कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
बसंत । ( ४८५ ) .
यह कह कबीर ये हरिके दास । फगुवा मागै वैकुण्ठ वास॥७॥
सो या हठयोग करिकै जानै कि मैं मुक्त होउँगो, तौ या समाधिमें मायाहीतें
नहीं छूट्यो मुक्त कहां होइगो । ताते श्रीकबीरजी कहै हैं कि, हे जीवात्मा !
हरिके दास तैं बैकुंठबासको फगुवामागै अर्थात् फगुहार फगुवा खेलाइकै
फगुवामागैं हैं सोतैंहठयोगकियो ताको फल फगुवा राजयोग मांगु जाते बैकुंठ
बासहोई ॥ ७ ॥
इति दूसरा बसंत समाप्त ।
अथ तीसरा बसंत ॥ ३ ॥
मैं आयउँमेहतरमिलनतोहिं।अबऋतुवसन्तपहिराउ मोहिं १
है लंबी पुरिया पाइ झीन । तेहि सूत पुरा ना खुंटा तीन ॥२॥
शर लागे सै तीनि साठि । तहँ कस न वहत्तरि लागगांठि॥३
खुर खुर खुर खुर चलै नारि।वहबैठिजोलाहिनिपलाथिमारि४
सो करिगहमें दुइ चलाहिं गोड़ा।ऊपर नचनी नचि करै कोड़५
हैं पांच पचीसौ दशहु द्वार । सखी पांच तहँ रचीधमार ॥६॥
वें रंग विरंगी पहिरैं चीर । धरि हरिके चरण गावै कबीर ॥७॥
मैं आयउं मेहतर मिलन तोहिं।अबऋतुवसंतपहिराउमोहिं १
हैं लंबी पुरिया पाइ झीन । तेहि सूत पुराना खुंटा तीन ॥२॥
जीव कहैहैं मेह कही बड़ेको औ जो बड़ाते बड़ा होइ ताको मेहतर कहै हैं
फ़ारसीमें । सो ईश्वरनते ब्रह्मते जो बड़े श्रीरामचंद्रहैं तिनसों जीव कहै है कि,
मैं तुमको मिलन आयो हौं । सो जौने लोकमें सदा बसंत रहै है सो मोको
पहिराओ अर्थात् मेरो प्रवेश कराइ दीजे । ताना रूप जो मेरे शरीरकों बसंत
तातें छुड़ाइये ॥ १ ॥ सो लम्बी पुरिया कौन कहावै जो ताना तनै है पूरै है
( ४८६ ) बीजक कबीरदास ।
सों मैं बासननि कारिकै बहुत लम्बा ह्वै रह्यौंहौं । कहैं बासननि
कारिकै मैं संसारमें फैलिरह्योहौं । औ पाई वा कहावैहै जो ताना
साफ करैहै सो या आत्माको साफ करिबो बहुत झीनहै कहै जब कोई बिरलै
संत मिलैं तब आत्मा शुद्ध होइ काहेते कि, यह सूतजीव पुरान कहै अनादि
कालते तीन खूंटा जो हैं सत १ रज २ तम ३ तामें बँधो है ॥ २ ॥
शर लागै सै तीनि साठि। तहँ कसनि बहत्तरि लाग गाँठि३
खुर खुर खुर खुरचलै नारि।वह बैठि जोलाहिनि पलथि मारि४
पाई में शर लागैहै सो शरीरमें तीनि सै साठि हाड़हैं तेई शरहैं बहत्तरि जे
कोठाहैं तिनमें बहत्तरि हजार नसनकी गांठि एक एककोठनमें लागहैं तेई कसनी
हैं ॥ ३ ॥ औ बिनतमें जौन बीच ह्वै चलावै है सो नारि कहावै है सो या
शरीरमें नाड़ी जो है सो खुर खुर खुर खुर चलैहै । औ जोलाहिनि जो है
बुद्धि सो पलथी मारिकै बैठी है अर्थात् देहही में निश्चय करिकै बैठी है ॥ ४ ॥
सो करिगहमें दुइ चलहि गोड़। ऊपर नचनीनाच करै कोड़५
सो यह तरहको जो शरीर है सो कारिगह है जहां जोलाहिनि बैठै है धमारि
महलमें होयहै सो शरीरै महलहै सो कारिगहमें जोलाहिनि दोऊ अंगूठा चलावै
है ऊपर तानामें नचनी कोड़ करै है कहै नाचै है । इहां शरीररूपी करिगहमें
बुद्धिरूपी जोलाहिनि बैठिकै कहूं शुभकर्म में निश्चय करै है कहूं अशुभ कर्ममें
निश्चय करै है यही दोऊ अंगूठाको लचाइबोहै । औ वृत्तिबुद्धिकी कहूंशुभमें
कहूं अशुभमें जायहै यही नचनी है सो नाचै है औ धमारि पक्षमें नाचत में
नचनी को गोड़ चलैहै ऊपर कोड़ करै है कहै भावबतावै है ॥ ५ ॥
हैं पांच पचीसौ दशहु द्वार। सखी पांच तहँ रची धमार ॥६॥
औ कषाय पांच जे हैं १ अविद्या २ अस्मिता ३ राग ४ द्वेष ५ अभि-
निवेश । औ पचीसौ जे तत्त्व हैं १ जीव २ माया ३ महत्तत्त्व ४ अहंकार ५
शब्द ६ रूप ७ रस ८ गन्ध ९ स्पर्श दशौँइंद्रिय एकमन २० पंच भूत
ई २५ औ ताहीमें दशौ द्वार ऐसे शरीर में पांच सखी जे हैं पंचप्राण ते धमारि
रचतभई । औ ताना पक्षमें पांच पचीस तत्त्वकेकेहे सबकोरीकै साजु आइगै
औ धरिकेहे सबअपने अपने धमारमें लगिगे कैड़ावारे माड़ीवारे पुरियावारें
करिगहवारें तानासाफकरैवारे औ धमारिपक्षमें पांच सखी धमारि रचैहैं दुइ
एकबार कियो एकदेखैया भो ॥ ६ ॥
वे रंग विरंगी पहिरैं चीर । धरि हरिके चरण गावै कबीर॥७॥
पांचो जे सखीहैं पांच तत्त्वनका रंग विरंग चीर पहिरैं । स्वगोदय में लिखे
हैं श्वास तत्त्वनके रंग जुदेजुदे देखे परै हैं औ कोरीके घरके अनेक रंगकेंचीर
पहिरैं हैं । औ धमारि पक्षमें केशरि कस्तूरी करिकै गुलाल झोड़र करिकै चीर
रंग बेरंग होयहैं ते पहिरैं हैं । सो यहि तरहकी धमारि या संसारमें है ताते
हरिको चरण धरिकै कबीर गावै है कहै है । या धमारिको प्रथम या कहि
आये हैं जौने लोकमें सदा बसंत है तहांप्रवेश करावो । औ इहां धमारि कहैं
हैं तात्पर्य यह कि, या शरीरको ताना बाना जनन मरण में परिरह्यो है या
धमारि तुमको देखायो जो रीझे होहु तो मैं फगुवा यही मांगौं हौं कि जहां
सदा बसंत है वा लोक में प्रवेश करावो औ न रीझ्यो होहु तौ तुम हरिहौ
या ताना बाना धमारि हरिलेउ । या कहो कि, “ऐसी धमारि तैं न रचु”
कबीर कहै हैं कि हे जीव हरिके चरणधारि ऐसी बिनयकरु ॥ ७ ॥
इति तीसराबसंत समाप्त ।
अथ चौथा बसन्त ॥ ४ ॥
बुढ़ियाहँसिकहमौँनितहिवारि।मोहिंऐसितरुणिकहुकौननारि १
ये दांत गये मोर पान खात।औ केश गयल मोर गँगनहात २
औ नयनगयल मोरकजल देत।अरुवैस गयलपरपुरुषलेत ३
औ जान पुरुष वा मोर अहार।मैं अन जानेको कर श्रृंगार४
कह कबीर बुढ़ि या आनँद गाय । पूत भतारहि बैठी खाय५॥
( ४८८ ) बीजक कबीरदास ।
बुढ़ियाहँसिकहमैनितहिवारि।मोहिंऐसितरुणिकहुकौनिनारि १
बुड़िया जो मायाहै सो हँसिकै कहैहै कि मैं नित्यही बारीहौं माया अनादि
है यातै बुढ़िहाकह्यो है तामें प्रमाण ॥ “अजामेकांलोहित” इत्यादि । औ
हँसिकै कह्यो यातै या आयो कि साधनकरिकै छोटे छोटे या कहै हैं कि, हमको
माया जीर्ण ह्वैगई है अर्थात् अब छूटि जाइहै मैं नित्यही बारीहौं सबके
कार्य रूपते उत्पन्न होत रहौं हौं । औ मोहिं अस तरुणि कौनि नारि है जो
सब जीवनको संग करौं हौं और बुढ़ाउँ कबौं नहीं ॥ १ ॥
दांत गये मोर पान खात।औ केश गयल मोर गंग नहात॥२॥
औ दांत गये पान खात जो कह्यो सो पान जो है वेद ताको तात्पर्य जो
जानै है यही खाब है । सो वेद तात्पर्यार्थ जानेते कामादिकजे मेरे दांतहैं
जिनते जीव सज्जनन्को ज्ञानखाय लेइहै ते दांत मेरे जातरहे काम क्रोधादिक
मायाके दांतहैं तामें प्रमाण ॥ रत्नयोग ग्रंथ कबीरजीको ॥ “काम क्रोध लोभ
मोह माया । इन दांतनसौं सब जग खाया ” ॥ औ साहबको जो कथा चरित्र
रूप गंगा तामें जो नहायहै अर्थात् सुनै है सो कुमति रूप केश मेरे जातरहे हैं॥२॥
औनयनगयलमोरकजलदेत । अरुबैसगयलपरपुरुषलेत ३
साहबको ज्ञानरूप कज्जल जो कोई दियो तो मेरे नयन जो निरंजनहैं
सो जातरहे हैं । अर्थात् चैतन्यके योग करिकै माया देखै है औ । नयनको
निरंजन कहै हैं । तामेंप्रमाण कबीरजीको ॥ “नयन निरंजन जानि भरममें
मतपरै” ॥ औ बैस जो मोर है सो परम पुरुष जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनको
लेत अपने बशकै बैस मोर जात रहे है अर्थात् चारिउ शरीर मोर
नहीं रहतेहैं ॥ ३ ॥
औ जान पुरुषवा मोर अहारा।मैं अन जानेको कर शँगार ४
औ जान पुरुषवा कहे जो या कहैहैं कि, हम ब्रह्मको जानिलियो, हमहीं
ब्रह्म हैं । तेतो हमार अहारहीहैं आपने आत्मैको भूलिगये औ अजान जे हैं
तिनको शृंगारै किये हैं नाना विषदैकै लोभाय लेउहौं । अर्थात् जानौ अजानकों
बसंत । (४८९)
विद्या अविद्या रूपीते बशकरि लियोहै धुनि याहै, जिनको साहब आपनों
हंसरूप दियो है तेई बचे हैं या उपसंहार कियो ॥ ४ ॥
कह कबीर बुढ़िया अनँद गाय।पूत भतारहि बैठि खाय॥५॥
सो श्रीकबीरजी कहै हैं कि बुढ़िया जो माया है सो जैसो या पद कहि
आये तैसो आनंदसों गावैहै । वेद शास्त्रादिकनमें वाणीरूपते सबजीव सुनैहैं
परन्तु या नहीं जानैहैं कि, जीव औ ब्रह्म माया के भितरै है । पूत जो जीव
है औ भतार जो ब्रह्महै ताको बैठिखाय है अर्थात जबजीव संसारी भयो तब
संसारमें डारिकै खायो जब ब्रह्म में लीनभयो औ सृष्टि समय आयो तब वा
ब्रह्मज्ञानहूं नहीं रहि जाइहै ब्रह्महूंको खायो ॥ ५ ॥
इति चौथा बसंत समाप्त ।
अथ पांचवां बसंत ॥ ५ ॥
तुम बूझहु पण्डित कौन नारि ।
कोइ नाहिं विआहल रहल कुमारि ॥ १ ॥
यहि सब देवन मिलि हरिहि दीन्ह ।
तेहि चारिहु युग हरि संग लीन्ह ॥ २ ॥
यह प्रथमहि पद्मिनि रूप आय ।
ह्वै सांपिनि सब जग खेदि खाय ॥ ३ ॥
या वर युवती वे वारनाह।अति तेज तिया है रैनि ताह ॥ ४ ॥
कहकबीर सबजगपियारि । यह अपनेवलकवैरहलमारि ॥५॥
तुमबूझहुपंडितकौननारि।कोइनाहिंविआहलरहलकुमारि १
यहि सबदेवनमिलि हरिहिदीन्ह।तेहिचारिहुयुगहरिसंगलीन्ह२
श्रीकबीरजी कहैहैं कि, हे पण्डित ! तुम बूझौ तौ या शङ्खिनी हस्तिनी
चित्रिणी पद्मिनी चारि प्रकारकी नारिनमें कौन नारिहै या माया है ? अर्थात एकौकें
( ४९० ) बीजक कबीरदास ।
लक्षण नहीं मिलत एकौके लक्षण जो मिलते तौ कुमारि न रहती बिबाहि
जाती याहीते अब तक कुमारि है ॥ १ ॥ जब समुद्र मथिगयो लक्ष्मीकढ़ी सो
सबदेवमिलि हरिको देतभये सो हरि चारिहुयुग सङ्गही राखतभये ॥ २ ॥
यह प्रथमहि पद्मिनिरूपआयाहै सांपिनिसब जग खेदि खाय
याबर युवती बे वार नाह । अति तेज तिया है रैनि ताह ॥४॥
प्रथमतो ब्रह्मजे हैं विष्णु तिनकी नाभिमें कमलिनीहै सो लक्ष्मी रूपहै सो
आय अब धन रूप सांपिनि है संसारको खेदिखाय है ॥ ३ ॥ या माया बरयुवती
है कहै श्रेष्ठ है बार जे लरिका ब्रह्मा विष्णु महेश तेई याके नाह हैं औ ताह
कहै तौन जो संसार रूपी रैनि है तौने में अति तेजहै ॥ ४ ॥
कह कबीर सब जगपियारियह अपने बलकवै रहल मारि ५
. सो श्रीकबीरजी कहैं हैं कि या माया सबजगतको पियारिहै आपन बाल-
क जे जीव तिनको मारि रही है अर्थात् सब जीवनको बांधे है जनन मरण
करावै है ॥ ५ ॥
इति पांचवां बसंत समाप्त ।
अथ छठवां बसंत ॥ ६ ॥
माई मोर मनुष है अति सुजान। धंधा कुटि कुटि करै बिहान १
बड़े भोर उठि अँगन वहार । बड़ी खांच लै गोबर डार ॥२॥
बासी भात मनुष ल खाय । बड़ घैला लै पानी जाय ॥३॥
अपने सैंयां बांधी पाट । लैरे बेंचौ हाटै हाट ॥ ४ ॥
कह कबीर ये हरिकेकाज । जोइयाके ढिंगर कौन है लाज ५
जीव शक्ति कहै है कि, हे माई माया ! मोर मनुष जो मन सो बड़ा
सुजान है ! धंधा जो बाल पौगंड किशोर ताहीको कूटिकूटि कहै कैकै बिहान-
कहै देहांत कै देइहै । सुजान याते कह्यो कि, मोको नहीं जान देइहै । आपही
बसंत । ( ४९१ )
जानै है बड़े भोर कहे जबदूसर भयो तब आंगन बहार कहे गर्भवासमें ज्ञान-
दियो अंतःकरण साफकियो यहीबहारबो है औ बड़ीखांच जो प्रसूत वायु तौनें-
ते गर्भरूप गोबरटारचो अर्थात् बाहर निकारचो । औ बासीभात जो पूर्व कर्म
ताको दुःख सुख आपही भोगै है । औ थैलाजो बुद्धिहै ताको लैके गुरुवन कें
यहां नाना बानी रूप पानी ताको लेनजाइ है अर्थात् बुद्धिते निश्चयकरै है ।
ऐसोजो मोर सैंयां है ताको पाट जो ज्ञान तामें बांधे पाऊं तौ हाट हाट में बेंचौं
अर्थात् साधुनको संगकरिकै अपनो औ याको सम्बन्ध छोड़ायदेउँ । सो श्रीकबी-
रजी कहैं हैं कि, जोइया जो जीव तौनेको ढिंगरा जोमन सो हरि जे श्रीरामचन्द्र
तिनको काज में जो नहीं लागे तौ याको कौन लाज है । धुनि या है जो साह-
बमें लगै तौ यहु शुद्ध होइजाय ॥ १-६ ॥
इति छठवां बसंत समाप्त ।
अथ सातवां बसंत ॥ ७ ॥
घरहीमें बाबुल बढ़ी रारि।अँग उठि उठि लागै चपल नारि १
वह बडी एक जेहि पांच हाथ।तेहि पचहुनके पच्चीस साथ २
पच्चीस बतावैं और और । वे और बतावै कई ठौर ॥ ३ ॥
सो अंतर मध्ये अंत लेइ । झकझोलि झुलावै जीव देह ॥ ४ ॥
सब आपन आपन चहैं भोग । कहु कैसे परिहै कुशल योग ५
विवेक विचार न करै कोइ । सब खलक तमाशा देख सोइ ६
मुख फारिहँसैं सब राव रंक । तेहि घेरे न पैहौ एक अंक ॥७॥
नियरे बतावैं खोजैं दूरि । वह चहुँ दिशि बागुरि रहल पूरि ८
द्वै लक्ष अहेरी एक जीउ । ताते पुकारै पीउ पीउ ॥ ९ ॥
अबकी वारै जो होय चुकावा। ताकी कबीर कहपूरिदाव १०
( ४९२ ) बीजक कबीरदास ।
घरहींमें बाबुल बढ़ी रारि । अंग उठि उठि लागै चपलनारि १
वह बड़ी एक जेहि पांच हाथ।तेहि पचहुनके पच्चीस साथ २॥
हे बाबू ! जीव तुम्हारे घटहीमें कहे शरीरहीमें रारि बढ़ीहै काहेते कि, हमेशा
उठि उठि चपल नारि जो माया सो तेरे पीछू लगैहै॥ १॥ तामें वह एक सबते बड़ी
काया जाके पांच हाथकहे पांच तत्त्वहैं पृथ्वी, अप, तेज, वायु, आकाश, पुनि एक
एक तत्त्वनके साथ पांच पांच प्रकृतिहैं। सो असकैकै पच्चीस प्रकृतिहैं कहैहैं मन, बुद्धि,
चित्त, अहंकार चौथ, पांचों अन्तःकरण जामें चारचोरह्वैहैं। ये सब निराकारहैं। ऐसे
आकाशके साथहैं। औप्राण अपान समान व्यान उदान ये कर्म करावैहैं एते वायुके
साथहैं। औ आंखी कान नाक जिह्वा त्वचा येऊ बिषयको प्रकाश करै हैं एते
अग्निके साथ हैं। औ शब्द स्पर्श रूप रस गंध सो येऊ पांचौ तृप्ति कर्त्ता हैं ।
एते जल पंचक हैं जलकेसाथहैं। औ हाथ पांव मुख गुदा लिंग येऊ आधार-
भूत हैं एते पृथ्वीकेसाथहैं । यही रीति पचहुन तत्त्वनके साथ पचीसौ
प्रकृति हैं ॥ २ ॥
पच्चीस बतावैं और और । वे और बतावैं कई ठौर ॥ ३ ॥
सो ये पच्चीसौ प्रकृति जे हैं ते और और अपने विषयको बतावै हैं । सो
कहैहैं अंतःकरणको बिषय निर्विकल्प । मन को विषय संकल्प विकल्प ।
चित्तको विषय बासना ! बुद्धि को विषय निश्चय । अहंकारको बिषय करतू-
ति । प्राणको विषय चलब । अपानको विषय छोड़ब । समानको विषय
बैठब । उदानको विषय उठब । व्यानको विषय पौढ़ब । कानको विषय
सुनब । आंखीको विषय रूप । नाकको विषय सुंघबो । जीभको विषय
बोलिबो। त्वचा को विषय स्पर्श। शब्दको विषय राग रस । स्पर्श को विषय
कोमलत्व कठिनत्व शीतलत्व उष्णत्व । रूपकोविषय सुंदरत्व । रसकोविषय
स्वाद । गंधको विषय सुबास । इनको वे पचीसौ प्रकृतिबतावैं हैं ईसब कई ठौर
और बतावै हैं कहे चौरासीलक्षयोनि जीवको बतावैहैं ॥ ३ ॥
सो अंतर मध्ये अन्त लेइ।झक झोलि झुलाउब जीव देइ ४॥
बसंत । (४९३)
सब आपन आपन चहें भोग । कह कैसे परिहैं कुशलयोग ५
बीबेक विचार न करै कोइ । सब खलक तमाशा लखै सोइ ६
सोये विषय कैसे हैं कि अंतरमें अंत लेइहैं कहे गड़ि जाते हैं । झकझेलि
कैकहे जोरवारी झुलाउब जो आवागमनहै सोजीवको देइहै ॥ ४ ॥ सो ये सब
आपन आपन भोगचाह्यो तबजीवको कुशल को योग कैसे परै अर्थात् कैसे
कल्याण पावै ॥ ५ ॥ सो ये बंधनको विवेककहे बिचार कोई नहीं करै है कि
क्या सांचहै क्या झूठहै सब खलक कहे सब संसारके लोग षाणी विषयनकों
तमाशा देखैहैं औ वहीमें अरुझि रहैहैं ॥ ६ ॥
मुख फारि हँसैं सब राव रंक । तेहि धरन न पैहौ एक अंक ७
नियरे बतावैं खोजैं दूरि । वह चहुँ दिशि वागुरि रहलपूरि ८
हैं लक्ष अहेरी एक जीउ । ताते पुकारै पीउ पीउ ॥ ९ ॥
सो वही विषयमें परिकै मुख फारिकै राव रंक सब हँसैं हैं या दुःखदायीहैं
विषय या अंक कोऊ नहीं धरन पावै है तेहिको ॥ ७ ॥ सो वेद शास्त्र पुराण
साहबको तौ नियरेही बतावैहैं औ दूरिखोजैं हैं काहेते कि, मायारूप बागुरि
सर्वत्र पूरिरहीहै ॥ ८ ॥ सो येतो सब शिकारी हैं औ लक्ष कहे निशाना
एकजीवही है ताते हे जीव ! तैं पीउ पीउ पुकारै तबहीं तेरो बचाउहै ॥ ९ ॥
अबकी बारै जो होय चुकाव । ताकी कबीर कह पूरिदाव १०
सो श्रीकबीरजी कहैं हैं कि, अबकी बार जो मानुष शरीरमें चुकाव होयगो
औ साहबको न जानैगो तौ ताकी पूरिदावहै काहेते कि अबकीबारके चूकेफेरि
ठिकाना न लगेगो चौरासीलाख योनिन में भटकैगो फेरि जो भागन
शरीर पावैगो तब पुनि नाना मतनमें लगिकै चौरासी लाख योनिमें भटकैगो
उद्धार न होइगो । ताते अबकी बार जो समझे औ साहबको जानै तौ तेरो
पूरो दांव परै तामें प्रमाण कबीरजीकीसाखी ॥ "लख चौरासी भटकि कै, पौमें
अटको आय ॥ अबकी पौ जो ना परै, तौ फिरि चौरासी जाय" ॥ १० ॥
इति सातवां बसन्त समाप्त ।
( ४९४ ) बीजक कबीरदास ।
अथ आठवां बसन्त ॥ ८ ॥
कर पल्लवके बलखेलैनारि।पण्डित जो होयसोलेइविचारि १
कपरा नहिं पहिरै रह उघारि।निरजीवै सो धनअतिपियारि२
उलटी पलटी बाजै सो तार।काहुहि मारै काहुहि उवार॥३॥
कह कबीर दासन के दास।काहुहि सुख दे काहुहि उदास४॥
कर पल्लवके बलखेलैनारि।पण्डित जो होयसोलेइविचारि १
सो श्रीकबीरजी कहै हैं कि, नारि जो माया सो पल्लव जो राम नाम सो
करमें लैके वाहीके बल खेलैहै । जब प्रथम यह जगत् की उत्पत्ति भई तब
राम नाम लैके बाणी निकसी है तामें प्रमाण ॥ “ रामनामलैउचरीबाणी ॥ ”
ताही जगत मुख अर्थ में चारिउ वेद ईश्वर ब्रह्म सब संसार निकसेहैं तामें
प्रमाणसायरको ॥ “ रामनामके दोई अक्षर चारिउवेद कहानी ” ॥ सो तौनेहीके
बलते सबसंसार बांधि लियोहै । सो जो कोई पंडित होइ सो बिचारिकै लैलेइ ।
जगत्मुख साहब मुख यामें दोऊ अर्थ हैं सो साहब मुख अर्थ रामनाममें लेइ
जगत्मुखअर्थ केवल माया खेलैहै ताको छोड़िदेइ ॥ १ ॥
कपरा नहिं पहिरै रह उघारि।निरजीवै सोधन अति पियारि२
उलटी पलटी बाजै सो तार । काहुहि मारै काहुहि उवार ३॥
सो वा नारि माया कैसी है कि कपरा नहीं पहिरै उघारही रहै है अर्थात
वह माया सबको मूंदेहै वाको मूंदनवारो कोई नहीं है । जो कहो वाको ब्रह्म
मूंदे होइगो तौ निर्जीव जो ब्रह्म सो धन जो माया ताको अति प्यारहै
अर्थात् वाहूको सबलित कियेहै ॥ २ ॥ औ पुनि कैसीहै कि उलटी पलटी
तार बाजैहै कहे काहूको अविद्यामें डारिकै नरकदेइहै औ काहूको विद्यारूपतें
स्वर्ग सत्यलोकादि देइ है ॥ ३ ॥
कह कबीर दासनके दास।काहु सुख दै काहू उदास॥४॥
श्री कबीरजी कहै हैं कि, दासनके दास कहे ब्रह्मादिक जे माया के
दास तिनहूंके दास जीव तुम्हारी माया कैसे छूटे वे ब्रह्मादिकै मायाते नहीं
छूटे । या माया कैसीहै काहूको तौ सुखदहै काहू कैति उदास है। कहे
उनको स्पर्शनहीं करिसकैहै । अर्थात् जे साहब को जानैहैं तिनकी कैति उदासहै
तिनहींके दास तुम्हूं होउ तब उबार होइगो माया ब्रह्मजीवके परे श्रीरामच-
न्द्रही हैं तामें प्रमाण ॥ “ राम एव परं ब्रह्म राम एव परंतपः। राम एव परंतत्त्वं
श्रीरामो ब्रह्म तारकं ” इतिश्रुतेः ॥ ४ ॥
इति आठवां बसन्त समाप्त ।
अथ नवां बसन्त ॥ ९ ॥
ऐसो दुर्लभ जात शरीर । रामनाम भजु लागै तीर ॥ १ ॥
गये वेणुं वलि गेहैं कंस । दुर्योधन गये बूड़े बंस ॥ २ ॥
पृथु गयै पृथवी के राव । विक्रम गये रहे नहिंकाव ॥ ३ ॥
छौ चकवे मंडलीके झार । अजहूं हो नर देखु विचार ॥४॥
हनुमत कश्यप जनकौ वार । ई सब रोंके यमके धार ॥५॥
गोपिचंद भल कीन्हों योग । रावण मरिगो करतै भोग॥६॥
जात देखु अस सबके जाम । कह कबीर भजु रामै नाम॥७॥
चौरासी लाख योनिनमें भटकत भटकत यह शरीर पायो दुर्लभ सो वृथाही
जायहै सो राम नामको भजु सेवा करु जाते तीर लगै । छौ चकवे कहिये १ वेणु
२ बलि ३ कंस ४ दुर्योधन ५ पृथु ६ विक्रम ये छवो चक्रवर्ती भूमिमंडल के, ते शरीर
छोड़िकै जातभये। सो हे नर अजहूं विचारिकै तू देखु औ हनुमत कश्यप अदिति जनक
कहे ब्रह्मा, बार कहे सनकादिक ते ये अबलौं रामनाम कहि यमको धाररोकेंहैं ।
अर्थात् जे उनके मतमें जाय रामनाम कहैंहैं ते संसारते छूटिही जायँहैं उनपै यम-
को बल नहीं चलैहै । औ गोपीचन्द योगिरहे रावण भोगिरह्यो पै रामनाम
नहीं भजे ते दोऊ मरिगये सो श्री कबीरजी कहै हैं कि याही भांति
१ अन्य प्रतियों में वेणुके स्थानमें विष्णु लिखाहै ।
२ दूसरी प्रतियोंमें धारकी जगह द्वार लिखाहै ।
॥७॥
Look at:
शिव (shiva)
माति (maati)
रहे (rahe)
हरि (hari)
चरण (charana)
सेव (seva) ।
कलि (kali)
माते (maate)
नामदेव (naamadeva)
जयदेव (jayadeva) ॥७॥
Everything matches perfectly.
Line 18:
वहसत्यसत्यकहसुँमृतिवेद । जसरावणमारेघरकेभेद ॥ ८ ॥
Wait, look at "कहसुँमृतिवेद":
क (ka)
ह (ha)
सुँ (sum) or सँ (sam) or सु (su)?
There is a footnote '२' above it, and 'ु' below: "सुँ" or "सं"?
Footnote 2 says: "२ स्मृति ।"
In the verse: "वहसत्यसत्यकहसुँमृतिवेद" or "वहसत्यसत्यकहसंमृतिवेद"?
Look closely:
It has a 'ु' below the 'स': "सु". And on top it has a candrabindu: "सुँ".
Then 'म' with 'ृ': "मृ".
Then 'त' with 'ि': "ति".
Then 'वेद': "वेद".
So: "सुँमृतिवेद" (or "सुंमृतिवेद").
Then: "जसरावणमारेघरकेभेद ॥ ८ ॥"
Line 19
बसंत । ( ४९७ )
संसार सागरको पार करनवारो एक राम नामही है तामें प्रमाण पद ॥ "माधव
दुख दारुण सहि न जाइ । मेरी चपल बुद्धि ताते का बसाइ ॥ तन मन
भीतर बस मदन चोर । तब ज्ञान रतन हरि लीन मोर ॥ हौं मैं अनाथ प्रभु
कहौं काहि । अनेक बिगूंचे मैं को आहि ॥ औ सनकसनंदन शिव शुकादि ।
आपुन कमला पति भो ब्रह्मादि ॥ योगी जंगम यति जटाधारि अपने अवसर
सब गयेहारि॥ सो कह कबीर करि संत सात । अभ्यंतर हरिसों करहु बात॥
मन ज्ञान जान करि करि बिचार । श्री राम नाम भजु होउ पार"॥ १-६ ॥
इति दशवां बसंत समाप्त ।
अथ ग्यारहवां बसन्त ॥ ११ ॥
शिवकाशीकैसीभैतुम्हारि।अजहूँहोशिवदेखहुविचारि ॥१॥
चोवाअरुचन्दनअगरपान। सबघरघरस्मृतिहोइपुरान॥२॥
बहुविधिभवननमेंलगैभोग।असनगरकोलाहलकरतलोग३
बहुविधिपरजानिर्भयहैंतोर। तेहिकारणचितहैढीठमोर॥४॥
हमरेवालककरयहैज्ञान । तोहींहरिकोसमुझवैआन ॥ ५ ॥
जगजो जेहिसों मनरहल लाय। सोजिवकेमरेकहुक हँ समाय ६
तहंजोकछुजाकरहोयअकाज।हैताहिदोषनहिंसाहवलाज ७
तवहरहर्षितसोकहलभेव । जहँहमहींहैंतहँदुसरकेव ॥ ८ ॥
तुमदिनाचारिमनधरहुधीर।पुनिजसदेखहुतसकहकवीर९॥
शिवकाशीकैसीभैतुम्हारि।अजहूँहोशिवदेखहुविचारि ॥१॥
चोवाअरुचन्दनअगरपान।सबघरघरस्मृतिहोइपुरान ॥२॥
बहुविधिभवननमेंलगैभोग।असनगरकोलाहलकरतलोग ३
बहुविधिपरजा निर्भयहैंतोर।तेहिकारणचितहैढीठमोर ॥४॥
श्री कबीरजी कहै हैं कि जब मैं बालपन में साधन करत रह्यों है तबहीं
देवतनको दर्शन होत रह्यो है । सो मैं महादेवजीते पूछ्यो कि, यह काशी
३२
(४९८) बीजक कबीरदास।
तुम्हारी कैसी भई है, अजहूं तो बिचारि देखो । तुम्हारी काशीमें चन्दन चोवा
अगर लगावैं हैं, पान खायहैं घर घर स्मृति पुरान होइहैं, बिविध भांतिके
मेवा पकवान भोग लगावै हैं, यही रीतिते नगरमें कोलाहल लोग करिरहे हैं
ऐसे परजा तुम्हारे निर्भय होइ रहे हैं तौने कारणते मोरौ चित ढीठ होइ गयो है १-४
हमरेबालककोयहैज्ञान । तोहिंहारिकोसमुझवैआन ॥ ५ ॥
जगजो जेहिसों मनरहललाय।सोजिवकेमेरेकहुकहँसमाय६॥
सो हम जे सब बालक हैं तिनकर यहै ज्ञान है तुम जे हौ महादेव औ हरि
जे हैं श्रीरामचन्द्र तिनको तो समुझावै आनहैं काहेते कि, वेद द्वार यह कहते हैं
कि, जब संसारछूटै है ज्ञान होईहै तब मुक्ति होईहै और ये सब काशीमें जे
नाना विषय भोग करै हैं संसारमें लिप्त रहे हैं सो यहू वेदैके प्रमाणसे मुक्त हो
यबो मानत है ॥५॥ और जगत् में जो जौनेमें मनलगावै है सो शरीरछूटै कहो
कहां समायहै अर्थात् जाहीमें मन लगावै है ताहीमें समाय है यहू वेद में लिखे
है॥ "अन्ते या मतिः सा गतिः॥" सोहम तुमसों पूछै हैं कि विषयमें मन लगाये
मरे जे काशीके लोग ते कहां जायँहैं ? ॥ ६ ॥
तँहजोकछुजाकरहोइअकाज।हैताहिदोषसाहवनलाज ॥७॥
हरहर्षितह्वैतवकहलभेव । जहँहमहींहैंतहँडुसरकेव ॥ ८ ॥
तुमदिनाचारमनधरहुधीर।पुनिजसदेखहुतसकहकवीर॥९॥
सो जाकर अकाज होईहै ताहीको दोष है काहेते, वाके कर्मही ते अकाज
होईहै । साहब जो आपहै श्रीरामचन्द्र तिनको कौन लाज है जो आप काशीके
जीवनको मुक्ति देइहैं सो कौने हेतुते कहा ? औरे संसार क्या आपका नहीं है
काशी ही आपकी है ? ॥ ७ ॥ तब हर्षित ह्वैकै हर मोसे भेद बतायो
कि, जहां हमहैं तहां दूसरको है काशीमें औ सब संसारमें जहां हमहैं अर्थात्
हमको जे जानै हैं तेके कर्म औ कालई कैसे जोर कैसकैं काहेते कि जब हम ब्रह्माते राम
नाम पायो है तब जान्यो है ताहीते मुक्त करै हैं राम नामको उपदेश करि
श्रीरघुनाथजीको ज्ञानदेइहै वाको तब मुक्त होईहै । सोकाशीहूमें रामनाम दै
मुक्त करै है। औरहू देशमें राम नाम पाइकै मुक्तह्वै जाइहै ॥ ८ ॥ सो दिन-
चार तुम मनमें धीर धरो पुनि जस देख्यो तस हे कबीर तुम कह्यों अर्थात्
बसंत । (४१९)
जैसे हम रामनाम दैके जीवनको उद्धार करते हैं तैसे तुमहूं करोगे । तब तस
देखोगे कि राम नामते कैसेहू विषयी होइ पै वाको उद्धारई होइ जाइहै। औ काशीमें
रामनामही ते मुक्तिहोइहै रामई नाम महादेव देइहैं तामें प्रमाण ॥ “पेयं पेयं-
श्रवणपुटके रामनामाभिरामं ध्येयं ध्येयं मनसि सततं तारकं ब्रह्मरूपम् । जलपं
जलपंप्रकृतिविकृतौ प्राणिनां कर्णमूले वीथ्यांवीथ्यामटतिजटिलः कोपि काशी
निवासी । इतिस्कांदे” ॥ ९ ॥
इति ग्यारहवां बसंत समाप्त ।
अथ बारहवां बसंत ॥ १२ ॥
हमरे कहल कर नहिं पतियार। आपु बूड़े नर सलिलै धार १॥
अंधा कहै अंध पतियाय । जस बिश्वा के लगनै जाय ॥२॥
सोतो कहिये अतिहि अबूझ। खसम ठाढ़ ढिग नाहीं सूझ ३
आपन आपन चाहहिं मान । झूठ परपंच सांचकै जान॥४॥
झूठा कबहूं करौ नहि काज । मैं तोहिं बरजौं सुनु निरलाज ५
छाड़हु पाखंड मानहुं बात । नहिंतौ परिहौ यमके हात ॥६॥
कहै कबीर नर चले न सोझ। भंटकि मुये जस वनके रोझ ७
हमरे कहल कर नहिं पतियार। आपु बूड़े नर सलिलै धार १॥
अंधा कहै अंध पतियाय । जस बिश्वाके लगनै जाय ॥ २ ॥
सो तौ कहिये अतिहि अबूझ । खसम ठाढ़ ढिग नाहीं सूझ ३
श्री कबीरजी कहै हैं कि, हमरे कहे ये जीव कोई नहीं पतियायहैं साहब
में कोई नहीं लगते हैं; आपने खुशीते बानी रूप सलिलमें बूड़े जाते हैं बानी को
पानी आगे कहि आये हैं ॥ १ ॥ आंधर जे गुरुवा लोगहैं ते नाना मतनको
बतावै हैं और आँधर जे जीव तें ग्रहण करै हैं साहब को नहीं जानै हैं जैसे
बेश्या की लगन, वह तो नाना पुरुषते रमै है एकको जानतिही नहीं है ऐसे नाना
उपासना मानै हैं सो साहब को मानतही नहीं हैं ॥ २ ॥ सो ते जीवन को
( ५०२ ) बीजक कबीरदास ।
छिलकत थोथे प्रेमसों, धरि पिचकारी गात ।
करि लीनो बश आपने, फिरि फिरि चितवत जात ९॥
ज्ञान गाड़ लै रोपिया, त्रिगुण लियो है हाथ ।
शिव सन ब्रह्मा लीनिया, और लिये सब साथ ॥१०॥
एक ओर सुर मुनि खड़े, एक अकेली आप ।
दृष्टि परे छोड़ै नहीं, करि लीनो यक छाप ॥११॥
जेते थे ते ते लियो, घूंघुट माहँ समाय ।
कज्जल वाके रेखहै, अदग गया नहिं कोय ॥१२॥
इंद्र कृष्ण द्वारे खड़े, लोचन दोउ ललचाय ।
कह कबीर ते ऊबरे, जाहि न मोह समाय ॥१३॥
खेलति माया मोहनी, जेर कियो संसार ।
कटि कहेरि गज गामिनी, संशय कियो शृंगार ॥१॥
रचै रंगकी चूनरी, सुन्दरि पहिरै आय ।
शोभा अद्भुत रूपकी, महिमा वरणि न जाय ॥ २ ॥
जौन माया सब संसार को जेर कियो है सो मोहिनी माया चाचरि खेलै
है । केहरि जो है काल सब को खाइलेनवारो सो वाकी कटिहै कहैं मध्यभाग
है । मध्य में बैठिकै अधो ऊर्ध्व को खाय है । औ मन गज है तेही कारिकै
चलै है । औ संशय रूप श्रृङ्गार किये अर्थात् जहँ बहुत संशय होईहै तहँ माया
बहुत शोभित होइ है ॥ १ ॥ नारी लोग रचैकहे जो पीउ को रुचैहै सो चूनरी
पहिरे हैं औ माया नाना विषय जो जीवन को नीक लगै ताकी चूनरी पहिरैं
है अद्भुत शोभा स्त्रियनहूं की होईहै यहै मायौकी अद्भुत शोभा है ॥ २ ॥
चन्द्र बदनि मृग लोचनी, बिन्दुक दियो उगालि ।
यती सती सब मोहिया, गज गति बाकी चालि ॥३॥
चांचर । (५०३)
नारदको मुखमाड़िकै, लीन्हो बदन छिपाय ।
गर्व गहेली गर्वते, उलटि चली मुसकाय ॥ ४ ॥
औ नारी चंद्र बदनी मृग नयनी बिंदुक दीन्हे घूँघुट उवारि गज की नाईं
चलि सबको मोहै हैं । माया कैसी है कि, चंद्रबदनी है चन्द्रमाके समान
याहू आपने पदार्थते सबको आनन्द देय है । मृगनयनी कहे यहू चंचल
है । बिंदुक दीन्हे उघारि कहे आपने रागको फैलाय देइहै गजगति कहे धीरे
धीरे यती सती सबको मोहै है ॥ ३ ॥ वै स्त्री नारद कहे जाके रद कहे दांत
नहीं हैं ऐसे जे वृद्ध पुरुष तिनको मुख माड़िकै बदन कहे बोलिबो छिनाय
लेती हैं । अर्थात् और बोलिबो सो छूटि जाइहै नारी नारी यहै कहै हैं ।
चाचरि वोऊ गावै लगै हैं । अथवा माया जो है सो नारद ऐसे मुनिको बांद-
रकी नाईं मुख कै दियो । शीलनिधि राजाकी कन्याको काज करै चलै ।
और स्त्री गर्व को गहे लोगनके मोहिबे को चाचरि में मुसक्याय चलैहै ।
औ माया जो है सोऊ नारदके गर्वको गहि कै मुसक्यायकै चली है ॥ ४ ॥
शिव अरु ब्रह्मा दौरिकै, दोनों पकरे जाय । फगुवा लीन
छिनायकै, बहुरि दियो छिटकाय ॥ ५ ॥ अनहद धुनि
बाजा बजै, श्रवण सुनत भो चाव । खेलनि हारी खेलिहै,
जैसी वाकी दाव ॥ ६ ॥
स्त्री जेहैं ते पुरुषनते चाचरि में पकारि फगुवा लैके आपस में छिटकाय कहे
बांंटिलेय हैं तैसेही मायाजो है सोऊ ब्रह्मा शिव तिन को पकरिकै फगुवा जो
नाना मत सो लैिकै अनेक ब्रह्मांडनमें छिटकाय दीन्हों ॥ ५ ॥ चाचरि में
बाजा बजै है ताको सुनिकै चाव होइ है खेलनिहारी आपनो दावँ ताकि ताकि
खेलै हैं । औ माया जो है सोऊ अनहद बाजा बजाइ जौनके सुनतमें योगिन
के चाव होइहै सो खेलनिहारी जो कुंडलिनी शक्ति सो जैसो वाको दावँ है तैसो
खेलै है जीवको चढ़ावै औ उतारै है ॥ ६ ॥
आगे ढाल अज्ञानकी, टारे टरत न पाव। खेलनिहारी खे
लिहै,बहुरि न ऐसीदाव७सुरनर मुनि भूदेवता,गोरख दत्ता
व्यास।सनक सनन्दनहारिया,और कि केतिक आस॥८॥
( ५०४ ) बीजक कबीरदास ।
चाचरिमें स्त्री भोंडरकी ढाल आगेंकरि पांव पीछेको नहीं टारै हैं सो खेल-
निहारी जे हैं ते जब पतिको पाय जाय हैं तब कहैं हैं कि, खेलि लेउ अब
ऐसो दाँव न मिलैगो। औ यहां मायाजो है सोऊ अज्ञानकी ढाल आगे लीन्हे है,
जाको पांव ज्ञानभक्ति बैराग्यकरैं टारे नहीं टरै सो, खेलनिहारी जो माया सो
खेलैबै करी ऐसो दाँव वाको फिरि न मिलैगो अपने बशकरि पायोहै ॥७॥ औ
चाचरि में स्त्रिनते पुरुष हारि जाइहैं सुख मानै हैं औ माया जो है ताहूसों
सुर जेहैं देवता, नर जेहैं मनुष्य, मुनि जेहैं ज्ञानी, भूदेव जे हैं ब्राह्मण, गोरख
जे हैं योगी कवि, दत्तात्रेयजे हैं अवधूत, ब्यास जे हैं कवि, सनकसनंदनजे हैं
त्यागी ते सब हारिगये औरकी कौन गिनती है ॥ ८ ॥
छिलकत थोथे प्रेमसों, धरि पिचकारी गात ।
करि लीनो वश आपने, फिरि फिरि चितवत जात॥९॥
ज्ञान गाड़ लै रोपिया, त्रिगुण लिये है हाथ ।
शिव सँग ब्रह्मा लीन्हिया, और लिये सब साथ॥ १०॥
चाचरि में नारी रंगकी पिचकारो गात में सींचि आपने बश करि फिरि
फिरि चितवत कहे कटाक्ष करै हैं इसी प्रकार मायाजोहै सोऊ थोथे कहे झूठे-
प्रेमसो संसार राग सबको गातसींचैहै आपनेबश करिलियोहै औ फिरिफिरि
चितवत जातै है कहे सबको ताकेरहै है कि कोऊ बाच्यौतौ नहीं ॥९॥ औचाच-
रिमें स्त्री लोग रंगकेहौदमें डारिदेइ हैं औ फूलनके मालामें हाथबांधै हैं पुरुषन-
को वैसेही माया जोहै सोऊ ज्ञानके गाड़में ब्रह्मादिक देवतनको डारिकै त्रिगुण
की फांसीमें बांधि लियो ॥ १० ॥
एक ओर सुर मुनि खड़े, एक अकेली आप ।
दृष्टि परे छोड़ै नहीं, करिलिय एकै छाप ॥ ११ ॥
जेते थे तेते लियो, घूंघुट माहँ समाय ।
कज्जल वाके रेख हैं, अदग न कोई जाय ॥ १२ ॥
इन्द्र कृष्ण द्वारे खड़े, लोचन निज ललचाय ।
कह कबीर ते ऊबरे, जाहि न मोह समाय ॥ १३ ॥
चाचर । ( ५०५ )
औ चाचारिमें दुइ पारा होयहैं एकओर स्त्री एकओर पुरुष होइहैं ऐसें सुर
नर मुनि सब एक ओर माया अकेली आप है दृष्टिपरे काहूको नहीं छोड़ैहै ॥ ११ ॥
वैसे स्त्री जे हैं ते आपने घूंघुट में सबको मन समाय लेइहैं सबके काजर
लगाइदेइ हैं अदगकोई नहीं जायहै वैसे माया जो है सोऊ अपनेमें सबको
समाय लियो है सबकें एकदाग लगाइ दियो है अदग कोई नहीं बच्यो ॥ १२ ॥
चाचरि में स्त्रिनके द्वारे इन्द्र कृष्ण सबखड़े रहै हैं लोचन देखिबेको ललचायहैं
ऐसे माया जोहै ताहूके द्वारमें इन्द्रकृष्णजे हैं उपेन्द्र ते खड़ेहैं मायाके देखिबे
को लोचन ललचाय हैं सो श्रीकबीरजी कहै हैं कि तेई पुरुष उबरे हैं जे मोहमें
नहीं समाने हैं ॥ १३ ॥
इति पहिली चाचर समाप्त ।
अथ दूसरी चाचर ।
जारहु जगको नेहरा मन बौराहो ।
जामें शोक संताप समुझ मन बौराहो ॥ १ ॥
काल बूतको हस्तिनी मन बौराहो ।
चित्र रच्यौ जगदीश समुझ मन बौराहो ॥ २ ॥
बिना नेइको देवघरा मन बौराहो ।
बिन कहागिलकै ईंट समुझ मन बौराहो ॥ ३ ॥
तन धन सो क्या गर्व समुझ मन बौराहो ।
भसम क्रीमकी साजु समुझ मन बौराहौ ॥ ४ ॥
काम अन्ध गज बश परे मन बौराहो ।
अंकुश सहिया शीश समुझ मन बौराहो ॥ ५ ॥
ऊँच नीच जानेहु नहीं मन बौराहो ।
घर घर नाचेहु द्वार समुझ मन बौराहो ॥ ६ ॥
( ५०६ ) बीजक कबीरदास ।
मरकट मूठी स्वादकी मन बौराहो ।
लीन्हों भुजा पसारि समझ मन बौराहो ॥ ७ ॥
छूटनकी संशय परी मन बौराहो ।
घर घर खायो डांग मन बौराहो ॥ ८ ॥
ज्यों सुवना नलिनी गह्यो मन बौराहो ।
ऐसा मर्म विचारि समझ मन बौराहो ॥ ९ ॥
पढ़े गुने का कीजिये मन बौराहो ।
अंत बिलैया खाय समझ मन बौराहौ ॥ १० ॥
सूने घरका पाहुना मन बौराहो ।
ज्यों आवै त्यों जाय ममुझ मन बौराहो ॥ ११ ॥
न्हाने को तीरथघनी मन बौराहो ।
पूजैका बहुदेव समझ मन बौराहो ॥ १२ ॥
बिनपानी नर बूड़िया मन बौराहो ।
तुम टेकहु राम जहाज समझ मन बौराहो ॥ १३ ॥
कह कबीर जग भर्मिया मन बौराहो ।
तुम छोड़े हरिका सेव समझ मन बौराहो ॥ १४ ॥
जारहु जगको नेहरा मन बौराहो ।
जामें शोक संताप समझ मन बौराहो ॥ १ ॥
कालबूतकी हस्तिनी मन बौराहो ।
चित्र रचो जगदीश समझ मन बौराहो ॥ २ ॥