कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । ( ९५ )
प्रणव प्रगटभयो है ताते प्रणवप्रतिपाद्य श्रीरामचन्द्रही हैं यह रामनामको साह
बेदमुख अर्थ रामतापनीमें प्रसिद्धहै ताते हेजीवो! तुमसब रामचन्द्रहीकी नारीहौ
अविचल कहे न चलायमान निर्विकार सदा एकरस ऐसे भतार कहे स्वामी
तुम्हारे श्रीरामचन्द्रही हैं जीव चित्शक्ति माया अष्टांगीआदि अचित् शक्ति
ई दूनों शक्ति उनहींकी हैं याते पति श्रीरामचन्द्रही हैं इहां कबीरजी मायामें
सब परे हैं या देखाय साहबको लखायो इहां सब जीवनको या देखायो कबी-
रजी कि, तुम रामकी नारीहौ और पुरुषकरौगी तौ मारी जाउगी ॥ ८ ॥
इति सत्ताईसवीं रमैनी समाप्तम् ।
अथ अट्ठाईसवींरमैनी ।
चौपाई ।
अस जोलहाकामर्म न जाना।जिनजगाइपसारलताना १
महि अकास दुइ गाड़वनाई।चन्द्र सूर्य दुइ नरा भराई॥२॥
सहस तार लै पूरिन पूरी । अजहूं विनै कठिनहैदूरी ॥ ३ ॥
कहहिं कबीर कर्म सों जोरी।सूतकुसूत बिनै भलकोरी ॥ ४ ॥
अस जोलहाकामर्मनजाना । जिनजगआयपसारलताना १
महिअकाशदुइगाड़वनाई । चंद्र सूर्य दुइनरा भराई २
यहि भांतिको जोल्हा जो मनहै जौन जगतमें तानपसारचो है कहे बाणी
पसारचोहै ताकोमर्म कोई न जानतभयो भतारश्री रामचन्द्रको भूलिगये धोखा-
ब्रह्म नानापति खोजनलग्यो १ महि औ आकाशकहे अधः ऊर्ध्व दुइगड़वा
बनावतभये तामें चन्द्र सूर्य इडा पिंगलाहै तिनकर नराभरावत भये ॥ २ ॥
सहसतारलै पूरिनपूरी । अजहूं विनैकठिनहै दूरी ॥ ३ ॥
कहहिंकबीरकर्मसोंजोरी । सूतकुसूत बिनैभलकोरी ॥ ४ ॥