सो ठीकनहीं है काहेतें
कि संसार बिष उतारिबेको तुम धोखा ब्रह्ममें लगैहै। सो बिषके खाये बिष
नहीं जाइहै यह धोखाब्रह्म बिषरूपैहै संसार देनवारोहै गारुड़ सो कहावैहै जो
मरतमें जिआइलेइ सोमेरोज्ञान धोखा ब्रह्मबिषते बचाई कालते बचाइलेइ ताकों
जानो ॥ ६ ॥
साखी ॥ अलखजोलागीपलकमों, पलकहि मोंडसिजाय ॥
विषहरमंत्र न मानही, गारुड़ काह कराय ॥ ७ ॥
७
( ९८ ) बीजक कबीरदास ।
अलख जो वह ब्रह्महै सो सबके पलकमें लाग्योहै अर्थातपलपलमें ध्यानकरैहै
औ एक पलही में डसिजायहै अर्थात् जो गुरुवनके मुंहतै कढ़्यो सो पलै में वा-
ज्ञान लगिजायहै सो साहब कहैं हैं कि तैं मेरोहै मेरी तरफ आउ यहि विषको
हरनवारो जो ज्ञान ताको तो मानतही नहीं है मैं जो गरुड़ सो काहकरौ ॥७॥
इति उनतीसवीं रमैनी समाप्त ।
अथ तीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
औ भूले षटदरशन भाई । पाखँडवेष रहा लपटाई ॥ १ ॥
जीवसीवका आयन सौना।चारो वद्ध चतुरगण मौना ॥२॥
जैनी धर्मकमर्म न जाना । पातीतोरी देव घर आना ॥३॥
द्वना मरुवा चंपा फूला । मानोंजीव कोटि समतूला ॥४॥
औ पृथिवी को रोम उचारै । देखत जन्म आपनो हारै५॥
मन्मथ बिन्दुकहै असरारा।कलपैबिन्दुखसै नहिंद्वारा॥६॥
ताकर हाल होय अघकूचा।छादरशनमें जैन विगूचा ॥७॥
साखी ॥ ज्ञान अमर पद बाहिरे, नियरे ते है दूरि ॥
जो जानै तेहि निकटहै, रह्यो सकल घटपूरि ॥ ८ ॥
औभूले षट दरशन भाई । पाखँडवेषरहा लपटाई ॥ १ ॥
जीवसीवकाआयनसौना । चारोवद्धचतुरगुण मौना ॥ २ ॥
पाखण्ड वेष जो धोखा ब्रह्म सो सर्वत्र लपटाइ रह्योहै ताहीमें षट्दर्शन
जेहैं तेऊ भूलिमये ॥१॥यह जो धोखा ब्रह्मको ज्ञानहै सो जीव जोहै ताको
सीव जो कल्याणहै सो नशावनवारोहै औचारों प्रकारके जीव जे हैं तेऊ बद्धहैं
जे चतुर हैं तेगुणमौनाकहे गुणातीत हैं परंतु वोउ धोखा ब्रह्मही में हैं ॥ २ ॥
रमैनी । ( ९९ )
जैनी धर्मक मर्म न जाना । पाती तोरि देवघर आना ॥३॥
दवना मरुवा चंपा फूला । मानों जीव कोटि समतूला ॥४॥
अरुजैनी जे नास्तिकहैं ते धर्मको मर्म नहीं जान्यो कांहते कि बांधे तो मुंहै
पट्टीरहैंहैं कि कहूं किरवा न घुसिजाय जीवको बचावैहैं कि हिंसा हम न करेंगे
सो जिन वृक्षनमें जीव हैं तिनकी पातीको तोरिकै पाषाण जे पारसनाथ देवहैं
तिनमें चढ़ावै हैं ॥ ३ ॥ दवना औ मरुवा औचंपाके फूलको तोरिकै कोटिन
जे जीवहैं तेसूंघिकै अघायहैं तिनको तोरि तोरिकै पारसनाथकी मूर्तिमें चढ़ावै हैं
सो अरे मूढ़ा! प्रतक्ष जे जीव वृक्षहैं तिनका पत्रको तोरिकै जड़ जो पाषाणहै तामें
काहेको चढ़ावो हौ तुम तो प्रत्यक्ष प्रमाण मानौहौ कर्म किये फल होय है यह
मानतही नहीं हौ पाषाणपूजे कहा फल होइगो ॥ ४ ॥
औ पृथिवीको रोमउचारै । देखत जन्म आपनो हारै ॥ ५ ॥
मन्मथ बिंदु करै असरारा । कलपैविन्दुखसैनाहिंद्वारा॥६॥
ताकरहालहोयअघकूचा । छादर्शनमेंजैनबिगूचा ॥ ७ ॥
औ पृथ्वी के रोमाजेहैं वृक्ष तिनको चेलनते उखरावै हैं औ शिष्यनकी स्त्रिन-
को देखिकै भोगकारिकै अपनो जन्म हारिदेइहैं कहे नरकको जायैं ॥ ५ ॥
साधन करिकै मन्मथ के बिन्दुको असरारा कहे सरलकरै हैं औ कन्यनते भगि-
नी नाते औ उनकी स्त्रिनते भोग करै हैं तब वह बिन्दु ऊपरते नीचेको कल्प-
तैहै कहे बढ़तहै औ पुनि नीचेते मेरु दंडद्वैकै ऊपरको चढ़ाइ लैजाइहै ॥ ६ ॥
सो जे जैनधर्मी हैं छः दर्शन में बिगूचा कहे भूलि गये हैं तिनकी औ जिनको
कहिआये हैं बीर्य बढ़ावन वारे तिनको हाल अघ कूचा कहे नरकनमें कूचे
जाहि हैं ॥ ७ ॥
साखी ॥ ज्ञान अमरपद बाहिरे, नियरेतेहै दूरि ॥
जो जानै तेहि निकटहै, रह्योसकलघटपूरि ॥ ८ ॥
( १०० ) बीजक कबीरदास ।
अमरपद कहे आत्माको जो स्वस्वरूपहै सो साहबकोअंशहै दासहै सोई
अमरहै ताको ज्ञान नियरेते दूरिहै औबाहिरैहै इहा नियरेते दूरि कह्यो तातें
अपनेको ज्ञाननहीं है औ बाहिरै है कहे बहुत दूरि देखि परैहै परन्तु जो सतगुरु
भेद बतावै है तौ ज्ञान होइहै आत्माके स्वरूपको जानैहै ताको साहब निकटही है
काहे घटघटमें तौ पूर्ण है तौ आत्माके निकटहै ॥ ८ ॥
इति तीसवीं रमैनी समाप्त ।
अथ इकतीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
स्मृतिआहि गुणनकोचीन्हा।पापपुण्यको मारगलीन्हा १॥
स्मृति वेद पढ़ेअसरारा । पाखंड रूप करै अहँकारा॥ २ ॥
पढ़ै वेद औ करै बड़ाई । संशय गाँठिअजहुंनहिंजाई ॥ ३ ॥
पढ़िकैशास्त्रजीवबधकरई । मूड़ काटि अगमनकै धरई॥४॥
साखी ॥ कह कबीर पाखण्डते, बहुतक जीव सताय ॥
अनुभवभाव न दर्शई, जियत न आपुलखाय॥५॥
स्मृति आहिगुणनकोचीन्हा । पापपुण्यकोमारगलीन्हा १॥
स्मृतिवेदपढ़े असरारा । पाखँडरूप करै अहंकारा ॥ २ ॥
स्मृति गुणनको चीन्हा आहि कहे तीनोंगुण स्मृति में देखिपरै है काहेतें
कि पाप पुण्यको मार्ग चीन्हे हैं अर्थात् पापपुण्यके मार्ग वाहीते जानिपरैहैं ॥ १॥
रारा जो जीव स्मृति वेदका असपढ़ताहै पाखण्डरूप ह्वैकै या अहंकार करैहै
जानिबेकेलिये नहीं पढ़ैहै अर्थात् हमविद्यामें जीतै कोई विद्यामानजानि हमें
मानै चेलाहोइ इत्यादिकछू आपने न पढ़े है ॥ २ ॥
पढ़ै वेद औ करै बड़ाई । संशय गाँठि अजहुंनहिंजाई ॥३॥
पढ़िकैवेदजीववध करई । मूड़काटिअगमनकै धरई॥ ४॥