कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४९२ ) बीजक कबीरदास ।
घरहींमें बाबुल बढ़ी रारि । अंग उठि उठि लागै चपलनारि १
वह बड़ी एक जेहि पांच हाथ।तेहि पचहुनके पच्चीस साथ २॥
हे बाबू ! जीव तुम्हारे घटहीमें कहे शरीरहीमें रारि बढ़ीहै काहेते कि, हमेशा
उठि उठि चपल नारि जो माया सो तेरे पीछू लगैहै॥ १॥ तामें वह एक सबते बड़ी
काया जाके पांच हाथकहे पांच तत्त्वहैं पृथ्वी, अप, तेज, वायु, आकाश, पुनि एक
एक तत्त्वनके साथ पांच पांच प्रकृतिहैं। सो असकैकै पच्चीस प्रकृतिहैं कहैहैं मन, बुद्धि,
चित्त, अहंकार चौथ, पांचों अन्तःकरण जामें चारचोरह्वैहैं। ये सब निराकारहैं। ऐसे
आकाशके साथहैं। औप्राण अपान समान व्यान उदान ये कर्म करावैहैं एते वायुके
साथहैं। औ आंखी कान नाक जिह्वा त्वचा येऊ बिषयको प्रकाश करै हैं एते
अग्निके साथ हैं। औ शब्द स्पर्श रूप रस गंध सो येऊ पांचौ तृप्ति कर्त्ता हैं ।
एते जल पंचक हैं जलकेसाथहैं। औ हाथ पांव मुख गुदा लिंग येऊ आधार-
भूत हैं एते पृथ्वीकेसाथहैं । यही रीति पचहुन तत्त्वनके साथ पचीसौ
प्रकृति हैं ॥ २ ॥
पच्चीस बतावैं और और । वे और बतावैं कई ठौर ॥ ३ ॥
सो ये पच्चीसौ प्रकृति जे हैं ते और और अपने विषयको बतावै हैं । सो
कहैहैं अंतःकरणको बिषय निर्विकल्प । मन को विषय संकल्प विकल्प ।
चित्तको विषय बासना ! बुद्धि को विषय निश्चय । अहंकारको बिषय करतू-
ति । प्राणको विषय चलब । अपानको विषय छोड़ब । समानको विषय
बैठब । उदानको विषय उठब । व्यानको विषय पौढ़ब । कानको विषय
सुनब । आंखीको विषय रूप । नाकको विषय सुंघबो । जीभको विषय
बोलिबो। त्वचा को विषय स्पर्श। शब्दको विषय राग रस । स्पर्श को विषय
कोमलत्व कठिनत्व शीतलत्व उष्णत्व । रूपकोविषय सुंदरत्व । रसकोविषय
स्वाद । गंधको विषय सुबास । इनको वे पचीसौ प्रकृतिबतावैं हैं ईसब कई ठौर
और बतावै हैं कहे चौरासीलक्षयोनि जीवको बतावैहैं ॥ ३ ॥
सो अंतर मध्ये अन्त लेइ।झक झोलि झुलाउब जीव देइ ४॥