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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 144

रमैनी । ( ९३ )
अथ सत्ताईसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
ब्रह्मा को दीन्हो ब्रह्मण्डा । सात द्वीप पुहुमी नौखण्डा ॥१॥
सत्य सत्यकै विष्णुदृढाई । तीनि लोकमहँ राखिनिजाई॥२॥
लिंग रूप तब शंकरकीन्हा। धरतीकीलि रसातलदीन्हा॥३॥
तब अष्टंगीरची कुमारी । तीनि लोक मोहनिसवझारी ॥४॥
द्वितीयानामपार्वतीभयऊ।तपकरता शंकर को दयऊ ॥५॥
एकै पुरुष एक है नारी । ताते रचिनि खानि भौ चारी॥६॥
शर्मन वर्मन देवो दासा। रजगुण तमगुण धरनिअकासा॥७॥
साखी ॥ एक अंडॐकारते, सब जग भयो पसार ॥
कहकबीरसबनारिरामकी, अविचलपुरुषभतार ८
ब्रह्माकोदीन्होंब्रह्मण्डा । सातद्वीपपुहुमीनौखण्डा ॥ १ ॥
सत्यसत्यकैविष्णुदृढाई । तीनि लोकमहँराखिनिजाई॥ २ ॥
अष्टांगकौन हैं ॥ ( भूमिरापोऽनलोवायुःखंमनोबुद्धिरेवच ॥ अहंकारइतीयंमेभि-
न्नाप्रकृतिरष्टधा) ॥ ऐसी जो इच्छारूपी नारिअष्टांगीसो ब्रह्माको ब्रह्मांड देत-
भई औ सात दीप नवखण्ड पृथ्बी बिष्णुको दैके तीनि लोकमें राखिनि कहे
व्यापक करिदेतभई औ बिष्णुको नाम सत्य धरावतभई सो आठ नाममें प्रसिद्धहै॥
“हरिः सत्योजनार्दनः” ॥ सो जब ब्रह्मा बिष्णु दोऊ अपने अपनेको मालिक
मानि लरे तब महादेवजी कह्यो कि, हम लिंग बढ़ावै हैं जोई अंत लै आवै
सोई बड़ो ॥ १ ॥ २ ॥
लिंगरूपतबशंकरकीन्हा। धरतीकीलरसातलदीन्हा ॥३॥
तब महादेवजी सातलोक नीचे के सात ऊंचेके तामें कीलवत् लिंग बढ़ावत
भये ब्रह्मा विष्णु दोऊकोपठयो कि, जाय अंतलै आवो सो विष्णु जायकै या कह्यो