कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबसंत । (४९३)
सब आपन आपन चहें भोग । कह कैसे परिहैं कुशलयोग ५
बीबेक विचार न करै कोइ । सब खलक तमाशा लखै सोइ ६
सोये विषय कैसे हैं कि अंतरमें अंत लेइहैं कहे गड़ि जाते हैं । झकझेलि
कैकहे जोरवारी झुलाउब जो आवागमनहै सोजीवको देइहै ॥ ४ ॥ सो ये सब
आपन आपन भोगचाह्यो तबजीवको कुशल को योग कैसे परै अर्थात् कैसे
कल्याण पावै ॥ ५ ॥ सो ये बंधनको विवेककहे बिचार कोई नहीं करै है कि
क्या सांचहै क्या झूठहै सब खलक कहे सब संसारके लोग षाणी विषयनकों
तमाशा देखैहैं औ वहीमें अरुझि रहैहैं ॥ ६ ॥
मुख फारि हँसैं सब राव रंक । तेहि धरन न पैहौ एक अंक ७
नियरे बतावैं खोजैं दूरि । वह चहुँ दिशि वागुरि रहलपूरि ८
हैं लक्ष अहेरी एक जीउ । ताते पुकारै पीउ पीउ ॥ ९ ॥
सो वही विषयमें परिकै मुख फारिकै राव रंक सब हँसैं हैं या दुःखदायीहैं
विषय या अंक कोऊ नहीं धरन पावै है तेहिको ॥ ७ ॥ सो वेद शास्त्र पुराण
साहबको तौ नियरेही बतावैहैं औ दूरिखोजैं हैं काहेते कि, मायारूप बागुरि
सर्वत्र पूरिरहीहै ॥ ८ ॥ सो येतो सब शिकारी हैं औ लक्ष कहे निशाना
एकजीवही है ताते हे जीव ! तैं पीउ पीउ पुकारै तबहीं तेरो बचाउहै ॥ ९ ॥
अबकी बारै जो होय चुकाव । ताकी कबीर कह पूरिदाव १०
सो श्रीकबीरजी कहैं हैं कि, अबकी बार जो मानुष शरीरमें चुकाव होयगो
औ साहबको न जानैगो तौ ताकी पूरिदावहै काहेते कि अबकीबारके चूकेफेरि
ठिकाना न लगेगो चौरासीलाख योनिन में भटकैगो फेरि जो भागन
शरीर पावैगो तब पुनि नाना मतनमें लगिकै चौरासी लाख योनिमें भटकैगो
उद्धार न होइगो । ताते अबकी बार जो समझे औ साहबको जानै तौ तेरो
पूरो दांव परै तामें प्रमाण कबीरजीकीसाखी ॥ "लख चौरासी भटकि कै, पौमें
अटको आय ॥ अबकी पौ जो ना परै, तौ फिरि चौरासी जाय" ॥ १० ॥
इति सातवां बसन्त समाप्त ।